सेंक
गरमी, ताप।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सेंकना)

सेंक
शरीर के किसी अंग पर गरम चीज से पहुँचाई जानेवाली गर्मी, टकोर।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सेंकना)

सेंकना, सेंकनो
आँच के पास या आग पर रखकर गर्मी पहुँचाना या भूनना।
क्रि.स.
(सं. श्रेषण=जलाना, तपाना)

सेंकना, सेंकनो
धूप में या गरमी पहुँचानेवाली चीज के सामने रहकर उसकी गर्मी से लाभ उठाना या उठाने को प्रवृत्त करना।
क्रि.स.
(सं. श्रेषण=जलाना, तपाना)
मुहा.- आँखें सेंकना-किसी (नारी) का सुन्दर रूप देखकर आँखें तृप्त करना।

सेंगर
एक पौधा जिसकी फलियों की तरकारी बनती है।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रृंगार)

सेंगर
इस पौधे की फली।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रृंगार)

सेंगर
क्षत्रियों की एक जाति।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रृंगीवर)

सेंट
स्तन से निकलने वाली दूध की धार।
संज्ञा
स्त्री.
(देश.)

संठा
मूँज या सरकंडे के सींके का निचला मोटा हिस्सा।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

सेंत
अपने पास से कुछ खर्च या व्यय न होना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. संहति=किफायत)
मुहा.- सेंत का-(१) जिसके लिए खर्च न करना पड़ा हो, मुफ्त में मिला हुआ। (२) बहुत सा, ढेर का ढेर। उ.-दधि में पड़ी सेंत की मोपै चीटी सबै कढ़ाईं-१०-३२२। सेंत में- (१) बिना कुछ दाम दिये या खर्च किये। (२) व्यर्थ, निष्प्रयोजन।

सृष्टि
रचकर या बनाकर तैयार करने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

सृष्टि
जन्म, उत्पत्ति।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

सृष्टि
रचना, निर्माण।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

सृष्टि
संसार, जगत।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)
उ.- मानौं आन सृष्टि करिबे कौं अंबृज नाभि जम्यौ - 1- 273।

सृष्टि
संसार या जगत के चर-अचर प्राणी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)
उ.- इनतैं प्रगटी सृष्टि अपार- 3-8।

सृष्टि
प्रकृति, निसर्ग।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

सृष्टिकर्ता, सृष्टिकर्त्ता
सृष्टि या संसार की रचना करनेवाला, ब्रह्मा।
संज्ञा
पुं.
(सं. सृष्टिकर्त्तृ)

सृष्टिकर्ता, सृष्टिकर्त्ता
ईश्वर।
संज्ञा
पुं.
(सं. सृष्टिकर्त्तृ)

सृष्टि-विज्ञान
वह शास्त्र जिसमें सृष्टि की उत्पत्ति, रचना, विकास आदि का विचार किया जाता है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेंक
सेंकने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं.) सेंकना)

सेंत
बहुत अधिक, ढेर का ढेर।
वि.

सेंतना, सेंतनो
इकट्ठा या संचित करना।
क्रि.स.
(हिं. सैंतना)

सेंतना, सेंतनो
समेटना।
क्रि.स.
(हिं. सैंतना)

सेंतना, सेंतनो
सहेजना।
क्रि.स.
(हिं. सैंतना)

सेंतमेंत
बिना दाम दिये, मुफ्त में।
क्रि. वि.
[हिं. सेंत + मेंत (अनु.)]
उ.- कलुषी अरू मन मलिन बहुत मैं सेंतमेंत न बिकाऊँ-१-१२८।
मुहा. सेंतमेंत का - मुफत का। सेंतमेंत में- (१) मुफ्त में। (२) व्यर्थ।

सेंतमेंत
बेमतलब, वृथा, निष्प्रयोजन।
क्रि. वि.
[हिं. सेंत + मेंत (अनु.)]

सेंति, सेंती
कुछ खर्च या व्यय का न होना।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सेंत)
मुहा. सेंति के- बहुत से। उ.- सखा संग लीन्हें जु सेंति के फिरत रैनि दिन बन में धाए-१०९३। सेंति या में - बिना मूल्य के, मुफ्त में। उ.- प्रानन के बदले न पाइयत सेंति बिकाय सुजस की ढेरी-२८५२।

सेंति, सेंती
पुरानी हिन्दी की करण और अपदान की विभक्ति, से।
प्रत्य.
[प्रा. सुंतो (पंचमी विभक्ति)]
उ.- (क) ता रानी सेंती सुत ह्यैहै-६-५। (ख) तप कीन्हैं सो दैहैं आग। ता सेंती तुम कीनौ जाग-९-२। (ग) बहुरि सक्र सेंती कहथौ जाइ-९-१७४।

सेंथी
भाला, बरछी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शक्ति)
उ.- इंद-जीत लीनी जब सेंथी (पाठा. - सक्ती) देवनि हहा करथौ। छूटी बिज्जु-रासि वह मानौ, भूतल बंधु परथौ-९-१४४।

सेंद
चोरी करने के लिए दीवर में किया गया छेद जिसमें से होकर चोर घर में जा सके और सामान बाहर निकाल सके।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सेंध)

सेतु
मर्यादा, प्रतिबंध।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेतु
सफेद, उजला, उज्ज्वल।
वि.
(सं. श्वेत)

सेतुबंध
पुल की बँधाई।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेतुबंध
वह पुल जो श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करने के उद्देश्य से नल, नील आदि बानरों की सहायता से बँधवाया था।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेतुबंध रामेश्वर
दक्षिण में शिव का एक मंदिर जिसकी स्थापना सेतु बंधन के अवसर पर श्रीराम द्वारा की जाना प्रसिद्ध है। यह हिन्दुओं के चार मुख्य धामों में से एक है।
संज्ञा
पुं.
(सं. सेतुबंध + रामेश्वर)

सेतुवा
एक जलजंतु।
संज्ञा
पुं.
(सं. सूस)

सेद
पसीना।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वेद)

सेद
हर्ष, लज्जा आदि से पसीना आना जो एक सात्विक अनुभाव है।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वेद)

सेदज
पसीने से उत्पन्न होनेवाला।
वि.
(सं. स्वेदज)

सेध
मनाही, निषेध।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौगाती
बढ़िया, उत्तम।
वि.
(हिं. सौगात)

सौधा
सस्ता।
वि.
(हिं. महँगा का विप.)

सौच
शुद्धता।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोच)

सौच
पविता। जीवन-यापन।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोच)

सौच
मल-त्याग, कुल्ला- दातुनआदिकृत्य।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोच)

सौचि, सौचिक
सूची-कर्म से जीविकार्जन करनेवाला, दरजी।
संज्ञा
पुं.
(सं. सौचिक)

सौज
साज-सामान, सामग्री।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सज्जा)
उ.- (क) लेहु सँभारि देहु पिय अपनी विन प्रमान सब सौज धरी। (ख) जन पुकारे हरि पै जाइ। जिनकी यह सब सौज राधिका तेरे तनु सब लई छँड़ाइ।

सौज
चीज, वस्तु।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सज्जा)

सौज
बलवान, शक्तिशाली।
वि.
(सं. सौजस)

सौजना, सौजनो
सँवरना।
क्रि.अ.
(हिं. सजना)

सौजना, सौजनो
सँवारना।
क्रि.स.
(हिं. सजाना)

सौजन्य
भलमंसाहत, सुजनता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौजन्यता
भलमंसी, सुजनता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सौजन्य)

सौजा
वह पशु या पक्षी जिसका शिकार किया जाता हो।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सावज)

सौड़
ओढ़ने की चादर।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सौंड़)

सौड़ा
कम चौड़ा।
वि.
(हिं. चौड़ा का विप.)

सौत, सौतन, सौतनि
किसी स्त्री के प्रेमी या पति की दूसरी प्रेमिका या पत्नी, सवत।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सपत्नी)

सौति
सूत' का पुत्र, कर्ण।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौति
सवत, सौकन, सपत्नी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सौत)
उ.- (क) मानौं स्वर्गहिं तैं सुरपति-रिपु-कन्या-सौति आइ ढरि सिंदहिं-१०-१०७। (ख) चेरि सौति भइ आइ-६५६। (ग) नींद जो सौति भई रिपु हमको, सहि न सकी रति तिल की-२७८६।

सौतिन, सौतिनि, सौतिनी
सवत, सपत्नी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सौता)
उ.- धरनी नख चरननि कुरवारति सौतिन भाग सुहाग दुहीली-१३०९।

सौति-साल
सौत के कारण होनेवाली कुढ़न या मिलनेवाला दुख।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सौति + साल)
उ.- (क) इक टक चितै रही प्रतिबिंबहिं सौति-साल जिय जानी-१८६५। (ख) सौति-साल उर में अति साल्यौ नखसिख लौं भहरानी-२६७३।

सौतुक, सौतुख, सौतुष
सामना, समक्ष, समक्षता प्रत्यक्षता।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सौतुख)
उ.- देखि बदन चकृत भई सौतुक की सपने।

सौतुक, सौतुख, सौतुष
सामने, समक्ष, प्रत्यक्ष।
क्रि. वि.

सौतेला, सौतेलो
सौत से उत्पन्न।
वि.
(हिं. सौत + एला, एलो)

सौतेला, सौतेलो
जिसका संबंध सौत के रिश्ते या पक्ष से हो।
वि.
(हिं. सौत + एला, एलो)

सौत्र
ब्राह्मण।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौत्र
सूत-संबंधी।
वि.

सौत्र
सूत्र-संबंधी।
वि.

सौत्रांत्रिक
बौद्धों का एक वर्ग।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौत्रिक
जुलाहा, तंतुवाय।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौदागरी
वाणिज्य, व्यापार।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)

सौदामनी, सौदामिनि, सौदामिनी
बिजली, बिधुत।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सौदामनी)
उ.- बंदन सो ससि में बए मनो सौदामिनि के बीज-२०६५।

सौदामनी, सौदामिनि, सौदामिनी
एक रागिनी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सौदामनी)

सौदामनीय, सौदामिनीय
बिजली जैसा चंचल और चमकदार।
वि.
(सं. सोदामनौय)

सौध
प्रासाद।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौध
चाँदी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौधकार
भवन भनानेवाला, राज।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौधना, सौधनो
शुद्ध करना।
क्रि.स.
(हिं. सोधना)

सौधना, सौधनो
शुद्धता की जाँच करना।
क्रि.स.
(हिं. सोधना)

सौधना, सौधनो
भूल या त्रुटि दूर करना।
क्रि.स.
(हिं. सोधना)

सौदर्य
भाईपन, भ्रातृत्व।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौदा
वह चीज जो खरीदी या बेची जाय।
संज्ञा
पुं.
(अ.)
मुहा.- सच्चा सौदा-खरा सौदा, ऎसा सौदा जिसमें किसी प्रकार का धोखा या हानि न हो।

सौदा
खरीदने-बेचने या लेन-देन की बातचीत।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

सौदा
खरीदने-बेचने की बातचीत पक्की करना।
संज्ञा
पुं.
(अ.)
मुहा.- सौदा करना-खरीदने की बात-करना। सौदा कराना-खरीदने की बातचीत कराना। सौदा पटना या होना- खरीदने की बातचीत पक्की होना। सौदा पटाना-खरीदने की बातचीत पक्की करना या कराना।

सौदा
क्रय-विक्रय, व्यापार।
संज्ञा
पुं.
(अ.)
मुहा.- सच्चा सौदा, सौदा साँचौ-खरा व्यापार, व्यापार जिसमें किसी प्रकार का छल-कपट न हो। उ.- सूर स्याम को सौदा साँचौ-१-३१०।

सौदा
सौदा-सुलुफ-खरीदन की चीजैं। सौदा-सूत-व्यापार, व्यवहार।
यौ.

सौदा
पागल, बादला या दीवाना-पन।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा.)

सौदा
उर्दू के एक प्रसिद्ध शायर।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा.)

सौदाई
पागल, बावला।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सौदा)
मुहा.- सौदाई होना- बहुत आसक्त होना। सौदाई बनाना-अपने ऊपर किसी को आसक्त करना।

सौदागर
व्यापारी, व्यवसायी।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा.)

सौधना, सौधनो
ढूँढ़ना।
क्रि.स.
(हिं. सोधना)

सौधना, सौधनो
धातु संस्कार करना।
क्रि.स.
(हिं. सोधना)

सौधना, सौधनो
ऋण चुकाना।
क्रि.स.
(हिं. सोधना)

सौधना, सौधनो
निश्चित करना।
क्रि.स.
(हिं. सोधना)

सौनंद
बलराम के मूसल का नाम।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौनंदी
सौनंद' नामक मूसलधारी, बलराम।
संज्ञा
वि.
(सं. सौनन्दिन्)

सौन
सामने, प्रत्यक्ष।
क्रि. वि.
(सं. सम्मुख)

सौन
सोना, स्वर्ण।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वर्ण)

सौन
पीला या सुनहरा रंग।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वर्ण)

सौन
अबीर।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वर्ण)

सौभग
ऎश्वर्य।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौभग
सौंदर्य।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौभद्र
सभद्रा का पुत्र, अभिमन्यु।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौभरि
एक ऋषि जिन्‍होंने यमुना में एक मत्स्य को मछलियों से भोग करते देख, काम-वासना से मान्धाता की पचास कन्याओं से विवाह करके उनसे पाँच हजार पुत्र उत्पन्न किये। अंत में भोग से तृप्ति न होते देख विरक्त होकर कठोर तपस्या करने के उपरंत शरीर त्याग दिया था।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- सौभरि रिषि जमुना-तट गयौ। तहाँ मच्छ इक देखत भयौ-९-८।

सौभागिन, सौभागिनि, सौभागिनी
सधवा या सुहागिन स्त्री।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सौभाग्य)

सौभाग्य
खुशकिस्मती, अच्छा भाग्य।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौभाग्य
सुख, आनंद।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौभाग्य
कुशल-क्षेम।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौभाग्य
स्त्री के सधवा होने की अवस्था।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौभाग्य
ऎश्वर्य; वैभव।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौनक, सौकनि
शौनक ऋषि।
संज्ञा
पुं.
(सं. शौनक)
उ.-सूत सौनकनि सौं यौं कहथौ-१-२०७।

सौनजाइ, सौनजुही
पीली जूही या चमेली, स्वर्ण यूथिका।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सोनजुही)

सौना
स्वर्ण, (धातु)।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोना)

सौपना, सौपनो
सौंपना।
क्रि.स.
(हिं.) सौंपना)

सौपर्ण
सुपर्ण अथबा गरुण-संबंधी।
वि.
(सं.)

सौबल
गांधार के राजा सुबल का पुत्र शकुनि जो दुर्योंधन का मामा था।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौबीर
सिंधु नद के आसपास के प्रदेश का प्राचीन नाम।
संज्ञा
पुं.
(सं. सौबीर)

सौबीर
उस प्रदेश का निवासी।
संज्ञा
पुं.
(सं. सौबीर)

सौभग
सौभाग्य।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौभग
सुख।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौभाग्यवती
सधवा, सुहागिन।
वि.
स्त्री.
(सं.)

सौभाग्यवती
अच्छे भाग्यवाली।
वि.
स्त्री.
(सं.)

सौभाग्यवान, सौभाग्यवान्
अच्छे भाग्यवाला।
वि.
(सं. सौभाग्यवत्)

सौभाग्यवान, सौभाग्यवान्
सुख-संपन्न।
वि.
(सं. सौभाग्यवत्)

सौमन
एक प्रचीन अस्त्र।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौमनस
फूलों का।
वि.
(सं.)

सौमनस
सुंदर।
वि.
(सं.)

सौमनस
प्रसन्नता।
संज्ञा
पुं.

सौमनस
अस्त्रों को निष्फल करनेवाला अस्त्र।
संज्ञा
पुं.

सौमनस्य
प्रसन्नता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौमनस्य
प्रेम।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौमनस्य
आनंद या प्रसन्नता देनेवाला।
वि.

सौमित्र
लक्ष्मण।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौमित्र
मित्रता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौमित्रा
सुमित्रा जो लक्ष्मण की माता थी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सुमित्रा)
उ.- सौमित्रा कैकेवी मन आनंद वह सवहिन सुत जायौ-९-२२।

सौमित्रि
सुमित्रा के पुत्र लक्ष्मण।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौम्य
सोमरस-संबंधी।
वि.
(सं.)

सौम्य
चंद्रमा-संबंधी।
वि.
(सं.)

सौम्य
नम्र और सुशील।
वि.
(सं.)

सौम्य
उत्तर की ओर का।
वि.
(सं.)

सेना
नियम पूर्वक खाने-पीने आदि के कार्य करना।
क्रि.स.
(सं. सेवन)

सेना
किसी स्थान पर निरंतर वास करना या पढ़े रहना।
क्रि.स.
(सं. सेवन)

सेना
दूर न करके व्यर्थ के लिए दैठे रहना।
क्रि.स.
(सं. सेवन)

सेना
मादा चिड़िया का गरमी पहुँचाने के लिए अंडे पर बैठना।
क्रि.स.
(सं. सेवन)

सेनादार
सेनापति।
संज्ञा
पुं.
(सं. सेना + फ़ा. दार)

सेनाध्यक्ष
सेनानायक।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेनानायक
सेनापति।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेनानी
सेनापति।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेनानी
देव-सेनापति स्वामि कार्तिकेय का एक नाम।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेनापति
सेना का प्रधान अधिकारी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौम्य
शुभ, मांगलिक।
वि.
(सं.)

सौम्य
सोम यज्ञ।
संज्ञा
पुं.

सौम्य
चंद्रमा का पुत्र, बुध।
संज्ञा
पुं.

सौम्य
अगहन मास।
संज्ञा
पुं.

सौम्य
सुशीलता।
संज्ञा
पुं.

सौम्य
एक दिव्यात्म।
संज्ञा
पुं.

सौम्यग्रह
(चार) शुभ ग्रह-चंद्र, बुध, बृहस्पति और शुक्र।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौम्यता
सुशीलता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

सौम्यता
शीतलता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

सौम्यता
सुंदरता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

सौम्यता
उदारता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

सौम्यदर्शन
जो देखने में सुंदर हो।
वि.
(सं.)

सौम्यी
चाँदनी। चंद्रिका।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

सौर
सूर्य का, सूर्य-संबंधी।
वि.
(सं.)

सौर
सूर्य से उत्पन्न।
वि.
(सं.)

सौर
सुर्य के अनुसार या उससे प्रभावित।
वि.
(सं.)

सौर
सूर्य का पुत्र, शनि।
संज्ञा
पुं.

सौर
सूर्य का उपासक।
संज्ञा
पुं.

सौर
सूर्यवंशी क्षत्रिय।
संज्ञा
पुं.

सौर
ओढ़ने की चादर।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सौंड)

सौरज
शूरता, वीरता।
संज्ञा
पुं.
(सं. शैर्य्य)

सौर-जगत
सूर्य और उसकी परिक्रमा करनेवाले ग्रहों का समूह।
संज्ञा
पुं.
(सं. शैर्य्य + जगत)

सौरत
सुरत या रति-संबंधी।
वि.
(सं.)

सौरत्य
रति-सुख, संभोग।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौर दिवस
एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय तक का समय।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौरभ
खुशब, सुगंध।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- (क) त्रिबिध समीर सुमन सौरभ मिलि मत्त मधुप गुंजार। (ख) ज्यौं सौरभ मृग-नाभि बसत है द्रुम-तृन सूंधि फिरथौ-२-२६।

सौरभ
आम, आम्र।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौरभ
सुरभि अर्थात् गाय से उत्पन्न।
वि.

सौरभमय
सुगंधित।
वि.
(सं.)

सौरभित
सुगंध से युक्त।
वि.
(सं.)

सौर मास
तीस दिन का वह समय जब सूर्य बारह राशियों में से किसी एक राशि में रहता है; एक संक्रांति से दूसरी संक्रांति तक का समय।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौरवर्ष, सौरसंवत्सर
उतना काल जिताना सूर्य को बारह राशियों पर धूमने में लगता है; एक मेष संक्रांति से दूसरी मेष संक्रांति तक का समय।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौरसेन
आधुनिक मथुरा और उसके आसपास के प्रदेश का पुराना नाम जो राजा शूरसेन के नाम पर पड़ा था।
संज्ञा
पुं.
(सं. शौरसेन)

सौरस्य
रसीलापन, सुरसता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौराटी
एक रागिनी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

सौराष्ट्र
गुजरात-काठियावाड़ का पुराना नाम, सोरठ देश।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौराष्ट्र
उक्त देश का निवासी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौराष्ट्रक
सौराष्ट्र का निवासी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौराष्ट्रिक
सौराष्ट्र-संबंधी।
वि.
(सं.)

सौराष्ट्रिक
सौराष्ट्र प्रदेश का निवासी।
संज्ञा
पुं.

सौरास्त्र
एक प्राचीन दिव्यास्त्र।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौरि
सूर्य का पुत्र, शनि।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौरिक
शनि ग्रह।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौरिक
स्वर्ग।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौरी
वह स्थान जहाँ स्त्री प्रसव करे, सूतिकागार।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सूतिका)

सौरी
सूर्य की पत्नी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

सौरी
गाय।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

सौरी
एक तरह की मछली।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सफरी)

सौरी
ओढ़ने की चादर।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सौंड़)

सौरे, सौरेय, सौरेयक
सफेद कटसरैया या झिंटी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौर्य
सूर्य- संबंधी।
वि.
(सं. सौर्य्य)

सौर्य
सूर्य का पुत्र, शनि।
संज्ञा
पुं.

सौवर्ण
सोना (धातु), सुवर्ण।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौवर्ण
सोने का।
वि.

सौवाँ
जिसका स्थान निन्यानबे की संख्या के बाद पड़े।
वि.
(हिं. सौ + वाँ)

सौबीर
सिंधु नद के आसपास के प्रदेश का प्राचीन नाम।
वि.
(सं.)

सौबीर
उक्त प्रदेश का निवासी या राजा।
वि.
(सं.)

सौवों, सौवौं
जिसका स्थान निन्यानबे की संख्या के बाद पड़े।
वि.
(हिं. सौवाँ)
उ.- सौवों जज्ञ सगर जब टयौ। इंद्र अस्व कौं हरि लै गयौ-९-९।

सौष्‍ठव
सुडौलता, सुष्ठता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौष्‍ठव
सौंदर्य।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौष्‍ठव
फुर्ती, तेजी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौष्‍ठव
नाटक का एक अंग।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौसन
एक पौधा।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोसन)

सौसनी
लाली मिला नीला या पीला रंग।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोसनी)

सौसनी
सोसन के फूल के रंग का।
वि.

सौहँ
कसम, सौगंध।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शपथ, प्रा. सबह)

सौहँ
सामने, समक्ष।
क्रि. वि.
(सं. सम्मुख, प्रा. सम्मुह)

सौहर
पति।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. शौहर)

सौहरा
ससुर।
संज्ञा
पुं.
(हिं. ससुर)

सौहार्द, सौहार्द्य
मित्रता, बंधुत्व।
संज्ञा
(सं.)

सौहार्द, सौहार्द्य
सज्जनता।
संज्ञा
(सं.)

सौहीं
एक तरह का हथियार।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा. सोहन)

सौहीं
सामने, समक्ष।
क्रि. वि.
(हिं. सौहँ)

सौहृद
मित्रता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौहृद
मित्र।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौहृद
सुहृद या मित्र-संबंधी।
वि.

स्कंद
निकलने या बाहर आने की क्रिया।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्कंद
विनाश, ध्वंस।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्कंद
देव सेनापति कार्तिकेय।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्कंद
देह, शरीर।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्कंदक
सिपाही, सैनिक।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्कंदगुप्त
गुप्त वंश का एक प्रसिद्ध सम्राट जो 'विक्रमादित्य' के नाम से भी प्रसिद्ध है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्कंदजननी
पार्वती, दुर्गा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्कंदजित, स्कंदजित्
स्कंद को जीतनेवाले विष्णु।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्कंदजित्)

स्कंदन
सोखना, शोषण।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्कंदन
जाना, गमन।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्कंदन
बहना, गिरना, स्खलन।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्कंदपुराण
अठारह पुराणों में एक।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्कंदित
बहा हुआ , स्खलित।
वि.
(सं.)

स्कंध
मोढ़ा, कंधा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्कंध
वृक्ष के तने का ऊपरी भाग जिसमें से डालियाँ निकलती हैं, कांड।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्कंध
डाल, शाखा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्कंध
झुंड, समृह।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्कंध
सेना का अंग, व्यूह।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्कंध
ग्रंथ का विभाग या खंड जिसमें कोई पूरा प्रसंग हो।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- ब्यास कहथौ सुकदेव सौं, श्रीभागवत बखानि। द्वादस स्कंध परम सुभ प्रेम-भक्ति की खान-१०-१।

स्कंध
मार्ग, पंथ।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्कंध
देह, शरीर।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्कंध
वह वस्तु जिसका राज्याभिषेक में उपयोग हो।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्कंध
युद्ध, संग्राम।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्कंध
दर्शन शास्त्र में शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेनापति
देवसेनापति, स्वामी कार्तिकेय।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेनापत्य
सेनापति का पद, कार्य या अधिकार।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेनापाल
सेनापति।
संज्ञा
पुं.
(सं. सेना + पाल)

सेनाबास
छावनी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेनाबास
शिविर।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेना-व्यूह
युद्ध के लिए की गयी सेना-रचना या स्थापना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेनि
कतार, पाँति, पंक्ति।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्रेणी)

सेनि
क्रम।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्रेणी)

सेनि
दरजा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्रेणी)

सेनि
सीढ़ी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्रेणी)

स्कंधदेश
कंधा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्कंधदेश
पेड़ का तना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्कंधवह, स्कंधवाह
वह पशु जो कंधों के बल बोझ खीचता हो।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्कंधवाह)

स्कंधावार
राजा का डेरा या शिविर।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्कंधावार
सेना का पड़ाव, छावनी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्कंभ
खंभा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्कंभ
ईश्वर।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्‍खलन
चीरना-फाड़ना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्‍खलन
हिंसा, हत्या।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्‍खलन
सताना, उत्पीड़न।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्‍खलन
गिरना, बहना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्खलित
गिरा या बहा हुआ।
वि.
(सं.)

स्खलित
फिसला या सरका हुआ।
वि.
(सं.)

स्खलित
लड़खड़ाया हुआ, विचलित।
वि.
(सं.)

स्खलित
चूका हुआ, लक्ष्य से हटा हुआ।
वि.
(सं.)

स्तंबक
गुच्छा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तंभ
खंभा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तंभ
पेड़ का तना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तंभ
(हर्ष, लज्जा, भय आदि से) शरीर के अंगों का शिथिल या जड़ हो जाना, जो साहित्य में एक प्रकार का सात्विक भाव माना गया है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तंभ
जड़ता, अचलता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तंभन
वीर्य-पात को रोकना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तंभन
शीघ्र वीर्य-पात को रोकने की औषध।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तंभन
सहारा, टेक।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तंभन
जड़ या निश्चेष्ट करना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तंभन
वह तांत्रिक प्रयोग जिससे किसी की चेष्टा, शक्ति आदि को रोका जाय।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तंभन
कामदेव के पाँच वाणों- उन्माद, शोषण, तापन, सम्मोह, और स्तंभन-में एक।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तंभित
जड़, सुन्न, निश्चल, निश्चेष्ट।
वि.
(सं.)

स्तंभित
ठहरा या ठहराया हुआ।
वि.
(सं.)

स्तंभित
रुका या रोकाहुआ।
वि.
(सं.)

स्तंभित
आश्चर्य-युक्त, चकित।
वि.
(सं.)

स्तंभ
रुकावट, प्रतिबंध।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तंभ
वह तांत्रिक प्रयोग जिससे किसी की चेष्टा, गति या शक्ति रोकी जाय।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तंभ
वह व्यक्ति, तत्व आदि जो किसी संस्था, कार्य-सिद्धांत आदि का आधार-स्वरूप हो।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तंभ
समाचार-पत्रों का विषय-विशेष के अनुसार किया गया विभाग।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तंभक
रोकनेवाला; रोधक।
वि.
(सं.)

स्तंभक
संभोग-काल में वीर्य को शीघ्र स्खलित होने से रोकनेवाला (प्रयोग या औषध)।
वि.
(सं.)

स्तंभक
खंभा, स्तम्भ।
संज्ञा
पुं.

स्तंभता
स्तंभ' का भाव, अवरुद्धता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्तंभता
जड़ता, अचलता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्तंभन
रुकावट, अवरोध।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तन
स्त्रियों या मादा पशुओं के शरीर का वह अंग जिसमें दूध रहता है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तनन
ध्वनि, नाद।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तनन
बादलों की गर्जन।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तनन
कराह, आर्तनाद।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तनप
दूध पीनेवाला (बच्चा)।
वि.
(सं.)

स्तन-पान
स्तन से दूध पीना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तनपायिका
दूद्य पीती (बच्ची)।
वि.
(सं.)

स्तनपायी
दूध पीता (बच्चा)।
वि.
(सं.स्‍तनपायिन्)

स्तन्य
दूध।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तन्य
जो स्तन में हो।
वि.

स्तर
कार्य-संपादन, उत्सव आयोजन, जीवन-यापन आदि में व्यय इत्यादि की दृष्टि से लगायी जानेवाली अनुमानित उच्च, मध्यम अथवा निम्न श्रेणी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तव
किसी देनी-देवता की पद्यबद्ध स्तुति या गुण-गान, स्तोत्र।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तव
स्तुति, प्रार्थना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तव
श्लाघा प्रशंसा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तवक
स्तव, स्तुति या प्रार्थना करनेवाला।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तवक
फूलों का गुच्छा, गुलदस्ता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तवक
झुंड, समूह।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तवक
ढेर, राशि।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तवक
पुस्तक का अध्याय या परिच्छेद।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तवन
स्तुति, गुण-कथन।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तन्य
स्तन-संबंधी।
वि.

स्तब्ध
जड़, सुन्न, अचल, निश्चेष्ट।
वि.
(सं.)

स्तब्ध
दृढ़ता से स्थिर।
वि.
(सं.)

स्तब्ध
धीमा, सुस्त, मंद।
वि.
(सं.)

स्तब्धता
जड़ता, अचलता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तब्धता
दृढ़ता, स्थिरता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तब्धता
सुस्ती, मंदता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तब्धता
सन्नाटा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तर
तह, परत।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तर
भूमि का वह विभाग जो भिन्न-भिन्न कालों में बनी हुई उसकी तहों या परतों के आधार पर होता है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तिमित
तर, गीला, आर्द्र।
वि.
(सं.)

स्तिमित
स्थिर, निश्चल।
वि.
(सं.)

स्तिमित
शांत।
वि.
(सं.)

स्तिमित
प्रसन्न, संतुष्ट।
वि.
(सं.)

स्तीर्ण
दूर तक फैला हुआ, विस्तुत।
वि.
(सं.)

स्तीर्ण
इधर-उधर बिखरा हुआ, विकीर्ण।
वि.
(सं.)

स्तुत
जिसकी स्तुति की गयी हो।
वि.
(सं.)

स्तुति
प्रशंसा, गुणकथन, प्रार्थना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)
उ.- (क) कपिल स्तुति तिहिं बहु बिधि कीन्हीं-९-९। (ख) अकूर बिमल स्तुति गानै-२५५७। (ग) लोक-लोकन बिदित कथा तुरतही गई, करन स्तुतिहिं जहाँ तहाँ आए-२६१८।

स्तुतिवादक
स्तुति या प्रशंसा करनेवाला।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तुतिवादक
खुशामदी, चाटुकार।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तोत्र
देवी-देवता की पद्यबद्धस्तुति।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तोत्र
प्रार्थना, स्तुति।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तोम
स्तुति।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तोम
समूह, राशि।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्त्री
नारी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्त्री
पत्नी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्त्रीजित, स्त्रीजित्
स्त्री या पत्नी के वश में रहनेवाला।
वि.
(सं. स्त्रीजित्)

स्त्रीत्‍व
स्त्री' होने का भाव, गुण या धर्म।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्त्रीत्‍व
स्त्रियों जैसा भाव, जनानापन।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्त्रीत्‍व
स्त्री का वह गुण जिसके अनुसार वह पति के अतिरिक्त किसी से प्रेम या शरीर -संबंध नहीं करती सतीत्व।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तुती
प्रार्थना, बड़ाई।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्तुति)
उ.- किऎ नर की स्तुती कौन कारज सरै, करै सो आपनौ जन्म हारै-४-११।

स्तुत्य
स्तुति या प्रशंसा के योग्य।
वि.
(सं.)

स्तूप
मिटटी-पत्थर का ढूह, टीला।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तूप
वह ढूह या टीला जिसके नीचे भगवान बुद्ध या किसी अन्य बौद्ध महात्मा की अस्थि, दाँत, केश आदि स्मृति-चिह्न संरक्षित हों।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तेन
चोर।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तेन
चोरी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तेय
चोरी का कार्य।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तोक
बूँद।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तोक
चातक (पक्षी)।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्तोता
स्तुति करनेवाला।
वि.
(सं. स्तोतृ)

सेधक
हटाने या रोकनेवाला।
वि.
(सं.)

सेन
एक भक्त जो जाति का नाई था।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेन
बाज पक्षी।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्येन)

सेन
फौज, सैनिकदल।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सेना)

सेनजित, सेनजित्
श्रीकृष्ण के एक पुत्र का नाम।
संज्ञा
पुं.
(सं. सेनजित)

सेनप, सेनपति
सेनापति।
संज्ञा
पुं.
(सं. सेना + प, पति)

सेना
फौज, सैनिक-दल।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)
उ.-सप्त समुद्र देउँ छाती तर, एतिक देह बढ़ाऊँ। चली जाऊँ सेना (सैना) सब मोपर धरौ चरन रघुबीर-९-१०७।

सेना
बहुत बड़ा झुंड या दल।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)
उ.-(क) कोटि छ् यानबे नृप-सेना सब जरासंध बँध छोरे-१-३१। (ख) सेना साथ बहुत भाँतिनि की कीन्हें पाप अपार-१-१४१।

सेना
टहल या सेवा करना।
क्रि.स.
(सं. सेवन)

सेना
पूजा, उपासना या आराधना करना।
क्रि.स.
(सं. सेवन)

स्त्रीत्‍व
(व्याकरण में) शब्द का स्त्री-लिंग-वाची प्रत्यय।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्त्री-धन
ऎसा धन जो स्त्री को मैके या ससुराल से मिले और जिस पर एकमात्र उसी का अधिकार रहे।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्त्री-धर्म
स्त्री का (प्रति मास) रजस्वला होना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्त्री-धर्म
स्त्री का कर्तव्य।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्त्रीलिंग
व्याकरण में वह शब्द जो स्त्री जाति का अथवा वस्तु के अल्पार्थक या सुकुमार रूप का सूचक होता है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्त्रीव्रत
पत्नी के अतिरिक्त दूसरी स्त्री की कामना न करना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्त्रीव्रती
जो पत्नी के अतिरिक्त दूसरी स्त्री की कामना न करे।
वि.
(सं.स्त्रीव्रत)

स्त्रैण
स्त्री-संबंधी।
वि.
(सं.)

स्त्रैण
स्त्रियों जैसा।
वि.
(सं.)

स्त्रैण
स्त्री या पत्नी के वश में रहनेवाला।
वि.
(सं.)

स्थगित
जो कुछ समय के लिए रोक दिया गया हो।
वि.
(सं.)

स्थल
जमीन, भूमि।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थल
जल से रहित भूमि।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थल
जगह, स्थान।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थल
ऎसी जगह जहाँ कोई विशंष रचना, निमर्ण आदि हो या होने को हो।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थल
मौका, अवसर।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थल-कमल
एक फूल।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थलगामी
भूमि पर रहने-बसनेवाला (प्राणी)-।
वि.
(सं.स्थलगामिन्

स्थलचर
भूमि पर रहने-बसनेवाला (प्राणी)-।
वि.
(सं.)

स्थलचारी
भूमि पर रहने या विचरण करनेवाला (प्राणी)।
वि.
(सं.स्‍थलचारन्)

स्त्रैण
जो स्त्रियों के संपर्क में ही रहता हो।
वि.
(सं.)

स्थ
एक प्रत्यय जो शब्दांत में लगकर मुख्यतःचार अर्थ देता है-स्थित, विद्यमान, निवासी और लीन।
प्रत्य.
(सं.)

स्थकित
थका हुआ, शिथिल।
वि.
(सं.थकित)

स्थगन
छिपाना, लुकाना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थगन
ढकना, आच्छादन।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थगन
(कार्य, विचार, बैठक आदि) कुछ समय के लिए रोक देना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थगित
ढका हुआ, आच्छादित।
वि.
(सं.)

स्थगित
छिपा हुआ, तिरोहित।
वि.
(सं.)

स्थगित
बंद रुद्ध।
वि.
(सं.)

स्थगित
रोका या ठहराया हुआ।
वि.
(सं.)

स्थाई
स्थायी।
वि.
(सं.)

स्थाणु
खंभा, स्तंभ।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थाणु
(पेड़ का) ठूँठ।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थाणु
एक तरह का भाला।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थाणु
स्थिर वस्तु।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थाणु
स्थिर, अचल, स्थावर।
वि.
(सं.)

स्थान
ठहराव, स्थिति।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थान
मैदान, खुला स्थान।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थान
विशेषतायुक्त स्थल।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- पावै मेरो परम स्थान-११-६।

स्थान
नियत या निश्चित स्थल।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थलज
जो भंमि से उत्पन्न हो।
वि.
(सं.)

स्थल-युद्ध
मैदान की लड़ाई।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थल-विग्रह
मैदान का युद्ध।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थली
जमीन, भूमि।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्थली
जगह या स्थान-विशेष।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)
उ.- प्रगट भई कुच-स्थली सोख्यो जोबन-सूरि-२०६५।

स्थलीय
भूमि का, भूमि-संबंधी।
वि.
(सं.)

स्थलीय
भूमि पर रहने-बसनेवाला।
वि.
(सं.)

स्थलीय
किसी स्थान का, स्थानीय।
वि.
(सं.)

स्थविर
बुढ़ा मनुष्य।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थविरा
बूढ़ी स्त्री।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्थान
घर, आवास।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थान
काम करने की जगह।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थान
दर्जा, ओहदा, पद।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थान
(व्याकरण में) मुख का वह अंग जहाँ से किसी वर्ण का उच्चारण हो।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थान
मंदिर, देवालय।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थान
मौका, अवसर।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थान
कारण, उद्देश्य।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थान
जगह (की जगह पर), बदला (केबदले में)।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- पात्र स्थान हाथ हरि दीन्हें-२-२०।

स्थानच्युत
जो अपने स्थान से गिर या हट गय हो।
वि.
(सं.)

स्थानच्युत
जो अपने पद से हटा दिया गया हो।
वि.
(सं.)

स्थानभ्रष्ट
स्थानच्युत।
वि.
(सं. स्थान + भ्रष्ट)

स्थानांतर
प्रस्तुत से भिन्न स्थान।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थानांतरण
किसी वस्तु का एक स्थान से हटाकर दूसरे स्थान पर रखा जाना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थानांतरण
किसी वस्तु का एक व्यक्ति से दूसरे के हाय में पहुँचना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थानांतरण
किसी कर्मचारी या कार्यकर्ता का एक विभाग से दूसरे विभाग में या एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजा जाना, बदली।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थानांतरित
जिसका स्थान बदल दिया गया हो, जो एक स्थान से दूसरे पर रख या भेज दिया गया हो।
वि.
(सं.)

स्थानापन्न
किसी के न रहने पर उसके स्थान पर अस्थायी रूप से बैठने या काम करनेवाला।
वि.
(सं.)

स्थानिक
उस स्थान का जिसके संबंध में कुछ चर्चा या उल्लेख हो।
वि.
(सं.)

स्थानीय
जो किसी स्थान पर स्थित हो।
वि.
(सं.)

स्थानीय
उस स्थान से संबंधित जिसका उल्लेख हुआ हो।
वि.
(सं.)

स्थानेश्वर
थानेश्वर नामक तीर्थ।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थापक
स्थापन करनेवाला।
वि.
(सं.)

स्थापक
(संस्था आदि की) स्थापना करनेवाला;, संस्थापक।
वि.
(सं.)

स्थापक
मूर्ति या प्रतिमा बनानेवाला।
संज्ञा
पुं.

स्थापक
(नाटक में) सूत्रधार का सहकारी।
संज्ञा
पुं.

स्थापत्य
भवन-निर्माण।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थापत्य
वह विद्या जिसमें भवन-निर्माण-संबंधी विषयों का विवेचन हो, वास्तुशास्त्र।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थापन
दृढ़तापूर्व्रक जमाना, बैठाना या रखना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थापन
स्थायी रूप से स्थित करना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थापन
नयी संस्था का नया कार-बार खड़ा करना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थापन
किसी विषय को (सप्रमाण) सिद्ध करना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थापना
स्थापन।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्थापना
स्थापित करना।
क्रि.स.

स्थापित
जिसकी स्थापना की गयी हो।
वि.
(सं.)

स्थापित
व्यवस्थित, निर्दिष्ट।
वि.
(सं.)

स्थापित
निश्चित।
वि.
(सं.)

स्थापित
दृढ़ता से स्थित।
वि.
(सं.)

स्थायित्व
स्थायी होने का भाव, गुण, धर्म या अवस्था।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थायित्व
स्थिरता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थायी
टिकने, ठहरने या स्थिर रहनेवाला।
वि.
(सं. स्थायिन्)

स्थायी
बहुत दिन तक चलने या बना रहनेवाला।
वि.
(सं. स्थायिन्)

स्थायी
संगीत में किसी गीत का पहला चरण, टेक (दूसरा पद 'अंतरा' होता है)।
संज्ञा
पुं.

स्थायी भाव
वे तत्व या भाव जो मनुष्य के मन में सदा निहित रहते और विशिष्ट कारण से जाग्रत होते हैं और रस-परिपाक में, बिरुद्ध-अविरुद्ध भावों को अपने में समा लेते हुए, अंत तक बने रहते हैं। इनके आधार पर साहित्य में नौ रस माने गये हैं जिनके नाम और उनके स्थायी भाव ये हैं- श्रृंगार रस का स्थायीभाव रति, हास्य का हास, करूण का शोक , रौद्र का क्रोध, वीर का उत्‍साह, भयानक का भय, बीभत्स का घृणा, अदभुत का विस्मय और शांत का निर्वेद।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थाली
हंडी, हँडिया।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्थाली
मिट्टी की तश्तरी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्थालीपुलाक न्याय
(हाँडी में पकते चावलों में से एक देखकर सबकी स्थिति जान लेने की तरह) एक बात देखकर अन्य बातें समझ लेना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थावर
अचल, स्थिर।
वि.
(सं.)
उ.- मुरली अति गर्व काहु बदति नाहिं आजु¨¨¨¨¨¨। स्थावर चर, जंगम जड़ करति जीति जीति-६५३।

स्थावर
जो अपने स्थान से हट ही न सके, 'जंगम' का विरुद-द्यार्थक।
वि.
(सं.)

स्थावर
स्थायी।
वि.
(सं.)

स्थावर
पहाड़, पर्वत।
संज्ञा
पुं.

सेनिका
बाज पक्षी की मादा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्येनिका)

सेनी
तश्तरी, रकेबी।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा. सीनी)

सेनी
बाज पक्षी की मादा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्येनी)

सेनी
पंक्ति।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्रेणी)

सेनी
परंपरा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्रेणी)

सेनी
दरजा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्रेणी)

सेनी
सीढ़ी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्रेणी)

सेनु
झुंड, दल, समूह।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सेना)
उ.- (क) स्याम-हलधर संग सँग बहु गोप-बालक-सनु-४२७। (ख) जुरी ब्रज-बालक सेनु-४४८।

सेफालिका
निर्गुड़ी (पौधा)।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शेफालिका)

सेब
एक प्रसिद्ध फल।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा.)
उ.- सफ सेब छुहारे पिस्ता जे तरबूजा नाम-१०-२१२।

स्थावर
अचल संपत्ति।
संज्ञा
पुं.

स्थावरता
स्थिरता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्थाविर
बुढ़ौती, वृद्धावस्था।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थित
एक स्थान पर ठहरा या टिका हुआ।
वि.
(सं.)

स्थित
बैठा हुआ, आसीन।
वि.
(सं.)

स्थित
अपनी बात पर दृढ़।
वि.
(सं.)

स्थित
विद्यमान, उपस्थित।
वि.
(सं.)

स्थित
रहनेवाला, निवासी।
वि.
(सं.)

स्थित
बसा हुआ, अवस्थित।
वि.
(सं.)

स्थित
अचल, स्थिर।
वि.
(सं.)

स्थिति
टिकाव, ठहराव।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्थिति
बैठन या आसीन रहने की अवस्था या भाव।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्थिति
रहने या निवास करने की स्थिति।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्थिति
दर्जा, पद।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्थिति
एक स्थान, अवस्था या रूप में बना रहना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्थिति
पर्याप्त समय, अवस्था या कार्य के पश्चात् प्राप्त व्यक्ति, संस्था आदि कीमर्यादा, सम्मान आदि की सूचक दशा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्थिति
किसी आरोप आदि के पक्ष में अपने संबंध को स्पष्ट करनेवाली बात।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्थितिप्रज्ञ
जिसकी विवेकबुद्धि स्थिर हो।
वि.
(सं.)

स्थितिप्रज्ञ
आत्मसंतोषी।
वि.
(सं.)

स्थिर
एक ही स्थिति में बना रहनेवाला, निश्चल।
वि.
(सं.)

स्थिरता
धीरता, धैर्य।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्थिरधी
स्थिरचित्त।
वि.
(सं.)

स्थिरबुद्धि
स्थिरचित्त।
वि.
(सं.)

स्थिरमति
स्थिरचित्त।
वि.
(सं.)

स्थिरमना
स्थिरचित्त।
वि.
(सं. स्थिर + मन )

स्थिर यौवन
जो सदा युवा रहे।
वि.
(सं.)

स्थिरा
दृढ़ चित्तवाली।
वि.
(सं.)

स्थिरीकरण
स्थिर करने की क्रिया।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थूल
मोटा, पीन।
वि.
(सं.)
उ.- देख्थो भरत तरुन अति सुंदर। स्थूल सरीर, रहित सब द्वंदर ¨¨¨¨¨¨। तन स्थूल अरु दूबर होइ। परमातम कौं ये नहिं दोइ-५-४।

स्थूल
सहज में दिखायी देने या समझ में आ सकनेवाला, सूक्ष्म का विपरीतार्थक।
वि.
(सं.)

स्थूल
मूर्ख, जड़।
वि.
(सं.)

स्थूल
मोटे हिसाब से अनुमान किया या ध्यान में आया हुआ।
वि.
(सं.)

स्थूलता
स्थूल' होने का गुण, भाव या धर्म।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्थूलता
मोटापन।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्थूलता
भारीपन।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्थैर्य
स्थिरता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थैर्य
दृढ़ता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्नात
जिसने स्नान किया हो।
वि.
(सं.)

स्नात
जिस पर किसी प्रकार का प्रभाव पड़ा हो, ओत-प्रोत।
वि.
(सं.)

स्नातक
वह जिसने (ब्रह्मचर्यपूर्वक) विद्याध्ययन समाप्त कर लिया हो।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थिर
निश्चित।
वि.
(सं.)

स्थिर
शांत, प्रकृतिस्थ।
वि.
(सं.)

स्थिर
दृढ़, अटल।
वि.
(सं.)

स्थिर
सदा बना रहनेवाला, स्थायी।
वि.
(सं.)

स्थिरचित्त
जो अपनी बात या विचार पर दृढ़ रहता हो।
वि.
(सं.)

स्थिरचित्त
जो विकल या विचलित न हो।
वि.
(सं.)

स्थिरचेता
स्थिरचित्त।
वि.
(सं. स्तिर + हिं. चेत)

स्थिरता
ठहराव, निश्चलता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्थिरता
दृढ़ता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्थिरता
स्थिायित्व।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्नातक
वह जो विश्व विद्यालय की परीक्षा में उत्तीर्ण हो।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्नान
नहाना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- (क) स्नान करि अंजली-जल नृप लियौ-८-१६। (ख) तहँ उरवसी सखिनि समेत आई हुती स्नान कैं हेत-९-२। (ग) यहि अंतर यमुना तट आए स्नान-दान कि खरथौ-२५५२।

स्नान
धूप, वायु आदि के सामने शरीर को इस प्रकार करना कि उसका सारे अंगों पर पूरा प्रभाव पड़े।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्नान
इस प्रकार किसी वस्तु का दूसरी पर पड़नेवाला प्रभाव।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्नानगृह
वह कमरा जिसमें स्नान करने की व्यवस्था हो।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्नानागार
स्नानगृह।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्नायविक
स्नायु-संबंधी।
वि.
(सं.)

स्नायवीय
(हाथ, पैर आदि) कर्मेन्द्रिय।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्नायु
शरीर की वे नसें जिनसे शीत, ताप, वेदना आदि की अनुभूति होती है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्निग्ध
जिससे स्नेह या प्रेम हो।
वि.
(सं.)

स्निग्ध
जिसमें स्नेह या तेल लगा हो, चिकना।
वि.
(सं.)

स्निग्धता
चिकनापन, चिकनाहट।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्निग्धता
प्रिय होने का भाव, प्रियता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्नुषा
पुत्र की पत्नी, पतोहू, पुत्रवधू।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्नेह
छोटों के प्रति वात्‍सल्‍य-भाव।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्नेह
प्यार, प्रेम।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्नेह
चिकना पदार्थ, तेल।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्नेहपात्र
वह जिसके प्रति स्नेह हो।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्नेही
स्नेहपात्र।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्नेहिन् )

स्नेही
प्रेमी।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्नेहिन् )

स्नेही
जिसके प्रति स्नेह हो।
वि.

स्नेही
जिसका स्वभाव ही स्नेह करने का हो।
वि.

स्नेही
चिकना।
वि.

स्पंद
धीरे-धीरे हिलना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्पंद
अंग़ों आदि की फड़क, धड़क।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्पंदन
किसी चीज का धीरै-धीरे हिलना-काँपना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्पंदन
(अंगों का) फड़कना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्पंदित
हिलता-काँपता या फड़कता हुआ।
वि.
(सं.)

स्पंदी
हिलने, काँपने या फड़कनेवाला।
वि.
(सं. स्पंद)

स्पंर्द्धा, स्पर्धा
किसी के मुकाबले या किसी प्रतियोगिता में आगे बढ़ने की इच्छा, होड़।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्पर्द्धा)

स्पंर्द्धा, स्पर्धा
सामर्थ्य या योग्यता से अधिक करने या पाने की इच्छा, हौंसला या साहस।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्पर्द्धा)

स्पंर्द्धा, स्पर्धा
सद्भावपूर्वक किसी के समक्ष होने की कामना या चेष्टा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्पर्द्धा)

स्पंर्द्धा, स्पर्धा
ईर्ष्या, द्वेष।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्पर्द्धा)

स्पंर्द्धी, स्पर्धी
स्पर्द्धा करनेवाला, जिसमें स्पर्द्धा का भाव हो।
वि.
(सं. स्पर्दिन्. हिं. स्पर्द्धी)

स्पर्श
दो या अधिक वस्तुओं के परस्पर सटने, लगने या छूने का भाव।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्पर्श
त्वचा का वह गुण जिससे छूने, दबने आदि का बोझ या अनुभव हो।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्पर्श
व्याकरण में उच्चारण के आभ्यंतर प्रयत्‍नों केचार भेदों में से एक जिसमें उच्‍चारण करते समय यागिंद्रिय का द्वार बंद-सा हो जाता है (देवनागरी वर्णमाला के क' से 'म' तक के व्यंजनों का उच्चारण इसी प्रयत्न से होता है)।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्पर्श
ग्रहण' के समय सूर्य या चंद्रमा पर छाया पड़ने का आरंभ।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्पर्श-जन्य
जो स्पर्श से या उसके कारण उत्पन्न हो, संक्रामक।
वि.
(सं.)

स्पर्शता
स्पर्श' का भाव या धर्म।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्पष्टवादी
स्पष्टवक्ता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्पष्टीकरण
कोई बात इस प्रकार स्पष्ट करना कि वक्त पर संदेह न रहे।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्पष्टीकरण
कार्य-विशेष के संबंध में आपत्ति, आरोप आदि होने पर अपनी स्थिति स्पष्ट करना और अपने आचरण के कारणों पर प्रकाश डालना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्पृश्य
स्पर्श करने के योग्य हो।
वि.
(सं.)

स्पृष्ट
जिसका या जिससे स्पर्श हुआ हो, छुआ हुआ।
वि.
(सं.)

स्पृष्ट
वर्णोच्चारण का स्पष्ट प्रयत्न।
संज्ञा
पुं.

स्पृहण
इच्छा, अभिलाषा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्पृहणीय
जिसकी या जिसके लिए इच्छा या कामना की जाय, वांछनीय।
वि.
(सं.)

स्पृहणीय
जो गौरव या बड़ाई के योग्य हो, गौरवशाली।
वि.
(सं.)

स्पृहा
इच्छा, कामना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

सेर
बाघ, नाहर।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. शेर)

सेर
तृप्त, तुष्ट।
वि.
(फ़ा.)

सेरसाह, सेरसाहि
बादशाह शेरशाह।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. शेरशाह)

सेरा
चारपाई के सिरहाने की पाटी।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सिर)

सेराना, सेरानो
ठंडा या शीतल होना।
क्रि.अ.
(सं. शीतल, प्रा. सीअड़, हिं. सीयर, सीरा)

सेराना, सेरानो
मर जाना।
क्रि.अ.
(सं. शीतल, प्रा. सीअड़, हिं. सीयर, सीरा)

सेराना, सेरानो
समाप्त होना।
क्रि.अ.
(सं. शीतल, प्रा. सीअड़, हिं. सीयर, सीरा)

सेराना, सेरानो
शेष न बचना।
क्रि.अ.
(सं. शीतल, प्रा. सीअड़, हिं. सीयर, सीरा)

सेराना, सेरानो
ठंडा या शीतल करना।
क्रि.स.

सेराना, सेरानो
मूर्ति आदि को जल में प्रवाहित करना या जमीन में गाड़ना।
क्रि.स.

स्पर्शमणि, स्पर्शमनि
पारस पत्थर।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्पर्शमणि)

स्पर्शास्पर्श
छूताछूत।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्पर्श + अस्पर्श)

स्पर्शी
छूनेवाला।
वि.
(सं. स्पर्शिन्)

स्पर्शेद्रिय
त्वचा, त्वगेंद्रिय।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्पष्ट
साफ साफ दिखायी देने या समझ में आ सकनेवाला
वि.
(सं.)
मुहा.- स्पष्ट कहना या सुनाना-(बिना दुराव-छिपान के) साफ-साफ कहना।

स्पष्ट
जिसके संबंध में संदेह न हो।
वि.
(सं.)

स्पष्ट
व्यकरण में ('प' से 'म' तक के) वर्णों के उच्चारण का वह प्रयत्न जिसमें दोनों होंठ एक दूसरे से छू जाते है।
वि.
(सं.)

स्पष्टतया
साफ-साफ, स्पष्ट रूप से।
क्रि. वि.
(सं.)

स्पष्टता
स्पष्ट होने का भाव।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्पष्टवक्ता
(बिना किसी संकोच या भय के) साफ और सच्ची बात कहनेवाला व्यक्ति।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्पृही
इच्छा करनेवाला।
वि.
(सं.)

स्फटिक
एक तरह का सफेद पारदर्शी पत्थर, बिल्लौर।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- (क) फल स्फटिक खंभ रचित कंचन हीं-२४०२। (ख) बिद्रुम स्फटिक पत्री कंचन खचि मनिमय मंदिर वने बनावत-१० उ.-५।

स्फटिक
सूर्यकान्त मणि।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्फटिक
काँच, शीशा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्फार
अधिक, प्रचुर।
वि.
(सं.)

स्फार
विकट।
वि.
(सं.)

स्फार
जो फैल या फूलकर बड़ा हो गया हो।
वि.
(सं.)

स्फीत
बढ़ा हुआ, वर्द्धित।
वि.
(सं.)

स्फीत
फूला या उभरा हुआ।
वि.
(सं.)

स्फीत
संपन्न, समृद्ध।
वि.
(सं.)

स्फीतता
वृद्धि।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्फीतता
मोटाई।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्फीतता
समृद्धि, संपन्नता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्फीति
वृद्धि, बढ़ती।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्फुट
दिखायी देनेवाला, व्यक्त।
वि.
(सं.)

स्फुट
खिला हुआ, विकसित।
वि.
(सं.)

स्फुट
साफ, स्पष्ट।
वि.
(सं.)

स्फुट
अलग-अलग, फुटकर।
वि.
(सं.)

स्फुटन
फटना, फूटना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्फुटन
(फूल का) खिलना या विकसित होना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्फुटन
सामने आना, व्यक्त होना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्फुटित
खिला हुआ, विकसित।
वि.
(सं.)

स्फुटित
प्रकट किया हुआ।
वि.
(सं.)

स्फुटित
हँसता हुआ।
वि.
(सं.)

स्फुत्कार
फुफकार, फूत्कार।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्फुरण
किसी चीज का जरा-जरा हिलना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्फुरण
अंग का फड़कना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्फुरण
अंगों का फड़कना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्फुरति
स्फूर्ति।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. स्फूर्त्ति )

स्फुरित
हिलने या फड़कनेवाला।
वि.
(सं.)

स्मरण
किसी देखी, सुनी, कही, पढ़ी या अनुभव की हुई बात का फिर से याद या ध्यान में आना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
मुहा. स्मरण दिलाना-भूली हुई बात को याद कराना।

स्मरण
नौ प्रकार की भक्तियों में एक जिसमें उपासक निरंतर अपने उपास्य का ध्यान या याद किया करता है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- स्रवण कीर्तन स्मरण पादरत अरचन बंदन दास-सारा. ११६।

स्मरण
एक काव्यालंकार।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्मरणशक्ति
याद रखने की शक्ति।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्मरणासक्ति
उपास्य के स्मरण या ध्यान के लिए होनेवाली आसक्ति जिसके फलस्वरूप उपासक हर समय उसका स्‍मरण करता है।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्मरणीय
याद रखने योग्य।
वि.
(सं.)

स्मरता
कामदेव का भाव या धर्म।।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्मरता
स्मरण का भाव या धर्म।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्मर-दशा
विरह-दशा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्मर-दहन
कामदेव को भस्म करनेवाले शिवजी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्फुलिंग
(आग की ) चिनगारी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्फूर्ति, स्फूर्त्ति
धीरे-धीरे हिलना या फड़कना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्फूर्त्ति)

स्फूर्ति, स्फूर्त्ति
कार्य करने का भाव या उत्साह।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्फूर्त्ति)

स्फूर्ति, स्फूर्त्ति
फुरती, तेजी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्फूर्त्ति)

स्फोट
किसी पदार्थ का, ऊपरी आवरण तोड़कर, बाहर निकलना, फूटना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्फोट
फोड़ा, फुंसी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्मर
कामदेव।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- मनौ सरासन धरे कर स्मर भौंह चढ़ै सर बरसै री-१०-१३७।

स्मर
याद, स्मरण।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्मर
(संगीत में) एक राग-भेद।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्मरगुरु
श्रीकृष्ण का एक नाम।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्मरन
स्मरण।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्मरण)

स्मरना, स्मरनो
याद या स्मरण करना।
क्रि.स.
(सं. स्मरण + ना)

स्मरारि
कामदेव के शत्रु, शिव।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्मर्ण
स्मरण।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्मरण)

स्मसान
मसान, श्मशान।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्मशान)

स्मारक
स्मरण करानेवाला।
वि.
(सं.)

स्मारक
वह कृत्य, रचना आदि जो किसी की स्मृति बनाये रखने के लिए हो।
संज्ञा
पुं.

स्मारक
वह वस्तु जो अपनी स्मृति बनाये रखने के लिए किसी को दी जाय।
संज्ञा
पुं.

स्मार्त, स्मार्त्त
वे कृत्य, विधान आदि जो स्मृति-ग्रंथों में लिखे हुए हैं।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्मार्त, स्मार्त्त
वह जो स्मृति-ग्रंथों में लिखे के अनुसार सब कृत्य करता हो।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्मार्त, स्मार्त्त
वह जो स्मृति, ग्रंथों का अच्छा ज्ञाता या पंडित हो।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्मार्त, स्मार्त्त
स्मृति का मृति-संबंधी।
वि.

स्मित
मंद हँसी, मुस्कराहट।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्मित
बि. मुस्कराता हुआ।
वि.

स्मित
खिला हुआ विकसित।
वि.

स्मिति
मुस्कराहट।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्मृत
जिसका स्मरण हो आया हो।
वि.
(सं.)

स्मृति
वह ज्ञान जो स्मरण-शक्ति से प्राप्त होता रहता है।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्मृति
याद, स्मरण।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्मृति
किसी पुरानी या भूली हुई बात का स्मरण हो आना जो साहित्य में एक संचारी भाव माना गया है।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्मृति
प्रियतम के सम्बन्ध में पुरानी बातों का रह-रहकर याद आना जो साहित्य में पूर्वराग की दस अवस्थायों में से एक है।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्मृति
वे हिन्दू धर्म- शास्त्र जिनकी रचना वेदों का स्मरण-चिंतन करके की गयी थी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्मृति
स्मरण' अलंकार का दूसरा नाम।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्यंदन
रथ, विशेषतः युद्ध में काम आने वाला रथ।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- (क) स्यंदन खंडि महारथि खंडौं, कपिव्वज सहित गिराऊँ-१-२७०। (ख) जैसोइ स्याम बलराम श्री स्यंदन चढ़े, वहै छबि कुँवर सर माँझपेख्यौ-२५५४। (ग) धनुष तरंग भँवर स्यंदन पग जलचर सुभट सरीर-१० उ.-२।

स्यमंतक
एक प्रसिद्ध मणि जो सूर्य से सत्राजित नामक यादव को मिली थी और जिसकी चोरी का झूठा कलंक श्रीकृष्ण पर लगा था।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- दीन्हीं मनि आदित्य स्यमंतक, कोटिक सूर- प्रकास-सारा. ६४२।

स्यात, स्यात्
शायद, कदाचित।
अव्य.
(सं. स्यात्)

स्याद्वाद
जैन दर्शन जिसमें अनेक विरुद्ध मतों का सापेक्षत्व स्वीकार किया जाता है और 'स्यात यह भी है' 'स्यात वह भी है' आदि कहा जाता है, अनेकांतवाद।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्यान
स्याना।
वि.
(हिं. स्याना)

स्यानप, स्यानपन
चतुराई, बुद्धिमानी।
संज्ञा
पुं.
(हिं. स्याना + पन)

स्यानप, स्यानपन
चालाकी, धूर्तता।
संज्ञा
पुं.
(हिं. स्याना + पन)

स्याना
चतुर, बुद्धिमान।
वि.
(सं. सज्ञान)

स्याना
चालाक, काइयाँ, धूर्त।
वि.
(सं. सज्ञान)

स्याना
जो बालक न हो, बड़ा, वयस्क।
वि.
(सं. सज्ञान)

स्याना
बड़ा-बूढ़ा या वृद्ध पुरुष।
संज्ञा
पुं.

स्याना
झाड़ फूँक करनेवाला।
संज्ञा
पुं.

स्यानापन
चतुराई, चातुरी।
संज्ञा
पुं.
(हिं. स्याना + पन)

स्यानापन
चालाकी, काइयाँपन, धूर्तता।
संज्ञा
पुं.
(हिं. स्याना + पन)

स्यानापन
वयस्क या स्याना होने की अवस्था।
संज्ञा
पुं.
(हिं. स्याना + पन)

स्यानि, स्यानी
चालाक।
वि.
स्त्री.
(हिं. स्याना)
उ.- आई सिखवन भवन पराऎं स्यानि ग्वालि बौरैया-३७१।

स्यापा
किसी संबंधी की मृत्यु पर परिवार और हेलमेल की स्त्रियों का कुछ दिन एकत्र होकर शोक मनाना और रोना-पीटना
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. स्याहपोश)
मुहा.- स्यापा पड़ना-(१) रोना-पीटना होना। (२) (किसी स्थान का) बिलकुल उजाड़ या सूनसान हो जाना।

सेम
एक तरह की फली जिसकी तरकारी बनती है।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शिंबी)

सेमई
हल्‍का हरा रंग।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सेम)

सेमई
सेम जैसे हलके हरे रंग का।
वि.

सेमई
मैदा के तागे-जैसे लच्छे जो धी में तलकर और दूध में पकाकर खाये जाते है।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सेवईं)

सेमर, सेमल
एक पेड़ जिसके फल में से एक तरह की रूई निकलती है।
संज्ञा
पुं.
(सं. शाल्मलि)
उ.-(क) अंब सुफल छाँड़ि कहा सेमर कौं धाऊँ-१-१६६। (ख) सेमर-ढाकहिं काटि कै बाँधौं तुम बेरौ-९-४२। (ग) सेमर फूल सुरँग अति निरखत मुदित होत खगभूप-१-१०२।

सेमर, सेमल
सेमर या सेमल का सुक, सुआ या सूआ-सेमल के सुंदर फूल में रस और गूदे के लोभ से चोंच मारने, परंतु रुई न निकलने पर पछतानेवाला तोता जो व्यर्थ की आशा लगाने, परंतु अंततः निराश होने और पछतानेवाले व्यक्ति के समान है।
पद.
उ.-(क) रसमय जानि सुवा सेमर कौं चोंच घालि पछितायौ-१-५८। (ख) कत तू सुवा होत सेमर कौ, अंतहीं कपट न बँचिबौ-१-५९। (ग) ज्यौं सुक सेमर सेव आस लगि निसि बासर हठि चित्त लगायौ-१-३२६।

सेमि
सेम' नाम की फली जिसकी तरकारी बनती है।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सेम)
उ.-सेमि सींगरी छमकि झोरई-२३२१।

सेये
पूजा या उपासना की।
क्रि.स.
(सं. सेवन, हिं. सेना)
उ.-सूरदास सेये न कृपानिधि जो सुख सकल मई-१-२९९।

सेयो, सेयौ
निरतर वास किया।
क्रि.स.
(सं. सेवन, हिं. सेना)
उ.-जा कारन तुम बन सेयों सो तिय मदन-भुअंगम खाई-७४८।

सेर
एक तौल चो मन का चालीसवाँ भाग होती है।
संज्ञा
पुं.
(सं. सेठ)

स्याबास
वाह-वाह, साधुवाद।
अव्य.
(फ़ा. शाबास)

स्याम
श्रीकृष्ण।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्याम)
उ.- छाँड़ौं नहीं स्याम-स्यामा की बृन्दाबन रजधानी-१-८७।

स्याम
काला, नीला।
वि.

स्यामकरन, श्यामकर्न
वह सफेद घोड़ा जिसका एक कान काला हो।
संज्ञा
पुं.
(सं.श्यामकर्ण)

स्याम कल्यान
एक राग।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्याम कल्याण)

स्यामकृष्न
जिसका रंग कुछ कालापन लिये नीला हो।
वि.
(सं.)

स्यामकृष्न
कुछ कालापन लिए नीला रंग।
संज्ञा
पुं.

स्यामघन
घनश्याम, श्रीकृष्ण।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्यामघन)

स्यामघन
काले-काले बादल।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्यामघन)

स्यामता
काला या साँवलापन।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्यामता)

स्यामता-कोर
काली रेखा, काला धब्बा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्यामता + हिं. कोर)
उ.- बहुरौ देख्यौ ससि की ओर। तामैं देखि स्यामता कोर-५-३।

स्यामल
साँवला।
वि.
(सं. श्यामल)
गोरो नंद, जसोदा गोरी, तू कह स्यामल गात-१०-२१५।

स्यामलता
साँवलापन।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्यामलता)

स्यामलिया
श्रीकृष्ण।
संज्ञा
पुं.
(हिं. श्यामल)

स्यामसुंदर
श्रीकृष्ण।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्यामसुंदर)
उ.- (क) भई न कृपा स्यामसुंदर की अब कहा स्बारथ फिरत बहै-१-५३। (ख) कुलही लसत सिर स्याम सुंदर कैं बहु बिधि सुरँग बनाई-१०-१०८।

स्यामा
(कृष्ण-प्रिया) राधा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्यामा)
उ.- छाँड़ौं नहीं श्याम-श्यामा की बृन्दावन रजधानी-१-८७।

स्यामा
सुरीले कंठवाली एक काली चिड़िया।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्यामा)

स्यामा
सोलह वर्ष की युवती।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्यामा)

स्यामा
काली गाय।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्यामा)

स्यामा
यमुना नदी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्यामा)

स्यामा
रात।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्यामा)

स्यामा
काली, श्याम रंग का।
वि.
स्त्री.

स्यार
गीदड़, सियार।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सियार)
उ.- वा देही कौ गरब न करियै, स्यार-काग-गिध खैहैं -१-८६।

स्यारपन
गीदड़ का स्वभाव।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सियार + पन)

स्यारपन
डरपोंकपन, कायरता।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सियार + पन)

स्यारी
गीदड़ की मादा।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सियारी)

स्याल
पत्नी का भाई, साला।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्याल
गीदड़।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सियार)

स्यालि, स्यालिया
गीदड़ी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सियारी)

स्याली
पत्नी की बहन, साली।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्यालू
ओढ़नी उपरैनी।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सालू)

स्याबज
वह पशु जिसका शिकार किया जाता हो।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सावज)

स्याह
काले रग का,काला।
वि.
(फ़ा.)

स्याह
एक तरह का घोड़ा।
संज्ञा
पुं.

स्याहा
बही, खाँता, रोजनामचा।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. सियाही)
उ.- प्रभु जू मैं ऎसौ अमल कमायौ।¨¨¨¨¨¨ वासिल बाकी, स्याहा मुजमिल सब अधर्म की बाकी-१-१४३।

स्याही
रोशनाई, मसि।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)

स्याही
कालापन, कालिमा।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)
मुहा.- स्याही जाना-बालों का कालापन न बना रहना, युवावस्या बीत जाना।

स्याही
कलौंछ, कालिख, कालिमा।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)

स्याही
एक जंतु।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. साही)

स्यों, स्यौं
साथ, सहित।
अव्य.
(सं. सह)
उ.- (क) सुनु सिख कंत, दंत तृन धरिकै, स्यौं परिवार सिंधारौ-९-११५। (ख) स्यौं परबत सर बैठि पवन-सुत, हौं प्रभु पै पहुँचाऊँ-९-१५५।

स्यों, स्यौं
पास, निकट।
अव्य.
(सं. सह)

स्रंग
पर्वत की चोटी, शिखर।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रृंग)

स्रंग
चौपायों के सोंग।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रृंग)

स्रंग
कँगूरा।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रृंग)

स्रक, स्रक्, स्रग
फूलों की माला।
संज्ञा
स्त्री. पुं.
(सं. स्रक्)
उ.- (क) रचि स्रक कुसुम सुगंध सेज सजि बसन कुमकुमा बोरि-२८०७। (ख) स्रुति-कुंडल अरु पीत बसन स्रक वैसोइ साज बनाए-२९५९। (ग) स्रक चंदन बनिता विनोद रस-३२३०।

स्रक, स्रक्, स्रग
एक छंद।
संज्ञा
स्त्री. पुं.
(सं. स्त्रक)

स्रक, स्रक्, स्रग
एक वृक्ष।
संज्ञा
स्त्री. पुं.
(सं. स्त्रक)

स्रगाल
गीवड़, सियार।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रृगाल)

स्रग्‍धरा
एक वर्णवृत्त।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्रग्वान, स्रग्वान्
जो हार या माला धारण किये हो।
वि.
(सं. स्रगवात्)

स्रग्विणी
एक वर्णवृत्त।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्रग्‍वी
जो माला पहने हो।
वि.
(सं. स्रग्विन)

स्रज, स्रज्
फूल-माला।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्रक)

स्रजना, स्रजनो
रचना, बनाना।
क्रि.स.
(हिं. सृजना)

स्रजात
एक राजा जिसकी पुत्री सुकन्या का विवाह च्यवन ऋषि से हुआ था।
संज्ञा
पुं.
(सं. शर्याति)
उ.-ता आस्रम स्रजात नृप गयो।¨¨¨¨¨¨तब स्रजात रानी सौं कही। जब तै कन्या ऋषि कौं दई-९-३।

स्रद्धा
आस्था, आदरपूर्ण और पूज्य भाव।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्रद्धा)
उ.- सुमति सुरूप सँचै स्रद्धा-बिधि उर-अंबुज अनुराग -२-१२।

स्रम
शरीर को थकानेवाला काम, परिश्रम।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रम)
उ.- (क) चित चकोर गति करि अतिसय रति तजि स्रम सघन बिषय लोभा-१-६९।
मुहा.- स्रम साधना- (१) कठिन परिश्रम करना।

स्रम
निरंतर अभ्यास करना। स्रम साधै-निरंतर अभ्यास करते हैं।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रम)
उ.- मुक्ति हेत जोगी स्रम साधै असुर बिरोधैं पावै-१-१०४।

स्रम
जीविका-निर्वाह या घनोपार्जन के लिए किया जानेवाला काम।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रम)
उ.- जन जानत जदुनाथ जिते जन निज भुज-स्रम सुख पायौ-१-१५।
मुहा.- श्रम ठयना-बड़ी लगन से कठिन परिश्रम करना। श्रम ठयौ-बड़ी लगन से निरंतर परिश्रम किया। उ.- पिता सो तासु काल-बस भयौ। भ्रातनि हूँ स्रम बहु बिधि ठयौ-५-३।

स्रम
थकावट, क्‍लांति।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रम)
उ.- जिय करि कर्म जन्म बहु पावै। फिरत-फिरत बहुतै स्रम आवै-५-४।

स्रम
दौड़-धूप।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रम)

स्रम
पसीना।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रम)

स्रम
साहित्य में संभोग आदि के कारण होनेवाली थकावट जिसकी गिनती संचारी भावों में की गयी है।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रम)
उ.- सोभित सिथिल बसन मनमोहन सुखवत स्रम के पागे-६८६।

स्रम-कन
अधिक परिश्रम आदि के कारण शरीर से निकलनेवाली पसीने की बूदें।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रमकण)

स्रम-जल
पसीना, स्वेद।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रमजल)

स्रमन
बौद्ध संन्यासी।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रमण)

स्रमन
यती, मुनि।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रमण)

स्रमना, स्रमनो
श्रम या परिश्रम करना।
क्रि.अ.
(सं. श्रम + ना)

स्रमना, स्रमनो
थकना।
क्रि.अ.
(सं. श्रम + ना)

स्रम-बारि
पसीना, स्वेद।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रम + वारि)

स्रम-बिंदु
पसीना, स्वेद।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रम + बिंदु)

स्रम-सीकर
पसीना।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रम + सीकर)

स्रमि
थककर।
क्रि.अ.
(हिं. स्रमना)
उ.- उर भयौबिबस कर्म-निरअंतर स्रमि सुख-सरनि चहथौ-१-१६२।

स्रमिक
मजदूर।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रमिक)

स्रमित
अधिक श्रम के कारण थका हुआ या शिथिल।
वि.
(सं. श्रमित)
उ.- स्रमित भयौ, जैसे मृग चितवत देखि - देखि भ्रम-पाथ-१-२०८।

स्रमिष्ठा
दानवराज बृषपर्वा की पुत्री स्रमिष्ठा जो शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी की दासी बनकर राजा ययाति के यहाँ गयी थी और उनसे प्रम पाकर पुत्रवती हुई थी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)
उ.- कह्थौ स्रमिष्ठा अवसर पाइ। रति कौ दान देह मोहिं राइ।¨¨¨¨। कहथौ, स्रमिष्ठा, सुत कहँ पाए। उनि कहथौ, रिषि किरपा तैं जाए-९-१७४।

स्रवण
बहने की क्रिया या भाव, बहाव,प्रवाह।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्त्रवण
गर्भपात।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्रवत
बहता या टपकता है।
क्रि.अ.
(हिं. स्रवना)
उ.- स्रवत स्रोनकन - १-२७३।

स्रवत
गिराता, बहाता या टपकता है।
क्रि.स.
उ.- (क) अमृत हूँ तैं अमल अति गुन स्रवत निधि आनंद -९-१०। (ख) परसत आनन मनु रवि कुंडल अंबुज स्रवत सीप-सुत-जोटी-१०-१८७।

स्रवन
कान, कर्णेंद्रिय।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रमण)
उ.- (क) स्रवन सुनत करुना-सरिता भए, बाढ़थौ बसन उमंगी-१-२१। (ख) स्रवन न सुनत-१-११८। (ग) रोचन भरि लै देत सींक सौं स्रवन-निकट अतिही आतुर की-१०-१८०।

स्रवन
बौद्ध संन्यासी।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रवण)

स्रवन
मुनि।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रवण)

स्रवना, स्रवनों
बहना।
क्रि.अ.
(सं. स्रवण)

स्रवना, स्रवनों
टपकना।
क्रि.अ.
(सं. स्रवण)

स्रवना, स्रवनों
गिरना।
क्रि.अ.
(सं. स्रवण)

स्रवना, स्रवनों
बहाना।
क्रि.स.

स्रवना, स्रवनों
टपकाना।
क्रि.स.

स्रवना, स्रवनों
गिराना।
क्रि.स.

स्रवति
बहा हुआ।
वि.
(हिं. स्राव)

स्रवैं
टपकाती हैं।
क्रि.स.
(हिं. स्रवना)
उ.- आनँद-मगन धेनु स्रवैं थनु पय-फेनु-१०-३०।

स्रव्य
जो सुना जा सके।
वि.
(सं. श्रव्‍य)

स्रव्य
जो सुनने-योग्य हो।
वि.
(सं. श्रव्‍य)

स्रांत
थका हुआ।
वि.
(सं. श्रांत)

स्रांति
परिश्रम।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्रांति)

स्रांति
थकावट, कलांति।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्रांति)

स्रांति
विश्राम।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्रांति)

स्रष्टा
सृष्टि की रचना करनेवाला, ब्रह्मा।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्रष्ट)

स्रष्टा
शिव।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्रष्ट)

स्रष्टा
विष्णु।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्रष्ट)

सेराना, सेरानो
अघाना, तृप्त होना।
क्रि.अ.
(फ़ा. सेर)

सेराना, सेरानो
तुष्ट या तृप्त करना।
क्रि.स.

सेरी
तृप्ति, तुष्टि।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)
उ.-नेंकहूँ न पावति भजि भजन सेरी।

सेल
बरछा, भाला, साँग।
संज्ञा
पुं.
(सं. शल, प्रा. सेल)

सेल
माला।
संज्ञा
स्त्री.
(देश.)

सेलना, सेलनो
मर जाना।
क्रि.अ.
(सं. शेल)

सेलना, सेलनो
छेदना।
क्रि.अ.
(सं. शेल)

सेला
एक प्रकार की रेशमी चादर या दुपट्टा।
संज्ञा
पुं.
(सं. शल्लक)

सेला
रेशमी साफ।
संज्ञा
पुं.
(सं. शल्लक)

सेलिया
एक तरह का घोड़ा।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

स्रष्टा
रचने या बनानेवाला।
वि.

स्रस्‍त
अपने स्थान से गिरा हुआ।
वि.
(सं.)

स्रस्‍त
ढीला, शिथिल।
वि.
(सं.)

स्रस्‍त
धँसा हुआ।
वि.
(सं.)

स्रस्‍त
अलग किया हुआ।
वि.
(सं.)

स्राद्ध
पितरों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के उद्देश्य से किये गये पिंडदान, ब्राह्मण-भोजन आदि कृत्य।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्राद्ध)

स्राप
किसी के अनिष्ट की कामना से कही गयी बात।
संज्ञा
पुं.
(सं. शाप)

स्रापना, स्रपनो
शाप देना।
क्रि.स.
(सं. शापना)

स्रापित
जिसे किसी ने शाप दिया हो, शापग्रस्त।
वि.
(सं. शापित)

स्राव
(खून आदि का) बह या रसकर निकलना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्राव
गर्भपात।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्राव
वह जो बह रस या चू कर निकला हो।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्रावक
स्राव करानेवाला।
वि.
(सं.)

स्रावक
बौद्धबिक्षु या सन्यासी।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रावक)

स्रावक
जैन धर्मानुयायी।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रावक)

स्रावग
बौद्ध सन्यासी।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रावक)

स्रावग
जैन धर्मानुयायी।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रावक)
उ.- अजहूँ स्रावग ऎसोहि करै। ताही कौ मारण अनुसरैं-५-२।

स्रावगीं
जैन-धर्मानुयायी, जैन।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रावक)
उ.-राजा रहत हुतौ तहँ एक। भयौ स्रावगी रिषभहिं देखि-५-२।

स्रावन
सावन मास।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रावण)

स्रावन
सुनने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रवण)

स्रावन
श्रवण या सुनने से संबंधित।
वि.

स्रावना
गिराना।
क्रि.स.
(हिं. स्रवना)

स्रावना
बहाना।
क्रि.स.
(हिं. स्रवना)

स्रावना
टपकाना।
क्रि.स.
(हिं. स्रवना)

स्रावनी
सावन मास की पूर्णिमा जो 'रक्षाबंधन' का दिन है।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्रावणी)

स्रावनो
गिराना।
क्रि.स.
(हिं. स्रवना)

स्रावनो
बहाना।
क्रि.स.
(हिं. स्रवना)

स्रावनो
टपकाना।
क्रि.स.
(हिं. स्रवना)

स्रावित
सुना हुआ।
वि.
(सं. श्रावित)

स्रावी
स्त्राव करानवाला।
वि.
(सं. स्राविन)

स्राव्‍य
बहाने या टपकाने योग्य।
वि.
(सं.)

स्राव्‍य
सुनने योग्य।
वि.
(सं. श्राव्य)

स्रिंग
पहाड़ की चोटी, शिखर।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रृंग)

स्रिंग
पशु के सींग।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रृंग)

स्रिंग
कँगूरा।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रृंग)

स्रिजन
रचने या निर्माण करने की क्रिया।
संज्ञा
पुं.
(सं. सृजन)

स्रिजन
सृष्टि।
संज्ञा
पुं.
(सं. सृजन)

स्रियम्री
लक्ष्मी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्री)

स्रियम्री
ऎश्वर्य।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्री)

स्रियम्री
संपत्ति।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्री)

स्रियम्री
छटा, शोभा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्री)

स्रियम्री
यश, कीर्ति।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्री)

स्रुत
बहा या टपका हुआ।
वि.
(सं.)

स्रुत
सुना हुआ।
वि.
(सं. श्रुत)

स्रुत
जो परंपरा से सुनने आये हों।
वि.
(सं. श्रुत)

स्रुत
प्रसिद्ध।
वि.
(सं. श्रुत)

स्रुति
बहाव।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. )

स्रुति
सुनना, श्रवण करना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्रुति)

स्रुति
सुनने की इंद्रिय, कान।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्रुति)

स्रुति
सुनी हुई बात।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्रुति)

स्रुति
वेद।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्रुति)
उ.- (क) और अनंत कथा स्रुति गाई-१-६। (ख) सोचि-बिचारि सकल स्रुति-सम्मति, हरि तैं और न आगर-१-९१। (ग) सकल स्रुति-दधि मथत पायौ; इतौई घृत-सार-२-३। (घ) जस अपार स्रुति पार न पावै-१०-३। (ङ) स्रुति, स्रमृति सब पुरान कहत मुनि बिचारी-३९४।

स्रुतिकटु
जो सुनने में कटु, कठोर या परुष जान पड़े।
वि.
(सं. श्रुटिकट)

स्रुतिकीरति, स्रुतिकीत, स्रुतकीर्ती
उर्मिला की छोटी बहन जो शत्रुघ्न को ब्याही थी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्रुतिकीर्त्ति)

स्रुति-द्वार
कान या श्रवण द्रिय के सामने के भाग या द्वार पर।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रुति + द्वार)
उ.- संकर पारवती उपदेसत तारक मंत्र लिख्यौ स्त्रुति द्वार-२-३।

स्रुति-पथ
कान या श्रवर्ण-मार्ग।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रुति + पथ)

स्रुति-पथ
वेद-विहित मार्ग।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रुति + पथ)

स्रुति-माथ
विष्णु।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रुति + मस्तक या हिं. माथा)

स्रुति
वेद।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्रुति)
उ.-स्रुती स्रमृति सब पुरान कहत मुनि बिचारी-३९४।

स्रुव, स्रुवा
लकड़ी की कलछी जिससे हवन की अग्नि में घी की आहुति दी जाती है।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्रुवा)

स्रेनिका, स्रेनी
कतार, पंक्ति।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्रेणी)
उ.- तड़ित धन संजोग मानो स्रेनिका सुकजाल-६२७।

स्रेनिका, स्रेनी
क्रम, परंपरा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्रेणी)

स्रेनिका, स्रेनी
सीढ़ी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्रेणी)

स्रेष्‍ठ
अच्छा, उत्तम, श्रेष्ठ।
वि.
(सं. श्रेष्ठ)
उ.- स्व-पचहू स्रेष्ठ होत पद सेवत-१-२३३।

स्रेष्‍ठता
उत्तमता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्रेष्ठता)

स्रोत
पानी का प्रवाह, धारा।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्रोतस्)

स्रोत
सोता, झरना।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्रोतस्)

स्रोत
नदी।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्रोतस्)

स्रोत
वह आधार या साधन जिससे कोई वस्तु बराबर आती रहे।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्रोतस्)

स्रोतस्विनि, स्रोतस्विनी
नदी, सरिता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्रोतस्विनी )

स्रोता
सुननेवाला।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्रोता)

स्रोता
कथा-पुराण आदि सुननेवाला।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्रोता)

स्रोत्र
कान।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रोत्र)

स्रोन
कान।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रवण)
उ.-कूप समान स्रोन दोउ जानै-३-१३।

स्रोन
लहू, रक्त, रुधिर।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोण)
उ.- लै-लै स्रोन हृदय लपटावति चुंबति भृजा गँभीर-१-२९।

स्रोनकन
पसीने की बूँदें, स्वेदकण।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रमकण)

स्रोनकन
रक्त की बूँदें।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोण + कण)
उ.- गोबिंद कोपि चक्र कर लीन्हौ।¨¨¨¨। स्रवत स्रोनकन, तन शोभा, छबि-घन बरसत मनु लाल-१-२७३।

स्रोनित
खून, सक्त, रुधिर।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोणित)
उ.- (क) तब रावन कौ बदन देखिहौं दससिर स्रोनित न्हाइ-९-७७। (ख) लै लै चरन-रेनु निज प्रभु की रिपु कैं स्रोनित न्हात-९-१४७।

स्लथ
ढीला, शिथिल।
वि.
(सं. श्लथ)

स्लथ
मंद, धीमा।
वि.
(सं. श्लथ)

स्लथ
कमजोर, दुर्बल।
वि.
(सं. श्लथ)

स्लाधा
तारीफ, बड़ाई, प्रशंसा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्लाघा)

स्लाधा
खुशामद, चापलूसी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्लाघा)

स्लोक
संस्कृत का पद्य या अनुष्टुप छंद।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्लोक)
उ.-(क) श्रीमुख चारि स्लोक दए ब्रह्मा कौं समुझाइ-१-२२५। (ख) तब नारद तिनकैं ढिग आइ चारि स्लोक कहे समुझाइ-१-२३०।

स्वः
आकाश।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वः
स्वर्ग।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वःसरित, स्वःसरित्, स्वःसरिता
आकाशगंगा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्वःसरित)

स्वःसुंदरी
अप्सरा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. अप्सरा)

स्व
अपना, निज का।
वि.
(सं.)
उ.- स्व कर काटत सीस-१-१०६।

स्व
क प्रत्यय जो शब्दांत में जुडकर भाववाचकता, प्राप्य धन आदि का अर्थ देता है।
प्रत्य.

स्वकर्मी
केवल अपने ही काम से मतलब रखनेवाला, स्वार्थी।
वि.
(सं. स्वकर्मिन्)

स्वकीय
अपना, निज का।
वि.
(सं.)

स्वकीया
वह नीयिका जो केवल अपने ही पति से प्रेम करती हो, पर पुरुष का ध्यान तक न करती हो।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वक्ष
साफ, निर्मल।
वि.
(हिं. स्वच्छ)

स्व-ख्यापन
स्वयं ही अपनी प्रशंसा करके अपने को प्रसीद्ध करना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वगत
आप ही आप या स्वतः (कुछकहना या बोलना)।
क्रि. वि.
(सं.)

स्वगत
अपने में आया या लाया हुआ, आत्मगत।
वि.

स्वगत
मन में आया हुआ, मनोगत।
वि.

स्‍वगत कथन
नाटत में अन्य पात्रों की उपस्थिति में किसी पात्र का इस प्रकार कुछ कहना जौसे वह अपने से ही या अपने मन में कुछ कह रहा है जिसे दर्शक तो सुन लें, परंतु मंच पर उपस्थित पात्र न सुनें। इसे 'अश्राव्‍य' या 'आत्मगत' भी कहते हैं।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वच्छंद
जो किसी के नियंत्रण में न ही, स्वतंत्र, स्वाधीन।
वि.
(सं.)
उ.- यह तौ जाइ उनै उपदेसी सनकादिक स्वच्छंद-२४०२।

स्वच्छंद
मनमाना काम या आचरण करनेवाला, निरंकुश।
वि.
(सं.)

सेल्ही
योगियों की माला।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सेला)

सेल्ही
गले में लपेटने की चादर।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सेला)

सेल्ही
छोटा भाला या बरछी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सेली)

सेवँई
मैदे के सूत के लच्छे जो घी में तलकर और दूध में पकाकर खाये जाते हैं।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सेविका)

सेवंत
एक राग।
संज्ञा
पुं.
(सं. सामंत)

सेवँर
एक वृक्ष जिसके फलों से एक प्रकार की रुई निकलती है।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सेमल)

सेव
बेसन का बना हुआ एक पकवान जो नमकीन भी बनाया जा सकता है और पागकर मीठा भी।
संज्ञा
पुं.
(सं. सेविका)
उ.-(क) फेनी सेव अँदरसे प्यारे-३९६। (ख) सेव सुहारी घेवर घी के -२३२१।

सेव
टहल, परिचर्या।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सेवा)
उ.-राजा सेव भली बिधि करै। दंपति-आयसु सब अनुसरै-१-२८४।

सेव
पूजा, उपासना, आराधना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सेवा)
उ.-(क) तातैं बिबस भयौं करुनामय छाँड़ि तिहारी सेव-१-४९। (ख) करै जो सेव तुम्हारी सो सेइयो बिष्नु सिव ब्रह्म मम रूप सारे-१० उ.-३५।

सेव
उपासना, आराधना करो।
क्रि.स.
(हिं. सेवना)
उ.-सेव चरन-सरोज-सीतल तजि बिषय रस पान-१-३०७।

स्वच्छंद
बिना किसी संकोच या बिचार के।
क्रि. वि.
बालक रूप ह्वै के दसरथ-सुत करत केलि स्वच्छंद-सारा.।

स्वच्छंदचारी
स्वेच्छाचारी।
वि.
(सं. स्वच्छंदचारिन्)

स्वच्छंदता
स्वतंत्रता, स्वाधीनता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वच्छ
साफ, निर्मल।
वि.
(सं.)

स्वच्छ
उज्जवल, शुभ्र।
वि.
(सं.)
उ.- स्वच्छ सेज मैं तैं मुख निकसत गयौ तिमिर मिटि मंद-१०-२०३।

स्वच्छ
स्पष्ट।
वि.
(सं.)

स्वच्छ
शुद्ध, पवित्र।
वि.
(सं.)

स्वच्छता
निर्मलता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वच्छना, स्वच्छनो
निर्मल करना।
क्रि.स.
(सं. स्वच्छ)

स्वच्छना, स्वच्छनो
पवित्र या शुद्ध करना।
क्रि.स.
(सं. स्वच्छ)

स्वच्छी
स्वच्छ।
वि.
(सं. स्वच्छ)

स्वज
अपने से उत्पन्न।
वि.
(सं.)

स्वज
पुत्र।
संज्ञा
पुं.

स्वज
रक्त।
संज्ञा
पुं.

स्वज
पसीना।
संज्ञा
पुं.

स्वजन
अपने परिवार के लोग, आत्मीय जन।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- (क) सुत-संतान-स्वजन-बनिता-रति घन समान उनई-। (ख) बोलि-बोलि सुत-स्वजन मित्रजन लीन्यौ सुजस सुहायौ-।

स्वजन
नाते-रिश्तेदार, संबंधी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वजनता
आत्मीयता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वजनता
नाते-रिश्तेदारी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वजनि, स्वजनी
अपने परिवार की स्त्री।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्वजन)

स्वजनि, स्वजनी
नाते-रिश्ते की स्त्री।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्वजन)

स्वजनि, स्वजनी
सखी, सहेली।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्वजन)

स्वजन्मा
जो अपने आप उत्पन्न हुआ हो (ईश्वर)।
वि.
(सं. स्वजन्मन्)

स्वजा
बेटी, पुत्री।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वजा
अपने से उत्पन्न (पुत्री)।
वि.
स्त्री.

स्वजात
अपने से उत्पन्न।
वि.
(सं.)

स्वजात
बेटा, पुत्र।
संज्ञा
पुं.

स्वजाति
अपनी जाति।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वजाति
अपनी ही जाति का।
वि.

स्वजातीय
अपनी जाति या वर्ग का।
वि.
(सं.)

स्वजातीय
एक ही जाति या वर्ग का।
वि.
(सं.)

स्वतंत्र
जो किसी के अधीन न हो स्वांधीन।
वि.
(सं.)

स्वतंत्र
मनमानी करनेवाला, निरंकुश।
वि.
(सं.)

स्वतंत्र
अलग, भिन्न, पृथक्।
वि.
(सं.)

स्वतंत्र
बंधन, नियम आदि से रहित या मुक्त।
वि.
(सं.)

स्वतंत्रता
बिना किसी दबाव या रोकटोक के सब कुछ करने का पूर्ण अधिकार, आजादी स्वाधीनता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वतंत्रा
वह नायिका जो केवल धन के लोभ से पर-पुरुषों से संबंध रखती हो, सामान्या नायिका, गणिका।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वतंत्री
आजाद, स्वाधीन।
वि.
(सं. स्वतंत्रिन्)

स्वतः
अपने आप, आप ही।
अव्य.
(सं. स्वतस)

स्वतःसिद्ध
जो (बात या तत्व) बिना किसी तर्क या प्रमाण के आप ही ठीक, प्रत्यक्ष और सिद्ध या प्रमाणित हो।
वि.
(हिं. स्वतः + सं. सिद्ध)

स्वत्व
स्व' या अपना होने का भाव, अपनापन।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वत्व
वह अधिकार जिसके बल पर कोई चीज अपनी समझी या अपने पास रखी जाय।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वत्वाधिकारी
वह जिसके हाथ में किसी बात या विषय का पूरा स्वत्व या अधिकार हो।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वत्वाधिकारिन्)

स्वत्वाधिकारी
मालिक, स्वामी।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वत्वाधिकारिन्)

स्वदेश
मातृभूमि।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वदेशी, स्वदेशीय
अपने देश से संबंधित।
वि.
(सं. स्वदेशीय)

स्वदेशी, स्वदेशीय
अपने देश में बना या उत्पन्न।
वि.
(सं. स्वदेशीय)

स्वधर्म
अपना धर्म।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वधर्म
अपना कर्तव्य।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वधा
एक शब्द जिसका उच्चारण या प्रयोग यज्ञ में हवि देने के समय किया जाता है।
अव्य.
(सं.)

स्वधा
पितरों के उद्देश्य से दिया जानेवाला अन्न या भोजन।
संज्ञा
स्त्री.

स्वन
शब्द, ध्वनि।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वनामधन्य
जिसने अपने महान और गौरव-पूर्ण कार्यों से अपना नाम धन्य या प्रसिद्ध कर दिया हो।
वि.
(सं.)

स्वनित
ध्वनित, ध्वनियुक्त।
वि.
(सं.)

स्वपच
चांडाल।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्वपच)
उ.- ढूँढ़ि फिरे घर कोउ न बतायौ, स्वपच कोरिया लौं-१-१५१।

स्वपच
एक निम्नजातीय भक्त।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्वपच)
उ.- गायौ स्वपच परम अघपूरन-१-६५।

स्वपन, स्वपना
स्वप्न।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वपन)

स्वप्न
सोने की क्रिया या अवस्था, निद्रा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वप्न
निद्रावस्था में, ठीक-ठीक नींद न आने के कारण कुछ घटनाएँ आदि दिखायी देना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- बहुरि कहथौ, रिषि कौ कहि नाम ? कहथौ स्वप्न देख्यौ अभिराम-९-१७४।

स्वप्न
वह घटना आदि जो निद्रित अवस्था में दिखायी दे और जिसे साहित्य में एक संचारी भाव माना गया है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वप्न
मन में उठनेवाली वह ऊँची कल्पना या विचार जिसे साधाणतया कार्य रूप न दिया जा सके।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
मुहा.- स्वप्न में भी न करना-(जागने में तो मनुष्य को अपने पर अधिकार होता है, अतएव अनिच्छित कार्य करने से वह सहज ही बच जाता है; परंतु सोते समय स्पप्न पर उसका कोई अधिकार नहीं रहता; अतएव उस अवस्था में अप्रिय कार्य करते भी वह अपने को देख सकता है। अतः जागते-सोते) किसी भी दशा में करने को तैयार न होना। उ.- स्याम-बलराम बिनु दूसरे देव कौं स्वप्न हूँ माँहिं नहिं हृदय ल्याऊँ-१-१७७। स्वप्न समान जानना- झूठा, असत्य या मिथ्या समझना। स्वप्न समान जानौ- झूठा, मिथ्या या वश्वर समझो। उ.- सब जग जानौ स्वप्न समान-१-३४१।

स्वनप्दर्शी
स्वप्न देखनेवाला।
वि.
(सं. स्वनप्दर्शिन्)

स्वनप्दर्शी
व्यर्थ की कल्पनाएँ करनेवाला।
वि.
(सं. स्वनप्दर्शिन्)

स्वप्नाना
स्वप्न देखना।
क्रि.अ.
(सं. स्वप्न + आना)

स्वप्नाना
स्वप्न दिखाना।
क्रि.स.

स्वप्निल
स्वप्न का।
वि.
(सं.)

स्वप्निल
स्वप्न देखनेवाला।
वि.
(सं.)

स्वप्रकाश, स्वप्रकास
जो अपने ही तेज से प्रकाशित हो।
वि.
(सं. स्वप्रकाश)

स्वभाइ, स्वभाई, स्वभाउ, स्वभाऊ
स्वभाव।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वभाव)

स्वभाव
(किसी वस्तु आदि में) सदा लगभग एक-सा बना रहनेवाला मूल या प्रधान गुण।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.-जीव न तजै स्नभाव जीव कौ, लोकबिदित दृढ़ताई-१-१०७।

स्वभाव
(किसी व्यक्ति के) मन की प्रवृत्ति, प्रकृति।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वभाव
बान, आदत।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वभावज
जो स्वभाव या प्रकृति-जन्य हो, स्वाभाविक, प्राकृतिक।
वि.
(सं.)

स्वभावतः
स्वभाव से, सहज ही।
अव्य.
(सं.)

स्वभाव-सिद्ध
स्वाभाविक।
वि.
(सं.)

स्वभावोक्ति
एक काव्यालंकार।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वभू
जो अपने आप से जन्मा हो।
वि.
(सं.)

स्वभू
ब्रह्मा।
संज्ञा
पुं.

स्वभू
विष्णु।
संज्ञा
पुं.

स्वभू
शिव।
संज्ञा
पुं.

स्वयं
खुद, आप।
अव्य.
(सं. स्वयम्)

स्वयं
आप से आप, अपने आप, स्वतः।
अव्य.
(सं. स्वयम्)

स्वयंदूत
वह नायक जो नायिका से अपने प्रेम की बात स्वयं ही प्रकट करे।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वयंदूतिका, स्वयंदूती
वह नायिका जो अपने प्रेम की बात नायक पर स्वयं प्रकट करे।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वयंपाकी
अपना भोजन स्वयं ही पकानेवाला।
वि.
(सं. स्वयंपाकिन्)

स्वयंपाकाश
वह जो अपने ही प्रकाश से प्रकासित हो।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वयंपाकाश
ईश्वर।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वयंप्रभा
इंद्र की एक अप्सरा जिसे मय दानव हर लाया था और जिसके गर्भ से उसने मंदोदरी नामक कन्या उत्पन्न की थी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वयंभु, स्वयंभू
ब्रह्मा।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वयम् भू)

स्वयंभु, स्वयंभू
विष्णु।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वयम् भू)

स्वयंभु, स्वयंभू
शिव।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वयम् भू)

स्वयंभु, स्वयंभू
काल।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वयम् भू)

स्वयंभु, स्वयंभू
कामदेव।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वयम् भू)

स्वयंभु, स्वयंभू
चौदह मनुष्यों में से प्रथम जो स्वयंभू ब्रह्मा से उत्पन्न माने गये हैं।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वयम् भू)
उ.- बहुरि स्वयंभू मनु तप कीनौ। (ख) ब्रह्मा सौं स्वयंभू मनु भयौ-३-१०।

स्वयंभु, स्वयंभू
जो आप से आप जन्मा हो।
वि.

स्वयंभु, स्वयंभू
जो (बिना योग्यता आदि के) स्वयं ही किसी पद पर प्रतिष्ठित हो गाया हो।
वि.

स्वयंवर
भारत की एक प्राचीन प्रथा जिसमें कन्या अपना वर स्वयं चुनती थी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- (क) जनक बिदेह कियो जु स्वयंवर बहु नृप बिप्र बुलाये-सारा. २०६। (ख) तोरि धनुष, मुख मोरि नृपनि कौं सीय स्वयंवर कीनौ-९-११५।

स्वयंवरा
वह स्त्री जो स्वयं ही अपने उपयुक्त वर का वरण करे।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वयंसिद्ध
जो (बात ) अपने आप सिद्ध हो।
वि.
(सं.)

स्वयंसेवक
जो अपनी ही इच्छा से, केवल सेवा-भाव से कोई कार्य करे।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेली
छोटा भाला, बरछी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सेल)

सेली
छोटा दुपट्टा या चादर।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सेल)

सेली
गले में बाँधने की चादर, गाँती।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सेल)

सेली
बद्धी या माला जिसे योगी-यती गले में डालते या सिर में लपेटते हैं।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सेल)
उ.-सीस सेली केस, मुद्रा कनक बीरी, बीर। बिरह-भस्म चढ़ाई बैरी सहज कंथा चीर-३१२६।

सेली
स्त्रियों का एक गहना।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सेल)

सेल्ला
भाला, बरछा।
संज्ञा
पुं.
(सं. शल)

सेल्ह
भाला, बरछा।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सेला)

सेल्हा
दुपट्टा।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सेला)

सेल्हा
साफा।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सेला)

सेल्ही
छोटा दुपट्टा।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सेला)

स्वरसमुद्र
एक प्राचीन बाजा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वरांत
जिसके अंत में स्वर हो।
वि.
(सं.)

स्वराज्य
वह शासन-प्रणाली जिसमें किसी देश पर उसके ही निवासियों का पूर्ण शासन हो।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वराट, स्वराट्
स्वतंत्र सम्राट।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वराट, स्वराट्
जो स्वयं प्रकाशमान हो और दूसरों को भी प्रकाशित करे।
वि.

स्वरिक
कंठ-स्वर-संबंधी।
वि.
(सं. स्वर)

स्वरित
मध्यम रूप से उच्चारित स्वर।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वरित
जिसमें स्वर हो।
वि.

स्वरित
गूँजता हुआ।
वि.

स्वरूप
व्यक्ति, पदार्थ आदि की शकल या आकृति।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- नारायन भुव भार हरो है अति आनंदस्वरूप-सारा. १४५।

स्वर-पात
रुकाव आदि का ध्यान रखते हुए किसी शब्द या पद का किया गया उच्चारण।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वरभंग
गला बैठना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वरभंग
हर्ष, भय क्रोध, मद आदि के कारण गला रुँध जाने से कुछ कह न पाना या कुछ के बदले कुछ कह जाना जो साहित्य में एक सात्विक अनुभाव माना गया है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वर-भानु
सत्यभामा के गर्भ से उत्पन्न श्रीकृष्ण के दस पुत्रों में से एक का नाम।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वरमंडल
एक प्राचीन बाजा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वरमंडलिका
एक प्रचीन वीणा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वरयंत्र
गले के भीतर का वह अंग जिससे स्वर या शब्द निकलता है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वरलहरी
(संगीत आदि के लिए निकाली गयी) उतार-चढ़ाववाले स्वरों की लहर या क्रम।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वरलासिका
वंशी, मुरली।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वरलिपि
संगीत में किसी गीत, तान आदि में आनेवाले स्वरों का क्रमबद्ध लेखन।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वयमेव
आप ही, स्वयं ही।
क्रि. वि.
(सं.)

स्वर
प्राणी के कंठ से अथवा किसी पदार्थ पर आघात होने से निकलनेवाला शब्द जिसमें कोमलता, कटुता आदि गुण हों।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वर
संगीत में वे सात निश्चित ध्वनियाँ जिनका स्वरूप, तीव्रता आदि निश्चित है, सुर।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.-चाँपति चरन जननि अप अपनी कछुक मधुर स्वर गाये-सारा. १९६।
मुहा.- स्वर उतारना-सुर घीमा करना। स्वर चढ़ाना-सुर तेज करना। स्वर निकालना- सुर उत्पन्न करना। स्वर भरना-अभ्यास के लिए एक ही सुर बार-बार निकालना। स्वर मिलाना-(बाद्य आदि के) सुनायी देते स्वर के अनुसार सुर निकालना)

स्वर
व्याकरण में वह वर्ण जिसका उच्चारण बिना किसी वर्ण की सहायता के हो और जो किसी व्यंजन के उच्चारण में सहायक हो।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वर
आकाश।
संज्ञा
पुं.
(सं.स्वर)

स्वर
स्वर्ग़।
संज्ञा
पुं.
(सं.स्वर)

स्वरग
स्वर्ग़।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वर्ग)

स्वर-ग्राम
संगीत के सातों स्वरों का समूह, सप्तक।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वरता
स्वर का भाव या धर्म।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वर-पात
उच्चारण करते समय शब्द के किसी वर्ण पर रुकना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वरूप
आकार।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- देखत गज-से होय गये हैं, कीन्हों बृहत स्वरूप-सारा. ४०।

स्वरूप
मूर्ति, चित्र आदि।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वरूप
देवताओं आदि का धारण किया हुआ रूप।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वरूप
वह जिसने देव-रूप धारण किया हो।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वरूप
सुंदर।
वि.

स्वरूप
समान, तुल्य।
वि.

स्वरूप
तौर पर, रूप में।
अव्य.

स्वरूप
मुक्ति का वह रूप जिसमें भक्त अपने उपास्य देव का रूप प्राप्त कर लेता है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- हम सालोक्य स्वरूप सरो ज्यौं रहत समीप सदाई-३२९०।

स्वरूपज्ञ
जो आत्मा-परमात्मा का स्वरूप पहचानता हो, तत्वज्ञ।
वि.
(सं.)

स्वरूपता
स्वरूप' का भाव या धर्म।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वरूपमान, स्वरूपवान
सुंदर।
वि.
(सं. स्वरूपवत्)

स्वरूपी
स्वरूपवाला।
वि.
(सं. स्वरूपिक)

स्वरूपी
जिसने किसी का स्वरूप धारण किया हो।
वि.
(सं. स्वरूपिक)

स्वरूपी
मुक्ति का वह रूप जिसमें भक्त अपने आराध्‍य का ही स्वरूप प्राप्त कर लेता है।
संज्ञा
पुं.
(सं. सारूप्य)

स्वरोद
एक तरह का बाजा।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वरोदय)

स्वरोदय
नथनों से निकली स्वाँस के द्वारा शुभ-अशुभ फल जानने की विद्या।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वर्गंगा
आकाश-गंगा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वर्ग
हिंदुओं केसात लोकों में से तीसरा जिसमें प्राणी पुण्‍यों और सत्कर्मों के फल-स्वरूप सुख भोगने जाता है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- सुनि-सुनि स्वर्ग रसातल भूतल, जहाँ तहाँ उठि धायौ-१-१५४।
मुहा.- स्वर्ग के पथ पर पैर देना या रखना (१) मरना। (२) जान जोखिम में डालना, प्राण संकट में डालना। स्वर्ग को उड. जाना- मर जाना। गयौ उडि. स्‍वर्ग को-मर गया। उ.- तुरँत गयौ उड़ि स्वर्ग को-२५७७। स्वर्ग जाना या सिधारना- मर जाना। स्वर्ग पठाना- (१) मार डालना। (२) मरने पर स्वर्ग का सुख भोगने को भेजना। उ.- तुम मौसे अपराधी माधव, कोटिक स्वर्ग पठाए हौ-१-७।

स्वर्ग
स्वर्ग सुख-वैसा सुख जैसा स्वर्ग में मिलता है। कोटि स्वर्ग सम सुख- कल्‍पना से भी बाहर का सुख।उ-कोटि स्वर्ग सम सुख अनुमानत, हरि समीप समता नहिं पावत-३१४२। स्वर्ग की धार, स्वर्ग-धारा-आकाशगंगा।
यौ.

स्वर्ग
वह स्थान जहाँ बहुत अधिक सुख मिले।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वर्ग
आकाश।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वर्ग
सुख।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वर्ग
ईश्वर।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वर्ग
प्रलय।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वर्गकाम, स्वर्गकामी
स्‍वर्ग की कामना रखनेवाला।
वि.
(सं.)

स्वर्गगमन
मरना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वर्गगामी
स्वर्ग जानेवाला।
वि.
(सं. स्वर्गगामिन्)

स्वर्गगामी
मृत, स्वर्गीय
वि.
(सं. स्वर्गगामिन्)

स्वर्गद
स्वर्ग दिलानेवाला।
वि.
(सं.)

स्वर्गनदी
आकाशगंगा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्वर्ग + नदी)

स्वर्गीय
जिसका स्वर्गवास हो गया हो, मृत।
वि.
(सं.)

स्वर्गीय
जिसकी मृत्यु हाल ही में हुई हो।
वि.
(सं.)

स्वर्ण
सोना (धातु), सुवर्ण।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वर्णकाय
गरुड़।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वर्णकाय
जिसका शरीर सोने का या सोने सा हो।
वि.

स्वर्णकार
सुनार।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वर्णकीट
एक सुनहरा कीड़ा, सोन किरवा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वर्णकीट
जूगनूँ।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वर्णगिरि
सुमेरु पर्वत।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वर्णचूड
नीलकंठ पक्षी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वर्णज
सोने से उत्पन्न।
वि.
(सं.)

स्वर्णज
सोने का बना हुआ।
वि.
(सं.)

स्वर्णजयंती
किसी व्यक्ति, संस्था, कार्य आदि के पचास वर्ष पूरे होने पर की जानेवाली जयंती।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वर्णजातिका, स्वर्णजाती
पीली चमेली।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्वर्णजातिका)

स्वर्णजीवी
सुनार।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वर्णजीविन्)

स्वर्णदिवस
बहुत ही शुभ और महत्वपूर्ण दिन।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वर्णपुरी
लंकापुरी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वर्णभूमि
वह स्थान या देश जहाँ सभी श्री-संपन्न और सुखी हों।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वर्णमय
जोसोने का बना हो।
वि.
(सं.)

स्वर्णमुद्रा
सोने का सिक्का।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वर्गलाभ
मरना, स्वर्ग की प्राप्ति।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वर्गवाणी
आकाशवाणी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्वर्ग + वाणी)

स्वर्गवास
मरना, स्वर्ग जाना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वर्गवास
स्वर्ग में निवास करना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वर्गवासी
स्वर्ग में रहनेवाला।
वि.
(सं. स्वर्गवासिन्)

स्वर्गवासी
मृत, स्वर्गीय।
वि.
(सं. स्वर्गवासिन्)

स्वर्गस्थ
जो स्वर्ग में (स्थित) हो।
वि.
(सं.)

स्वर्गस्थ
मृत, स्वर्गवासी।
वि.
(सं.)

स्वर्गीय
स्वर्ग का, स्वर्ग-संबंधी।
वि.
(सं.)

स्वर्गीय
स्वर्ग में रहने या होनेवाला।
वि.
(सं.)

स्वर्णयूथिका, स्वर्णयूथी
पीली जुही।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वर्णका
सोने की खान।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वर्णिम
सुनहला।
वि.
(सं. स्वर्ण)

स्वर्भू
स्वर्गलोक।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वर्लोक
स्वर्ग।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वल्प
बहुत थोड़ा या कम।
वि.
(सं.)
उ.- स्वल्प साग तैं तृप्त किए सब कठिन आपदा टारी-१-२८२।

स्वल्प
बहुत थोड़ी, हलकी या घीमी।
वि.
(सं.)
उ.-सरस स्वल्प ध्वनि उघटत सुखद-१८२६।

स्ववश, स्ववश्य
जो अपने वश में हो।
वि.
(सं.)

स्ववश, स्ववश्य
जो अपनी इंद्रियों को वश में रखता हो।
वि.
(सं.)

स्वविवेक
उचित-अनुचित या युक्त-अयुक्त का विचार करने की बुद्धि, शक्ति या योग्यता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेंदुर
ईँगुर की बुकनी, सिंदूर जो सौभाग्यवती स्त्रियाँ माँग में भरती हैं और जो उनके सौभाग्य का चिह्न माना जाता है।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सेंदूर)
उ.- (क) मुख मंडित रोरी रंग, सेंदुर माँग छही-१०-२४। (ख) आल मजीठ लाख सेंदुर कहुँ ऐसेहि बुधि अवरेखत-११०८। (ग) कहुँ जावक कहुँ बने तमोर रँग कहुँ अँग सेंदुर दाग्यौ-१९७२।
मुहा. सेंदुर चढ़ना- स्त्री का विवाह होना (विवाह में वर जब कन्या की माँग में सेंदुर भरता है तभी से वह उसकी पत्नी बन जाती है)। सेंदुर देना- विवाह के समय वर का कन्या की माँग भर कर उसको पत्नी बनाना।

सेंदुरानी
सिंदूर रखने की डिबिया, सिंदूरा
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सेंदुर + फ़ा. दानी)

सेंदुरा
सेंदुर-जैसे लाँल रंग का।
वि.
(हिं. सेंदुर)

सेंदुरा
सेंदुर रखने की डिबिया।
संज्ञा
पुं.

सेंदुरिया
सेंदुर-जैसे लाल रंग का।
वि.
(हिं. सेंदुर)

सेंदुरि, सेंदुरी
सेंदुर-जैसे लाँल रंग की गाय।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सेंदुर)
उ,- कजरी धौरी सेंदुरी धूमरि मेरी गैया-६६६।

सेंदुरि, सेंदुरी
सेंदुर जैसे लाल रंग की।
वि.
स्त्री.
(हिं. सेंदुर)

सेंद्रिय
जिसमें इंद्रियाँ हों, सजीव।
वि.
(सं.)

सेंद्रिय
जो पुरूषत्वयुक्त हो।
वि.
(सं.)

सेंध
चोरी करने के लिए दीवार में किया गया ऐसा छेद जिससे होकर चोर घर के भीतर जा सके और माल बाहर लाया जा सके।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सेधि)

सेव
व्यर्थ ही निकट या पास (आशा लगाये) बैठा रहता है।
क्रि.स.
(हिं. सेवना)
उ.-ज्यौं सुक सेमर सेव आस लागि निसि-बासर हठि चित्त लगायौ-१-३२६।

सेव
सेव' फल।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सेव)

सेवक
टहल या परिचर्या करनेवाला, नौकर-चाकर, भृत्य।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.-(क) इंदु समान हैं जाके सेवक, नर बपुरे की कहा गनी-१-३९। (ख) अनाचार सेवक सौं मिलि कै करत चबाइनि काम-१-१४१। (ग) सेवक राज, नाथ बन पठए, यह कब लिखी बिघाता-९-४९। (घ) सेवक कौ सेवापन एतौ, अज्ञाकारी होइ-९-९९। (ङ) सुर-नर-असुर-कीट-पसु-पच्छी सब सेवक प्रभु तेरे-५७०।

सेवक
भक्‍त, उपासक, आराधक।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.-जिहिं जिहिं बिधि सेवक सुख पावै, तिहिं बिधि राखत मन कौं-१-९। (ख) तीनि लोक के ताप निवारन सूर स्याम सेवक सुखकारी-१-३०। (ग) सूर सुकृत सेवक सो साँचौ स्यामहिं सुमिरैगौ-१-७५।

सेवक
व्यवहार या सेवन करनेवाला।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेवक
किसी स्थान में नियम पूर्वक अथवा उहेश्य-विशेष से वास करनेवाला।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेवकाइ, सेवकाई
सेवक का काम, टहल, सेवा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सेवक + हिं. आई)
उ.- (क) खरिक दुहावन जाति हों, तुम्हरी सेवकाई-७१३। (ख) चूक परी हरि की सेवकाई-२६९५।

सेवकनी, सेवकिन, सेवकिनि, सेवकिनी, सेविका, सेविकिन
सेवा करनेवाली, टहलिनो, परिचारिका।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सेवक)
उ.- रमा सेवकिनी देऊँ करि, कर जोरैं दिन याम-१६२५।

सेवकनी, सेवकिन, सेवकिनि, सेवकिनी, सेविका, सेविकिन
पूजा उपासना करनेवाली।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सेवक)

सेवकनी, सेवकिन, सेवकिनि, सेवकिनी, सेविका, सेविकिन
सेवन करनेवाली।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सेवक)

स्वसंभव
जो स्वतः उत्पन्न हो।
वि.
(सं.)

स्वसंभूत
जो आप से आप उत्पन्न हो।
वि.
(सं.)

स्वसंविद, स्वसंविद्
जिसका ज्ञान इंद्रियों से न हो सके, अगोचर।
वि.
(सं. स्वसंविद्)

स्वसंवेद्य
(बात) जिसका अनुभव वही कर सकता हो, जिस पर बीती हो
वि.
(सं.)

स्वसा
बहन, भगिनी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्वसृ)

स्वस्ति
कुशल-मंगल हो।
अव्य.
(सं.)

स्वस्ति
मंगल--, कल्याण।
संज्ञा
स्त्री.

स्वस्ति
ब्रह्मा की तीन पत्नियों में एक।
संज्ञा
स्त्री.

स्वस्ति
सुख।
संज्ञा
स्त्री.

स्वस्तिक
मंगल-चिह्न जो शुभ अवसरों पर दीवारों आदि पर अंकित किया जाता है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वस्तिक
शरीर के विशिष्ट अंगों में होनेवाला उक्त आकार का चिह्न जो बहुत शुभ माना जाता है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वस्तिक
हठयोग का एक आसन।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वस्तिक
एक प्रकार का मंगल-द्रव्य जो चावल को पानी में पीसकर बनाया जाता है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वस्तिबाचन
मंगल कार्यों के प्रारंभ में किया जानेवाला एक धार्मिक कृत्य जिसमें गणेश-पूजन और मंगल-सूचक मंत्रों का पाठ किया जाता है।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वस्तिवाचन)
उ.- एक दिना हरि लई करोटी सुनि हरषी नँदरानी। बिप्र बुलाय स्वस्तिबाचन करि रोहिनि नैन सिरानी-सारा. ४२1।

स्वस्तिवाचक
मंगल-सूचक बात कहनेवाला।
वि.
(सं.)

स्वस्तिवाचक
अशीर्वाद देनेवाला।
वि.
(सं.)

स्वस्तिवाचन
मंगल कार्यों के आरंभ में किया जानेवाला एक धार्मिक कृत्य जिसमें देव-पूजन और मंगल- पाठ आदि होता है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वस्ती बचन
मांगलिक मंत्र।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वस्ती + वचन )
उ.-बिप्र बुलाय बेद-धुनि कीन्हीं स्वस्तीबचन पढ़ायौ-सारा. ३९१।

स्वस्तेन, स्वस्त्ययन
एक धार्मिक कृत्य जो अशुभ बातों का नाश करके मंगल या कल्याण के लिए किया जाता है।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वस्त्ययन)

स्वस्थ
जिसे कोई रोग न हो, भलाचंगा।
वि.
(सं.)

स्वस्थ
जिसका स्वास्थ्य अच्छा हो।
वि.
(सं.)

स्वस्थ
जिसका चित्त ठिकाने हो, सावधान।
वि.
(सं.)

स्वस्थ
जिसमें कोई दोष या अश्लीलता न हो।
वि.
(सं.)

स्वस्थ
जिसमें कोई विकार न हो।
वि.
(सं.)

स्वस्थचित्त
जिसका चित्त ठिकाने हो।
वि.
(सं.)

स्वस्थता
नीरोगता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वस्थता
साव धानता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वस्थ-प्रज्ञ
जो सब, बातें ठीक-ठीक समझने करने में समर्थ हो।
वि.
(सं.)

स्वाँग
दूसरे का रूप बनने के लिए धारण किया गया बनावटी या कृत्रिम वेश, भेस।
संज्ञा
पुं.
(सं. सु + अंग)
उ.- उनपै कहथौ तुम कोऊ क्षत्रिया, कपट करि बिप्र को स्वाँग स्वाँग्यो-१० उ.- ५१।

स्वाँग
परिहास-पूर्ण तमाशा, नकल या खेल।
संज्ञा
पुं.
(सं. सु + अंग)
उ.- (क) दर-द्रर लोभ लागि लिये डोलति नाना स्वाँग बनावै-१-४२। (ख) जैसे नटवा लोभ कारन करत स्वाँग बनाइ-१-४५। (ग) तीन्यौ पन मैं ओर निबाहे इहै स्वाँग कौं काछे-१-१३६। (घ) चौरासी लख जोनि स्वाँग धरि भ्रमि भ्रमि जमहिं हँसावै-२-१३। (ङ) रैनि नहीं तौ अब जु कृपा भइ, धनि जिनि स्वाँग करायौ जू-१९३४। (च) करि आए नट स्वाँग से मोको तुम वैसे-२५७६।

स्वाँग
धोखा देने के लिए बनाया गया रूप या किया गया कार्य, आडंबर।
संज्ञा
पुं.
(सं. सु + अंग)
मुहा.- स्वाँग रचना या लाना-धोखा देने या कपट-व्यावहार करने के लिए आडंबर रचना।

स्वाँगना, स्वाँगनो
बनावटी वेश या रूप धारण करना।
क्रि.अ.
(हिं. स्वाँग)

स्वाँगना, स्वाँगनो
आडंबर रचना।
क्रि.अ.
(हिं. स्वाँग)

स्वाँगी
जो नकली या दूसरे का वेश बनाकर जीविकार्जन करता हो।
वि.
(हिं. स्वाँग)

स्वाँगी
अनेक रूप धारण करनेवाला, बहुरूपिया।
वि.
(हिं. स्वाँग)
उ.- स्वाँगी से ए भए रहत हैं छिन ही छिन ए और-पृ. ३३६ (५४)।

स्वाँगी
वह जो स्वाँग करे।
संज्ञा
पुं.

स्वाँग्यो, स्वाँग्यौ
बनावटी वेश या रूप धारण किया, स्वाँग बनाया।
क्रि.अ.
(हिं. स्वाँगना)
उ.-भीम अर्जुन सहित बिप्र को रूप धरि हरि जरासंध सों युद्ध माँग्यौ। दियौ उनपे कहथौ, तुम कोऊ क्षत्रिया कपट करि बिप्र को स्वाँग स्वाँग्यौ-१० उ.-५१।

स्वांत
अंतःकरण।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वांत
मृत्यु।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वांतज
प्रेम।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वांतज
मनोज।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वांतज
जो मन या अंतः करण से उत्पन्न हो।
वि.

स्वाँस, स्वाँसा
साँस।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्‍वास)

स्वाक्षर
हस्ताक्षर।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वाक्षर
किसी के हाथ का हस्ताक्षर या लेख जो अपने पास स्‍मति-रूप में रखा जाय।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वाक्षरित
अपने हस्ताक्षर से युक्त।
वि.
(सं.)

स्वागत
किसी मान्य या प्रिय व्यक्ति का आने पर आगे बढ़कर अभिनन्दन करना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- तेरी कही साँचि तुम जानो कीजै आगत स्वागत-१४८२।

स्वागतकारिणी
स्वागत करनेवाली।
वि.
स्त्री.
(सं.)

स्वागतकारी
स्वागत या अभ्यर्थना करनेवाला।
वि.
(सं. स्वागतकारी न्)

स्वागतपत्तिका
वह नायिका जो विदेश से पति के लौटने पर उत्साहपूर्ण और प्रसन्न हो।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वाद
मजा, आनंद, रसानुभूति।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- बहिरौ तान स्वाद कहा जानै गूँगौ खात मिठास-३३३६।
मुहा.- स्वाद चखाना-(१) अपराध का दंड देना। (२) भयंकर बदला लेना।

स्वाद
चाह, इच्छा, कामना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वाद
मीठा रस।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वादक
स्वाद लेनेवाला।
वि.
(सं.)

स्वादन
चखना, स्वाद लेना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वादन
मजा या आनंद लेना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वादित
चखा हुआ।
वि.
(सं.)

स्वादिष्ट, स्वादिष्ठ
जिसका स्‍वाद अच्छा हो, सुस्वादु।
वि.
(सं. स्वादिष्ट)

स्वादी
स्वाद चखने या लेनेवाला।
वि.
(सं. स्वादिन्)

स्वादी
मजा या आनंद लेनावाला।
वि.
(सं. स्वादिन्)

स्वागतप्रिया
वह नायक जो विदेश से पत्‍नी के लौटने से उत्साहपूर्ण और प्रसन्न हो।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वागतिक
स्वागत करनेवाला।
वि.
(सं.)

स्वाच्छंद
सुख से, सहज में, स्वच्छंदतापूर्वक।
क्रि. वि.
(सं. स्वच्छंद)

स्वाच्छंद
स्वच्छंदता।
संज्ञा
स्त्री.

स्वातंत्र्य
स्वतंत्रता, स्वाधीनता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वात, स्वाति, स्वाती
पंद्रहवाँ नक्षत्र जिसकी वर्षा के जल से सीप में मोती, बाँस में वंशलोचन और साँप में विष उत्पन्न होना माना जाता है।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्वाति)

स्वाति-पथ, स्वाती-पथ
आकाशगंगा।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वाति + पंथ)

स्वाति-सुत, स्वाती-सुत
मोती।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वाति + सुत)
उ.- स्वाति-सुत माला बिराजत स्याम तन इहिं भाइ-१०-१७०।

स्वाति-सुवन, स्वाती-सुवन
मोती।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वाति + हिं. सुवन)
उ.- ज्योति प्रकाश सुघन में खोलत स्वाति-सुवन आकार।

स्वाद
किसी चीज के खाने-पीने से जीभ या रसनेंद्रिय को होनेवाला अनुभव, जायका।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- (क) किंचित स्वाद स्‍वान-बानर ज्यौं घातक रीति ठटी-१-९८। (ख) साधु-निंदक स्वाद-लंपट, कपटी गुरु-द्रोही-१-१२४। (ग) जीह्वा-स्वाद मीन ज्यौं उरझ्यौ सूझी नहीं फयंदाई -१-१४७। (घ) रसना स्वाद सिथिल लंपट ह्वै अघटित भोजन करतौ-१-२०३। (ङ) सालन सकल कपूर सुबासत। स्वाद लेत सुंदर हरि गासत-३९६। (च) सूरदास तिल-तेल- सुंबादी स्वाद कहा जानै घृत ही री-१४९९।

स्वादीला
स्वादिष्ट।
वि.
(सं. स्वाद)

स्वादु
स्वादिष्ट।
वि.
(सं. स्वाद)

स्वादु
मधुर।
वि.
(सं. स्वाद)

स्वाद्य
चखने के योग्य।
वि.
(सं.)

स्वाध
स्वाद।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वाद)

स्वाधिकार
अपना अधिकार।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वाधिकार
स्वतंत्रता, स्वाधीनता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वाधिष्ठान
शरीर के आठ चक्रों में दूसरा जिसका स्थान शिश्न के मूल में है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वाधीन
स्वतंत्र।
वि.
(सं.)

स्वाधीन
निरंकुश।
वि.
(सं.)

स्वाप
नींद, निंद्रा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वाप
सपना, स्वप्न।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वाप
अज्ञान।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वापक
नींद लानेवाला, निद्राकारक।
वि.
(सं.)

स्वापन
एक प्राचीन अस्त्र जिससे शत्रु को निद्रित किया जाता था।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वापन
नींद लानेवाली औषध।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वापन
नींद लानेवाला, निद्राकारक।
वि.

स्वाभाविक
स्वभाव से या अपने आप होनेवाला, प्राकृतिक, नैसर्गिक।
वि.
(सं.)

स्वाभाविक
स्वभाव से संबंध रखनेवाला, स्वभाव-संबंधी।
वि.
(सं.)

स्वाभाविकी
प्राकृतिक।
वि.
(सं. स्वाभाविक)

स्वाधीनता
आजादी, स्वतंत्रता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वाधीनता
निरंकशता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वाधीन-पतिका
वह नायिका जिसका पति उसके वश में हो।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वाधीनी
स्वतंत्रता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्वाधीन)

स्वाध्याय
वेदों की कोई शाखा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वाध्याय
वेदों का विधिपूर्वक अध्ययन।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वाध्याय
किसी विषय का अध्ययन-अनुशीलन।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वान
कुत्ता।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्‍वान)
उ.- (क) ह्वै गज चल्यौ स्वान की चालहिं-१-७४। (ख) बहुतक जनम पुरीष-परायन सूकर-स्वान भयौ-१-७८। (ग) स्रम करत स्वान की नाईं-१-१०३।

स्वाना
सोने को प्रवृत्त करना।
क्रि.स.
(हिं. सुलाना)

स्वाना
कुत्ता, स्वान।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वान)

सेवन
उपभोग।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेवना
सेवा-टहल करना।
क्रि.स.
(सं. सेवन, हिं. सेना)

सेवना
उपासना-आराधना करना।
क्रि.स.
(सं. सेवन, हिं. सेना)

सेवना
निरंतर वास करना।
क्रि.स.
(सं. सेवन, हिं. सेना)

सेवना
प्रयोग या व्यवहार करना।
क्रि.स.
(सं. सेवन, हिं. सेना)

सेवना
उपभोग करना।
क्रि.स.
(सं. सेवन, हिं. सेना)

सेवनि, सेवनी
सुई, सूची।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सेवनि)

सेवनि, सेवनी
जोड़, टाँका, सीवन।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सेवनि)

सेवनि, सेवनी
जूही (फूल)।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सेवनि)

सेवनि, सेवनी
दासी, सेविका।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सेवनी)

स्वाभिमान
अपनी प्रतिष्ठा, मर्यादा या गौरव का अभिमान।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वाभिमानी
जिसे अपनी प्रतिष्ठा, मर्यादा या गौरव का अभिमान हो।
वि.
(सं. स्वाभिमानिन्)

स्वामि
प्रभु, स्वामी।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वामी)
उ.- सेवक करै स्वामि सों सरवर इनि बातनि पति जाई -९८५।

स्वामि
पति।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वामी)
उ.- (तुम) जाहु बालक छाँडि जमुना स्वामि मेरौ जागिहै-५७७।

स्वामिकता
प्रभु या स्वामी होने का भाव या स्थिति।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वामिकार्तिक, स्वामिकार्त्तिक
शिवजी के पुत्र स्कंद, कार्तिकेय।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वामिकार्त्तिक)

स्वामित्व
प्रभुत्व।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वामिन, स्वामिनि, स्वामिनी
मालकिन, स्वत्वाधिकारिणी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्वामिनी)

स्वामिन, स्वामिनि, स्वामिनी
घर की मालकिन, गृहिणी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्वामिनी)

स्वामिन, स्वामिनि, स्वामिनी
प्रभु या स्वामी की पत्नी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्वामिनी)
उ.-सेष, महेष. लोकेस, सुकादिक, नारदादि मुनि की हैं स्वामिनी- पृ. ३४५ (४०)।

स्वारी
देव-मूर्ति के साथ का जलूस।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सवारी)

स्वार्थ
(अपना) मतलब, उद्देश्य या प्रयोजन।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वार्थ
(अपना) लाभ, भलाई या हित।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
मुहा.- स्वार्थ आना-काम आना, सहायक होना। (किसी बात में) स्वार्थ लेना-रुचि लेना, अनुराग रखना।

स्वार्थ
सफल, फलीभूत, सिद्ध।
वि.
(सं. सार्थक)

स्वार्थ-त्याग
(किसी भले काम के लिए) अपने लाभ या हित का ध्यान छोड़ देना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वार्थत्यागी
जो (किसी भले काम के लिए) अपने हित या लाभ को सहर्ष छोड़ दे।
वि.
(सं. स्वार्थ + हिं. त्यागी)

स्वार्थ-पंडित
पक्का मतलबी।
वि.
(सं.)

स्वार्थपर
मतलबी, स्वार्थी।
वि.
(सं.)

स्वार्थपरता
स्वार्थी होने का भाव।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वार्थपरायण
स्वार्थी।
वि.
(सं.)

स्वायत्त
जिस पर अपना ही पूर्ण अधिकार और शासन हो।
वि.
(सं.)

स्वायो, स्वायौ
सुलाया (हुआ)।
क्रि.स.
(हिं.) सुलाना)
उ.-मनहुँ देखि रवि-कमल प्रकासत तापर भृंगी सावक स्वायो-२०६३।

स्वारथ
(अपना) मतलब, उद्देश्य या प्रयोजन।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वार्थ)
उ.- (क) हरि बिनु को पुरवै मो स्वारथ-१-२८४। (ख) गोपी हरी सूर के प्रभु बिनु, रहत प्रान किहिं स्वारथ-१-२८७। (ग) तिन अंकनि कोउ फिर नहिं बाँचत गत स्वारथ समयौ-१-२९८।

स्वारथ
(अपना) लाभ, भलाई या हित।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वार्थ)
उ.- भई न कृपा स्यामसुंदर की अब कहा स्वारथ फिरत बहैं -१-५३।
मुहा.- स्वारथ आना-भलाई या हित के लिए सहायक या उपयोगी होना। न आयौ स्वारथ-काम नहीं आया, सहायक नहीं हुआ। उ.- काहु न धरहरि करी हमारी कोउ न आयौ स्वारथ-१-२५९।

स्वारथ
सफल, सिद्ध, फलीभूत, सार्थक।
वि.
(सं. सार्थ)
उ.- सेवा सब भई अब स्वारथ।

स्वारथी
अपना ही मतलब देखनेवाला।
वि.
(सं. स्वार्थी)
उ.- सूरदास वै आपु स्वारथी पर-वेदन नहिं जान्यौ-१४१७।

स्वारस्य
रसीलापन, सरसता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वारस्य
किसी कारण से मिलनेवाला आनंद।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वारी
वाहन।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सवारी)

स्वारी
वह जो वाहन पर सवार हो।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सवारी)

स्वामिन, स्वामिनि, स्वामिनी
श्रीराधा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)
उ.- सूर स्वामी स्वामिनी बने एक से कोउ न पट़तर-अरस-परस दोऊ-पृ. ३१३ (२४)।

स्वामी
आन्नदाता।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वामिन्)

स्वामी
घर का कर्ता-धर्ता या प्रधान।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वामिन्)

स्वामी
मालिक, स्वत्वाधिकारी।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वामिन्)

स्वामी
(स्त्री का) पति।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वामिन्)

स्वामी
परम आराध्य, ईश्वर, भगवान।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वामिन्)
उ.- (क) सूरदास ऎसे स्वामी कौं देहिं पीठ सो अभागे-१-८। (ख) निधरक रहौं सूर के स्वामी, जनम न जानौं फेरि-१-५१। (ग) कौन भाँति हरि-कृपा तुम्हारी, सो स्वामी समुझी न परी-१-११५। (घ) सनमुख होइ सूर के स्वामी भक्तनि कृपा-निधान -९-१३४। (ङ) ब्रह्मपूरन सकल स्वामी रहे ब्रज निसि धाम-२५८२। (च) सूरदास स्वामी के आगे निगम पुकारत साखि-३३७३।

स्वामी
साधु, संन्यासी और धर्माचार्यों की उपाधि या संबोधन।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वामिन्)
उ.- तिलक बनाइ चले स्वामी ह्णै, बिषयिनि के मुख जोए-१-५२।

स्वायंभुव
चौदह मनुओं में प्रथम जो स्वयंभू ब्रह्मा से उत्पन्न माने गये हैं।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- स्वायंभूव सौं आदि मनु जए-३-८।

स्वायंभुवी
ब्रह्माणी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वायंभू
ब्रह्मा से उत्पन्न प्रथम मनु।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वायंभुव)
उ.- स्वायंभू मनु के सुत दोइ-४-८।

स्वास, स्वासा
साँस, श्वास।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्‍वास)
उ.- रघुपति रिस पावक प्रचंड अति, सीता स्वास समीर-९-१५८।

स्वास्थ्य
तंदुरुस्ती, आरोग्य।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वास्थ्यकर
स्वस्थ करनेवाला।
वि.
(सं.)

स्वाहा
एक शब्द जिसका प्रयोग हवन की हवि देते समय होता है।
अव्य.
(सं.)
मुहा.- स्वाहा करना-फूँक डालना, नष्ट करना। स्वाहा होना-नष्ट होना।

स्वाहा
जो जलकर राख हो गया हो।
वि.

स्वाहा
बरबाद, नष्ट।
वि.

स्वाहा
अग्नि की पत्नी का नाम।
संज्ञा
स्त्री.

स्वीकरण
अपनाना, अंगीकार करना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वीकरण
मानना. राजी होना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वीकार
मंजूर, अंगीकार।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वार्थपरायणता
स्वार्थपरता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वार्थसाधक
पक्का मतलबी।
वि.
(सं.)

स्वार्थसाधन
काम निकालना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वार्थांध
जो अपना मतलब साधने में इतना अंधा हो जाय कि भले-बुरे का ध्यान भी छोड़ दे।
वि.
(सं.)

स्वार्थी
मतलबी।
वि.
(सं. स्वार्थिन्)

स्वाल
संज्ञा
पुं.
(हिं. सवाल)

स्वावलंब, स्वावलंबन
अपने ही बल-भरोसे पर काम करना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वावलंबी
अपने ही बल-भरोसे पर काम करनेवाला।
वि.
(सं. स्वावलंबिन्)

स्वाश्रय
अपना ही सहारा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वाश्रित
अपने ही सहारे रहनेवाला।
वि.
(सं.)

स्वीकारात्मक
जो स्वीकार करने योग्य हो या स्वीकार किया जाय।
वि.
(सं.)

स्वीकारोक्ति
वह कथन जिसमें अपना दोष, अपराध आदि स्वीकार किया गया हो।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वीकार्य
स्वीकार करने योग्य।
वि.
(सं.)

स्वीकृत
स्वीकार किया हुआ।
वि.
(सं.)

स्वीकृत
ग्रहण किया या माना हुआ।
वि.
(सं.)

स्वीकृत
मान्यताप्राप्त।
वि.
(सं.)

स्वीकृति
मंजूरी, स्वीकार करने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वीकृति
ग्रहण करने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वीकृति
मानने या राजी होने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वीय
अपना, निजी।
वि.
(सं.)

स्वीया
अपने ही पति में पूर्ण अनुराग रखनेवाली नायिका।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्वकीया)

स्वे
अपना।
वि.
(सं. स्वः)

स्वेच्छया
अपनी ही इच्छा से।
क्रि. वि.
(सं.)

स्वेच्छा
अपनी मर्जी या इच्छा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वेच्छाचार
मनमाना काम करना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वेच्छाचारिता
निरंकुशता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वेच्छाचारी
मनमाने ढंग से काम करनेवाला, निरंकुश।
वि.
(सं. स्वेच्छाचारिन् )

स्वेच्छा-बिहार, स्वेच्छा-विहार
निरंकुशतापूर्वक किया गया विहार।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वेच्छा + विहार)

स्वेच्छा-बिहारी
निरंकुशतापूर्वक विहार या विलास करनेवाला।
वि.
(सं. स्वेच्छा + हिं. बिहारी)
उ.- असुर द्वै हुते बलवंत भारी। सुंद-उपसुंद स्वेच्छृबिहारी-८-११।

स्वेच्छामृत्यु
जिसकी मृत्यु उसकी इच्छा पर हो, इच्छानुसार मरनेवाला।
वि.
(सं.)

स्वेच्छामृत्यु
भीष्म पितामह जो अपनी इच्छानुसार मरे थे।
संज्ञा
पुं.

स्वेच्छासेवक
वह जो अपनी इच्छाओं का दास हो।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वेच्छासेवक
वह जो अपनी मर्जी या इच्छा से सेवक बना हो, स्वयंसेवक।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वेत
सफेद
वि.
(सं. श्‍वेत)
उ.- अप्सरा, पारिजातक, धनुष, अस्व गज स्वेत, ये पाँच सुरपतिहिं दीन्हें-८-८।

स्वेद
पसीना, प्रस्वेद।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- चलत चरन चित गयौ गलित झिर स्वेद सलिल भै भीनी-२९०६।

स्वेद
लज्जा, हर्ष, श्रम आदि से शरीर का पसीने से भर जाना जो एक सात्विक अनुभाव माना गया है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वेद
भाप, वाष्प।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वेदक
पसीना लानेवाला (पदार्थ)।
वि.
(सं.)

स्वेद-कण
पसीने की बूँद।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वेदज
पसीने से उत्पन्न होनेवाला।
वि.
(सं.)

स्वेदज
(जूँ, खटमल आदि) जीव जो पसीनेसे उत्पन्न होते हैं।
संज्ञा
पुं.

स्वेदन
शरीर से पसीना लाना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वेदित
पसीने से भरा हुआ।
वि.
(सं.)

स्वेदित
भफारा दिया हुआ, भाप से सेंका हुआ।
वि.
(सं.)

स्वै
अपना, निजी।
वि.
(सं. स्वीय)

स्वै
सो।
सर्व.
(हिं. सो)

स्वैच्छिक
अपनी इच्छा से संबंधित।
वि.
(सं.)

स्वैच्छिक
अपनी इच्छा से लिया हुआ।
वि.
(सं.)

स्वैर
मनमाना काम करनेवाला।
वि.
(सं.)

स्वैर
धीमा, मंद।
वि.
(सं.)

सेवकनी, सेवकिन, सेवकिनि, सेवकिनी, सेविका, सेविकिन
स्थान-विशेष में नियमित रूप से वास करनेवाली।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सेवक)

सेवकु
सेवक।
संज्ञा
पुं.
(सं. सेवक)
उ.-सेवकु करै स्वामि सौं सरवर, इनि बातनि पति जाइ-९८५।

सेवत
टहल, सेवा या परिचर्या करता है।
क्रि.स.
(हिं. सेवना)
उ.-(क) सिव-विरंचि-सुरपति सब सेवत प्रभु-पद-चाए-१-१६३। (ख) बिबिध आयुध घरे सुभट सेवत खरे-९-१२९।

सेवत
पूजा, उपासना या आराधना करके या करता है।
क्रि.स.
(हिं. सेवना)
उ.- (क)स्वपचहु स्रेष्‍ठ होत पद-सेवत बिनु गोपाल द्विज जन्म न भावै-१-२३३। (ख) कर्मजोग करि सेवत कोई-१० उ.-१२७।

सेवति, सेवती
पंद्रहवाँ नक्षत्र जिसकी वर्षा के जल से मोती उपजना माना जाता है।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्वाति)

सेवति, सेवती
सफेद गुलाब।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सेवती)
उ.-(क) जाही जूङी सेवती करना कनिआरी-१८२२। (ख) फूले मरुवो मोगरो सेवती फूल-२४०५।

सेवन
टहल, परिचर्या, सेवा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेवन
उपासना, आराधना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेवन
नियमित प्रयोग या व्यवहार।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेवन
लगातार रहना, वास करना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- कोउ कहे तीरथ सेवन करो, कोउ कहै दान जज्ञ बिस्तरी-१-३४१।

स्वैर
मनमाना।
वि.
(सं.)

स्वैरता
निरंकुशता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वैराचार
मनमाना काम करना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्वैराचारिणी
मनमाना काम करनेवाली।
वि.
(सं.)

स्वैराचारिणी
व्यभिचारिणी।
संज्ञा
स्त्री.

स्वैराचारी
मनमाना काम करनेवाला, निरंकुश।
वि.
(सं. स्वैराचारिन् )

स्वैरिणी
मनमाना काम करनेवाली।
वि.
(सं.)

स्वैरिणी
व्यभिचारिणी स्त्री।
संज्ञा
स्त्री.

स्वैरिता
स्वेच्छाचारिता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्वैरी
स्वेच्छाचारी।
वि.
(सं. स्वैरिन्)

स्वौपार्जित
अपना कमाया हुआ।
वि.
(सं.)

ह-देवनागरी वर्णमाला का तैंतीसवाँ और अंतिमव्यंजन जो उच्चारण की दृष्टि से 'ऊँष्म' वर्ण है।

हँक
उच्च स्वर से किया हुआ संबोधन।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हाँक)

हँक
ललकार।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हाँक)

हँक
बढ़ावा।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हाँक)

हँक
दुहाई।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हाँक)

हँकड़ना, हँकरना
उच्च स्वर से चिल्लाना।
क्रि.अ.
(हिं. हाँक)

हँकड़ना, हँकरना
ललकारना।
क्रि.अ.
(हिं. हाँक)

हँकराई
जोर से पुकारने या बुलाने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हँकराना)

हँकराई
पुकरवाया, बुलवाया।
क्रि.स.
उ.- जमुता तट मन बिचारि गाइनि हँकराई-६१९।

हँकराए
बुलाया, बुलाये।
क्रि.स.
(हिं. हँकराना)
उ.- (क) मोहन ग्वाल-सखा हँकराए। (ख) कौन काज को हम हँकराए-१००५।

हँकरानो, हँकरानो
जोर से आवाज देना या संबोधन करना।
क्रि.स.
(हिं. हाँक)

हँकरानो, हँकरानो
बुलाना, पुकारना।
क्रि.स.
(हिं. हाँक)

हँकरानो, हँकरानो
बुलाने या पुकारने का काम दूसरे से कराना, बुलवाना, पुकरवाना।
क्रि.स.
(हिं. हाँक)

हँकराये
बुलवाया।
क्रि.स.
(हिं. हँकराना)
उ.- (क) इहीं काज तुमकौं हँकराए-१०४६। (ख) सूर इंद्र गण हँकराये-१०६२।

हँकरावा
बुलाने की क्रिया या भाव, पुकार, बुलाहट।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हँकरावा)

हँकरावा
बुलावा, न्योता।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हँकरावा)

हँकवा
बहुत से लोगों का कोलाहल करते हुए शेर, चीते, आदि को तीन ओर से घेरकर उस दिशा में ले चलना जिघर शिकारी उसे मारने को तैयार बैठा हो।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाँकना)

हँकवाना
पुकारने का काम दूसरे से कराना, हाँक लगवाना।
क्रि.स.
(हिं. हाँकना का प्रे.)

हँकवैया
हाँकनेवाला।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाँकना + वैया)
उ.- मन मंत्री सो रथ हँकवैया-४-१२।

हँकारी
बुलाने की क्रिया या भाव, बुलाहट।
संज्ञा
स्त्री.

हँकारी
हँकार करके।
क्रि.स.
(हिं. हँकारना)

हँकारी
लेहु हँकारी-बुला या बुलवा लो।
प्र.
उ.- ऎरावत को लेहु हँकारी-१०६६।

हँकारी
पुकारते, बुलाते या चिल्लाते हुए।
क्रि. वि.
उ.- हमको देखत ही गए उत ग्वाल-बाल हँकारी-१५३२।

हँकारी
हुंकार करके।
क्रि.अ.
(हिं. हंकराना)

हँकारी
उठे हँकारी-वीरनाद या हुंकार कर उठे।
प्र.
उ.- अंकुस राखि कुंभ पर करष्यो, हलधर उठे हँकारी-२५९४।

हँकारी
गर्व करनेवाला, घमंड़ी।
वि.
(हिं. अहंकारी)

हँकारे
बुलाया या बुलवाया है।
क्रि.स.
(हिं. हँकारना)
उ.- (क) तुम दारुक आगँ ह्वै देखौ, भक्त भवन किधौं अनत सिधारे। सुनि सुंदरि उठि उत्तर दीन्हथौ, कौरव-सुत कछु काज हँकारे-१-२४०। (ख) मल्ल-युद्ध प्रति कंस कुटिल मति छल करि इहाँ हँकारे-२५६९।

हँकारौ
बुलाया या बुलावाया।
क्रि.स.
(हिं. हँकारना)
उ.- न्यौति नृप प्रजा कौं तब हँकारौ-४-११।

हँकारौ
बुलाओ या पुकारो, बुलवाओ या पुकरवाओ।
क्रि.स.
(हिं. हँकारना)
उ.- नैंकु काहैं नसुत कौ हँकारौ-७५१।

हंका
ललकार।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हाँक)

हँकाई
हाँकने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हाँकना)

हँकाना, हँकानो
चौपायों को हाँककर या हँकाकर किसी ओर ले जाना।
क्रि.स.
(हिं. हाँक)

हँकाना, हँकानो
बुलाना, पुकारना।
क्रि.स.
(हिं. हाँक)

हँकाना, हँकानो
हाँकने का काम दूसरे से कराना, हँकवाना।
क्रि.स.
(हिं. हाँक)

हँकार
जोर से पुकारने की क्रिया या भाव, पुकार।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हक्कार)
मुहा.- हँकार पड़ना-(चारों ओर से) बुलाने के लिए आवाजें लगाना।

हंकार
घंमड, शेखी, गर्व।
संज्ञा
पुं.
(सं. अहंकार)

हंकार
वीरों की ललकार।
संज्ञा
पुं.
(सं. हुंकार)

हँकारत
जोर से पुकारता है, ऊँचे स्वर से बोलता है।
क्रि.स.
(हिं. हँकारना)
उ.-ऊँचे तरु चढ़ि स्याम सखनि कौं बारंबार हँकारत।

हँकारना, हँकारनो
जोर से पुकारना, ऊँचे स्वर से बुलाना।
क्रि.स.
(हिं. हँकार)

हँकारना, हँकारनो
अपने पास आने को कहना, बुलाना।
क्रि.स.
(हिं. हँकार)

हँकारना, हँकारनो
युद्ध के लिए ललकारना या आह्वान करना।
क्रि.स.
(हिं. हँकार)

हंकारना, हंकारनो
युद्ध में वीरों का हुंकार या दर्पनाद करना।
क्रि.अ.
(हिं. हुंकार)

हंकारना, हंकारनो
घमंड या गर्व करना।
क्रि.अ.
(हिं. हुंकार)

हँकारा
पुकार, बुलाहट।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हँकारना)

हँकारा
बुलावा, न्योता, निमंत्रण।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हँकारना)

हँकारि
हाँक देकर, ललकारकर।
क्रि.अ.
(हिं. हँकारना)
उ.- आगै हरि पाछै श्रीदामा, धरथौ स्याम हँकारि-१०-२१३।

हँकारि
लिए हँकारि-बुला या बुलवा लिये।
प्र.
उ.-ग्वाल-बाल लिए हँकारि-६१९।

हँकारी
लोगों को बुलाकर लानेवाला व्यक्ति।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हँकार)

हँकारी
दूत।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हँकार)

हंबा
सम्मति मा स्वीकृति-सूचक अव्यय, हाँ।
अव्य.
(हिं. हाँ)

हँबाना, हँबानो
(गाय का) रैभाना।
क्रि.अ.
(देश.)

हंभा
(गाय बैल के) बोलने या रैभान का शब्द।
संज्ञा
स्त्री.
(देश.)

हंस
बतख की तरह का एक जल पक्षी जिसका वर्षाकाल में मानसरोवर आदि झीलों में चला जाना और शरत्काल में लौटना प्रसिद्ध है।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)
उ.- (क) मानसरोवर छाँड़ि हंस तट काग-सरोवर न्हावै-२-१३। (ख) मानौं चारि हंस सरवर तैं बैठे आइ, सदेहिया-९-१९।

हंस
सूर्य, रवि।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हंस
ब्रह्म, परमात्मा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हंस
माया से निर्लिप्त शुद्ध आत्मा, जीवात्मा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हंस
जीवनी शक्ति, प्राण।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)
उ.- (क) जा छन हंस तजी यह काया, प्रेत-प्रेत कहि भागी-१-७९। (ख) बिछुरत हंस बिरह कैं सूलनि, झूठे सबै सनेह-८०१।
मुहा.- हंस उड़ जाना- शरीर से प्राण निकल जाना।

हंस
विष्णु का एक अवातर जो सनकादिक का भ्रम और गर्व दूर करने के लिए हुआ था।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)
उ.- (क) सनकादिक, पुनि ब्यास बहुरि भए हंस -रूप हरि-२-३६। (ख) तब हरि हँस-रूप धरि आए-११-६।

हंस
सन्यासियों का एक भेद।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)
उ.- कही आचार भक्ति-बिधि भाखी हंस धर्म प्रगटायो- सारा.।

हंडा
वह रोशनी जिस पर शीशे की हंडे-जैसी बड़ी चिमनी हो।
संज्ञा
पुं.
(सं. भांडक)

हँडाना, हँडानो
धुमाना, फिराना।
क्रि. स.
(हिं. हंडना)

हँडाना, हँडानो
मारे-मारे या व्यर्थ धुमाना-फिराना।
क्रि. स.
(हिं. हंडना)

हँडाना, हँडानो
छानबीन कराना, ढुँढ़ाना।
क्रि. स.
(हिं. हंडना)

हँडिया
मिट्टी, पत्‍थर आदि का बना बरतन, हाँड़ी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हंडी)

हंडी
मिट्टी, पत्‍थर आदि का बना गोलाकार बरतन, हाँड़ी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हंडा)

हंत
खेद या शोकसूचक शब्द।
अव्य.
(सं.)

हंता
वध करनेवाला।
वि.
(सं. हंतृ)

हंत्री
हत्या करनेवाली।
वि.
स्त्री.
(सं. हंता)

हँफनि, हँफनी
हाँफने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हॉंफना)
मुहा.- हँफनि या हँफनी मिटाना-दम लेना, सुस्ताना, थकावट दूर करना।

हँकारयो, हँकारयौ
बुलाया-बुलवाया है, न्योता या निमंत्रण दिया या भिजवाया।
क्रि.स.
(हिं. हँकारना)
उ.- (क) दच्छ रिस मानि जब जज्ञ आरंभ कियौ, सबनि कौं सहित पत्नी हँकारथौ -४-६। (ख) आयो सुन्यो अहीर मनो महि काल हँकारथौ-१० उ.-८।

हँकारयो, हँकारयौ
बुलाकर तैयार कराया।
क्रि.स.
(हिं. हँकारना)
उ.- सुनि जरासंध बृत्तांत अस सुता से जृद्ध हित कटक अपनो हँकारथौ-१० उ.-१।

हँकारयो, हँकारयौ
घमंड या गर्व से भरगया।
क्रि.अ.
(हिं. अहंकारना)
उ.- घात मन करत, लै डारिहौं दुहुँनि पर, दियो गज पेलि आपुन हँकारथो-२५९२।

हंगामा
उपद्रव, उत्पात।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. हंगामः)

हंगामा
शोरगुल, हल्ला।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. हंगामः)

हंगामा
भीड़-भाड़।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. हंगामः)

हंडना, हंडनो
घूमना-फिरना।
क्रि.अ.
(हिं. अध्‍यटन)

हंडना, हंडनो
मारे-मारे या व्यर्थ घूमना।
क्रि.अ.
(हिं. अध्‍यटन)

हंडना, हंडनो
इधर-उधर ढूँढ़ना, छानबीन करना।
क्रि.अ.
(हिं. अध्‍यटन)

हंडा
पीतल, ताँबे आदि का बहुत बड़ा बरतन।
संज्ञा
पुं.
(सं. भांडक)

हँसता
जो हँस रहा हो।
वि.
(हिं. हँसना)
मुहा.- हँसता चेहरा या मुख-हँसमुख। हँसता-हँसता-(१) प्रसन्नता के साथ। (२) सहज में, सरलता से।

हँसति
हँसती है।
क्रि.अ.
(हिं. हँसना)
उ.- रूखी ह्वै रहति हँसे ते हँसति-१८६९।।

हँसन
हँसने की क्रिया, भाव या ढंग।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हँसना)

हँसना
प्रसन्नता सूचित करने के लिए खिलखिलाना या ठट्ठा मारना, हास करना।
क्रि.अ.
(सं. हसन)
मुहा.- हँसना खेलना-प्रसन्नता या आनंद करना, आनोद-प्रमोद करना। हँसना-बोलना-प्रेमपूर्वक बातचीत करना। ठठाकर हँसना-जोर से हँसना, अट्टहास करना।

हँसना
दिल्लगी या परिहास करना।
क्रि.अ.
(सं. हसन)

हँसना
मनोहर या रमणीय लगना।
क्रि.अ.
(सं. हसन)

हँसना
प्रसन्न या सुखी होना।
क्रि.अ.
(सं. हसन)

हँसना
खिलना, विकसित होना।
क्रि.अ.
(सं. हसन)

हँसना
उपहास या व्यंग करना।
क्रि.स.
मुहा.- किसी व्यक्ति पर हँसना-उसकी हैसी उड़ाना, उसका उपहास करना। किसी वस्तु पर हँसना-तुच्छ या बुरी समझकर उसकी व्यंग्यपूर्ण निंदा करना।

हंसनादिनि, हंसनादिनी
सुंदर या मधुर बोलनेवाली।
वि.
स्त्री.
(सं. हंसनादिनी)

सेवनीय
सेवा के योग्य।
वि.
(सं.)

सेवनीय
पूजा के योग्य।
वि.
(सं.)

सेवनीय
व्यवहार के योग्य।
वि.
(सं.)

सेवनीय
उपभोग के योग्य।
वि.
(सं.)

सेवनो
सेना, सेवना।
क्रि.स.
(सं. सेवन)

सेवर
एक प्राचीन अनार्य जाति।
संज्ञा
पुं.
(सं. शबर)

सेवरा
साधुओं का एक वर्ग।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

सेवरि, सेवरी
शबर' जाति की एक भक्तिन जिसके जूठे बेर श्रीराम ने खाये थे।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शबरी)

सेवल
विवाह की एक रीति जिसमें वर-पक्ष की कोई सधवा, थाली में दीपक रखकर वर के हाथ में देती, उसका माथा नवाती और अपना माथा छूती है।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

सेवहु
पूजा, उपासना या आराधना करो।
क्रि.स.
(हिं. सेवना)
उ.-करहिं बिचार सुन्दरी सब मिलि, अब सेवहु त्रिपुरारि-७६४।

हंस
पैर का 'नूपुर' नामक आभूषण।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हस
हास करके।
क्रि.अ.
(हिं. हँसना)
मुहा.- हँसकर बात उड़ाना-तुच्छ या साधारण समझकर टाल देना।

हंसक
हंस पक्षी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हंसक
पैर का 'बिछुआ' या 'नूपुर' नामक आभूषण।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हंस-किंकिणी
एक रागिनी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हंस-गति
हंस जैसी सुंदर चाल।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हंस-गति
सायुज्य मुक्ति।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हंसगामिनी
हंस के समान सुंदर गति से चलनेवाली।
वि.
स्त्री.
(सं.)

हंसजा
सूर्य-पुत्री, यमुना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हँसत
हँसता है।
क्रि.अ.
(हिं. हँसना)
उ.- (क) हँसै हँसत, बिलखैं बिलखत हैं-१-१९५। (ख) हुलसत, हँसत, करत किलकारी, मन अभिलाष बढ़ावै-१०-४५।

हँसनि
हँसने की क्रिया, भाव या ढंग।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हँसना)
उ.- हँसनि माधुरता।

हँसनी
हंस की मादा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हंस)

हँसनो
हँसना।
क्रि.अ.
स. (हिं. हँसना)

हंस-मंगला
एक रागिनी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हंस-बाल
हंस का बच्चा, बाल हंस।
संज्ञा
पुं.
(सं. हंस + बाल)
उ.- सूर प्रभु नंद-सुवन दोउ हंस-बाल उपाय-२५६५।

हंसमाला
हंसों की पंक्ति।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हंसमाला
एक वर्णवृत्त।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हंसमुख
सदा हँसता रहनेवाला।
वि.
(हिं. हँसना + मुख)

हंसमुख
मसखरा, ठिठोलीबाज।
वि.
(हिं. हँसना + मुख)

हंसरथ
ब्रह्मा जिनका वाहन हंस।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हँसली
गरदन और छाती के बीच की धन्वाकार हड्डी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. अंसली)

हँसली
गले का एक आभूषण।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. अंसली)

हंस-वंश
सूर्यवंश।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हंसवाहन
ब्रह्मा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हंसवाहनी
सरस्वती।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हंस-सुता
सूर्य की पुत्री, यमुना नदी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)
उ.- हंस-सुता की सुंदर कगरी अरु कुंजन की छाहीं- ना. ४७७४।

हंसा
राधा की सखी एक गोपी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हंस)
उ.- कहि राधा किन हार चुरायो ¨¨¨¨¨। प्रेमा दामा रूपा हंसा रंगा हरषा जाउ-१५८०।

हँसाई
हँसने की क्रिया, भाव या रीति।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हँसना)

हँसाई
बदनामी, निंदा, उपहास।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हँसना)
उ.- (क) सूरदास कूबरि रँग राते ब्रज में होति हँसाई। (ख) सूरदास प्रभु बिरद लाज धरि मेटहु इहाँ के लोग हँसाई-३११८।

हँसाना, हँसानो
किसी को हँसने में प्रवृत्त करना।
क्रि.स.
(हिं. हँसना)
मुहा.- अपने को हँसाना- ऎसा आचरण या व्यवहार करना जिससे दूसरे उपहास करें।

हँसाय
हँसने की क्रिया, भाव या रीति।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हँसाई)

हँसाय
निंदा, उपहास।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हँसाई)

हंसारूढ़
ब्रह्मा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हंसारूढ़
जो हँस पर सवार हो।
वि.

हंसारूढ़ा
सरस्वती।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हंसारूढ़ा
जो हंस पर सवार हो।
वि.
स्त्री.

हंसालि
एक छंद।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हँसावत
हँसने को प्रवृत्त करता हे।
क्रि.स.
(हिं. हँसाना)
उ.- (क) बालक-बृंद बिनोद हँसावत-६१८। (ख) गावत हँसत गवाय हँसावत -८०९।

हँसावै
हँसने या उपहास करने को प्रवृत करता है।
क्रि.स.
(हिं. हँसाना)
उ.- चौरासी लख जोनि स्वाँग धरि भ्रमि भ्रमि जमहि हँसावै -२-१३।

हँसि
हँसकर।
क्रि.अ.
(हिं. हँसना)
उ.- हँसि बोलौ जगदीस जगतपति-१-१५१।

हँसि
परिहास या विनोद करके।
क्रि.अ.
(हिं. हँसना)
उ.- की तू कहति बात हँसि मोसों की बूझति सति भाऊ-१२६०।

हंसिका
हंस की मादा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हंसिनी
हंस की मादा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हंसी)

हँसिया
एक धारदार अर्द्धचंद्राकार औजार।
संज्ञा
पुं.
(सं. हंस)

हंसिया
हाथी के अंकुश का टेढ़ा भाग।
संज्ञा
पुं.
(सं. हंस)

हंसी
हंस की मादा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)
उ.-कैसैं ल्याउँ संगीत सरोवर मगन भई गति हंसी-१६८५।

हंसी
एक वर्णवृत्त।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हँसी
हँसने की क्रिया या भाव, हास।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हँसना)

हँसी
हँसी-सुखी-प्रसन्नता। हँसी ठट्ठा-विनोद। हँसी-खेल-विनोद और क्रीड़ा।
यौ
मुहा.- हँसी छूटना-(बहुत जोर से) हँसी आना। (२) मजाक, दिल्लगी, ठट्ठा, परिहास।

हँसी
हँसी-खेल-आमोद-प्रमोद, विनोद।
यौ

हँसी
सहज या साधारण बात। हँसी-ठठोली-दिल्लगी, मजाक, हँसी-दिल्लगी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हँसना)
मुहा.- हँसी उड़ाना-उपहास करना। हँसी समझना या हँसी-खेल समझना- खिलवाड़ या साधारण बात समझना। हँसी में उड़ाना- साधारण या उपेक्षणीय समझ कर टाल देना, परिहास या विनोद की बात कहकर टाल देना। हँसी में लेना या ले जाना-गंभीर या महत्वपूर्ण बात (पर गंभीरता से विचार न करके उस) को हँसी या मन-बहलाव की बात समझना। हँसी में खसी होना या हों जाना-दिल्लगी, मजाक या विनाद की बात करते करते परस्पर झगड़ने लगना या मारपीट कर बैठना।

हँसी
अनादरसूचक हास, व्यंग्यपूर्ण निंदा।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हँसना)
मुहा.- हँसी उड़ाना-व्यंग्यपूर्ण निंदा करना।

हँसी
बदनामी, लोक-निंदा।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हँसना)
मुहा.- हँसी होना-बदनामी या निंदा होना। हँसी (हाँसी) होने लगी -बदनामी या निंदाहोनेलगी है।उ.-हँसी (हाँसी) होने लगी या ब्रज में कान्हहिं जाइ सुनावौ।

हँसीला
हँसी-मजाक करनेवाला।
वि.
(हिं. हँसना)

हँसुआ
हँसिया।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हँसिया)

हँसुली
हँसली।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हँसली)

हँसुवा
हँसिया।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हँसिया)

हँसें, हँसैं
हँसने या हँसाये जाने पर।
क्रि. वि.
(हिं. हँसना)
उ.-(क) हँसैं हँसत, बिलखैं बिलखत हैं-१९५। (ख) हँसें तें हँसति-१८६९।

हँसै
हँसी उड़ावे, उपहास करे।
क्रि.स.
(हिं. हँसना)
उ.-ऎसे चलौ हँसै नहिं कोऊ-१४९७।

हँसैगो
हँसी उड़ायँगे, उपहास करेंगे।
क्रि.स.
(हिं. हँसना)
मुहा.- नाउँ हँसैगो-नाम की हँसी उड़ायेंगे, उपहास करेंगे। उ.-यह बिचारि सुनि ग्वारिनी नाउँ हँसैगो लोग-११२०।

हँसोड़, हँसोर
हँसी-ठट्ठा करनेवाला, मसखरा।
वि.
(हिं. हँसना + ओड़)

हँसोहाँ
हँसौहाँ।
वि.
(हिं. हँसना)

हँसौगे
हास करोगे, खिलखिला ओगे।
क्रि.अ.
(हिं. हँसना)
उ.-बात सुने तैं बहुत हँसौगे, चरन-कमल की सौं-१-१५१।

हँसोगे
उपहास करोगे।
क्रि.अ.
(हिं. हँसना)

हँसौहों, हँसौहाँ
कुछ-कुछ हँसता हुआ, कुछ कुछ हँसी लिये।
वि.
(हिं. हँसना)

हँसौहों, हँसौहाँ
जो स्वभाव से हँसमुख हो।
वि.
(हिं. हँसना)

हँसौहों, हँसौहाँ
बहुत जल्दी हँस देनेवाला।
वि.
(हिं. हँसना)

हँसौहों, हँसौहाँ
परिहासयुक्त।
वि.
(हिं. हँसना)

हई
घुड़सवार।
संज्ञा
पुं.
(सं. हयिन्, हिं. हयी)

हई
अचरज या आश्चर्यसूचक शब्द।
अव्य.
(अनु.)

हई
डर, भय।
संज्ञा
स्त्री.

हई
है ही' (का संक्षिप्त रूप)।
क्रि.अ.
(हिं. है + ही)

हई
पीड़ित कर दिया।
क्रि.स.
(हिं. हयना)
उ.- (क) मदन हई री-१४७४। (ख) प्रिया जानि अंकम भरि लीन्ही कहि कहि ऎसी काम हई-१८३२।

हई
नष्ट कर दिया।
क्रि.स.
(हिं. हयना)
उ.- घटी घटा सब अभिन मोह मद तमिता तेज हई-२८५३।

हउँ
हूँ।
क्रि.अ.
(ब्रज. हौं)

हउँ
ब्रजभाषा में उत्तमपुरुष, सर्वनाम का एक वचन रुप, मैं।
सर्व.

हए
मार डाला।
क्रि.स.
(हिं. हयना)
उ.- (क) दंतबक्र सिसुपाल जो भए। बासुदेव ह्वै सी पुनि हए-१०-२। (ख) कोट सबन भूलि गए हाँक देत चकृत भए लपकि लपकि हए उबरथौ नहिं कोऊ-२६१०।

हए
आघात किया, लक्ष्य बनाकर आहत किया।
क्रि.स.
(हिं. हयना)
उ.- (क) सूर स्याम बिथुरे कच मुख पर नख नाराच हए-२०८४। (ख) इन हिय हेरि मृगी सब गोपी सायक ज्ञान हए -३०५०।

हक
सच।
वि.
(अ. हक)

हक
उचित।
वि.
(अ. हक)

हक
अधिकार, स्वत्व।
संज्ञा
पुं.
मुहा.- हक दबाना या मारना-किसी को प्राप्य वस्तु या बात से वेचित करना। हक पर या के लिए लड़ना-प्राप्य या अधिकार की रक्षा के लिए लड़ना। हक दबना या मारा जाना-प्राप्य या अधिकार से वंचित रहना। हक में-लाभ की दृष्टि से, पक्ष में।

हक
फर्ज, कर्तव्य।
वि.
(अ. हक)
मुहा.- हक अदा करना- कर्तव्य पालन करना।

हक
वह वस्तु जिस पर न्यायतः अधिकार हो।
वि.
(अ. हक)

हक
दस्तूरी की रकम।
वि.
(अ. हक)
मुहा.- हक दबना या मारा जाना- दस्तूरी की रकम न मिलना। हक दबाना या मारना- दस्तूरी की रकम न देना।

हक
ठीक या उचित बात या पक्ष।
वि.
(अ. हक)
मुहा.- हक पर होना-उचित बात का आग्रह करना।

हकदार
अधिकारी।
वि.
(अ. हक + फ़ा. दार)

हकनाहक
जबर-दस्ती, धींगा-धींगी से।
(अव्य)
(अ. हक + फ़ा. नाहक)

हकनाहक
व्यर्थ, निष्प्रयोजन।
(अव्य)
(अ. हक + फ़ा. नाहक)

हकबक
घबराया हुआ।
वि.
(हिं. हक्काबक्का)

हकबकाना, हकबकानो
घबरा जाना।
क्रि.अ.
(अनु.)

हकराना, हकरानो
बुलाना।
क्रि.स.
(हिं. हकार)

हकलना, हकलनो
हुंकार करना।
क्रि.अ.
(सं. हुंकार)

हकलना, हकलनो
ललकारना।
क्रि.अ.
(सं. हुंकार)

हकला
(वाग्दोष के कारण) रुक-रुक कर बोलनेवाला।
वि.
(हिं. हकलाना)

हकलाना, हकलानो
वाग्दोष के कारण) रुकरुककर बोलना।
क्रि.अ.
(अनु. हक)

हकलाहा
हकला।
वि.
(हिं. हकला)

हकार
ह' अक्षर या वर्ण।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हकारना, हकारनो
हे' कहकर पुकारना।
क्रि.अ.
(हिं. हकार)

हकाहक
खूब जोरों से।
क्रि. वि.
(अनु.)

हकाहक
जोरों की लड़ाई, घोर युद्ध।
संज्ञा
स्त्री.

सेवांजलि
सेवक या भक्त का अंजुली में कूछ लेकर स्वामी या उपास्य को अर्पण करना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

सेवा
टहल, परिचर्या।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)
उ.-राजनीति अरु गुरु की सेवा, गाइ-बिग्न प्रतिपारे-९-५४।

सेवा
नौकरी, चाकरी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

सेवा
पूजा, उपासना, आराधना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)
उ.-(क)जिहिं जिहिं भाइ करत जन सेवा अंतर की गति जानत-१-११। (ख) ब्रह्मा महादेव तै को बड़, तिनकी सेवा कछु न सुधारी-१-३४। (ग) तजि सेवा बैकुंठनाथ की, नीच नरनि कैं संग रहै-१-५३। (घ) मनमा और मानसी सेवा दोउ अगाध करि जानौ-१-२११। (ङ) जोग न जज्ञ, ध्यान नहिं सेवा,संत-संग नहिं ज्ञान-१-३०४।
मुहा.- सेवा में-पास, समीप, सामने।

सेवा
आश्रय, शरण।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

सेवा
रक्षा, संरक्षण।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

सेवा
उपभोग।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

सेवाति, सेवाती
पंद्रहवाँ नक्षत्र जिसकी वर्षा के जल से मोती का उत्पन्‍न होना माना जाता है।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. स्वाती)

सेवाति, सेवाती
बूंदसेवातीस्वाती नक्षत्र की वर्षा के जलकी दूँद।
पद.

सेवाति, सेवाती
बूंदसेवाती वह दुष्प्राप्य वस्तु जिसके प्राप्त होने पर असीम प्रसन्नता हो।
पद.
उ.- सूरदास प्रभु प्रानहिं राखहु होइ करि बूँद सेवाती-३११६।

हकीकत
असलियत, सत्य या वास्तविक बात।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हकीकत)
मुहा.- हकीकत खुलना-ठीक बात का पता लगना। हकीकत में-सचमुच, वास्तव में।

हकीकत
सच्चा और ठीक-ठीक वृत्तांत।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हकीकत)

हक़ीक़ी
सच्चा, ठीक।
वि.
(अ. हक़ीक़ी)

हक़ीक़ी
सगा, आत्मीय।
वि.
(अ. हक़ीक़ी)

हक़ीक़ी
भगवत्संबंधी।
वि.
(अ. हक़ीक़ी)

हक़ीम
विद्वान।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हकीम
यूनानी चिकित्सक।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हकीमी
हकीम-संबंधी।
वि.
(अ. हकीम)

हकीमी
यूनानी चिकित्सा शास्त्र।
संज्ञा
स्त्री.

हकीमी
हकीम का काम, पेशा या व्यवसाय।
संज्ञा
स्त्री.

हक़ीर
तुच्छ।
वि.
(अ. हक़ीर)

हक़ीर
उपेक्षणीय।
वि.
(अ. हक़ीर)

हकूमत
शासन, अधिकार।
संज्ञा
पुं.
(अ. हुकूमत)
मुहा.- हकूमत चलाना या दिखाना-अधिकार या बड़प्पन दिखाना।

हक्क
हक।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हक)

हक्का
हाँक, पुकार।
संज्ञा
पुं.
(सं. हुंकार)

हक्का
ललकार।
संज्ञा
पुं.
(सं. हुंकार)

हक्का
हुंकार।
संज्ञा
पुं.
(सं. हुंकार)

हक्काबक्का
घबराया हुआ, भेंचक्का।
वि.
(अनु. हक, बक)

हक्कार
चिल्लाकर बुलाने का शब्द।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाँक)

हक्कारना, हक्कारनो
ललकारना।
क्रि.स.
(सं. हुंकार)

हजार
सहस्त्र।
वि.
(फ़ा. हजार)

हजार
अनेक।
वि.
(फ़ा. हजार)
उ.-मैं देखें की नाहीं देखे तुम तो बार हजार-१३११।

हजार
दस सौ की संख्या या अंक।
संज्ञा
पुं.

हजार
कितना ही, चाहे जितना अधिक।
क्रि. वि.

हजारहाँ
हजारों, सहस्‍त्रों।
वि.
(फ़ा. हजारहाँ)

हजारहाँ
बहुत से, अनेक।
वि.
(फ़ा. हजारहाँ)

हजारा
(फूल) जिसमें हजार ये बहुत अधिक पंखुड़ियाँ हों, सहस्रदल।
वि.
(फ़ा. हज़ारा)

हजारा
फुहारा।
संज्ञा
पुं.

हजारा
एक तरह की आतिश-बाजी।
संज्ञा
पुं.

हजारी
एक हजार सिपाहियों का नायक या सरदार।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. हजारी)

हचकना, हचकनो
हच-हच' करके रुकना, झुकना या हिलना-डोलना।
क्रि.अ.
(अनु.)

हचका
झोंका, धक्का।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हचकना)

हचकोला
धक्का, धचका।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हचकना)

हचना, हचनो
हिचकना।
क्रि.अ.
(अनु.)

हज
काबे के दर्शन या परिक्रमा के लिए मक्के (अरब) जाना (मुसलमान)।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हजम
पचा हुआ।
वि.
(अ. हज़म)

हजम
बेईमानी या अनुचित रुप से लिया हुआ।
वि.
(अ. हज़म)
मुहा.- हजम होना-बेईमानी या अनुचित रीति से ली गयी वस्तु का पास रहना या पच सकना।

हजरत
महापुरुष, महात्मा।
संज्ञा
पुं.
(अ. हजरत)

हजरत
दुष्ट या धूर्त (व्यंग्य)।
संज्ञा
पुं.
(अ. हजरत)

हजामत
सिर के बाल काटने और दाढ़ी बनाने का काम या मजदूरी।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)
मुहा.- हजामत बनाना- (१) सिर या दाढ़ी के बाल काटना। (२) घन या अन्य वस्तु ठगकर ले लेना। (३) मारना-पीटना। हजामत होना - (१) धन या अन्य वस्तु का ठगकर लिया जाना। (२) मार पड़ना, दंड मिलना।

हटकना
रोकना, मना करना, निषेध या वर्जन करना।
क्रि.स.
(हिं. हटक)

हटकना
पशुओं को किसी ओर हाँकना।
क्रि.स.
(हिं. हटक)

हटकना
मना करने से मानना, रोकने से रुकना।
क्रि.अ.

हटकनि
मना करना।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हटकन)

हटकनि
चौपायों को हाँकने की क्रिया।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हटकन)
उ.-बालक-बृन्द बिनोद हँसावत, करतल लकुट धेनु की हटकनि-६१८।

हटकनि
पशुओं को हाँकने की लाठी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हटकन)

हटकनो
हटकना।
क्रि.स. क्रि.अ.
(हिं. हटक)

हटका
किवाड़ों को खुलने से रोकने के लिए लगाया गया काठ, अर्गल।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हटक)

हटकि
रोक कर, मना करके।
क्रि.स.
(हिं. हटकना)
उ.- (क) सूर स्याम को हटकि न राखै, तैं ही पूत अनोखो डायौ-१०-३३१। (ख) कुल-अभि-मान हटकि हठि राखी, तैं जिय मैं कछु और धरी-८०६। (ग) बारहिंबार कहि हटकि राखति, निकसि गए हरि संत नहिं रहे घेरे- पृ. ६२२ (१६) (घ) जद्यपि हटकि हटकि राखति हौं, तद्यपि होति खरी- पृ. ३३७ (६३)।

हटकि
पशुओं को किसी दिशा में जाने से रोककर।
क्रि.स.
(हिं. हटकना)
उ.-पायँ परि बिनती करौंहौं हटकि लावौ गाय। (ख) अबकैं अपनी हटकि चरावहु, जैहैं भटकी घाली-५०३।
मुहा.- जबरदस्ती, हठात्। (२) बिना कारण।

हजो
बदनामी, निंदा।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हज्व)

हज्ज
हज।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हज)

हज्जाम
नाई, नापित।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हटक
मना करने या रोकने की क्रिया, वारण, वर्जन।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हटकना)
मुहा.- हटक मानना- मना करने पर रुक जाना, रोकने पर मान जाना। हटक न मानत- रोकने पर भीं नहीं रुकते। उ.-सूरदास ए हटक न मानत लोचन हठी हमारे-३०३६। हटक न मानति-मना करनैं पर भी नहीं मानती। उ.-बंसी धुनिमृदु कान परत ही गुरुजन-हटक न मानति।

हटक
पशुओं को हाँकने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हटकना)

हटकत
रोककर दूसरी ओर हाँकने (पर भी), मना या वर्जित करने (पर भी)
क्रि.स.
(हिं. हटकना)
उ.-माधौ, मैंकु हटकौ गाइ। ¨¨¨¨¨¨ यह अति हरहाई, हटकत हूँ बहुत अमारग जाति-१-५१।

हटकति
रोकती या मना करती, रोकने या मना करने (पर)।
क्रि.स.
(हिं. हटकना)
उ.- (क) सुत को हटकति नाहिं, कोटि इक गारी दीन्हीं-१०७०। (ख) सूर जव हम हठकि हटकति बहुत हम पर लरी-पृ. ३३७ (६७)।

हटकन
मना करना, रोकना, वारण, वर्जन।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हटकना)

हटकन
चौपायों को हाँकना।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हटकना)

हटकन
चौपायों को हाँकने की लाठी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हटकना)

हजारी
हजारी बजारी-सरदारों से लेकर बनियों तक सब, अमीर-गरीब सभी।
यौ.

हजारों
सहस्त्रों।
वि.
(हिं. हजार)

हजारों
अनेक।
वि.
(हिं. हजार)

हजूम
भीड़।
संज्ञा
पुं.
(अ. हुजूम)

हजूर
किसी बड़े या अधिकारी की समक्षता।
संज्ञा
पुं.
(अ. हुजूर)

हजूर
बादशाह या शासनाधिकारी का दरबार या कचहरी।
संज्ञा
पुं.
(अ. हुजूर)
उ.-दधि-माखन-धृत लेत छँड़ाए, आजुहिं मोहिं हजूर बोलावहु-१०९४।

हजूर
किसी बड़े अधिकारी, शासक या स्वामी के लिए संबोधन शब्द।
संज्ञा
पुं.
(अ. हुजूर)

हजूर
किसी बड़े या शासनाधिकारी के सामने या समक्ष।
क्रि. वि.
उ.-रजु लै सबै हजूर होति तुम सहित सुता वृषभान-२९३६।

हजूरी
किसी बादशाह, राजा या शासनाधिकारी के पास रहनेवाला सेवक।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हजूर)
मुहा.- जी-हजूर करना-चापलूसी, खुशामद या चाटुकारी करना।

हजूरी
हजूर का।
वि.

हटकी
रोका, मना किया।
क्रि.स.
(हिं. हटकना)
उ.- माई री, गोबिंद सों प्रीति करत तबहीं काहे न हटकी री -१२००।

हटके
रोका, मना किया।
क्रि.स.
(हिं. हटकना)
उ.-नैना बहुत भाँति हटके -पृ. ३३६ (४२)।

हटकौ
पशु को रोककर दूसरी ओर हाँको।
क्रि.स.
(हिं. हटकना)
उ.-माधौ, नैंकु हटकौ गाइ-१-५६।

हटक्यो,हटक्यौ
रोका, मना किया।
क्रि.स.
(हिं. हटकना)
उ.-जुरीं आय सिगरीं जमुना तट हटक्यो, कोउ न मान्यो।

हटतार
एक खनिज पदार्थ।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हरताल)

हटतार
माला का सूत।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हठतार)

हटतार
टकटकी।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हठ + तारा)

हटना, हटनो
एक स्थान को छोड़कर दूसरे पर जाना।
क्रि.अ.
(सं. घट्टन)

हटना, हटनो
पीछे की ओर सरकना।
क्रि.अ.
(सं. घट्टन)

हटना, हटनो
(काम से) जी चुराना या विमुख होना।
क्रि.अ.
(सं. घट्टन)
मुहा.- पीछे न हटना-(काम करने को) तैयार रहना।

हटा
रोक, मनाही।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हटकना)

हटाना, हटनो
एक स्थान से दूसरे पर ले जाना।
क्रि.स.
(हिं. हटना)

हटाना, हटनो
दूर करना, न रहने देना।
क्रि.स.
(हिं. हटना)

हटाना, हटनो
स्थान छोड़ने पर विवश करना।
क्रि.स.
(हिं. हटना)

हटाना, हटनो
(किसी बात का) विचार छोड़ देना।
क्रि.स.
(हिं. हटना)

हटाना, हटनो
बात पर दृढ़ न रहने देना।
क्रि.स.
(हिं. हटना)

हटी
दूकान।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हाट)

हटी
बाजार।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हाट)

हटी
जिददी, हठी।
वि.
(हिं. हठी)

हटुआ, हटुवा
हाट में बेचनेवाला, दूकानदार।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाट + उआ, उवा)

हटना, हटनो
समने से दूर होना।
क्रि.अ.
(सं. घट्टन)

हटना, हटनो
किसी बात का नियत समय पर न होकर आगे के लिए टल जाना
क्रि.अ.
(सं. घट्टन)

हटना, हटनो
न रह जाना, मिटना।
क्रि.अ.
(सं. घट्टन)

हटना, हटनो
बात पर दृढ़ न रहना।
क्रि.अ.
(सं. घट्टन)

हटना, हटनो
रोकना, मना करना।
क्रि.स.
(हिं. हटकना)

हटवाई
हाट में सौदा लेना या बेचना, हाट का क्रय-विक्रय।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हाट + वाई)

हटवाई
हाट में सौदा बेचनेवाला।
संज्ञा
पुं.

हटवाई
हटाने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हटाना)

हटवाना, हटवानो
हटाने का काम दूसरे से कराना।
क्रि.स.
(हिं. हटाना का प्रे)

हटवार, हटवारा, हटवारो
हाट में सौदा बेचनेवाला।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाट +वारा)

सेवादार
किसी देवालय में सेवा-व्यवस्था आदि करने का अधिकारी।
संज्ञा
पुं.
(सं. सेवा + फ़ा. दार)

सेवाधर्म
सेवक का धर्म, कर्तव्य या दायित्व।
संज्ञा
पुं.
(सं. सेवा + धर्म्म)

सेवापन
टहल, परिचर्या।
संज्ञा
पुं.
(सं. सेवा + हिं. पन)

सेवापन
सेवक का धर्म या कर्तव्य।
संज्ञा
पुं.
(सं. सेवा + हिं. पन)
उ.-सेवक कौ सेवापन एतौ आज्ञाकारी होइ-९-९९।

सेवा-बंदगी
पूजा, उपासना आराधना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सेवा + बंदगी)

सेवार, सेवाल
पानी में होने वाली एक तरह की घास।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शैवाल)
उ.-(क) मनु सेवाल कमल पर अरुझे-१०-१४०। (ख) राम औ जांबवान सुभट ताके हते रुधिर की नहर सरिता बहाई। सुभट मनो मकर अरु केस सेवार ज्यौं धनुष त्वच चर्म कूरम बनाई-१० उ.-२१।

सेवावृत्ति
नौकरी, चाकरी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

सेवि
सेवी' का रूप जो समास में होता है।
संज्ञा
पुं.
(सं. सेवी)

सेवि
सेवित।
वि.
(सं. सेवित)

सेवि
सेव्य।
वि.
(सं. सेव्य)

हटौती
देह का ढाँचा, शरीर की गठन।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हाड़ + औती)

हट्ट
दूकान।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हट्ट
बाजार।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हट्टा-कट्टा
मोटा-ताजा।
वि.
(सं. हृष्ट + अनु, कटटा)

हट्टी
दूकान।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हट्ट)

हठ
जिद, अड़, टेक।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- (क) हठ, अन्याय, अधर्म, सूर नित नौबत द्वार बजावत-१-१४१। (ख) हठ न करहुतुम नंददुलारे-१०-१६०।
मुहा.- हठ पकड़ना-किसी बात के लिए अड़ जाना। हठ रखना-जिस बात के लिए जिद हो, उसे मान लेना। हठ में पड़ना-हठ करना। हठ माँड़ना-हठ ठानना। हठ माँड़ि रही-जिद कर रही है। उ.- क्यों हठ माँड़ि रही री सजनी टेरत स्याम सुजान।

हठ
दृढ़ प्रतिज्ञा, अटल संकल्प।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हठ
अनुचित बात के लिए की गयी जिद, दुराग्रह।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हठ-धर्म
अपनी बात पर दृढ़तापूर्वक डटे रहना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हठ-धर्मी
अनुचित बात पर भी डटे रहना, दुराग्रह।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हठ + हिं. धर्मी)

हठ-धर्मी
मत या संप्रदाय की बात को लेकर अड़ना, कट्टरता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हठ + हिं. धर्मी)

हठ-धर्मी
अनुचित बात पर भी अड़ा रहनेवाला।
वि.

हठना, हठनो
जिद या हठ करना।
क्रि.अ.
(हिं. हठ)

हठना, हठनो
दुराग्रह करना।
क्रि.अ.
(हिं. हठ)

हठना, हठनो
दृढ़ प्रतिज्ञा करना।
क्रि.अ.
(हिं. हठ)

हठना, हठनो
जोर देना, आग्रह करना।
क्रि.अ.
(हिं. हठ)
मुहा.- हठ कर-जबरदस्ती, बलात्।

हठयोग
योग का वह रूप जिसमें शरीर को साधने के लिए कठोर मुद्राओं और आसनों का विधान है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हठशील
जिद्दी, हठी।
वि.
(सं.)

हठहिं
हठ की।
संज्ञा
पुं.
सवि.(हिं. हठ +हिं.)
मुहा.- हठहिं गहौं-हठ करूँ। उ.-प्रगट ताप तनु ताप सूर प्रभु केहि पर हठहिं गहौं-११-३।

हठात
हठपूर्वक।
प्रत्य.
(सं.)

हठात
जबरदस्ती, बलात्।
प्रत्य.
(सं.)

हठात
अचानक, सहसा।
प्रत्य.
(सं.)

हठाहठ, हठाहठो
हठात्।
क्रि. वि.
(सं. हठात्)

हठि
हठ या दुराग्रहपूर्वक।
क्रि. वि.
(हिं. हठना)
उ.-अगम सिंधु जतननि सजि नौका हठि क्रम-भार भरत-१-५५।

हठि
दृढ़तापूर्वक।
क्रि. वि.
(हिं. हठना)
उ.-ज्यौं सुक सेमर सेव आस लगि, निसि-बासर हठि चिंत्त लगायौ-१-३२६।

हठिका
हल्ला-गुल्ला, शोर।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हठिहैं
हठ करेंगी।
क्रि.अ.
(हिं. हठना)
उ.- करिहैं न कबहूँ मान हम, हठिहैं न माँगत दान-२७३५।

हठी
हठ करनेवाला।
वि.
(सं. हठिन)
उ.- सूरदास ए हटक न माँगत लोचन हठी हमारे-३०३६।

हठीला
जिददी, हठी।
वि.
(हिं. हठ + ईला)

हठीला
दृढ़प्रतिज्ञ।
वि.
(हिं. हठ + ईला)

हठीला
युद्ध में डटा रहनेवाला।
वि.
(हिं. हठ + ईला)

हठीली
हठ करनेवाली।
वि.
स्त्री.
(हिं. हठीला)
उ.- (क) सूदास प्रभु माखन माँगत, नाहिंन देति हठीली-१०-२९९। (ख) तू अजहूँ तजि मान हठीली कहौं तोहिं समुझाय। (ग) कहति नागरी स्याम सों तजो मान हठीली- पृ. ३१२ (१५)।

हठीले
हठ, ऎंठ या अकड़भरे।
वि.
(हिं. हठ)
उ.-हारै तोरथौ, चीरहिं फारथौ बोलत बोल हठीले हो-१०३३।

हठे
हठ कर रहे हैं।
वि.
(हिं. हठ)
उ.-सखि, ये नैनहठे।

हठै
हठ को।
संज्ञा
पुं. सवि.
(हिं. हठ)
उ.-प्रगट पाप संताप सूर अब कापर हठै गहौं-३-२।

हठै
हठ करता है।
क्रि.अ.
(हिं. हठना)
उ.-सूरदास प्रभु इती बात कौं कत मेरौ लाल हठै-१०-१९५।

हठैहौ
हठ करोगे।
क्रि.स.
(हिं. हठना)
उ.-जो पै तुम या भाँति हठैहौ।

हड़
एक पेड़ जिसका फल औषध के रूप में काम आता है, हर्र।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हरीतकी)

हड़
हड़ के आकर का, नाक का एक गहना, लटकन।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हरीतकी)

हड़कंप
भारी हलचल।
संज्ञा
पुं.
(सं. हृत्कंप)

हड़प
अनुचित रीति से लिया हुआ।
वि.
(अनु.)
मुहा.- हड़प करना-अनुचित रीति से ले लेना।

हड़पना
खा या निगल लेना।
क्रि.स.
(हिं. हड़प)

हड़पना
अनुचित रीति से ले लेना।
क्रि.स.
(हिं. हड़प)

हड़बड़
जल्दी, उतावली।
संज्ञा
स्त्री.
(अनु.)

हड़बड़
उतावली के कारण होनेवाली घबराहट।
संज्ञा
स्त्री.
(अनु.)
मुहा.- हड़बड़ करना-बहुत जल्दी मचाना।

हड़बड़ाना
बहुत जल्दी करना।
क्रि.अ.
(अनु.)

हड़बड़ाना
शीघ्रता करने को प्रवृत्त करना।
क्रि.स.

हड़बड़िया
जल्दी मचानेवाला।
वि.
(हिं. हड़बड़)

हड़बड़ी
जल्दी, शीघ्रता।
संज्ञा
स्त्री.
(अनु.)

हड़बड़ी
उतावली के कारण घबराहट।
संज्ञा
स्त्री.
(अनु.)
मुहा.- हड़बड़ी में पड़ना-ऎसी स्थिति होना कि सारा काम बहुत जल्दी निबटाना पड़े।

हड़क
पागल कुत्ते के काटने पर पानी के लिए होनावाली व्याकुलता।
संज्ञा
स्त्री.
(प्रा.)

हड़क
किसी वस्तु को पाने की रट या धुन।
संज्ञा
स्त्री.
(प्रा.)

हड़कना
कोई चीज न मिलने पर या किसी अभाव से दुखी होना।
क्रि.अ.
(हिं. हड़क)

हड़काना
तंग करने के लीए किसी को पीछे लगा देना, लहकारना।
क्रि.स.
(हिं. हड़कना)

हड़काना
तरसाना।
क्रि.स.
(हिं. हड़कना)

हड़काना
नाही' करके हटा देना।
क्रि.स.
(हिं. हड़कना)

हड़काया
पागल (कुत्ता)।
वि.
(हिं. हड़कना)

हड़काया
किसी वस्तु के लिए बहुत उतावला।
वि.
(हिं. हड़कना)

हड़्ताल
किसी असंतोष को सूचित करने के लिए दूकाने या काम बंद करना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हट्ट +ताला)

हड़प
खाया या निगला हुआ।
वि.
(अनु.)

हड़हड़ाना
बहुत जल्दी करना।
क्रि.अ.
(अनु.)

हड़हड़ाना
जल्दी मचाकर दूसरे को घबराना।
क्रि.स.

हड़हा
जंगली बैल।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

हड़हा
इतना दुबला कि शरीर में हड़िडयाँ ही शेष रह गयी हों।
वि.
(हिं. हाड़)

हड़ावर, हड़ावरि, हड़ावल, हड़ावलि
हडि्डयों का समूह।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हाड़ + सं. अवलि)

हड़ावर, हड़ावरि, हड़ावल, हड़ावलि
हडि्डयों का ढाँचा, ठठरी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हीड़ सं. अवलि)

हड़ावर, हड़ावरि, हड़ावल, हड़ावलि
(3) हडि्डयों की माला
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हीड़ सं. अवलि)

हड़ि
काठ की बेड़ी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हड़ीला
जिसमें हड्डी हो।
वि.
(हिं. हाड़ + ईला)

हड़ीला
जो इतना दुबला हो कि केवल हडि्डयाँ बच रहें।
वि.
(हिं. हाड़ + ईला)

हत
गया-बीता, निकृष्ट।
वि.
(सं.)

हतक
हेठी, अपमान।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हतक)

हतचेत
बेहोश, अचेत।
वि.
(सं. हत + चेत)

हतज्ञान
संज्ञाशून्य।
वि.
(सं.)

हतदैव
दैव का मारा, अभागा।
वि.
(सं.)

हतन
मार डालना।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हतना)

हतन
दूर करना।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हतना)
उ.- ज्यौं कपि सीत-हतन हित गुंजा सिमिटि होत लौलीन-१-१०२।

हतन
मारनेवाला।
वि.

हतन
दूर या नष्ट करनेवाला।
वि.
उ.-नगर नारि ब्याकुल जिय जानत प्रभु सूर स्याम गर्व-हतन नाम ध्यान करि करि वै हरषैं-२६०४।

हतन. हतनो
मार डालना, वध करना।
क्रि.स.
(सं. हत +हिं. ना)

हड्डा
शरीर के भीतर की वह कठोर वस्तु जो ढाँचे या आधार के रूप में होती है, अस्थि।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. अस्थि, प्रा. अत्थि, अट्ठि)
मुहा.- हड्डी (हडि्डयॉं) गढ़ना या तोड़ना-बहुत मारना-पीटना। हड्डी (हडि्डयॉं) निकल आना - (रोग आदि के कारण) इतना दुबला हो जाना कि हडि्डयॉं दिखायी देने लगें।

हड्डा
पुरानी हड्डी-किसी वृद्ध या वृद्धा का मजबूत शरीर, पुराने समय के आदमी जैसा दृढ़ शरीर।
यौ.

हड्डा
खानदान, वंश, कुल।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. अस्थि, प्रा. अत्थि, अट्ठि)

हत
जो मार डाला गया हो।
वि.
(सं.)

हत
जो मारा-पीटा गया हो।
वि.
(सं.)

हत
रहित, विहीन।
वि.
(सं.)

हत
जिसके आघात या ठोकर लगी हो।
वि.
(सं.)

हत
जो रह न गया हो, नष्ट।
वि.
(सं.)
उ.- बिधि- गर्व हत करत न लागी बार-४३७।

हत
पीड़ित, ग्रस्त।
वि.
(सं.)

हत
जिसमें विकार आ गया हो।
वि.
(सं.)

हतन. हतनो
मारना-पीटना।
क्रि.स.
(सं. हत +हिं. ना)

हतन. हतनो
न मानना, पालन न करना।
क्रि.स.
(सं. हत +हिं. ना)

हतन. हतनो
तोड़ना, भंग करना।
क्रि.स.
(सं. हत +हिं. ना)

हतप्रभ
तेज या कांतिहीन।
वि.
(सं.)

हतप्रभाव
जिसका असर न रह गया हो।
वि.
(सं.)

हतप्रभाव
जिसका अधिकार न रह गया हो।
वि.
(सं.)

हतबुद्धि
मूर्ख, वुद्धिहीन।
वि.
(सं.)

हतबुद्धि
विमूढ़ , किंकर्तव्यविमूढ़।
वि.
(सं.)

हतबोध
मूर्ख।
वि.
(सं.)

हतबोध
विमूढ़।
वि.
(सं.)

सेविका
दासी, परिचारिका।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

सेविका
पूजा-उपासना करनेवाली।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

सेवित
जिसकी टहल वा सेवा की गयी हो।
वि.
(सं.)

सेवित
जिसकी पूजा- उपासना की गयी हो।
वि.
(सं.)

सेवित
जिसका प्रयोग या व्यवहार किया गया हो।
वि.
(सं.)

सेवित
जिसने आश्रय लिया हो।
वि.
(सं.)

सेवित
जिसका उपभोग किया गया हो।
वि.
(सं.)

सेवितव्य
सेवा-योग्य।
वि.
(सं.)

सेवितव्य
उपासना-योग्य।
वि.
(सं.)

सेविता
सेवा करनेवाला।
संज्ञा
पुं.
(सं. सेवितृ)

हतभाग, हतभागा, हतभागी, हतभाग्य
अभागा, भाग्यहीन।
वि.
(सं. हत + भाग्य)

हतभागिन, हतभागिनि, हतभागिनी
अभागी, भाग्यहीना।
वि.
स्त्री.
(सं. हत + भाग्य)

हतमना
उमंग या उत्साह रहित।
वि.
(सं. हत + मनस)

हतमना
चिंचित और दुखी।
वि.
(सं. हत + मनस)

हतवाना, हतवानो
वध करवाना।
क्रि.स.
(हिं. हतना का प्रे)

हतवाना, हतवानो
नष्ट करवाना।
क्रि.स.
(हिं. हतना का प्रे)

हतश्री
तेज, कांति या श्रीहीन।
वि.
(सं.)

हतश्री
मुरझाया हुआ, उदास।
वि.
(सं.)

हता
होना' का भूतकालिक एक वचन रूप, था।
क्रि.अ.
(हिं. होना)

हता
नष्ट चरित्रवाली।
वि.
स्त्री.
(सं. हत)

हताई
घायल होने, मरने आदि की क्रिया या भाव।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हतना)

हताना, हतानो
हत' करने को प्रवृत्त करना, हतवाना।
क्रि.स.
(हिं. हतना)

हताश, हताशा, हतास, हतासा
जिसकी आशा नष्ट हो गयी हो, निराश।
वि.
(सं. हताश )

हताहत
मारे हुए और घायल।
वि.
(सं.)

हति
मारकर।
क्रि.स.
(हिं. हतना)
उ.-(क) अघ-बक-तृनाबर्त-धेनुक हति-१-१५८। (ख) कंस बंस बधि, जरासंध हति-१-१८१। (ग) हति गज-सत्रु-८-६।

हति
तोड़ कर, भंग करके।
क्रि.स.
(हिं. हतना)

हति
डारत हति-तोड़ डालता है, भंग कर देता है।
प्र.
उ.-ज्यों गज फटिक सिला मैं देखत, दसननि डारत हति (पाठा, जाइ परथो)-२-३६।

हतिहैं
मार डालेगा।
क्रि.स.
(हिं. हतना)
उ.-मैं देखों इनको अब हतिहैं, अति ब्याकुल हहरथौ-२५५२।

हती
होना' क्रिया का भूतकालिक स्त्रीलिंग एकवचन रूप, थी।
क्रि.अ.
(हिं. होना)
उ.-तेरे हती प्रेम-संपति सखि, सो संपति केहि मूषी-२२७५।

हते
होना' क्रिया का भूतकालिक बहुवचन रूप, थे।
क्रि.अ.
(हिं. होना)
उ.-नयन हते तिनहूँ पर बीती।

हत्थे
हाथ में।
क्रि. वि.
(हिं. हाथ)
मुहा.- हत्थे चढ़ना-(१) हाथ में आना, मिलना, प्राप्त होना। (२) वश में होना।

हत्थे
हाथ से, द्वारा।
क्रि. वि.
(हिं. हाथ)

हत्या
मारने की क्रिया, वध।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)
उ.- करिकै क्रोध तुरत तिहिं मारथौ। हत्या हित यह मंत्र उचारथौ। चारि अंस हत्या के किए। ¨¨¨¨¨¨ ब्राह्मन हत्या कै दुख तयौ-६-५।
मुहा.- हत्या लगना या होना-किसी का वध करने का पाप लगना। हत्या लगी-वध करने के पाप के भागी बने। उ.- राम तिहिं हत्यौ, तब सब रिषिन मिलि कहथौ, बिप्र हत्या तुम्हैं लगी भाई- ना. ४८४१। हत्या होइ-वध करने का पाप लगेगा। उ.-हरि-जन मारैं हत्या होइ-५-३।

हत्या
(वध करने के उद्देश्य से नहीं) अनजान में या संयोगवश किसी के प्राण ले लेना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हत्या
हैरान करनेवाली बात, झँझट, बखेड़ा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)
मुहा.- हत्या टलना-झंझट से छुटकारा मिलना। हत्या गले पड़ना या सिर लगना-झंझट या बखेड़े के किसी काम में फँसना। हत्या गले डालना या सिर लगाना-बखेड़े या झंझट के काम में फँसाना।

हत्यार, हत्यारा
मार डालने या वध कर देनेवाला।
(सं. हत्या + कार या हिं. आर, आरा)

हत्यार, हत्यारा
फाँसी देनेवाला, जल्लाद।
(सं. हत्या + कार या हिं. आर, आरा)

हत्यार, हत्यारा
क्रूर कार्य करनेवाला।
(सं. हत्या + कार या हिं. आर, आरा)

हत्यारी
वध करनेवाली।
वि.
(हिं. हत्यारा)

हत्यारी
हिंसा या हत्या का पाप।
संज्ञा
स्त्री.

हते
मारे, मार डाले।
क्रि.स.
(हिं. हतना)
उ.- (क)ज्ञान-बिबेक बिरोधे दोऊ, हते बंधु-हितकारी-१-१३। (ख) हरि कहथौ, राज न करत धर्मसुत। कहत, हते मैं भ्रात तात जुत-१-२६१। (ग) राम औ' जादवन सुभट ताके हते-१० उ.-२१।

हतो
होना' क्रिया का भूतकालिक एकवचन रूप, था।
क्रि.अ.
(हिं. होना)

हतोत्साह
जिसमें (कुछ करने की) उमंग या उत्साह शेष न रह गया हो।
वि.
(सं.)

हत्
एक अव्यय जिसका प्रयोग उपेक्षा, बुरापन आदि सूचिन करने के लिए होता है।
अव्य.
(अनु.)

हत्थ
हाथ, हस्त।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथ)

हत्था
किसी औजार का दस्ता या मूठ।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथ)

हत्था
हाथ के नीचे रखने का आधार।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथ)

हत्था
केले के फलों की घौद।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथ)

हत्था
ऎपन आदि से बनाया गया पंजे या हाथ का चिह्न।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथ)

हत्थी
मूठ, दस्ता।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हत्था)

हत्यो, हत्यौ
मारा, वध किया।
क्रि.स.
(हिं. हतना)
उ.- (क) मागध हत्यौ-१-१७। (ख) हत्यौ कंस नरेस-२९७५।

हत्यो, हत्यौ
दूर किया, मिटाया।
क्रि.स.
(हिं. हतना)
उ.- गर्व हत्यौ-१८१७।

हथ
हाथ।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथ)
मुहा.- पर-हथ बिकाऊँ-दूसरे के हाथ बिकू,दूसरे के वश में हो जाऊँ। उ.-काकैं द्वार जाइ सिर नाऊँ पर-हथ कहा बिकाऊँ-१-१६४।

हथ
'हाथ' का वह संक्षिप्त रूप जो समस्त पदों के प्रारंभ में लगता है।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथ)

हथ-उधार
वह ऋण जो थोड़े दिनों के लिए, बिना किसी लिखा-पढ़ी के, लिया जाय।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथ + उधार)

हथकंडा
हाथ की सफाई या चालाकी।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथ + सं. कांड)

हथकंडा
(काम निकालने के लिए की गयी) छिपी हुई चालबाजी या गुप्त चाल।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथ + सं. कांड)

हथकड़ी
जंजीर या डोरी से बँधा लोहे के कड़ियों का जोड़ा जो अपराधी या कैदी के हाथ में पहनाया जाता है।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हाथ + कड़ी)

हथगोला
बारूद का गोला जो हाथ से फेंका जाता है।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथ + गोला)

हथछुट
जो जरा-जरा सी बात में किसी को मार बैठता हो।
वि.
(हिं. हाथ + छूटना)

हथनाल
वह तोप जो हाथी पर रखकर चलायी जाय, गजनाल।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथी + नाल = तोप)

हथनी
हाथी की मादा।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हाथी)

हथफूल
एक तरह की आतिशबाजी।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथ + फूल)

हथफूल
हथेली के पीछे पहनने का एक जड़ाऊ गहना।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथ + फूल)

हथफेर
स्नेह या प्यार से शरीर पर हाथ फेरना।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हाथ + फेरना)

हथफेर
हाथ की सफाई या चालाकी से किसी का माल उड़ा लेना।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हाथ + फेरना)

हथफेर
कुछ समय के लिए, बिना किसी लिखा-पढ़ी के, लिया हुआ उधार या ऋण।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हाथ + फेरना)

हथली
चरखे की मुठिया।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हाथ)

हथलेआ, हथलेवा
विवाह में वर द्वारा अपने हाथ में कन्या का हाथ लेने की रीति, पाणिग्रहण।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथ + लेना)

हथलेआ, हथलेवा
विवाह में कन्या का हाथ लेनेवाला, वर।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथ + लेना)

हथवाँस
नाव का डाँड़ा, लग्गा, पतवार आदि।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथ + वाँस)

हथवाँसना
किसी व्यवहारोपयोगी वस्तु का पहले पहल उपयोग करना।
क्रि.स.
(हिं. हाथ + अवाँसना)

हथसंकर, हथसाँकर, हथसाँकल, हथसाँकला
हथफूल' नामक गहना।
संज्ञा
पुं., स्त्री.
(हिं. हाथ + सॉंकल)

हथसार, हथसारा, हथसाल, हथसाला
हाथी बाँधने का स्थान।
(हिं. हाथी + सं. शाला)

हथा
हाथ का चिह्न जो दीवार आदि पर बनाया जाता है, थापा।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथ)

हथाहथी
एक के हाथ से दूसरे के हाथ में, हाथोहाथ।
अव्य.
(हिं. हाथ + हाथ)

हथाहथी
चटपट, तुरन्त।
अव्य.
(हिं. हाथ + हाथ)

हथिआर, हथिआरा
अस्त्र-शस्त्र।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हथियार)
मुहा.- कसे साजे हथिआरा-अस्त्र-शस्त्र धारण किये हुए। उ.- सकल सभा जिय जानि कसे साजे हथिआरा-१० उ.-८।

हथिनी
हाथी की मादा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हस्तिनी, प्रा. हत्थिणी)

हथियन
हाथियों ने।
संज्ञा
पुं. सवि.
(हिं. हाथी)
उ.-मानो मत्त मदन के हथियन बल करि बंधन तोरे-२८१८।

हथिया
हस्त नक्षत्र।
संज्ञा
पुं.
(सं. हस्त, प्रा. हत्थ)

हथिया
हस्त नक्षत्र की वर्षा।
संज्ञा
पुं.
(सं. हस्त, प्रा. हत्थ)

हथियाना, हथियानो
अपने हाथ में करना, ले लेना।
क्रि.स.
(हिं. हाथ + आना)

हथियाना, हथियानो
हाथ में पकड़ना।
क्रि.स.
(हिं. हाथ + आना)

हथियाना, हथियानो
दूसरे की चीज धोखा देकर ले लेना।
क्रि.स.
(हिं. हाथ + आना)

हथियार
हाथ में लेकर काम करने का औजार या उपकरण।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हथियार)

हथियार
हाथ से पकड़कर चलाया चानेवाला अस्त्र-शस्त्र।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हथियार)
उ.- लै लै ते हथियार आपने सान धराए ज्यौं-१-१५१।
मुहा.- हथियार उठाना- (१) लड़ाई के लिए तैयार होना। (२) प्रहार करने या मारने के लिए शस्त्र हाथ में लेना। हथिय़ार कसना, धरना, बाँधना, लेना या लगाना- (१) अस्त्र-शस्त्रधारण करना। (२) युद्ध के लिए तैयार होना। धरे हथियार-अस्त्र-शस्त्र सजाये हुए। उ.-धरे यंत्र-हथियार अहो हरि होरी है-२४१६।

हथियारबंद
जो हथियार लिये हो, अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित।
वि.
(हिं. हथियार + फ़ा. बंद)

हथेरी, हथेली
कर-तल, हस्ततल।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हस्ततल, प्रा. हस्थतल)
मुहा.- हथेली खुजलाना-कुछ मिलने या प्राप्त होना का शकुन होना। हथेली का फफोला-बहुत ही सुकुमार वस्तु जिसके टूटने-फूटने का डर सदा वना रहे। हथेली देना या लगाना- हाथ का सहारा देना, सहायता करना। किसकी हथेली में बाल जमे हैं - कौन सेसार में है।हथेली पर जान लेकर काम करना-जान जोखिम में या प्राण संकट में डालकर काम करना। हथेली में जान होना- बडे संकट में पड़ना।

हथेव
हथौड़ा।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथ)

हद
वह औचित्य जहाँ तक कोई काम, व्यवहार या आचरण ठीक हो, मर्यादा।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)
मुहा .- हद पारना-मर्यादा या औचित्य का पालन या निर्वाह करना। हद पारी- (उचित कार्य संपादन द्वारा) मर्यादा या औचित्य का पालन या विर्वाह करो। हद से गुजरना -मर्यादा या औचित्य से भी आगे बढ़ जाना।

हद
बहुत अधिक, अत्यंत।
क्रि. वि.

हदस
ऎसा भाव जो किसी को किंकर्तव्यविमूढ़ कर दे।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हादिस ?)

हदसना, हदसनो
बहुत अधिक डरना या भयभीत होना।
क्रि.अ.
(हिं. हदस)

हदीस
मुसलमानों का एक धर्मग्रंथ जिसमें मुहम्मद साहब के वचन संगृहीत हैं।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हनत
प्रहार करता है, प्रहार करते - करते।
क्रि.स.
(हिं. हनना)
उ.-मुसल मुगदर हनत-१-१२०।

हनन
मार डालना, वध करना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हनन
प्रहार या आघात करना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हनना, हंननो
मार डालना, वध करना।
क्रि.स.
(सं. हनन)

हनना, हंननो
प्रहार या आघात करना।
क्रि.स.
(सं. हनन)

हथोरि, हथोरी
हथेली।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हथेली)

हथौटी
काम करन का ढंग या कौशल।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हाथ + औटी)

हथौटी
काम में हाथ लगाने की स्थिति क्रिया या भाव।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हाथ + औटी)

हथौड़ा
एक औजार जिसमे कुछ ठोंका, पीटा या गढ़ा जाता है।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथ + औड़ा)

हथौड़ी
छोटा हथौडा।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हथौड़ा)

हथौना
वर-वधू के हाथ में मिठाई रखनें की रीति।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथ + औना)

हथ्याना, हथ्यानो
हथियाना।
क्रि.स.
(हिं. हथियाना)

हथ्यार, हथ्यारा
हथियार।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हथियार)

हद
सीमा।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)
मुहा - हद्र बँधना- सीमा निश्चित होना। हद बाँधना- सीमा निश्चित करना। हद तोड़ना-सीमा के बाहर जाना या कुछ करना। हद से बाहर ठहरायी हुई या मान्य सीमा से आगे।

हद
उचित संख्या या परिमाण, संख्या या परिमाण का मान्य औचित्य।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)
मुहा.- हद से ज्यादा- बहुत अधिक संख्या या परिमाण में। हद्र न होना- संख्या या परिमाण की दृष्टि से बहुत ही अधिक।

सेवी
सेवा करनेवाला।
वि.
(सं. सेविन्)

सेवी
उपासना- आराधना करनेवाला।
वि.
(सं. सेविन्)

सेवी
सेवन करनेवाला।
वि.
(सं. सेविन्)

सेवी
व्यवहार करनेवाला।
वि.
(सं. सेविन्)

सेवी
उपभोग करनेवाला।
वि.
(सं. सेविन्)

सेवी
स्थान-विशेष पर निरंतर वास करनेवाला।
वि.
(सं. सेविन्)

सेवै
टहल या परिचर्या करे।
क्रि.स.
(हिं. सेवना)
उ.- (क) सोइ करहु जिहिं चरन सेवै सूर जूठनि खाइ-१-१२६। (ख) भक्त सात्विकी सेवै संत-२-१३।

सेवै
पूजा-उपासना करे।
क्रि.स.
(हिं. सेवना)
उ.- (क) जो जो जन निस्चै करि सेवै हरि निज बिरद सँभारै-१-२५७। (ख) ज्यौं सेवै त्योंही गति होई-१०उ.-१२७।

सेवो, सोवौ
सेवा-पूजा करो।
क्रि.स.
(हिं. सेवना)
उ.-संत संग सेवौ हरि-चरना - ५-२।

सेव्य
जो सेवा या परिचर्या के योग्य हो या जिसकी सेवा परिचर्या की जाय।
वि.
(सं.)

हनना, हंननो
ठोंकना।
क्रि.स.
(सं. हनन)

हनना, हंननो
(नगाड़ा आदि लकड़ी से) पीट-पीट कर बजाना।
क्रि.स.
(सं. हनन)

हनना, हंननो
(शस्त्र) चंलाना।
क्रि.स.
(सं. हनन)

हनवाना, हवनानो
हनने' को प्रवृत्त करना।
क्रि.स.
(हिं. हनना)

हनवाना, हवनानो
नहलाना।
क्रि.स.
(हिं. नहाना)

हनाना
स्नान करना।
क्रि.अ.
(हिं. नहाना)

हनिवंत, हनिवंता
हनुमान।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हनुमंत)

हनी
मारी, बध किया।
क्रि.स.
(हिं. हनना)
उ.- पहिले ही इन हनी पूतना -सारा. ५६९।

हनु
दाढ़ की हड्डी, जबड़ा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हनु
ठोढ़ी, चिबुक।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हबूब
झूठमूठ की बात।
संज्ञा
पुं.
(अ. हबाब या हुबाब)

हब्स
कैद, कारावास।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हब्स
अफ्रीका का एक देश जहाँ के निवासी बहुत काले होते हैं।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. हब्श)

हब्सी
अफ्रीका के हब्श देश का निवासी जो बहुत काला होता है।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. हब्शी)

हब्सी
एक तरह का काल अंगूर।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. हब्शी)

हम
मैं' का बहुवचन।
सर्व.
(सं. अहम्)

हम
घमंड, अहंकार, अहंभाव।
संज्ञा
पुं.

हम
संग, साथ।
अव्य.
(फ़ा.)

हम
समान।
अव्य.
(फ़ा.)

हमकना, हमकनो
किसी चीज पर चढ़कर उसे बार-बार नीचे दबाना।
क्रि.अ.
(हिं. हुमकना))

हप
मुँह में चट से कुछ रखकर ओंठ बंद करने का शब्द।
संज्ञा
पुं.
(अनु.)
मुहा.- हपकर जाना-चटपट खा जाना।

हफ्ता
सप्ताह।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. हफ्त

हबकना, हबकनो
खाने या काटने के लिए मुँह खोलना या बाना।
क्रि.अ.
(अनु.)

हबकना, हबकनो
दाँत से काट लेना।
क्रि.स.

हबराना, हबरानो
जल्दी मचाना।
क्रि.अ.
(हिं. हड़बड़ाना)

हबराना, हबरानो
घबराना।
क्रि.अ.
(हिं. हड़बड़ाना)

हबीब
मित्र।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हबीब
मुहम्मद साहब जो ईश्वर के परम प्रिय माने जाते हैं।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हबीब
बहुत प्यारा, अत्यंत प्रिय।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हबूब
पानी का बुल्ला या बुलबुला।
संज्ञा
पुं.
(अ. हबाब या हुबाब)

हनुमंत, हनुमंता
हनुमान।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हनुमान)

हनुमान, हनुमान्
भारी दाढ़ या जबड़ेवाला।
वि.
(सं. हनुमत्)

हनुमान, हनुमान्
बहुत बड़ा वीर।
वि.
(सं. हनुमत्)

हनुमान, हनुमान्
श्रीराम के परम भक्त एक बानर जिन्होंने लंका के युद्ध में उनके अनेक कार्य बड़ी तत्परता से किये थे। अंजना इनकी माता और वायु या मरुत् पिता कहे जाते हैं।
संज्ञा
पुं.

हनुव
हनुमान।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हनुमान)

हनूमान, हनूमान्
हनुमान।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हनुमान)

हने
मार डाले।
क्रि.स.
(हिं. हनना)
उ.-बृषभ-गंजन मथन-केसी हने पूँछ फिराइ- ४९८।

हनोज
अभी, अभी तक।
अव्य.
(फ़ा. हनोज)

हनोद
एक राग।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

हन्यो, हन्यौ
मार डाला।
क्रि.स.
(हिं. हनना)
उ.-मनहुँ चंद्र-मुख कोपि हन्यो रिपु राहु बिषय बलवान - 1897।

हमकना, हमकनो
उछलना-कूदना।
क्रि.अ.
(हिं. हुमकना))

हमकाना, हमकानो
हँ हँ' शब्द करना।
क्रि.अ.
(अनु.)

हमजोली
संगी, साथी।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. हम + हिं. जोड़ी)

हमता
अपने को बहुत-कुछ समझने का अहम् भाव, अहंकार।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हम + ता)
उ.- हमता जहाँ तहाँ प्रभु नाहीं सो हमता क्यौं मानै-१-११।

हमदर्द
दुख का साथी, दुख की स्थिति में सहानुभूति दिखानेवाला।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा.)

हमदर्दी
सहानुभूति।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)

हमनिवाला
साथ-साथ भोजन करने वाला धनिष्ठ मित्र।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा.)

हमरा
हमारा।
सर्व.
(हिं. हमारा)

हमराह
साथ-साथ जानेवाला।।
वि.
(फ़ा.)

हमराह
साथ, संग में।
अव्य.
मुहा.- हमराह करना-साथ कर देना। हमराह होना- साथ-साथ जाना।

हमरी
हमारी।
सर्व.
स्त्री.
(हिं. हमारी)
उ.-अब इह सुरति करै को हमरी-१८३२।
मुहा.- हमरी उनकी सी मिलवत हौ- हमारी और उनकी हाँ में हाँ मिलाते हो, जो हम और वे कहते हैं उसी का समर्थन करते हो। उ.-हमरी उनकी सी मिलवत हौ तातें भए बिहंगी-२९९७।

हमरे
हमारे।
सर्व.
(हिं. हमारे)
उ.-हमरे डर करि दोऊ भाई नगर समुद्र बसायौ-सारा. ७५२।

हमरैं
हमारे में, हममें।
सर्व.
सवि.
(हिं. हमारे)
उ.-बिना काम हमरैं नहिं चाह-९-२।

हमरो, हमरौ
हमारा।
सर्व.
(हिं. हमारा)
उ.-बालक बह्यो सिंधु में हमरो सो नित प्रति चित लाग्यौ- साराण्;५३९।

हमला
चढ़ाई, धावा।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हम्मला)

हमला
मारने के लिए झपटना, आक्रमण।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हम्मला)

हमला
वार, प्रहार।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हम्मला)

हमला
किसी को हानि पहुँचाने के लिए किया गया काम या प्रयत्न।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हम्मला)

हमला
आक्षेप, व्यंग्य।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हम्मला)

हमवतन
स्वदेशवासी।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. हम + अ. वतन)

हमवार
समतल, सपाट।
वि.
(फ़ा.)

हमसर
बराबरी का आदमी।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा.)

हमसरी
बराबरी, समानता।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)

हमसाया
पड़ोसी।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा.)

हमहमी
अपने-अपने लाभ का प्रयत्न।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हम + हम + ही)

हमहमी
अपने को ही सबसे ऊपर या सबके आगे करने का प्रयत्न।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हम + हम + ही)

हमाम
स्नानागार।
संज्ञा
पुं.
(अ. हम्माम)

हमार
हमारा, हमारी।
सर्व.
(हिं. हमारा )
उ.-सुनि सिख-साखि हमार-२-२।

हमारा
हम' का संबंधकारकीय पुँल्लिंग रूप।
सर्व.
(हिं. हम + आरा)

हमारी
हम' का संबंधकारकीय स्त्रीलिंग रूप।
सर्व.
स्त्री.
(हिं. हमारा )
उ.- इंद्री खड्ग हमारी-१-१४४।

हमारो, हमारौ, हमार्यो, हमार्यौ
हमारा।
सर्व.
(हिं. हमारा )
उ.- या ब्रज कोऊ नाहिं हमारथौ-२८९२।

हमाल
भार या बोझ उठाने वाला।
संज्ञा
पुं.
(अ. हम्माल)

हमाल
रक्षा करने या सँभालनेवाला।
संज्ञा
पुं.
(अ. हम्माल)

हमाल
(बोझ ढोनेवाला) कुली।
संज्ञा
पुं.
(अ. हम्माल)

हमाहमी
अपने-अपने लाभ या स्वार्थ के लिए किया हुआ आतुर प्रयत्न।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हम + हम + ही)

हमाहमी
अपने को आगे बढ़ाने या ऊपर उठाने का आतुर प्रयत्न।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हम + हम + ही)

हमीर
रणखंभोर का एक प्रसिद्ध चौहान राजा।
संज्ञा
पुं.
(सं. हम्मीर)

हमें
हम' का कर्म और संप्रदानकारकाय रूप, हमको।
सर्व.
(हिं. हम)

हमेल
सोने-चाँदी के सिक्के जैसे गोल दुकड़ों की माला।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हमायल)
उ.- (क) दुलरी अरु तिलरी बँद तापर सुभग हमेल बिराजत-१०७९। (ख) और हार चौकी हमेल अब तेरे कंठ न नैहौं-१५५०।

हमेव
घमंड, अहंकार,।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हम)
मुहा.- हमेव टूटना-शेखी या गर्व निकल जाना।

हमेशा, हमेस, हमेसा
सदा।
अव्य.
(फ़ा. हमेशा)
मुहा.- हमेशा के लिए-सब दिनों के लिए।

हमैं
हमको।
अव्य.
(हिं. हमें)

हम्द
प्रशंसा।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हम्द
ईश-स्तुति।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हम्माम
स्नानागार।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हम्मीर
रणथंभोर का एक प्रसिद्ध चौहान राजा जो (सने १३०० में) अलाउद्दीन खिलजी से बड़ी बीरता से लड़कर मरा था।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हम्मीर
एक संकर राग।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हम्मीरनट
एक संकरराग।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हयंद
अच्छा या बड़ा घोड़ा।
संज्ञा
पुं.
(सं. हयेंद्र)

हयंद
इंद्र का उच्चैःश्रवा घोड़ा।
संज्ञा
पुं.
(सं. हयेंद्र)

हय
घोड़ा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.-हय गयंद उतरि कहा गर्दभ चढि़ धाऊँ-१-१६६। इंद्र का एक नाम।

हयगृह
घुड़साल, अश्वशाला।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हयग्रीव
विष्णु का एक अवतार जो मधुकैटभ नामक दैत्यों से बेदों का उद्धार करने के लिए हुआ था।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- (क) प्रगट भए हयग्रीव महानिधि प्रगट ब्रह्म अवतार-सारा. ८९। (ख) कपिल मनु हयग्रीव पुनि कीन्हौं ध्रुव अवतार-२-३६।

हयग्रीव
एक असुर जो ब्रह्मा की निद्रा के समय वेद उठा ले गया था। उससे वेदों का उद्धार करने लिए विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हयग्रीवा
दुर्गा का एक नाम।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हयन
साल, वर्ष।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हयना, हयनो
मार डालना, वध करना।
क्रि.स.
(सं. हत प्रा. हय + ना)

हयना, हयनो
मारना-पीटना।
क्रि.स.
(सं. हत प्रा. हय + ना)

हयना, हयनो
ठोंक-पीटकर बजाना।
क्रि.स.
(सं. हत प्रा. हय + ना)

हयना, हयनो
न रहने देना, मिटाना, नष्ट करना।
क्रि.स.
(सं. हत प्रा. हय + ना)

सेव्य
जिसकी पूजा- उपासना करनी हो यः की जाय।
वि.
(सं.)

सेव्य
जो सेवा योग्य हो।
वि.
(सं.)

सेव्य
मालिक, प्रभु, स्वामी।
संज्ञा
पुं.

सेव्य-सेवक
स्वामी और सेवक।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेव्य-सेवक
सेवक-सेव्य भाव-भक्ति का वह रूप या भाव जिसमें उपास्य को स्वामी और अपने को उसका सेवक समझा जाता है।
पद.

सेश्वर
जिसमें ईश्वर की सत्ता मानी गयी हो।
वि.
(सं.)

सेष
बाकी।
संज्ञा
पुं.
(सं. शेष)

सेष
अंत, समाप्ति।
संज्ञा
पुं.
(सं. शेष)

सेष
शेषनाग।
संज्ञा
पुं.
(सं. शेष)
उ.- (क) कंपत कमठ-सेष-बसुधा नभ रबि-रथ भयौ उतपात-९-७४। (ख) सिंह आगै, सेष पाछैं, नदी भइ भरिपूरि-१०-५।

सेष
लक्ष्मण जो शेष-नाग के अवतार माने जोते हैं।
संज्ञा
पुं.
(सं. शेष)
उ.-लगत सेष-उर, बिलखि जगत गुरु, अद्भुत गति नहिं परति बिचारी-९-६२।

हयना, हयनो
बहुत डरना, भयभीत होना।
क्रि.अ.
(सं. हनन या अ. हैबत=भय)

हयनाल
घोड़े पर से चलायी जानेवाली तोप।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हय + नाल = तोप)

हयमेध
अश्वमेध।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हयशाला, हयसार, हयसारा. हयसाल, हयसाला
घुड़साल।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हयशाला)

हया
शर्म, लाज, लज्जा।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हयात
जिंदगी, जीवन।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हयादार
जिसे अनुचित काम करने में शर्म या लाज आती हो, लज्जाशील।
वि.
(अ. हया + फ़ा. दार)

हयादारी
अनुचित काम करते समय लजाने का भाव, लज्जाशीलता।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हया + फ़ा. दारी)

हयी
घोड़ी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हयी
घुड़सवार।
संज्ञा
पुं.
(सं. हयिन्)

हयो, हयौ
मार डाला, वध किया।
क्रि.स.
(हिं. हयना)
उ.- (क) सोच सबको गयो, दनुज कुल सब हयो-२६१७। (ख) नए सखा जोरे जादव कुल अरु नृप कंस हयो-३३४७।

हयो, हयौ
दूर किया, मिटाया।
क्रि.स.
(हिं. हयना)
उ.- सखा बिप्र दारिद्र हयौ-१-२६।

हयो, हयौ
बरबादी कर ली, नष्ट कर लिया।
क्रि.स.
(हिं. हयना)
उ.-सूर नंद-नंदन जेहिं बिसरथौ, आपुहिं आपु हयौ-१-७८।

हर
ले लेनेवाला, छीनने या लूटनेवाला।
वि.
(सं.)

हर
दूर करने या मिटानेवाला।
वि.
(सं.)

हर
मारने या बध करनेवाला।
वि.
(सं.)

हर
ले जाने या पहुँचानेवाला, वाहक।
वि.
(सं.)

हर
एक प्रत्यय जो शब्दांत में लगकर उक्त अर्थ देता है।
प्रत्य.

हर
शिव, महादेव।
संज्ञा
पुं.
उ.-हरि-हर संकर नमो नमो-१०-१७१।

हर
एक राक्षस जो विभीषण का मंत्री था।
संज्ञा
पुं.

हर
वह संख्या जिससे भाग दें।
संज्ञा
पुं.

हर
एक प्रत्यय जो शब्दांत में लगकर स्थान, घर आदि का अर्थ देता है।
प्रत्य.

हर
हल।
संज्ञा
पुं.
(सं. हल)
उ.-बंजर भूमि गाँउ हर जोते, अरु जेती की तेती-१-१८५।

हर
एक-क, प्रत्येक।
वि.
(फ़ा.)
मुहा.- हर एक-एक-एक, प्रत्येक। हर कोई या किसी- सब कोई या किसी, सर्वसाधारण। हर दफा या बार-प्रत्येक अवसर पर। हर हाल या हालत में- प्रत्येक दशा में। हर दम-प्रतिक्षण, सदा।

हरई
लूटता या हरण करता है।
क्रि.स.
(हिं. हरना)
उ.-घर-घर माखन हरई-२५४२।

हरई
हलकापन।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हरुआ)

हरई
ओछापन।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हरुआ)

हरएँ
धीरे-धीरे, मंद गति से।
अव्य.
(हिं. हरुवा)

हरएँ
हलके-हलके।
अव्य.
(हिं. हरुवा)

हरएँ
चुपके से।
अव्य.
(हिं. हरुवा)

हरएँ
क्रम-क्रम से।
अव्य.
(हिं. हरुवा)

हरकत
हिलना-डोलना।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हरकत
चेष्टा, क्रिया।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हरकत
बुरी चाल, नटखटी।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हरकना, हरकनो
रोकना, मना करना।
क्रि.स.
(हिं. हटकना)

हरकना, हरकनो
पशुओं को किसी ओर हाँकना।
क्रि.स.
(हिं. हटकना)

हरकना, हरकनो
अलग या दूर करना, हटाना।
क्रि.स.
(हिं. हटकना)

हरकारा
पत्र या संदेश ले जानेवाला।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा.)

हरक्कत
हरज, नुकसान।
संज्ञा
स्त्री.
(देश.)

हरख
खुशी, प्रसन्नता।
संज्ञा
पुं.
(सं. हर्ष)

हरखना, हरखनो
खुश. प्रसन्न या हर्षित होना।
क्रि.अ.
(हिं. हरख + ना)

हरखाना, हरखानो
खुश. प्रसन्न या हर्षित करना।
क्रि.स.
(हिं. हरखना)

हरगिज
किसी दशा में, कदापि।
अव्य.
(फ़ा. हरगिज)

हरगिरि
कैलास पर्वत।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरचंद
कितना ही, कितनी ही बार।
अव्य.
(फ़ा.)

हरज
अड़चन, रुकावट, बाधा।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. हर्ज)

हरज
नुकसान, हानि।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. हर्ज)

हरजा
बाधा।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हरज)

हरजा
हानि।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हरज)

हरजा
हरजाना।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हरजाना)

हरजाई
हर जगह व्यर्थ घूमनेवाली।
वि.
(फ़ा.)

हरजाई
हर किसी से अनुचित संबंध करनेवाली।
वि.
(फ़ा.)

हरजाई
व्यभिचारिणी स्त्री।
संज्ञा
स्त्री.

हरजाई
वेश्या।
संज्ञा
स्त्री.

हरजाना
हानि का बदला, क्षतिपूर्ति।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. हर्जानः)

हरजाना
वह धन जो क्षति-पूर्ति के रुप में दिया जाय।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. हर्जानः)

हरट्ट
मोटा-ताजा, मजबूत।
वि.
(सं. हृष्ट)

हरण
छीनना, लूटना, चुराना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरण
दूर करना, मिटाना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरण
नाश, संहार।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरण
ले जाना, वहन।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरण
भाग देना (गणित)।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरत
छीनता, लूटता या चुराता है।
क्रि.स.
(हिं. हरना)
उ.- ज्यों ठग निधिहिं हरत-२५४३।

हरत
मिटाता या नष्ट करता है।
क्रि.स.
(हिं. हरना)
उ.- कोटि ब्रह्मंड करत छिन भीतर हरत बिलंब न लावै-१०-१२६।

हरता
हरण करनेवाला।
वि. संज्ञा
पुं.
(सं. हर्त्ता)
उ.- (क) हरता करता आपुहिं सोइ-१-२६१। (ख) मैं हरता-करता संहार-५-२। (ग) दाता-भुत्ता, हरता-करता बिस्वंभर जग जानि-४८७। (घ) ए हरता करता समर्थ और नाहीं-२५५६।

हरता-धरता
रक्षा या नाश करनेवाला।
वि.
(सं. हर्त्ता + धर्त्ता)

हरता-धरता
सब कुछ करने में समर्थ।
वि.
(सं. हर्त्ता + धर्त्ता)

हरताल
एक खनिज पदार्थ जिसमें स्याही या रंग उड़ाने का गुण होता है।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हरिताल)
मुहा. हरताल लगाना-मिटाना, नष्ट करना।

हरताली
हरताल से पीले रंग का।
वि.
(हिं. हरताल)

हरताली
एक तरह का पीला या गंधकी रंग।
संज्ञा
पुं.

हर-तिलक
चंद्रमा जो शिव के मस्तक पर है।
संज्ञा
पुं.
(सं. हर + तिलक)
उ.- (क) जनौ हर-तिलकं कुहू उग्यौ री-६९१। (ख) हर को तिलक हरि बिनु दहत-२८५८।

हरतेज
पारा (जो शिव का वीर्य कहा जाता है।)
संज्ञा
पुं.
(सं. हरतेजस्)

हरतो, हरतौ
लूटता, चुराता या हरण करता हुआ।
क्रि. वि.
(हिं. हरना)
उ.- स्रजन-बेष-रचना प्रति जन मनि आयौ पर-घन हरतौ-१-२०३।

हरद, हरदि, हरदी
हलदी' नामक मसाला।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हलदी)
उ.- (क) छिरकत हरद दही-१०-१९। (ख) हींग हरद म्रिच छौंके तेले-३९६। (ग) रंग कापै होत न्यारो हरद चूनौ सानि-८९५। (घ) हरद दूब केसर मग छिरकौ-१० उ.- २३।(ड;) दै करबॅदा हरदि रँग भीने-२३२१ (च) हरदि समान देखिअत गात-२७७९। (छ) नूतन सुभग दूब-हरदी-दधि हरषित सीस बँधाए-१०-८७।

हरदिया
हलदी के रंग का।
वि.
(हिं. हलदी)

हरदिया
पीले रंग का घोड़ा।
संज्ञा
पुं.

हरद्वार
हरिद्वार तीर्थ।
संज्ञा
पुं.
(सं. हरिद्वार)

हरन
हरने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
पुं.
(सं. हरण)
उ.-एकै चीर हुतौ मेरे पर, सो इन हरन चहथौ-१-२४७।

हरन
मिटाने या दूर करनेवाला।
वि.
(हिं. हरना)
उ.- (क) दुहूँ लोक सुखकरन, हरन-दुख बेद-पुराननि साखि-१-९०। (ख) भू-भर हरन प्रगत तुम भूतल-१-१२५।

हरन
चुराने या हरण करनेवाला।
वि.
(हिं. हरना)
उ.- रे रे अंध; बीसहॅू लोचन पर-तिय हरन, करन बिकारी -९-१३२।

हरन
मारने या नाश करनेवाला।
वि.
(हिं. हरना)
उ.-सूर स्याम खल हरन, करन सुख.२५७२।

हरन
हिरन (पशु)।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हरिन)

हरना
छीनना, लूटना, चुराना, हरण करना।
क्रि.स.
(सं. हरण)
मुहा. मन हरना-लुभाना, मोहित करना।

हरना
दूर करना, हटाना, न रहने देना।
क्रि.स.
(सं. हरण)

हरना
मिटाना, नाश करना।
क्रि.स.
(सं. हरण)
मुहा.- प्राण हरना- (१) मार डालना। (२) बहुत कष्‍ट देना। (३) उठाकर ले जाना, वहन करना।

हरना
जुए आदि में हारना।
क्रि.अ.
(हिं. हारना)

हरना
पराजित होना।
क्रि.अ.
(हिं. हारना)

हरना
थकना।
क्रि.अ.
(हिं. हारना)

हरना
हिरन (पशु)।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हिरन)

हरनाकस, हरनाकुस
एक दैत्य जो प्रहलाद का पिता था।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिरण्यकशिपु)

हरनाच्छु, हरनाछ
एक दैत्य।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिरण्याक्ष)

हरनि, हरनी
हिरन की मादा हिरनी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हिरन)
उ.-रिसनि मोहिं दहति, बन भई हरनी-६९८।

हरनि, हरनी
छीनने, लूटने या हरण करने वाली।
वि.
(हिं. हरना)
उ.- (क) सरद निसि कौ अंसु अगनित इंदु आभा हरनि-३५१। (ख) सोभित केस बिचित्र भाँति दुति सिखि सिखा हरनी-पृ. ३१६ (५४)।
मुहा. मन हरनी- लुभाने या मोहित करनेवाली। उ.- रुनुक-झुनुक पग बाजत पुति ही मन हरनी-१०-१२३।

हरनि, हरनी
दूर करने या मिटानेवाली।
वि.
(हिं. हरना)
उ.- असरन सरनी भव-भय हरनी बेद-पुरान बखानी- पृ. ३४६ (४१)।

हरनो
हरना।
क्रि.स., क्रि.अ.
(हिं. हरना)

हरपा, हरप्पा
डिब्बा।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

हरफ
अक्षर, वर्ण।
संज्ञा
पुं.
(अ. हरफ़)
मुहा.- किसी पर हरफ आना- दोष या अपराध लगना। हरफ उठाना-अक्षर पहचान कर पढ़ लेना। हरफ बनाना-सुंदर लिखने का अभ्यास करना। किसी पर हरफ लाना-दोष या अपराध लगाना।

हरबर
उतावली।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हड़बड़)

हरबर
उतावली करते हुए।
क्रि. वि.
उ.- हरबर चक्र धरे हरि आवत-८-३।

हरबराइ
घबराकर, उतावली करके।
क्रि.अ.
(हिं. हरबराना)
उ.-(क) हरबराइ उठि आइ प्रात ते-११८३। (ख) हरबराइ कोउ सखन बोलायो-१५६०।

सेष
बाकी, बचा हुआ।
वि.

सेष
समाप्त।
वि.

सेषनाग
वह नाग जिसके हजार फनों पर पृथ्वी ठहरी या टिकी हुई मानी गयी है।
संज्ञा
पुं.
(सं. शेषनाग)

सेषरंग
(शेषनाग-जैसा) सफेद या श्वेत रंग।
संज्ञा
पुं.
(सं. शेष + रंग)

सेसरेख, सेसरेखा
(शेषनाग के अवतार) लक्ष्मण द्वारा खींची गयी वह रेखा जो उन्होंने मरीच का 'हा लक्ष्मण' पद सुनकर, सीताजी को अकेला छोड़कर जाते समय खींची थी और जिसके बाहर जाने का उनको निषेध कर दिया था। रावण ने उस रेखा को लाँघने का साहस नहीं किया था और सीताजी जब उस रेखा के बाहर आ गयी थीं, तभी उसने उनका हरण किया था।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शेष + रेखा)
उ.-सूनैं भवन गवन तैं कीन्हौ, सेष-रेख नाहिं टारी-९-१३२।

सेषासन
शेषनाग का आसन जिस पर विष्णु शयन करते कहै जाते हैं।
संज्ञा
पुं.
(सं. शेष + आसन)
उ.-सप्त रसातल सेषासन रहे, तबकी सुरति भुलाऊ-१०-२२१।

सेस
बाकी।
संज्ञा
पुं.
(सं. शेष)

सेस
समाप्ति।
संज्ञा
पुं.
(सं. शेष)

सेस
शेषनाग।
संज्ञा
पुं.
(सं. शेष)
उ.- (क) सेस सारद रिषय नारद संत चिंतत सरन-१-३०८। (ख) धरनि सीस धरि सेस गरब धरथौ इहिं भर अधिक सँभारयौ-५६७।

सेस
लक्ष्मण (शेषावतार)।
संज्ञा
पुं.
(सं. शेष)

हरबरात
घबराते या उतावली करते हो।
क्रि.अ.
(हिं. हरबराना)
उ.- अजहूँ रैनि तीन याम है जू काहे को हरबरात स्याम जू-२२४१।

हरबराना, हरबरानो
जल्दी या उतावली करना।
क्रि.अ.
(हिं. हड़बड़ाना)

हरबरी
जल्दी आ शीघ्रता करने की उतावली।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हड़बड़ी )

हरबरी
घबराहट।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हड़बड़ी )

हरबा
हथियार, अस्त्र।
संज्ञा
पुं.
(अ. हरबः)

हरबोंग
गँवार, उजड्ड।
वि.
(देश.)

हरबोंग
अंधेर।
संज्ञा
पुं.

हरबोंग
उपद्रव।
संज्ञा
पुं.

हर- भूषण, हरभूषन
चंद्रमा।
संज्ञा
पुं.
(सं. हर + भूषण)
उ.-सिंहि को सुत हर-भूषन ग्रसि, सोइ गति भई हमारी-२७५१।

हरम
रनिवास, अंतःपुर।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हरम
रखेल (स्त्री)।
संज्ञा
स्त्री.

हरम
पत्नी।
संज्ञा
स्त्री.

हरयारी, हरयालि, हरयाली
हरियाली।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हरियाली)

हरयें
धीरे-धीरे।
अव्य.
(हिं. हरएँ)

हरयें
चुपके से।
अव्य.
(हिं. हरएँ)

हरयें
क्रम-क्रम से।
अव्य.
(हिं. हरएँ)

हरवल
सेना में सबसे आगे रहनेवाला सैनिक-दल।
संज्ञा
पुं.
(तु. हरावल)

हरवली
सेना की अध्यक्षता।
संज्ञा
स्त्री.
(तु. हरावल)

हरवली
हरावल सेना की अध्यक्षता।
संज्ञा
स्त्री.
(तु. हरावल)

हरवा
जो भारी न हो, हलका।
वि.
(हिं. हरुवा)

हरवा
(गले में पहनने का) हार।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हार)

हरवाना
उतावली करना।
क्रि.अ.
(हिं. हड़बड़)

हरवाह, हरवाहा
हल चलानेवाला नौकर या किसान।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हलवाहा)

हर-वाहन
(शिव की सवारी) बैल।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरवाही
बैल चलाने का काम या मजटूरी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हल + वाही)

हरवो
जो भारी न हो, हलका।
वि.
(हिं. हरुआ)
उ.-बोझ पृथ्वी को हरवो भयो-१० उ.-१३८।

हरशेखर
गंगा (जिसका वास शिवजी के सिर पर माना गया है)।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हरष
प्रसन्नता, आनंद।
संज्ञा
पुं.
(सं. हर्ष)
उ.-दनुज कुल सब हयौ तिहूँ भुवन जै जयो हरष कूबरी के -२६१७।

हरष
प्रसन्न हुए।
क्रि.अ.
(हिं. हरषना)
उ.- हरषीं पास-परोसिनैं, हरष नगर के लोग-१०-४०।

हरषत
प्रसन्न होते हैं।
क्रि.अ.
(हिं. हरषना)
उ.-छिरकत हरद दही, हिय हरषत-१०-१९।

हरषावैं
प्रसन्न या आनंदित करते हैं।
क्रि.स.
(हिं. हरषावना)
उ.- बिषय-भोग हृदय हरषावैं-४-१२।

हरषाहीं
प्रसन्न या आनंदित होती हैं।
क्रि.अ.
(हिं. हरषाना)
उ.-ब्रज जुवती निरखि निरखि हरषाहीं-१३४२।

हरषि
हर्ष के साथ।
क्रि. वि.
(हिं. हरषना)
उ.-हरषि निरखहिं नारि-१०-१६९।

हरषित
खुश, प्रसन्न।
वि.
(सं. हर्षित)
उ.-मथुरा हर्षित आज भई-२५-२।

हरषित
प्रसन्नता या हर्ष के साथ।
क्रि. वि.
उ.-नूतन सुभग दूब-हरदी-दधि हरषित सीस बँधाए-१०-८७।

हरषी
प्रसन्न हुईं।
क्रि.अ.
(हिं. हरषना)
उ.-हरषीं पास-परोसिनैं-१०-४०। (ख) गईं ब्रजनारि जमुना तीर, देखि लहरि तरंग हरषीं-१२९१।

हरषे
प्रसन्न हुए।
क्रि.अ.
(हिं. हरषना)
उ.- (क) ब्रज नर नारि अतिहिं मन हरषे-६०७। (ख) सुनत अक्रूर यह बात हरषे-२५५४।

हरषैं
प्रसन्न होती या होते हैं।
क्रि.अ.
(हिं. हरषना)
उ.-(नगर नारि) ध्यान करि करि वै हरषैं-२६०४।

हरष्यो, हरष्यौ
प्रसन्न हुआ।
क्रि.अ.
(हिं. हरषना)
उ.-बिषया जात हरष्यौ गात-२-२४।

हरसना, हरसनो
हर्षित होना।
क्रि.अ.
(हिं. हरषना)

हरषना, हरषनो
प्रसन्न होना।
क्रि.अ.
(सं. हर्ष + ना)

हरषना, हरषनो
पुलकित या रोमांचित होना।
क्रि.अ.
(सं. हर्ष + ना)

हरषवंत
प्रसन्न, हर्षित।
वि.
(सं. हर्ष + हिं. वंत)
उ.-सूरदास प्रभु के गुन गावत हरषवंत निज पुरी सिधाए-३८६।

हरषा
राधा की सखी एक गोपी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हर्ष)
उ.- प्रेमा, दामा, रूपा, हंसा, रंगा हरष नाउ-१५८०।

हरषाना, हरषानो
प्रसन्न या हर्षित होना।
क्रि.अ.
(हिं. हरषना)

हरषाना, हरषानो
पुलकित होना।
क्रि.अ.
(हिं. हरषना)

हरषाना, हरषानो
प्रसन्न करना।
क्रि.स.

हरषाना, हरषानो
पुलकित करना।
क्रि.स.

हरषावति
प्रसन्न होती है।
क्रि.अ.
(हिं. हरषाना)
उ.- ब्रज-तरुनी हरषावति री-२९५०।

हरषावना, हरषावनो
हरषाना।
क्रि.स., क्रि.अ.
(हिं. हरषाना)

हरसाना, हरसानो
हरषाना।
क्रि.अ., क्रि.स.
(हिं. हरषाना)

हर-सिंगार
एक प्रसिद्ध वृक्ष या उसका फूल।
संज्ञा
पुं.
(सं. हार + हिं. सिंगार)

हरहर
नटखट (बैल)।
वि.
(हिं. हरकना)

हरहा
नटखट (बैल)।
वि.
(हिं. हरहर)

हरहाई
नटखट (गाय), जो बार-बार खेत चरने दौड़े या इधर-उधर भागती फिरे।।
वि.
स्त्री.
(हिं. हरहा)
उ.- यह (गाइ) अति हरहोई, हटकत हूँ बहुत अमकग जाति-१-५१।

हरहाया
नटखट (बैल)।
वि.
(हिं. हरहा)

हर-हार
(शिव का हार) सर्प।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हर-हार
शेषनाग।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरहु
दूर करो, मिटाओ।
क्रि.स.
(हिं. हरना)
उ.-हरहु लोचन प्यास-१०-२१८।

हराँस
डर, भय।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हिरास)

हरा
हारा हुआ।
वि.
(हिं. हारना)

हरा
जो (कोई बात) हारकर छोड़ चुका हो।
वि.
(हिं. हारना)

हरा
रहित, विहीन, शून्य।
वि.
(सं. हर)

हरा
हर या शिव की पत्नी, पार्वती।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हराई
हारने की क्रिया या भाव, हार, पराजय।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हारना)

हराए
(युद्ध) हार जायेंगे।
क्रि.अ.
(हिं. हराना)
उ.-कह्यौ करि कोप, प्रभु, अब प्रतिज्ञा तजौ, नहीं तौ जुद्ध निज हम हराए-१-२७१।

हराठा
हट्टा-कट्टा।
वि.
(सं. हृष्ट)

हराना, हरानो
युद्ध, प्रतियोगिता आदि में शत्रु या प्रतिद्वंदी को पराजित या परास्त करना।
क्रि.स.
(हिं. हरना या हारना)

हराना, हरानो
वह काम या प्रयत्न करना जिससे कोई परास्त या पराजित हो जाय।
क्रि.स.
(हिं. हरना या हारना)

हराना, हरानो
थकाना, शिथिल करना।
क्रि.स.
(हिं. हरना या हारना)

हरापन
हरे होने का भाव, हरितता।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हरा + पन)

हराम
बुरा, वर्जित, निषिद्ध।
वि.
(अ.)

हराम
वर्जित वस्तु या बात।
संज्ञा
पुं.

हराम
सुअर (जिसके खाने का कहीं-कहीं निषेध है)।
संज्ञा
पुं.
मुहा.- (कोई बात) हराम कर देना-ऎसा प्रयत्न करना कि उस कार्य को करना अत्यन्त कष्ट दायक या असंभव ही हो जाय। (कोई बात) हराम होना-किसी काम का करना बहुत मुश्किल हो जाना।

हराम
बेईमानी, अधर्म, बुराई, पाप।
संज्ञा
पुं.
मुहा.- हराम का- (१) जो बेईमानी, पाप या अधर्म से कमाया या पाया गया हो। (२) जो बिना मेहनत का हो, मुफ्त का।

हराम
स्त्री-पुरुष का अनुचित संबंध।
संज्ञा
पुं.

हरामखोर
पाप या अधर्म की कमाई खानेवाला।
संज्ञा
पुं.
(अ. हराम + फ़ा. खोर)

हरामखोर
बिना मेहनत के कमाने-खानेवाला, धन लेकर भी काम न करनेवाला।
संज्ञा
पुं.
(अ. हराम + फ़ा. खोर)

हरामजादा
दोगला, वर्णसंकर।
वि.
(अ. हराम + फ़ा. जादा)

हरामजादा
पाजी, दुष्ट।
वि.
(अ. हराम + फ़ा. जादा)

हराँस
दुख, चिंता।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हिरास)

हराँस
थकावट।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हिरास)

हराँस
हरारत, हल्काज्वर।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हिरास)

हरा
घास-पत्ती के रंग का, हरित।
वि.
(सं. हरित, प्रा. हरिअ)

हरा
प्रसन्न, प्रफूल्ल।
वि.
(सं. हरित, प्रा. हरिअ)

हरा
ताजा, जो मुरझाया न हो।
वि.
(सं. हरित, प्रा. हरिअ)

हरा
(घाव) जो सूखा न हो।
वि.
(सं. हरित, प्रा. हरिअ)

हरा
(फल) जो पका न हो।
वि.
(सं. हरित, प्रा. हरिअ)
मुहा. हरा बारा- ऎसी बात जो व्यर्थ की आशा बँधाने या लुभानेवाली हो। हरा भरा- (१) जो सूखा या मुरझाया. न हो। (२) जो हरे पेड़-पौधों से भरा हो।

हरा
घास-पत्ती जैसा रंग, हरित रंग।
संज्ञा
पुं.

हरा
माला, हार।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हार)

हरामी
दोगला।
वि.
(अ. हराम)

हरामी
दुष्ट।
वि.
(अ. हराम)

हरारत
गरमी, ताप।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हरारत
हल्का या मंद ज्वर।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हरावर, हरावरि
हड्डियों का ढाँचा, ठठरी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हड़ावरि)

हरावर, हरावरि
हड्डियों की माला।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हड़ावरि)

हरावर, हरावरि
हरावल।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हरावल)

हरावल, हरावलि
सेना में सबसे आगे रहनेवाला सैनिक-दल।
संज्ञा
पुं.
(तु. हरावल)

हरास
डर, भय।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. हिरास)

हरास
खटका, अंदेशा, आशंका।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. हिरास)

सेंधना, सेंधनो
सेंध लगाना।
क्रि.स.
(हिं. सेंध)

सेंधा
एक तरह का नमक जो खान से निकलता है। यह सब नमकों में उत्तम माना जाता है और व्रत में प्रायः इसी का प्रयोग किया जाता है। इसे ‘लाहौरी’ भी कहते हें।
संज्ञा
पुं.
(सं. सैंधव)

सेंधिया
सेंध लगानेवाला।
वि.
(हिं. सेंध)

सेंधिया
एक मराठा राजवंश।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सिंधिया)

सेंधुर
सिंदूर।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सेंदुर)

सेंधुर
हाथी।
संज्ञा
पुं.

सेंवई
मैदे के सुखाये हुए सूत के से लच्छे जो घी में तलकर और दूध में पकाकर खाये जाते हैं। कुछ हिंदू जातियों में रक्षाबन्धन के और मुसलमानों में ईद के दिन सेंवई अवश्य बनती है।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सेविका)

सेंवर
एक पेड़ जिसके फल में से एक तरह की रूई निकलती है।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सेमल)

सेंहा
कुआँ खोदनेवाला।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सेंध)

सेंहुड़
थूहर (वृक्ष)।
संज्ञा
पुं.
(सं. सेहुण्ड)

सेसी
एक वृक्ष।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

सेह
साही' जंतु।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. साही)

सेह
तीन।
वि.
(फ़ा.)

सेहत
स्वास्थ्य।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

सेहरा
फूलों और सुनहरे-रुपहले तारों आदि की मालाओं से बना वह जालपुंज जो विवाह के समय दूल्हे के मौर के नीचे लटकता या पाग आदि पर बाँधा जाता है।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सिर + हार)

सेहरा
विवाह का मुकुट या मौर।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सिर + हार)
मुहा.- किसी के सिर सेहरा बाँधना-किसी को कार्य-विशेष के संपादन का श्रेय देना।

सेहरा
वे मांगलिक गीत या पद्य जो विवाह के अवसर पर वर के यहाँ गाये जाते हैं।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सिर + हार)

सेहरी
छोटी मछली।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शफरी)

सेहरो
दूल्हे का मौर या मुकुट।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सेहरा)
उ.- (क) लटकत सिर सेहरों मनो सिखी सिखंड सुभाव- पृ. ३४९ (६०)। (ख) सेहरो सिर पर मुकुट लटक्‍यौ, कंठमाला राजई-३४२४।

सेही
साही' जंतु।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. साही)

हरास
दुख, चिंता, विषाद।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. हिरास)

हरास
निराशा।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. हिरास)

हरास
हारने की क्रिया, भाव या इच्छा।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हरना)

हराहर
छीना-झपटी।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हरना)

हराहर
भयंकर विष।
संज्ञा
पुं.
(सं. हलाहल)

हरि
हरे रंग का।
वि.
(सं.)

हरि
विष्णु।
संज्ञा
पुं.
उ.-बृहदभानु ह्वैके हरि प्रगटे-सारा.३५२।

हरि
विष्णु के अवतार राम।
संज्ञा
पुं.

हरि
विष्णु के अवतार कृष्ण।
संज्ञा
पुं.
उ.-एक दिना ब्रज-पति की पौरी खेलत हरि ब्रजबाल- सारा. ४४५।

हरि
घोड़ा।
संज्ञा
पुं.

हरि
बन्दर।
संज्ञा
पुं.

हरि
सिंह।
संज्ञा
पुं.
उ.- कुटिल 'हरि' -नख हिऎं हरि के-१०-१६९।

हरि
सूर्य।
संज्ञा
पुं.

हरि
अग्नि।
संज्ञा
पुं.

हरि
एक छंद।
संज्ञा
पुं.

हरि
मोर, मयूर।
संज्ञा
पुं.

हरि
इंद्र।
संज्ञा
पुं.

हरि
सर्प।
संज्ञा
पुं.

हरि
धीरे।
अव्य.
(हिं. हरुए)

हरि
चुपके।
अव्य.
(हिं. हरुए)

हरि
हर कर, हरण करके।
क्रि.स.
(हिं. हरना)
उ.- इंद्र अस्व कौं हरि लै गयौ-९-९।

हरिअर
हरे रंग का।
वि.
(हिं. हरा)

हरिअर
हरा या हरित रंग।
संज्ञा
पुं.

हरिअराना, हरिअरानो
हरा होना।
क्रि.अ.
(हिं. हरिआना)

हरिअरी
हरियाली।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हरिअर)

हरिअरी
हरे रंगवाली, हरी।
वि.
स्त्री.

हरिआई
हरियाली।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हरिअर)

हरिआना, हरिआनो
पेड़-पौधों का हरा होना।
क्रि.अ.
(हिं. हरिअर)

हरिआना, हरिआनो
प्रसन्न या प्रफुल्लित होना।
क्रि.अ.
(हिं. हरिअर)

हरिआना, हरिआनो
हरा-भरा करना
क्रि.स.

हरिआना, हरिआनो
प्रसन्न करना।
क्रि.स.

हरिआली
हरे-भरे पेड़-पौधों का समूह या विस्तार।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हरियाली)
मुहा. हरिआली सूझना-चारों ओर आनंद ही आनंद दिखायी पड़ना, संकट में भी विनोद, प्रसन्नता या उमंग की बातें सूझना।

हरिकथा
भगवान या उनके अवतारों का चरित्र-वर्णन।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)
उ.- कहौँ हरि-कथा सुनौ चित लाइ-३-१।

हरिकीर्तन
भगवान या उनके अवतारों के नाम या गुण का भजन या कीर्तन।।
संज्ञा
पुं.
(सं. हरिकीर्तन)

हरिखंड
मोर-पंख।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरिगीतिका
एक प्रसिद्ध छंद।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हरिचंद
एक सत्यवादी राजा।
संज्ञा
पुं.
(सं. हरिश्चंद्र)

हरि-चंदन
एक तरह का चंदन।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरि-चर्म
बाघंबर, व्याघ्रचर्म।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरि-चाप
इंद्रधनुष।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरिजन
ईश्वर का भक्त।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरिजन
अस्पृश्य जाति का सामूहिक नाम।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरिजान, हरिजाना
विष्णु का वाहन, गरुड़।
संज्ञा
पुं.
(सं. हरियान)

हरिण
हिरन, मृग।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरिण-कलंक
चंद्रमा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरिणनयना, हरिणनयनी
मृग जैसी सुंदर आँखोंवाली।
वि.
स्त्री.
(सं.)

हरिणाक्षी
हिरन जैसी सुंदरआँखोंवाली।
वि.
स्त्री.
(सं.)

हरिणी
हिरन की मादा, मृगी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हरिणी
'चित्रिणी' ,त्री जो कम सुकुमार, चंचल तथा क्रीड़ाशील प्रकृति की होती है (कामशास्त्र)।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हरिणी
एक वर्ण-वृत्त।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हरिप्रिया
तुलसी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हरिप्रिया
द्वादशी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हरिप्रिया
एक छंद।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हरिबाहन
विष्णु का वाहन, गरुड़।
संज्ञा
पुं.
(सं. हरिवाहन)
उ.- (क) अतिहिं उठथौ अकुलाइ, डरथौ हरि-बाहन खग सौं-५८९। (ख) कद्रुज पैठि पताल दुरि रहे खगपति हरि-बाहन भए जाइ-२२२४।

हरिबोधिनी
देवोत्थान एकादशी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हरिभक्त
ईश्वर का भक्त।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरियर
हरे रंग का, हरा।
वि.
(हिं. हरा)

हरियर
हरा-भरा।
वि.
(हिं. हरा)
उ.- तब लगि सेवा करि निश्चय सौं, जब लगि हरियर खेत-१-३२२।

हरियरना, हरियरनो
हरा-भरा होना।
क्रि.अ.
(हिं. हरियर)

हरियरना, हरियरनो
प्रसन्न होना।
क्रि.अ.
(हिं. हरियर)

हरित, हरित्
हरे रंग का, हरा।
वि.
(सं. हरित्)

हरितमणि
पन्ना, मरकत।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरिता
हरि' ता भाव, विष्णुत्व।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हरिता
दूब।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हरिता
हल्दी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हरिताभ
हरापन लिये हुए, हरे रंग की आभा या कांतिवाला।
वि.
(सं.)

हरितालिका
भादों के शुल्क पक्ष की तीज या तृतीया जब सौभाग्यवती स्त्रियाँ निर्जल व्रत रखकर शिव-पार्वती का पूजन करती हैं।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हरिदास
भगवान का भक्त।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरिद्रा
हलदी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हरिद्वार
उत्तरी भारत का एक प्रसिद्ध तीर्थ जहाँ गंगा पहाड़ों को छोड़कर मैदान में आती है। 'हरिद्वार' नाम पड़ने का कारण यह विश्वास है कि इस तीर्थ के सेवन से विष्णुलोक का द्वार खुल जाता है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरि-धाम
विष्णुलोक, वैकुंठ।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरिन, हरिना
हिरन, मृग।
संज्ञा
पुं.
(सं. हरिण)

हरि-नख
सिंह या बाघ का नाखून। बच्चों को नजर से बचाने के लिए पहनायी जानेवाली वह ताबीज जिसमें बाघ या सिंह का नख बँधा हो।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- कुटिल हरि-नख हिऎं हरि के -१०-१६९।

हरि-नग
साँप की मणि।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरिनाकुस
एक दैत्य जो प्रहलाद का पिता था।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिरण्यकशिपु)

हरिनाक्ष, हरिनाच्छ, हरिनाछ
एक प्रसिद्ध दैत्य।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिराणयाक्ष)

हरिनाम
भगवान का नाम।
संज्ञा
पुं.
(सं. हरिनामन्)

हरिनी
हिरन की मादा।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हरिन)

हरिपुर
विष्णुलोक, वैकुंठ।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरिप्रिया
लक्ष्मी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हरिशयनी
आषाढ़ शुक्ल एकादशी जिस दिन विष्णु शेष-शेया पर (कार्तिक प्रबोधिनी एकादशी तक के लिए) सोते हैं।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हरिश्चंद्र
एक सूर्यवंशी राजा जो त्रिशंकु के पुत्र थे और अपनी सत्यनिष्ठा के लिए प्रसिद्ध हैं।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरिस
हल की लंबी लकड़ी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हलीषा)

हरि-सुत
श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरिहाई
नटखट (गाय)।
वि.
स्त्री.
(सं. हरहाया)

हरिहैं
दूर करेंगे, हल्का करेंगे।
क्रि.स.
(हिं. हरना)
उ.- भूमि-भार येई हरिहें-१०-८५।

हरी
हरे रंग की, हरित।
वि.
स्त्री.
(हिं. हरा)
उ.- (क) हरी घास हूँ सो नहिं चरै-५-३। (ख) इतनी कहत सुकाग उहाँ तैं हरी डार उड़ि बैठथौ-९-१६४।

हरी
हर की पत्नी, पार्वती।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हरी
एक वर्णवृक्त जिसे 'अनंद' भी कहते हैं।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हरी
विष्णु या उनके अवतार राम-कृष्ण।
संज्ञा
पुं.
(सं. हरि)
उ.- (क) हमारी तुमकौं लाज हरी-१-१८४। (ख) नाम बिना श्री स्याम हरी-१-११५। (ग) हरि-प्रभाउ राजा नहिं जान्यौ, कहथौ सैन मीहिं देहु हरी-१-२६८।

हरियारी; हरियाली
हरी घासग्यां हरे-भरे पेड़-पौधों का समूह या विस्तार।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हरित + अवलि, हिं. हरियाली)
मुहा.- हरियाली सूझना-चारो ओर आनंद ही आनंद जान पड़ना, संकट में भी विनोद, उमंग या प्रसन्नता की बातें सूझना।

हरिल
एक प्रसिद्ध पक्षी।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हारिल)

हरि-लोक
विष्णुलोक, बैकुंठ।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरिवंश
श्रीकृष्ण का वंश।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरिवंश
एक प्रसिद्ध ग्रंथ जिसमें श्रीकृष्ण और उनके कुल का विस्तृत वर्णन मिलता है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरिवर्ष
जंबू द्वीप के नौ खंडों में एक।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- इलावर्त और किंपुरुष कुरु औ हरिवर्ष केतु-माल। हिरनमय रमनक भद्रासन भरतखंड सुखपाल-सारा. ३३।

हरिवल्लभा
लक्ष्मी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हरिवल्लभा
तुलसी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हरिवाह
विष्णु का वाहन, गरुड़।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरिवाहन
गरुड़।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेस
बचा हुआ, अवशिष्ट।
वि.

सेस
समाप्त।
वि.

सेसनाग
शेषनाग।
संज्ञा
पुं.
(सं. शेषनाग)
उ.- सेसनाग के ऊपर पौढ़त तेतिक नाहिं बड़ाई-१-२१५।

सेसरंग
(शेषनाग जैसे) सफेद रंगवाला।
संज्ञा
पुं.
(सं. शेष + रंग)

सेसर
ताश के तीन-तीन पत्तों से खेला जानेवाला एक तरह का जुआ।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. सेह = तीन + सर = बाजी)

सेसर
चालबाजी, जालसाजी, छलकपट, धूर्तता।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. सेह = तीन + सर = बाजी)

सेसर
जाल।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. सेह = तीन + सर = बाजी)

सेसरिया
चालबाजी या छल-कपट करनेवाला।
वि.
(हिं. सेसर + इया)

सेसरिया
जाल-फरेब करनेवाला।
वि.
(हिं. सेसर + इया)

सेसरेख, सेस-रेखा
(शेषवतार) लक्ष्मण द्वारा, मारीच का 'हा लक्ष्मण' पद सुनकर और सीताजी को अकेली छोड़कर जाते समय, खीची गयी वह रेखा जिसको लाँघने का सीता जी को निषेध था और जिसके बाहर आ जाने पर ही उनको रावण हर सका था।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शेष + रेखा)

हरिया
हलवाहा।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हर = हल)

हरियाई
हरियाली।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हरियाली)

हरियान
विष्णु का वाहन, गरुड़।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरियाना
पेड़-पौधों का हरा होना।
क्रि.अ.
(हिं. हरिअर)

हरियाना
प्रसन्न होना।
क्रि.अ.
(हिं. हरिअर)

हरियाना
हरा-भरा करना।
क्रि.स.

हरियाना
प्रसन्न करना।
क्रि.स.

हरियाना
हिसार, रोहतल और करनाल का निकटवर्ती प्रदेश, बाँगड़।
संज्ञा
पुं.
(सं. हरियान)

हरियानी
हरियाना प्रदेश की बोली, बाँगड़ू।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हरियाना)

हरियारी; हरियाली
हरेपन या हरे रंग का विस्तार।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हरित + अवलि, हिं. हरियाली)

हरीचंद
सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र।
संज्ञा
पुं.
(सं. हरिश्चंद्र)
उ.-हरीचंद्र सो को जग दाता, सो घर नीच भरै-१-२६४।

हरीत
चोर।
संज्ञा
पुं.
(सं. हारीत)

हरीत
डाकू।
संज्ञा
पुं.
(सं. हारीत)

हरीतकी
हड़, हर्र।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हरीतिमा
हरे-भरे पौथों का समूह या विस्तार, हरियाली।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हरीतिमा
हरापन।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हरीरा
एक पेय जो दूध में मेवे-मसाले डालकर बनता है।
संज्ञा
पुं.
(अ. हरीरः)

हरीरा
हरे रंग का, हरा।
वि.
(हिं. हरिअर)

हरीरा
प्रसन्न, हर्षित।
वि.
(हिं. हरिअर)

हरील
हारिल' पक्षी।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हारिल)

हरीस
हल की लंबी लकड़ी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हलीषा)

हरुअ, हरुआ
जो भारी न हो, हलका।
वि.
(देश. हरुआ)

हरुआई
भारीपन का प्रभाव, हलकापन।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हरुआ)

हरुआई
जल्दी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हरुआना)

हरुआई
फुर्ती।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हरुआना)

हरुआना, हरुआनो
हलका होना।
क्रि.अ.
(हिं. हरुआ)

हरुआना, हरुआनो
तेजी या फुर्ती करना।
क्रि.अ.
(हिं. हरुआ)

हरुआना, हरुआनो
घबराकर उतावली दिखाना।
क्रि.अ.
(हिं. हरुआ)

हरुआय
जल्दी या फुर्ती करके।
क्रि.अ.
(हिं. हरुआना)
उ.- कर धनु लै किन चंदहिं मारि। तू हरुआय जाय मंदिर चढ़ि ससि सन्मुख दर्पन बिस्तारि।

हरुई
हलकी।
वि.
स्त्री.
(हिं. हरुआ)

हरुए, हरुऎं
धीरे-धीरे।
क्रि. वि.
(हिं. हरुआ)
उ.- आपु गए हरुंऎं सूनैं घर-१०-२८२।

हरुए, हरुऎं
इस प्रकार कि आहट न मिले, चुपके से।
क्रि. वि.
(हिं. हरुआ)
उ.- (क) फिरि चितई, हरि दृष्टि गए परि, बोलि लए हरुऎं सूनैं घर-१०-३०१। (ख) बरजति है घर के लौगनि कौं, हरुऎं लै लै नाम-५१५। (ग) ना जानौं कित तें हरुए हरि आय मूँदि दिए नैन।

हरुए, हरुऎं
बिना फैले हुए, सिमट कर।
क्रि. वि.
(हिं. हरुआ)
उ.-पौढ़ि गई हरुऎं करि आपुन अंग मोरि तब हरि जँभुआने- १०-१९७।

हरुए, हरुऎं
बेहुत हलके हाथ से, इस प्रकार कि जरा भी गति न हो।
क्रि. वि.
(हिं. हरुआ)
उ.- दोउ जननी मिलि कैं हरुऎं करि, सेज सहित तब भवन लए री-१०-२४७।

हरुव, हरुवा
हलका।
वि.
(हिं. हरुआ)

हरुवाई
हलकापन।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हरुवा)
उ.- दुहुँनि गोद अकूर लिए हँसि सुमनहुँ तें हरुवाई-२४९२।

हरुवाना, हरुवानो
हरुआना।
क्रि.अ.
(हिं. हरुआना)

हरू
हलका।
वि.
(हिं. हरुअ)

हरूफ
अक्षर।
संज्ञा
पुं.
(अ. हरफ़ का बहु., हरुफ़)

हरें
धीरे-धीरे।
अव्य.
(हिं. हरुएँ)

हरे
हरण होने या खो देने पर।
क्रि.स.
(हिं. हरना)
उ.-ब्याकुल होत हरे ज्यौं सरबस-१-५०।

हरे
हरण किया है।
क्रि.स.
(हिं. हरना)
उ.- मैं तो जे हरे हैं, ते तौ सोवत परे हैं-४८४।
मुहा.- चित्त हरे- मन को लुभाया या आकर्षित किया। उ.- बिवि लोचन सु बिसाल दुहुँनि के चित-वत चित्त हरे-६८९।

हरेक
हर एक।
वि.
(हिं. हर + एक)

हरेरा
हरे रंग का, हरा।
वि.
(हिं. हरा)

हरेरी
हरियाली।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हरियारी)

हरेरी
हरे रंग की, हरी।
वि.
स्त्री.
(हिं. हरेरा)

हरेव
मंगोलों का देश।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

हरेव
मंगोल जाति।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

हरेवा
एक हरा पक्षी।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हरा)

हरैं
धीरे से।
क्रि. वि.
(हिं. हरुए)
उ.- (क) हरैं बोलि जुवतिनि कौं लीन्हौ-३८८। (ख) हरत लाल हिंडोल झूलत, हरैं देत झुलाइ-४९८।

हरैं
धीरे-धीरे, चुपके से।
क्रि. वि.
(हिं. हरुए)
उ.-हरैं हरैं बेनी गहि पाछैं, बाँधी पाटी लाइ-१०-३२२।

हरै
छीनता, खसोटता या लूटता है।
क्रि.स.
(हिं. हरना)
उ.-कुरुपति चीर हरै-१-३७।

हरै
दूर करता या मिटाता है।
क्रि.स.
(हिं. हरना)
उ.- रिपु-तन-ताप हरै-१-११७।

हरैगो
हर लेगा।
क्रि.स.
(हिं. हरना)
मुहा.- प्रान हरैगो-जान ले लेगा। उ.- पिय को प्रेम तेरो प्रान हरैगो-२८७०।

हरैया
लूटने, खसोसने या छीननेवाला।
वि.
(हिं. हरना)

हरैया
मिटाने या दूर करनेवाला।
वि.
(हिं. हरना)

हरोल
सेना में सबसे आगे रहनेवाला सैनिक-दल।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हरावल)

हरौं
लूट या छीन लूँ, हरण करूँ।
क्रि.स.
(हिं. हरना)
उ.- सूर प्रभु अनुमान कीन्हौं, हरौं उनके चीर-७८३।

हरौं
मिटाऊँ, दूर करूँ।
वि.
(हिं. हरना)
उ.- सूरज सोच हरौं मन अबहीं, तौ पूतना कहाऊँ-१०-४९।

हरौ
हरे रंग का, हरा।
वि.
(हिं. हरा)
उ.- सेत हरौ, रातौ अरु पियरौ रंग लेत है धोई-१-६३।

हरें
चुपके से।
अव्य.
(हिं. हरुएँ)

हरें
क्रम-क्रम से।
अव्य.
(हिं. हरुएँ)

हरे
हरि' का संबंधित रूप।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- मोसौं पतिल न और हरे-१-१९८।

हरे
धीरे से।
क्रि. वि.
(हिं. हरुए)

हरे
(शब्द) जो ऊँ चा या तेज न हो।
क्रि. वि.
(हिं. हरुए)

हरे
(आघात, स्पर्श आदि) जो कठोर या तीव्र न हो।
क्रि. वि.
(हिं. हरुए)

हरे
हरे-हरे-धीरे-धीरे।
यौ.

हरे
हलका।
वि.

हरे
धीमा।
वि.

हरे
मंद।
वि.

हरौ
हरा-भरा।
वि.
(हिं. हरा)
उ.- मांडव रिषि जब सूली दियौ। तब सो काठ हरौ ह्वै गयौ-३-५।

हरौल
सेना में सबसे आगे का सैनिक दल।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हरावल)

हर्ज
बाधा।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हर्ज
हानि।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हरौहर
बल से छीन लेना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हरण)

हरौहर
लूट।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हरण)

हर्ता, हर्त्ता
दूर करनेवाला।
संज्ञा
पुं.
(सं. हर्तृ)

हर्ता, हर्त्ता
नाश करनेवाला।
संज्ञा
पुं.
(सं. हर्तृ)
उ.- (क) हर्ता-कर्ता आपै सोइ-७-२। (ख) तुम हर्ता, तुम कर्ता-२५५८। (ग) तुमहीं कर्ता तुमही हर्ता और न कोई-१० उ.-२८।

हर्तार
हर्त्ता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हर्दी
हलदी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हलदी)

हर्षक
आनंददायक।
वि.
(सं.)

हर्षण, हर्षन
भय या हर्ष से रोयों का खड़ा होना।
संज्ञा
पुं.
(सं. हर्षण)

हर्षण, हर्षन
प्रसन्न करना या होना।
संज्ञा
पुं.
(सं. हर्षण)

हर्षण, हर्षन
कामदेवँ के पाँच वाणों में एक।
संज्ञा
पुं.
(सं. हर्षण)

हर्षण, हर्षन
फलित ज्योतिष में एक योग।
संज्ञा
पुं.
(सं. हर्षण)
उ.- कृष्न पच्छ रोहिनी अर्द्ध निसि हर्षन जोग उदार-१०-८६।

हर्षना, हर्षनो
प्रसन्न होना।
क्रि.अ.
(सं. हर्षण)

हर्षाना, हर्षानो
प्रसन्न या प्रफुल्लित होना।
क्रि.अ.
(सं. हर्ष + हिं. आना)

हर्षाना, हर्षानो
प्रसन्न या आनदित करना।
क्रि.स.

हर्षित
प्रसन्न, प्रफुल्लित।
वि.
(सं.)

हर्षुल
प्रसन्न, प्रफुल्ल।
वि.
(सं.)

हर्फ
अक्षर।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हरफ)

हर्बा
हथियार, अस्त्र।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हरबा)

हर्म्य
राजमहल, प्रासाद।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हरथो, हरथौ
दूर किया, मिटाया।
क्रि.स.
(हिं. हरना)
उ.- (क) करुनासिंधु दयाल दरस दै, सब संताप हरथौ-१-१७। (ख) सूरदास प्रभु अंतर्यामी भक्त संदेह हरथो-१५५२।

हरथो, हरथौ
लूटा, छीना, चुराया, हरण किया।
क्रि.स.
(हिं. हरना)
उ.- (क) बेष धरि-धरि हरथौ पर धन-१-४५। (ख) ढूँढ़ि-ढूढ़ि गोरस सब घर कौ, हरथौ तुम्हारैं तात-१०-२९०। (ग) सुनि सखी, सूर सरबस हरयौ सावरैं-१०-३०७। (घ) मदन मोहन रूप धरयौ। तब गरब अनंग हरयौ-६२३।

हर्र, हर्रा, हर्रे, हर्रै
हड़' नामक मसाला।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हड़)
उ.- बाइबिरंग बहेरा हरैं-१-१०८।

हर्रैया
हाथ का एक गहना।
संज्ञा
स्त्री.
(देश.)

हर्ष
आनंद, प्रफुल्लता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- सीत-उष्न, सुख-दुख नहिं मानै, हर्ष-सोक नहिं खाँचे-१-८१।

हर्ष
भय या प्रसन्नता के कारण रोएँ खड़े होना या रोमांच होना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हर्ष
संयोग श्रृंगार का एक संचारी भाव जिसमें प्रसन्नता या प्रफुल्लता से रोएँ खड़े हो जाते या मुख पर पसीना आ जाता है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेहुँआ
एक चर्म रोग।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

सेहुँड़
थूहर का पेड़।
संज्ञा
पुं.
(सं. सेहुण्ड)

सैं
से।
प्रत्य.
(हिं. से)

सैं
समान।
अव्य.
(सं. सदृश)

सैकड़ा
सौ का समूह।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सौ)

सैकड़े
प्रतिशत।
क्रि. वि.
(हिं. सैंकड़ा)

सैकड़ों
कई सौ।
वि.
(हिं. सैंकड़ा)

सैकड़ों
गिनती में बहुत अधिक।
वि.
(हिं. सैंकड़ा)

सैंगर
एक पौधा जिसकी फलियों की तरकारी बनती है।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सेंगर)

सैंतत
इकट्ठा या एकत्र करता है।
क्रि.स.
(हिं. सैंतना)
उ.- कंचन मनि तजि काँचहिं सैंतत या माया के लीन्हे-१-१७७।

हर्षोत्फुल्ल
खुशी से फुला हुआ।
वि.
(सं.)

हलंत
शुद्ध व्यंजन जिसके उच्चारण में स्वर न उच्चरित हो
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हल
जमीन जोतने का एक प्रसिद्ध यंत्र।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- धर बिधंसि नल करत किरषि हल बारि बीज बिथरै-१-११७।
मुहा.- हल जोतना- (१) खेत में हल चलाना। (२) खेती करना। (३) देहाती या गँवार जैसा काम करना।

हल
एक प्राचीन अस्त्र का नाम।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- लख्यो बलराम यह सुभटवंत है कोऊ, हल-मुसल सस्त्र अपनो सँभारथो-१० उ.-४५।

हल
हिसाब सगाना।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हल
किसी समस्या का समाधान।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हलकंप
हलचल।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हिलना + कंप)

हलकंप
चारो ओर फैली हुई घबराहट।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हिलना + कंप)

हलक
गले की नली, कंठ।
संज्ञा
पुं.
(अ. हलक)
मुहा.- हलक के नीचे उतरना- (१) (किसी बात का) मन में बैठना या असर होना। (२) (किसी बात का) ठीक या युक्तिसंगत जान पड़ना।

हलकई
हलकापन।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हलका)

हलकई
ओछापन।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हलका)

हलकई
हेठी, अप्रतिष्ठा।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हलका)

हलकना, हलकनो
(पात्र में) भरे जल के हिलाने से उसका हिलना-डोलना या शब्द करना।
क्रि.अ.
(सं. हल्लन)

हलकना, हलकनो
हिलोरें लेना, तरंग मारना।
क्रि.अ.
(सं. हल्लन)

हलकना, हलकनो
बत्ती की लौ का झिलमिलाना।
क्रि.अ.
(सं. हल्लन)

हलकना, हलकनो
हिलना-डोलना।
क्रि.अ.
(सं. हल्लन)

हलका
जो भारी न हो।
वि.
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)

हलका
जो गाढ़ा न हो।
वि.
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)

हलका
जो (रंग) गहरा या चटक न हो।
वि.
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)

हलका
जो (सर आदि) गहरा न हो, उथला।
वि.
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)

हलका
जो (भूमि) उपजाऊ न हो।
वि.
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)

हलका
जो (भोजन) गरिष्ठ न हो।
वि.
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)

हलका
कम, थोड़ा।
वि.
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)

हलका
जो (दुःख-दर्द) जोर का न हो।
वि.
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)

हलका
जो (चोट) कठोर, ज्यादा या तेज न हो।
वि.
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)

हलका
जिसमें गंभीरता या बड़प्पन न हो, ओछा, तुच्छ।
वि.
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)

हलका
आसान, सरल।
वि.
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)

हलका
बेफिक्र, निश्चिंत।
वि.
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)

हलका
प्रसन्न, प्रफुल्ल।
वि.
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)

हलका
जो मोटा न हो, झीना।
वि.
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)

हलका
कम अच्छा, घटिया।
वि.
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)

हलका
जिसमें कुछ भरा न हो, खाली।
वि.
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)
मुहा.- हलका करना - अपमानित करना। हलका काम- (१) ओछा या तुच्छ काम। (२) बुरा काम। हलका-भारी होना-लोगों की दृष्टि में ओछा बनना। हलका-भारी बोलना-खरी-खोटी सुनाना।

हलका
हिलोर, लहर।
संज्ञा
पुं.
(अनु. हल-हल)

हलका
गोलाई, वृत्त।
संज्ञा
पुं.
(अ. हल्कः)

हलका
घेरा, परिधि।
संज्ञा
पुं.
(अ. हल्कः)

हलका
झुंड, मंडली।
संज्ञा
पुं.
(अ. हल्कः)

हलका
पशुओं (विशेषत: हाथियों) का झुंड।
संज्ञा
पुं.
(अ. हल्कः)

हलका
(किसी काम के लिए नियत) मुहल्लों, गाँवों या कसबों का समह।
संज्ञा
पुं.
(अ. हल्कः)

हलकाई
हलकापन।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हलका)

हलकाई
ओछापन।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हलका)

हलकाई
हेठी, अप्रतिष्ठित।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हलका)

हलकान
परेशान, हैरान।
वि.
(हिं. हलाकान)

हलकाना, हलकानो
बोझ कम या हलका होना।
क्रि.अ.
(हिं. हलका + ना)

हलकाना, हलकानो
(बरतन में भरे) पानी को हिलाना डुलाना।
क्रि.स.

हलकाना, हलकानो
हिलोरा देना।
क्रि.स.

हलकापन
हलका होने का भाव, भार का अभाव।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हलका + पन)

हलकापन
ओछापन, तुच्छता।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हलका + पन)

हलकापन
हेठी, अप्रतिष्ठा।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हलका + पन)

हलकारना, हलकारनो
तितर-बितर करना, छितराना, बिखराना।
क्रि.स.
(अनु.)

हलकारा
पत्र या संदेश पहुँचानेवाला।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हरकारा)

हलकारी
कपड़ा रँगते समय रँग चटक करने के लिए फिटकरी, हड़ आदि की पुट देना।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हड़ + कारी)

हलकोरा
तरंग, लहर।
संज्ञा
पुं.
(अनु.)

हलकोरा
झोंका।
संज्ञा
पुं.
(अनु.)

हलचल
हिलने-डुलने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हिलना + चलना)

हलचल
भगदड़, खलबली।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हिलना + चलना)

हलचल
दंगा, उपद्रव।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हिलना + चलना)

हलचल
हिलता-डोलता या डगमगाता हुआ।
वि.

हलजीवी
हल या खेती से जीविकार्जन करनेवाला।
वि.
(सं. हलजीविन्)

हलति
हिलती-डोलती है।
क्रि.अ.
(हिं. हिलना)
उ.- कर भटकत, चकडोरि हलति-६०१।

हलद
हलदी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हलदी)

हलदहात, हलदात
विवाह के (तीन या पाँच दिन) पहले वर-वधू के शरीर में हलदी-तेल लगाने की रीति, हलदी चढ़ना।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हलदी +हाथ)

हलदी
एक प्रसिद्ध पौधा जिसकी जड़ मसाले और रँगाई के काम आती है।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हरिद्रा)
मुहा.- हलदी उठना या चढ़ना-विवाह के (तीन या पाँच दिन) पहले वर-वधू के शरीर में हलदी-तेल लगाने की रीति होना। हलदी लगना-विवाह होना। हलदी लगाकर बैठना- (१) कोई काम-धाम न करके एक जगह बैठा रहना। (२) घमंड, ऎंठ या अकड़ में फला रहना। कहा. हलदी लगे न फिटकरी रँग चोखा आ (हो) जाय- बिना कुछ खर्च या परिश्रम किये ही सारा काम बन जाय।

हलधर
हल को धारण करनेवाला, किसान।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हलधर
हल नामक अस्त्र को धारण करनेवाला, बलराम।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.-सुबल हलधर अरु श्रीदामा करत नाना रंग-१०-२१३।

हलना, हलनो
हिलना-डोलना।
क्रि.अ.
(सं. हल्लन)

हलना, हलनो
घुसना, प्रवेश करना।
क्रि.अ.
(सं. हल्लन)

हलपाणि, हलपानि
बलराम (जिनके हाथ में 'हल' नामक अस्त्र रहता था)।
संज्ञा
पुं.
(सं. हलपाणि)

हलफ
कसम, सौगंध।
संज्ञा
पुं.
(अ. हलफ)
मुहा. हलफ उठवाना या देना-(ईश्‍वर को साक्षी करके) शपथ खिलाना या खाने को कहना। हलफ उठाना या लोना-(ईश्वर को साक्षी करके) शपथ खाना।

हलफा
हिलोर, तरंग।
संज्ञा
पुं.
(अनु. हलहल)
मुहा.- हलफ मारना-लहरें उठना, लहराना।

हलब
फारस की तरफ का एक देश जहाँ का शीशा प्रसिद्ध था।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

हलबल
खलबली।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हल + बल)

हलबली
खलबली, हलचल।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हलबल)

हलबी, हलब्बी
हलब देश का।
वि.
(हिं. हलब)

हलबी, हलब्बी
मोटे दल का और बढ़िया (शीशा)।
वि.
(हिं. हलब)

हलभल
हलचल।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हलबल)

हलभलई, हलभलाई
भला बनने के लिए की गयी चाटुकारी की बात।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हाल + भलाई)
मुहा.- मुँह की हलभलई-भला बनने के लिए केवल मुँह से (दिल या जी से नहीं) कही गयी चाटुकारी की बात। उ.- मुँह की हलभलई मोहूँ सो करन आए, जिय की जासों, ताही सों, तुम बिनु सूनौं वाको गेहरा-२००१।

हलभली
खलबली।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हलभल)

हलराना, हलरानो, हलरावना, हलरावनो
(बच्चों को प्यार-दुलार से) हाथ पर लेकर हिलाना-डुलाना या झुलाना।
क्रि.स.
(हिं. हिलोरा)

हलरावति
(बच्चों को प्यार-दुलार से) हाथ पर लेकर हिलाती-डुलाती या झुलाती है।
क्रि.स.
(हिं. हलरावना)
उ.-गावति हलरावति कहि प्यारे-१०-४६।

हलरावैं
हलराते है।
क्रि.स.
(हिं. हलरावना)
उ.- नंद-जसोदा हरषि, हलरावैं-१०-४५।

हलरावै
हलराती है।
क्रि.स.
(हिं. हलरावना)
उ.-(क) हलरावै, दुलराइ मल्हावै-१०-४३। (ख) जसोदा हलरावै अरु गावै-१०-१२८।

हलवा
एक मीठा भोजन।
संज्ञा
पुं.
(अ.)
मुहा.- हलवा-माँड़े से काम-अपने लाभ या स्वार्थ से मतलब। हलवा निकालना-बहुत मारना-पीटना।

हलवाइन
हलवाई की स्त्री।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हलवाई)

हलवाई
मिठाई बनाने-बेचनेवाला।
संज्ञा
पुं.
(अ. हलवा)

हलवाह, हलवाहा
हल चलाने वाला नौकर या किसान।
संज्ञा
पुं.
(सं. हलवाह)

हलहल
हिलता-काँपता हुआ।
वि.
(हिं. हिलना)

हलहला
हर्षसूचक किलकार
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हलहलाना, हलहलानो
जोर से हिलाना, झकझोरना।
क्रि.स.
(अनु. हलहल)

हलहलाना, हलहलानो
काँपना.थरथराना
क्रि.अ.

हला
शोर-गुल।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हल्ला)

हलाए
हिलाने-डुलाने लगे।
क्रि.स.
(हिं. हिलाना)
उ.-सैन जानि तब ग्वाल जहाँ तहँ द्रुम द्रुम डार हलाए-१०८४।

हलाक
मारा हुआ, हत।
वि.
(अ. हलाक़त)

हलाकान
हैरान, परेशान।
वि.
(हिं. हलाक)

हलाकानी
परेशानी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हलाकान)

हलाकी
मारनेवाला; घातक।
वि.
(हिं. हलाक)

हलाक
वध करनेवाला।
वि.
(हिं. हलाक)

हलाना, हलानो
गति देना, हिलाना-डुलाना।
क्रि.स.
(हिं. हिलाना)

हलाना, हलानो
कंपित या चलायमान करना।
क्रि.स.
(हिं. हिलाना)

हलाना, हलानो
कँपाना।
क्रि.स.
(हिं. हिलाना)

हलाना, हलानो
ढीला करना।
क्रि.स.
(हिं. हिलाना)

सैंतत
सहेजता-सँभालता है।
क्रि.स.
(हिं. सैंतना)
उ.- यक सैंतत घर के सब बासन-१०५२।

सैंतति
सहेजती और सँभाल कर रखती है।
क्रि.स.
(हिं. सैंतना)
उ.-(क) सैंतति महरि खिलौना हरि के-७१२। (ख) धरति, सैंतति धाम बासन-९५०। (ग) महरि सबै नेवज लै सैंतति-१०१०।

सैंतना, सैंतनो
इकट्ठ, एकत्र या संचित करना।
क्रि.स.
(सं. संचय)

सैंतना, सैंतनो
बिखरी हुई चीज को हाथ से समेटना।
क्रि.स.
(सं. संचय)

सैंतना, सैंतनो
सहेजना, सँभालकर या सावधानी से रखना।
क्रि.स.
(सं. संचय)

सैंतालिस, सैंतालीस
चालीस से सात अधिक की संख्या।
संज्ञा
पुं.
(सं. सप्तचत्वारिंशत्, पा. सत्तचत्तालीसति, प्रा. सत्तालिस, हिं. सैतालीस)

सैंति
इकट्ठा या एकत्र करके।
क्रि.स.
(हिं. सैंतना)
उ.-कहा होत जल महा प्रलय को राख्यौ सैति सैति है गेह। भुव पर एक बूॅद नहिं पहुँची निझरि गए सब मेह।

सैंति
सहेज या सँभालकर।
क्रि.स.
(हिं. सैंतना)
उ.- (क) नीलाम्बर पीताम्बर लीन्हें, सैंति धरति करि ध्यान-५११। (ख) अपनो जोग सैंति धरि राखौ यहाँ देत कत डारे-३०११।

सैंतिस, सैंतीस
तीस से सात अधिक की संख्या।
संज्ञा
पुं.
(सं. सप्तत्रिंशत्, पा. सत्ततिंसति, प्रा. सत्तिंसइ, हिं. सैतीस)

सैंथी
भाला, बरछी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शक्ति)
उ.- इन्द्रजीत लीन्हीं जब सैंथी (पाठा, सक्ती) देवन हहा करथौ-९-१४४।

हलावै
हिलाती या गति देती है।
क्रि.स.
(हिं. हलाना)
उ.- बेनी डोलति दुदूँ नितंब पर मानहुँ पूँछ हलावै-८७६।

हलाहल
वह प्रचंड विष जो समुद्र-मंथन करने पर सबसे पहले निकला था और जिसका पान शिव जी ने किया था।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- भयौ हलाहल प्रगट प्रथमहीं मथत जब, रुद्र कैं कंठ दियौ ताहिं धारी-८-८।

हलाहल
महा विष।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- घोरि हलाहल सुन री सजनी औसर तेहि न पियौ-२५४५।

हलाहल
पूरा-पूरा, भरपूर।
वि.

हली
किसान।
संज्ञा
पुं.
(सं. हलिन्)

हली
बलराम।
संज्ञा
पुं.
(सं. हलिन्)

हलीम
सीधा, शांत, सुशील।
वि.
(अ.)

हलुआ
एक मीठा भोजन।
संज्ञा
पुं.
(अ. हलवः)

हलुक
जो भारी न हो, हलका।
वि.
(हिं. हलका)

हलुकई
हलकापन।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हलकाई)

हलाना, हलानो
धसाना।
क्रि.स.
(हिं. हिलाना)

हलाना, हलानो
डिगाना।
क्रि.स.
(हिं. हिलाना)

हला-भला
निबटारा।
संज्ञा
पुं.
(हिं. भला +अनु. हला)

हला-भला
परिणाम।
संज्ञा
पुं.
(हिं. भला +अनु. हला)

हला-भला
कल्याण।
संज्ञा
पुं.
(हिं. भला +अनु. हला)

हला-भला
सुख।
संज्ञा
पुं.
(हिं. भला +अनु. हला)

हलायुध
बलराम (जिनका आयुध 'हल' कहा गया है )
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हलाल
जो हराम न हो, जो धर्मानुकूल हो
वि.
(अ.)

हलाल
वह पशु जिसका माँस खाने का निषेध न हो।
संज्ञा
पुं.
मुहा.- हलाल करना- (१) (गला रेतकर) पशु की हत्या करना। (२) मार डालना। (३) ईमानदारी के साथ पूरा काम करना।

हलाल
हलाल का-हराम का नहीं, ईमानदारी का।
पद.

हलुकी
जो भारी न हो, हलकी।
वि.
स्त्री.
(हिं. हलका)

हलुवा
हलुआ।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हलुआ)

हलूफा
मिठाई, अनाज, वस्त्र आदि वे वस्तुएँ जो विवाह के एक दिन पहले लड़की के यहाँ से लड़केवाले के यहाँ भेजी जाती हैं।।
संज्ञा
पुं.
(अ. अलूफः)

हले
हिले-डोले, चलायमान या कंपित हुए।
क्रि.अ.
(हिं. हलना)
उ.-धीर चलत मेरे नैनन देखे तिहि छिन अंस हले-२७१२।

हलेरा
तरंग, लहर।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हिलोर)

हलोर
लहर, तरुंग।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हिलोर)

हलोरना, हलोरनो
साफ करने के लिए पानी में लहर या तरंग उत्पन्न करना।
क्रि.स.
(हिं. हिलोरना)

हलोरना, हलोरनो
मथना।
क्रि.स.
(हिं. हिलोरना)

हलोरना, हलोरनो
अनाज फटकना।
क्रि.स.
(हिं. हिलोरना)

हलोरना, हलोरनो
(धन आदि) दोनों हाथों से समेटना।
क्रि.स.
(हिं. हिलोरना)

हल्लीश
एक उपरूपक जिसमें एक ही अंक रहता है और नृत्य की प्रधानता रहती है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हल्लीश
एक प्रकार का नृत्य।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हव
अग्नि में दी गयी आहुति।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हव
आग, अग्नि।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हवन
मंत्र पढ़कर धी, जौ, तिल आदि अग्नि में डालने का धार्मिक कृत्य, होम।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.-होम, हवन, द्विज पूजा गनपति, सूरज, सक्र, महेस,-सारा. २३४।

हवन
आग, अग्नि।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हवन
अग्निकुंड।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हवन
अहुति डालने का चमचा, श्रुवा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हवस
चाह, लालसा, कामना।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)
मुहा.- हलस पकाना-व्यर्थ की कामना करना। हवस पूरी करना-इच्छा पूरी करना। हवस पूरी होना-इच्छा पूरी होना। हवस रखना - (१) इच्छा करना। (२) इच्छा पूरी करना।

हवस
तृष्णा।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हलोरा
लहर, तरंग।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हिलोरा)

हलोरि, हलोरी
तरंग।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हिलोर)

हलोरि, हलोरी
(साफ करने के लिए) पानी हिलाकर।
क्रि.स.
(हिं. हलोरना)
उ.- जल हलोरि गागरि भरि नागरि जबहीं सीस उठायौ-८४२।

हल्
व्यंजन का वह शुद्ध रूप जिसके साथ स्वर न उच्चरित हो।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हल्का
जो भारी न हो।
वि.
(हिं. हलका)

हल्दी
हलदी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हलदी)

हल्लन
हिलना-डोलना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हल्ला
शोरगुल, कोलाहल।
संज्ञा
पुं.
(अनु.)

हल्ला
लड़ाई के समय की ललकार।
संज्ञा
पुं.
(अनु.)

हल्ला
चढ़ाई, धावा।
संज्ञा
पुं.
(अनु.)

हवस
काम-वासना।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हवा
वायु, पवन।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)
मुहा.- हवा उड़ना-खबर फैलना। हवा उड़ाना-खबर या अफवाह फैलाना। हवा करना-पंखा हाँकना। (कोई चीज) हवा करना-चीज उडा देना या गायब कर देना। हवा के मुँह पर या रुख जाना- जिस ओर हवा बहती हो, उसी ओर जाना। हवा के घोड़े पर सवार होना- (१) बहुत जल्दी या उतावली में होना। (२) किसी प्रकार की उमंग या नशे में होना। हवा खाना- (१) शुद्ध वायु-सेवन के लिए बाग-बगीचे या खुली जगह में घूमना-फिरना या टहलना। (२) (किसी से कोई चीज न पाकर) विकल या वंचित होना। हवा गिरना- (१) तेज हवा का चलना बंद होना। (२) (किसी चीज के) तेज भाव का सस्ता हो जाना। हवा गाँठ में बाँधना-अनहोनी या असंभव बात के लिए परेशान होना। हवा पीकर या फाँककर रहना-बिना भोजन-पानी के रहना (व्यंग्य)। हवा बताना-(१) (कोई चीज न देकर) यों ही टाल देना। (२) किसी के मनोरंजन स्वार्थसिद् में बाधक होकर उसे दूर हटा देना। हवा बाँधना-(१) शेखी हाँकना, लंबी-चौड़ी बातें करना। (२) जोड़ जोड़कर झूठी बातें कहना। हवा पलटना, फिरना या बँधना- (१) हवा का रुख बदलकर दूसरी ओर चलने लगना। (२) हालत, दशा या स्थिति का बदल जाना। हवा भर जाना-खुशी या घमंड से फूल जाना। हवा बिगड़ना-(१) कोई भयंकर, छुतहा या संकामक रोग फैलना। (२) रीति या चाल खराब होना या बिगड़ना। (३) दशा या स्थिति खराब होना या बिगड़ना। हवा बिगाड़ना- (मार-पीट कर) दुर्दशा कर देना। दिमाग में हवा भर जाना-(१) बहुत घमंड या गर्व हो जाना। (२) बुद्धि ठिकाने न होना। हवा देना-(१) (आग) फूँकना। (२) हवा में रखना। (३) झगड़ा बढ़ाना। हवा-सा-बहुत ही महीन और हलका। हवा से बोतें करना- (१) बहुत तेज चलना या दौड़ना। (२) आप ही आप या व्यर्थ ही बहुत बोलना। हवा से लड़ना-किसी से अकारण झगड़ बैठना। हवा लगना-(१) हवा का झोंका पड़ना। (२) वात रोग से ह्रस्त होना। (३) बुद्धि ठीक न रहना। (४) सीधी-सादी बोतें छोड़कर नयी-नयी हानिकारिणी बात आदि सीख लेना। किसी की हवा लगना- किसी की संगत के प्रभाव से नयी या बुरी बातें सीखना। हवा हो जाना- (१) बहुत जल्दी या झटपट चले जाना। (२) बहुत जल्दी गायब या समाप्त हो जाना। कहीं की हवा खाना-कहीं जाना। कहीं की हवा खिलाना-(१) खूब घुमाना-फिराना। (२) कहीं भेजना।

हवा
भूत, प्रेत।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हवा
यश, कीर्ति, ख्याति।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हवा
उत्तम व्यवहार की साख, ख्याति या विश्वास।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)
मुहा.- हवा उखड़ना-(१) प्रसिद्धि या ख्याति न रह जाना। (२) साख न बनी रहना, विश्वास उठ जाना। हवा बँधना-कीर्ति, यश या ख्याति फैलना। (२) बाजारमें साख होना या विश्वास जमना।हवा बिगड़ना-पहले की सी धात, साख, मर्यादा या विश्वास न रह जाना।

हवा
किसी बात की सनक या धुन।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हवाई
हवा-संबंधी।
वि.
(अ. हवा)

हवाई
हवा में चलनेवाला।
वि.
(अ. हवा)

हवाई
जिसमें सत्य का आधार न हो, निर्मूल।
वि.
(अ. हवा)

हवाई
एक तरह की आतिशबाजी।
संज्ञा
स्त्री.
मुहा.- मुँह पर हवाई (बहु. हवाइयाँ) उड़ना-चेहरे का रंग बहुत फीका पड़ जाना।

हवालात
पहरे के भीतर रखा जाना।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हवालात
मामूली कैद।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हवालात
वह स्थान जिसमें कैदी या अभियुक्त रखा जाता है।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हवाले
जिम्मे, अधिकार।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हवाला)
मुहा.- किसी के हवाले करना-किसी को सौंपना। किसी के हवाले पड़ना या होना- (१) किसी को सौंपा जाना। (२) किसी के हाथ या चंगुल में आ जाना।

हवास
इंद्रियाँ।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हवास
सवेदन।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हवास
होश, सुध, चेतना, संज्ञा।
संज्ञा
पुं.
(अ.)
मुहा.- हवास गुम होना-होश या बुद्धि ठिकाने न रहना, कर्तव्य न सूझना।

हवि
वह द्रव्य या वस्तु जिसकी अग्नि में आहुति दी जाय।
संज्ञा
पुं.
(सं. हविस्)
उ.-(क) तर्फत नैन हृदय होमत हवि मन-बच-क्रम और नहिं काम-२२३०। (ख) सूर सकल उपमा जो रही यों, ज्यों होइ आवै कहत होमत हवि-२३१४।

हवित्र, हवित्रि, हवित्री
हवन कुंड।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हवित्री)

हविष्मान, हविष्मान्
हवन करनेवाला।
वि.
(सं. हविष्मत्)

हवाईजहाज
वायु यान।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हवाई + जहाज)

हवादार
जिसमें हवा आने के लिए काफी दरवाजे, खिड़कियाँ आदि हों।
वि.
(अ. हवा + फ़ा. दार)

हवा-पानी
जल-वायु।
संज्ञा
पुं.
(अ. हवा + हिं. पानी)

हवाल
दशा, अवस्था।
संज्ञा
पुं.
(अ. अहवाल)

हवाल
समाचार, बृत्तांत।
संज्ञा
पुं.
(अ. अहवाल)

हवाल
गति, परिणाम।
संज्ञा
पुं.
(अ. अहवाल)

हवाला
घटना, प्रमाण आदि का उल्लेख।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हवाला
मिसाल, उदाहरण, दृष्टांत।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हवाला
कब्जा, सुपुर्दगी, अधिकार।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हवाला
गति, दशा, परिणाम।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हवाल)
उ.-ऎसी बातनि झगरौ ठानो हो, मूरख तेरो कौन हवाला -१०३४।

हविष्य
हवन करने योग्य।
वि.
(सं.)

हविष्य
जिसकी आहुति दी जाने को हो।
वि.
(सं.)

हविष्य
वह वस्तु जिसकी आहुति दी जाय।
संज्ञा
पुं.

हविष्यान्न
वह सात्विक आहार जो यज्ञ, व्रत आदि के दिन किया जाय।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हविस
लालसा।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हवस)

हविस
तृष्णा।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हवस)

हविस
काम वासना।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हवस)

हविस
अरमान, हौंसला।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हवस)

हवेली
बहुत बड़ा और पक्का मकान।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हवेली
पत्नी।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हवौ
हो।
क्रि.अ.
(हिं. होना)
उ.-मोहन-मोहन कहि कहि टेरै कान्ह हवौ यहि बन मेरे-१८१३।

हव्य
(देवताओं के लिए) हवन की सामग्री। (पितरों के लिए हवन-सामग्री 'कव्य' कहलाती है)।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हसद
डाह, ईर्ष्या।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हसन
हँसना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हसन
परिहास।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हसन
हजरत के दो बेटों में एक जो लड़ाई में मारे गये थे और जिनका शोक शिया मुसलमान मुहर्रम में मनाते हैं।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हसब
मुताबिक, अनुसार।
अव्य.
(अ.)

हसमत
गौरव, मान।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हशमत)

हसमत
वैभव, ऎश्वर्य।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हशमत)

हसरत
दुख।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

सैंदूर
सिंदूर से रँगा हुआ।
वि.
(सं.)

सैंदूर
सिंदूर जैसे लाल रंग का।
वि.
(सं.)

सैंधव
सेंधा नमक।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सैंधव
सिंध देश का घोड़ा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सैंधव
सिंध देश का निवासी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सैंधव
सिंध देश का राजा जयद्रथ।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सैंधव
जो सिंध देश में जन्मा या उत्पन्न हुआ हो।
वि.

सैंधव
जो सिंध देश से संबंधित हो।
वि.

सैंधव
जो समुद्र से त्पन्न हो।
वि.

सैंधव
जो समुद्र से संबंधित हो।
वि.

हसरत
कामना।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हसि
है' या 'हो' का अव्यय रूप।
क्रि.अ.
(सं. अस्ति)

हसिका
हॅंसी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हसिका
विनोद।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हसित
जिस पर लोग हँसते हों, हास्यास्पद।
वि.
(सं.)

हसित
हँसता हुआ।
वि.
(सं.)

हसित
खिला हुआ।
वि.
(सं.)

हसित
हास, हँसी।
संज्ञा
पुं.

हसित
उपहास।
संज्ञा
पुं.

हसित
कामदेव का धनुष।
संज्ञा
पुं.

हस्तक
हाथ।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हस्तक
नृत्य में हाथों की मुद्रा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- हस्तक भेद ललित गति लाई-१८२८।

हस्तक
करताल।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हस्तक
हाथ से बजायी गयी ताली।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हस्त-कोहली
वर- कन्या की कलाई में मंगल-सूत्र बाँधने की रीति।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हस्त-कौशल
हाथ की कारीगरी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हस्तक्षेप
(काम में) दखल देना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हस्तगत
हाथ में आया या मिला हुआ, हासिल, प्राप्त।
वि.
(सं.)

हस्ततल
हथेली।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हस्तमुद्रा
नृत्य, गायन आदि में हाथ से भाव बताने का ढंग।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हसीन
खूबसूरत, सुंदर।
वि.
(अ.)

हसील
सीधा-सादा।
वि.
(अ. असील)

हस्त
हाथ।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- थाके हस्त, चरन गति थाकी-१-२८७।

हस्त
हाथी की सूँड़।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हस्त
चौबीस अंगुल की एक नाप।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हस्त
लिखा हुआ, लिखा वट।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हस्त
एक नक्षत्र।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हस्त
संगीत या नृत्य में हाथ से भाव बताना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हस्त
श्रीकृष्‍ण के एक पुत्र का नाम।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हस्त
गुच्छा, समूह।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हस्त-रेखा
हथेली में पड़ी हुई रेखाएँ जिन्हे देखकर जीवन की मुख्य-मुख्य घटनाएँ बतायी जाती हैं।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हस्त-लाघव
हाथ की चालाकी, फर्ती या सफाई।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हस्तलिखित
हाथ का लिखा हुआ।
वि.
(सं.)

हस्तलिपि, हस्तलेखा
हाथ की लिखावट या लिपि।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हस्तांतरण
(संपत्ति आदि का) एक के हाथ से टूसरे के पास जाना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हस्तांतरित
एक के हाथ से दूसरे को मिला हुआ।
वि.
(सं.)

हस्ताक्षर
दस्तखत।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हस्तामलक
हाथ में लिया हुआ आँवला।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हस्तामलक
वह वस्तु या विषय जिसका अंग-प्रत्यंग (हथेयी पर लिये हुए आँवले के समान) स्पष्टतः ज्ञात हो सके।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हस्ति
हाथी।
संज्ञा
पुं.
(सं. हस्तिन्)

हहराना, हहरानो
काँपना।
क्रि.अ.
(अनु.)

हहराना, हहरानो
डर से दहलना।
क्रि.अ.
(अनु.)

हहराना, हहरानो
दंग या चकित होना।
क्रि.अ.
(अनु.)

हहराना, हहरानो
डाह या ईर्ष्या करना।
क्रि.अ.
(अनु.)

हहराना, हहरानो
डराना, दहलाना, भयभीत करना।
क्रि.स.

हहरयो, हहरयौ
दहल गया, थर्रा गया, भयभीत हो गया।
क्रि.अ.
(हिं. हहरना)
उ.- मैं देखौं, इनको अब हतिहै, अति ब्याकुल हहरथो-२५५२।

हहलना, हहलनो
हहरना।
क्रि.अ.
(हिं. हहरना)

हहलाना, हहलानो
हहरना।
क्रि.अ.
(हिं. हहरना)

हहलाना, हहलानो
हहराना।
क्रि.स.
(हिं. हहराना)

हहा
हँसने का शब्द, ठट्टा।
संज्ञा
स्त्री.
(अनु.)

हस्ती
व्यक्तित्व।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)
मुहा.- किसी की क्या हस्ती है-क्या गिनती या ताकत है ?

हस्ते
हाथ से, द्वारा।
अव्य.
(सं.)

हहर
डर।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हहरना)

हहर
कँपकँपी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हहरना)

हहरना, हहरनो
थरथराना, काँपना।
क्रि.अ.
(अनु.)

हहरना, हहरनो
डर से दहलना या थर्राना।
क्रि.अ.
(अनु.)

हहरना, हहरनो
दंग या चकित रह जाना।
क्रि.अ.
(अनु.)

हहरना, हहरनो
डाह या ईर्ष्या करना, सिहाना।
क्रि.अ.
(अनु.)

हहरना, हहरनो
हहर-हहर' करना।
क्रि.अ.
(अनु.)

हहरात
डर से काँपते-थर्राते।
क्रि. वि.
(हिं. हहराना)
उ.- घहरात, तरतरात, गररात, हहरात, थररात, झहरात माथ नाए-९४४।

हस्तिका
एक प्राचीन बाजा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हस्तिनपुर, हस्तिनापुर
वह प्रचीन नगर जो वर्तमान दिल्ली से उत्तरपूर्व २८ कोस पर स्थित था, जिसे हस्तिन नामक एक चंद्रवंशी राजा ने बसाया था और जो कौरवों की राजधानी था।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.-तब अक्रूर बैठि हरि के रथ हस्तिनपुर जु सिधारे-सारा. ५९१।

हस्तिनी
हथिनी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हस्तिनी
एक सुगंधित द्रव्य।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हस्तिनी
साहित्य में चार प्रकार की स्त्रियों में सबसे निकृष्ट जो लोभयुक्त और स्थूल शरीरवालीतथाआहार और कामवासना में सबसे अधिक कही गयी है।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हस्तिमुख
गजानन, गणेश।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हस्ती
हाथी।
संज्ञा
पुं.
(सं. हस्तिन्)
उ.-मद के हस्ती समान फिरति प्रेम लटकी-१२००।

हस्ती
वह चंद्रवंशी राजा जिसने हस्तिनापुर को बसाया था।
संज्ञा
पुं.
(सं. हस्तिन्)

हस्ती
होने का भाव, अस्तित्व।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)

हस्ती
ताकत, शक्ति, सामर्थ्य।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)

हाँक
बढ़ावे का शब्द, बढ़ावा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हुंकार)

हाँक
दुहाई।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हुंकार)
उ.- बसत श्री सहित बैकुंठ के बीच गजराज की हाँक पै दौरि आए।

हाँकत
(गाड़ी, रथ, यान आदि) चलाता हूँ या है।
क्रि.स.
(हिं. हाँकना)
उ.-(क) (रथ) हाँकत हरि-१-२३। (ख) हाँकत हौं रथ तेरौ-१-२७२।

हाँकन
हाँकने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाँकन)

हाँकनहार, हाँकनहारा, हाँकनहारे, हाँकनहारो, हाँकन-हारो
रथ, यान आदि चलानेवाला।
वि.
(हिं. हाँकना + हारा)
उ.-अति कुबुद्धि मन हाँकनहारे, माया जूआ दीन्हौ-१-१८५।

हाँकना, हाँकनो
चिल्लाकर पुकारना या बुलाना।
क्रि.स.
(हिं. हाँक + ना)

हाँकना, हाँकनो
युद्ध में ललकारना या हुंकारना।
क्रि.स.
(हिं. हाँक + ना)

हाँकना, हाँकनो
बढ़-बढ़ कर बोलना।
क्रि.स.
(हिं. हाँक + ना)

हाँकना, हाँकनो
जानवरों को चलाना या इधर-उधर हटाना और भगाना।
क्रि.स.
(हिं. हाँक + ना)

हाँकना, हाँकनो
(गाड़ी, यान आदि) चलाना।
क्रि.स.
(हिं. हाँक + ना)

हहा
हाहाकार।
संज्ञा
स्त्री.
(अनु.)
उ.- इंद्रजीत लीन्हीं तब सक्ती देवनि हंहा करथौ-९-१४४।

हहा
गिड़गिड़ाने या दीनता प्रकट करने का शब्द।
संज्ञा
स्त्री.
(अनु.)

हहा
चिरौरी, बिनती।
संज्ञा
स्त्री.
(अनु.)
मुहा.- हहा खाना-बहुत गिड़गिड़ाना।

हहा
गिड़गिड़ाहट के साथ, बिनती के स्वर में।
क्रि. वि.
उ.- सूर स्याम कर जोरि मातु सौं गाइ चरावन कहत हहा रे-४२३।

हाँ
स्वीकृति, सहमति या समर्थन सूचक शब्द।
प्रव्य.
(सं. आम्)

हाँ
एक शब्द जिससे यह सूचित हो कि पूछी गयी बात ठीक है।
प्रव्य.
(सं. आम्)
मुहा.- हाँ करना-(१) राजी होना, स्वीकारहोना (२) ठीक मान लेना। हाँ नकरना- (१) राजी न होना। (२) ठीक न मानना। हाँ जी हाँ जी करना या बोलना अथवा हाँ में हाँ मिलाना- (१) किसी को प्रसन्न करने के उद्देश्य से दिना विचार किये ही उसके मन की बात करना या उसका समर्थन करना। (२) खुशामद या चापलूसी करना। उ,- स्वारथ मानि लेत रति करिकै बोलत हाँ जी हाँ जी- पृ. ३२३। हाँ नाहीं न करना - (१) न स्वीकार करना, न अस्वीकार ही; कोई उत्तर न देकर मौन रहना। उ.-हाँ नाहीं नहीं कहत हौ, मेरी सौं काहै-ना. ३१०५। (२) स्पष्ट उत्तर न देकर टाल देना। हाँ हाँ करना- (१) स्वीकृति या सहमतिसूचक शब्द कहना। (२) बात न काटना। (३) खुशामद या चापलूसी करना।

हाँ
वह शब्द जिसके द्वारा किसी बात का अंशतः माना जाना सूचित हो।
प्रव्य.
(सं. आम्)

हाँ
यहाँ।
प्रव्य.
(सं. आम्)

हाँक
जोर से पुकारने का शब्द।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हुंकार)
मुहा.- हाँक देना, मारना या लगाना-जोर से पुकारना या बुलाना। हाँक दई-जोर से पुकारा या बुलाया। उ.-हार-चीर लै चले पराई। हाँक दई कहि नंद-दुहाई-७९९। दै दै हाँक-जोर से चिल्ला कर, कूक देकर या आवाज लगा कर। उ.- ग्वाल सखा सँग लीन्हें डोलत, दै दै हाँक जहाँ तहँ धावत- ना. २०५२। हाँक-पुकार कर कहना-निर्भय और निसंकोच रूप से सबको सुनाकर कहना। हाँक पड़ना या होना-पुकार या बुलाहट होना। हाँक परी-पुकार या बुलाहट हुई। उ.- भोर भयौ दधि-मथन होत सब ग्वालि-सखनि की हाँक परी-४०४।

हाँक
युद्ध में दपट, ललकार या हुंकार।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हुंकार)
उ.- (क) हाँकत हरि हाँक देत गरजत ज्यौं ऎंठे-१-२३। (ख) हाँक दै तुरत गज कौ हँकारे-ना. २६७२।

हाँकना, हाँकनो
पंखे से हवा करना, पंखा झलना।
क्रि.स.
(हिं. हाँक + ना)

हाँका
जंगली पशु को तीन ओर से घेर कर शोर करते हुए ऎसे स्थान पर लाना जहाँ से वह शिकारी का लक्ष्य बन सके।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाँकना)

हाँकि
पशुओं को आगे बढ़ाकर या इधर-उधर हटाकर।
क्रि.स.
(हिं. हाँकना)
उ.-(क) न्यारौ जूथ हाँकि ले अपनौ-१०-२१६। (ख) कोउ हाँकि सुरभि-गन जोरि चलावत-४३१।

हाँकि
हाँका।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाँका)

हाँकौ
(यान, रथ आदि) चलाया।
क्रि.स.
(हिं. हाँकना)
उ.- अर्जुन कौ रथ हाँकौ-१-११३।

हाँकौ
पशुओं को आगे बढ़ाओ।
क्रि.स.
(हिं. हाँकना)
उ.- संध्या कौ आगम भयौ, ब्रज-तन हाँकौ फेरि-४३७।

हाँक्यो, हाँक्यौ
(यान आदि) चलाया।
क्रि.स.
(हिं. हाँकना)
उ.-(क) आतुर रथ हाँक्यो मधुबन कौ- ना. ३६११। (ख) हँसत हँसत रथ हाँक्यौ-२५४६।

हाँगर
शार्क' मछली।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

हाँगा
ताकत, बल।
संज्ञा
पुं.
(सं. अंग)
मुहा.- हाँगा छूटना-हिम्मत न रहना।

हाँगा
जबरदस्ती, धींगाधींगी।
संज्ञा
पुं.
(सं. अंग)

सैंधवपति, सैंधवपती
सिंधवासियों का राजा जयद्रथ।
संज्ञा
पुं.
(सं. सैधव+ पति )

सैंधवी
एक रागिनी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

सैंधू
एक रागिनी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सैंधवी)

सैंयाँ
पति।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वामी)

सैंवर
राजपूताने की एक भील।
संज्ञा
पुं.
(हिं. साँवर)

सैंवर
इस झील के पानी से बननेवाला नमक।
संज्ञा
पुं.
(हिं. साँवर)

सैंवर
एक प्रकार का हिरन।
संज्ञा
पुं.
(हिं. साँवर)

सैंहथी
शक्ति (अस्त्र)।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सैंथी)

सैंहल
सिंहल का, सिंहली।
वि.
(सं.)

सैंहिक
(सिंहिका-पुत्र) राहु।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हॉतना
तोड़ डालना, भंग करना।
क्रि.स.
(हिं. हतना)

हॉंता
छोड़ा या त्याग किया हुआ।
वि.
(सं. हात = छोड़ा हुआ)

हॉंता
दूर किया या हटाया हुआ।
वि.
(सं. हात = छोड़ा हुआ)

हाँपना, हाँपनो, हाँफना, हाँफनो
मेहनत करने दौड़ने आदि से जोर-जोर और जल्दी-जल्दी साँस लेना।
क्रि.अ.
(अनु.)

हाँफा
हाँफने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाँफना)

हाँफी
हाँफने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हाँफना)

हाँस
हँसी, हास।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हँसी)

हाँसना, हाँसनो
प्रसन्नता से खिलखिलाना।
क्रि.अ.
(हिं. हँसना)

हाँसना, हाँसनो
परिहास करना।
क्रि.अ.
(हिं. हँसना)

हाँसना, हाँसनो
किसी की हँसी या उपहास करना।
क्रि.स.

हाँगी
हामी, स्वीकृति।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हाँ)
मुहा.- हाँगी भरना-मानना, स्वीकार करना।

हाँड़ना
आवारा घूमना।
क्रि.अ.
(सं. भण्डन)

हाँड़ना
व्यथ इधर-उधर घूमनेवाला, आवारा।
वि.

हाँडी, हाँड़ी
बटलोई या देगची की तरह का मिट्टी का छोटा बरतन।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हंडा)
मुहा.- हाँडी उबलना-खुशी से फूलना या इत राना। हाँडी पकना-(१) बकवाद होना। (२) कुचक्र या षडयंत्र रचा जाना। हाँड़ी चढ़ना-कोई चीज पकना। किसी के नाम पर हाँड़ी फ़ोड़ना-किसी के चले जाने पर प्रसन्न होना। काठ की हाँडी-ऎसा छल जो बार बार न चल सके।

हाँडी, हाँड़ी
इसी आकार का शीशे का पात्र जिसमें शोभा के लिए मोमबत्ती जलायी जाती है।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हंडा)

हॉतना
अलग करना।
क्रि.स.
(सं. हात)

हॉतना
दूर करना, हटाना।
क्रि.स.
(सं. हात)

हॉतना
मार डालना।
क्रि.स.
(हिं. हतना)

हॉतना
मारना-पीटना।
क्रि.स.
(हिं. हतना)

हॉतना
पालन न करना, न मानना।
क्रि.स.
(हिं. हतना)

हाँसल
एक तरह का घोड़ा।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

हाँसी
हँसने की क्रिया या भाव, हँसी, हास।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हास)
उ.-(क) दुख अरु हाँसी सुनौ सखी री, कान्ह अचानक आए-७९४। (ख) सूर स्याम कौ यहै परेखौ, इक दुख दूजे हाँसी-ना. ४६६१।

हाँसी
दिल्लगी, मजाक, हँसी-ठट्ठा, परिहास।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हास)
उ.- (क) हाँसी मैं कोउ नाम उचारै-६-४। (ख) पठै देहु मेरे लाल लड़ैतैं बारौं ऎसी हॉसी-ना. ३७९७। (ग) प्रान हमारे घात होत हैं तुम्हरे भाऎं हाँसी- ना. ४२२५। (घ) हमरौ प्रान घात ह्वै निसरैं तुम्हरे जानैं हाँसी-ना. १९७। (परि.)। (ङ) सूरदास प्रभु बेगि मिलहु अब पिसुन करत सब हाँसी- ना. ४७६५।

हाँसी
उपहास, निंदा।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हास)
उ.- (क) यह तौ कथा चलैगी आगैं, सब पतितनि मैं हाँसी-१-१९२। (ख) ऐसी बातैं बहुतै कहि कहि लोग करत हैं हाँसी- ना. ३९९३। (ग) हाँसी होन लगी है ब्रज मैं जोगहिं राखौ गोई-ना. ४१६०। (घ) देस देस भयौ रहस सूर प्रभु जरासंध सिसुपाल की हाँसी-ना. ४८०२।

हाँसुल
एक तरह का घोड़ा।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

हाँ हाँ
स्वीकृति, समर्थन या सहमति सूचक शब्द।
अव्य.
(हिं. हाँ + हाँ)

हाँ हाँ
मना करने या रोकने अथवा निषेध या वारण करने का शब्द।
अव्य.
(हिं. हैं !)

हा
शोक या दुखसूचक शब्द।
अव्य.
(सं.)
उ.- हा करुनामय कुंजर टेरयौ, रह्यौ नहीं बल थाक्यौ-१-११३।

हा
भयसूचक शब्द।
अव्य.
(सं.)
उ.- जारत है मोहिं चक्र सुदरसन हा प्रभु लेहु बचाई-९-७।

हा
आश्चर्य या प्रसन्नतासूचक शब्द।
अव्य.
(सं.)

हाजिर, जवाब
हर बात का तुरंत और उचित उत्तर देनेवाला।
वि.
(अ. हाजिर + जवाब)

हाजिरजवाबी
चट-पट उपयुक्त उत्तर देने की निपुणता।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हाजिर + जवाबी)

हाजिरी
उपस्थिति।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हाजी
वह जो हज कर आया हो।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हाट
दूकान।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हट्ट)

हाट
बाजार।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हट्ट)
उ.- भक्तनि हाट बैठि अस्थिर ह्वै हरि-नग निर्मल लेहि-१-३१०।
मुहा.- हाट करना- (१) दूकान लगाकर बैठना (२) सौदा लेने के लिए बाजार जाना। हाट की बेचन हारि (बेचनहारी)-हाट बाजार में सामान बेचनेवाली जिसे अपनी मान-मर्यादा का अधिक ध्यान न हो। उ.-ब्रज की ढीठी गुवारि, हाट की बेचनहारि, सकुचै न देत गारि झगरत हूँ-१०-२९५। हाट-बाजार करना-खरीदारी करना। हाट खोलना-(१) दूकान खोलना। (२) सौदा सामने रखना, दूकान लगाना। हाट लगना-बाजार में दूकानें लगना। हाट चढ़ना-बाजार में बिकने के लिए आना। हाट का दिन-(स्थान-विशेष में) जिस दिन बाजार लगता हो।

हाटक
सोना धातु, स्वर्ण।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- (क) किंकिनी कलित कटि हाटक रतन जटि-१०-१५१। (ख) फाटक दैकै हाटक माँगत भोरौ निपट सुधारी-३३४०।

हाटकपुर
सोने की लंका।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हाटकपुरी
सोने की लंका।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हाटकलोचन
हिरण्याक्ष दैत्य।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हा
मारन या हनन करनेवाला।
संज्ञा
पुं.

हाइ
शोक, दुख, पीड़ा आदि का सूचक शब्द।
अव्य.
(हिं. हाय)
उ.- भवन न भावै माई, आँगन न रह्यौ जाइ, करै हाइ हाइ देखौ जैसो हाल करयौ है-८७२।

हाइल
तीव्र इच्छा या उत्कट लालसा रखनेवाला।
वि.
(हिं. हाही = तीव्र इच्छा)

हाइल
चारों ओर से घिरा या बँघा हुआ।
वि.
(अ. हायल)

हाई
दशा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. घात)

हाई
घात, ढंग, ढब।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. घात)
उ.-ऊधौ दीनी प्रीति दिनाई। बातनि सुहृद, करम कपटी के, चले चोर की हाई।

हाऊ
बच्चों को डराने के लिए कल्पित भयानक चीज।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हौआ)
उ.- खेलन दूरि जात किन कान्हा। आज सुन्यौ बन हाऊ आयो तुम नहिं जानत नान्हा।¨¨¨¨¨। तब हँसि बोले कान्हा, मैया, कौन पठाए हाऊँ-१०-२२१।

हाकल
एक छद।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हाकलिका
एक वर्णवृत्त।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हाकली
सारवती' छंद का एक नाम।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हाकिम
शासक।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हाकिम
बड़ा अधिकारी या अफसर।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हाकिमी
हाकिम-संबंधी।
वि.
(अ. हाकिम)

हाकिमी
शासन, प्रभुत्व।
संज्ञा
स्त्री.

हाजत
जरुरत।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हाजत
चाह।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हाजत
पहरे के भीतर रखा जाना।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)
मुहा.- हाजत में देना या रखना-हवालात में रखना।

हाजमा
भोजन पचने की क्रिया या पचाने की शक्ति।
संज्ञा
पुं.
(अ. हाजमा)
मुहा.- हाजमा बिगड़ना-अन्न न पचना।

हाजिर
उपस्थित, विद्यमान।
वि.
(अ. हाजिर)

हाजिर
तैयार, प्रस्तुत।
वि.
(अ. हाजिर)

हाटकीय
सोने का बना हुआ।
वि.
(सं.)

हाड़
हड्डी, अस्थि।
संज्ञा
पुं.
(सं. हड्ड)
उ.-रिषि दधीचि हाड़ लै दान।¨¨¨¨¨¨¨। लिए हाड़ कियौ बज्र बनाइ-६-५।

हाड़
वंश की मर्यादा, कुलीनता।
संज्ञा
पुं.
(सं. हड्ड)

हाड़ना
तराजू का धड़ा करना, तराजू के दोनों पलड़े बराबर करना।
क्रि.स.
(सं. हरण)

हाड़ना
व्यर्थ इधर-उधर घूमना।
क्रि.स.

हाड़ा
क्षत्रियों की एक शाखा।
संज्ञा
पुं.

हात
छोड़ा या त्यागा हुआ।
वि.
(सं.)

हातव्य
छोड़ने योग्य, त्याज्य।
वि.
(सं.)

हातनि
घात या चाल से।
संज्ञा
पुं.सवि.
(हिं. धात)
उ.- बालि जीति जिन बलि बंधन किये लुब्धक कैसी हातनि (पाठा. की सी घातनि) -ना. ४१६७।

हाता
धेरा हुआ स्थान।
संज्ञा
पुं.
(हिं. अहाता)

हाता
प्रांत, प्रदेश।
संज्ञा
पुं.
(हिं. अहाता)

हाता
हद, सीमा।
संज्ञा
पुं.
(हिं. अहाता)

हाता
अलग या दूर किया हुआ।
वि.
(सं. हात)

हाता
बरबाद, नष्ट।
वि.
(सं. हात)

हाता
वध करनेवाला।
संज्ञा
पुं.
(सं. हता)

हातिम
चतुर, निपुण।
वि.
(अ.)

हातिम
पक्का, उस्ताद।
वि.
(अ.)

हातिम
बड़ा दानी।
वि.
(अ.)

हातिम
एक प्राचीन अरब सरदार जो बड़ा दानी और परोपकारी था।
संज्ञा
पुं.

हातु
मौत, मृत्यु।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हातो, हातौ
अलग या दूर किया हुआ, हटाया हुआ।
वि.
(सं. हात, हिं. हाता)
उ.-(क) छीरोदक धूँधट हातौ करि सन्मुख दियौ उधारि-ना. २७३६ (ख) कतहिं बकत है काम-काज बिनु, होहि न हथाँ तैं हातौ-ना. ४३२४।

हातो, हातौ
बरबाद, नष्ट।
वि.
(सं. हात, हिं. हाता)
उ.-तब नहिं निमिष बियोग सहत उर, करत काम नहिं हातौ-ना. ४५५१।

हातो, हातौ
हितू, शुभचिंतक।
वि.
(हिं. हितू)
उ.-बाहर हेत हातो (पाठा. हितू) कहवावत, भीतर काज सयाने- ना. ४६२६।

हाथ
कर, हस्त।
संज्ञा
पुं.
(सं. हस्त, प्रा. हत्थ)
उ.-(क) कुंज भवन कुसुमन की सेज्या अपने हाथ निवारत पात-१८९३। (ख) हृदय सिंगी, टेर मुरली, नैन खप्पर हाथ-ना. ४३१२।
मुहा.- हाथ आना (में आना) (१) मिलना, प्राप्त होना। (२) अधिकार या वश में आना। हाथ कछू नहिं आयौ-कुछ मिल न सका, प्राप्त नहीं हुआ। उ.-चाखन लाग्यौ, रुई उड़ि, हाथ कछू नहिं आयौ-। काहूँ हाथ न आवै-किसी के वश या अधिकार में नहीं आता। उ.- सूर स्याम अति करत अचगरी, कैसैंहुँ काहू हाथ न आवै-ना.। (किसी को) हाथ उठाना-सलाम या प्रणाम करना। (किसी पर) हाथ उठना-किसी को मारन-पीटने को तैयार होना। (किसी पर) हाथ उठाना-किसी को मारना-पीटना। हाथ उठाकर देना - अपनी खुशी से देना। हाथ उठाकर कोसना - किसी के अनिष्ट की ईश्वर से प्रार्थना करना। हाथ उठाकर कहना - ईश्वर को साक्षी करके प्रण करना। हाथ उतरना- (१) हाथ की हड्डी उखड़ जाना। (२) हाथ में पहले जैसी कारीगरी या कार्य-क्षमता न रह जाना। हाथ ऊँचा होना- (१) दान करने को प्रवृत्त होना। (२) देने या खर्च करने योग्य होना। हाथ छोड़ना- हाथ फैलाना, लेना, माँगना, याचना करना। हाथ कट जाना- (१) साघन या सहायक के अभाव से कुछ करने लायक न रह जाना। (२) प्रतिज्ञा, वचन आदि से बद्ध होने के कारण कुछ करने को स्वच्छंद न रह जाना। हाथ कटा देना- (१) साधन या सहायक खो कर अपने को कुछ कर सकने योग्य न रखना। (२) वचन, प्रतिज्ञा आदि करके अपने को कुछ कर सकने को स्वच्छंद न रखना। हाथ करना- वार या प्रहार करना। हाथ का झूठा- चोर, बेईमान। हाथ का दिया- (खुशी से) दिया। हुआ, प्रदत्त। हाथ का सच्चा- (१) ईमानदार। (२) ऐसा वार करनेवाला जो खाली न जाय। (३) ऐसा काम करनेवाला जिसमें भूल-चूक न हो। हाथ का (की) मैल- बराबर हाथ में आता-जाता रहनेवाला, ऐसी तुच्छ या साधारण चीज जिसके जाने का जरा भी दुख करना उचित न हो। किसी के हाथ की चिट्ठी या पुरजा- स्वयं उसी का लिखा हुआ अर्थात् प्रामाणिक लेख। हाथ की लकीर- (१) हथेली, में पड़ी हुई रेखाएँ जिनका शुभाशुभ फल भोगना ही पड़ता है। (२) किस्मत, भाग्य। हाथ के तले (नीचे) आना- इस प्रकार काबू या वश में आना कि मनचाहा कराया जा सके। हाथ खाली जाना- (१) वार चूकना, प्रहार या लक्ष्य ठीक न होना। (२) चाल या युक्ति सफल न होना। खाली हाथ- बिना कुछ लिये। हाथ खाली होना- पास में रूपया-पैसा न होना। (किसी स्त्री के) हाथ खाली होना- (१) हाथ में चूड़ियाँ न होने से स्त्री का विधवा होना। (२) हाथ में कोई भी गहना न होना। (स्त्री के) हाथ खाली लगना- हाथ में बहुत ही हलका गहना या चूड़ी होना। (स्त्री के) खाली-खाली हाथ- हाथ में कोई भी गहना न होना। हाथ खाली न होना- फुरसत न होना, काम में फँसा होना। (स्त्री के) हाथ खाली न होना- हाथ में अच्छे खासे या काफी गहने पहने होना। हाथ खुजलाना- (१) मारने को जी करना। (२) (कुछ धन आदि) मिलने या प्राप्त होने के लक्षण दिखायी देना। हाथ खींचना- (१) कोई काम करते-करते उससे अलग हो जाना। (२) खर्च आदि देते-देने बंद कर देना। हाथ खुलना- (१) देने या दान में प्रवृत्त होना। (२) खूब खर्च करना। हाथ खोलना- (१) बहुत देना या दान करना। (२) खूब खर्च करना। (किसी का) हाथ गरम करना- (१) किसी प्रकार की आर्थिक प्राप्ति कराना। (२) किसी को घूस आदि देना। (किसी का) हाथ गरम होना- (१) किसी प्रकार की आर्थिक प्राप्ति होना। (२) खूब घूस मिलना। (किसी का) हाथ चढ़ना या चढ़ा होना- विशेष कार्य क्षमता या कौशल होना। (किसी के) हाथ चढ़ना- (१) मिलना, प्राप्त होना। (२) वश या अधिकार में होना। हाथ चलना-(१) गति या कौशल से काम होना। (२) मारने के लिए हाथ उठना। हाथ चलाए-हाथ से प्रहार किया। उ.-सौयौ हुतौ असुर तरु छाया। हलधर कौं देख्यौ तिन आए। हाथ दोऊ बल करि जु चलाए-४९९। हाथ चलाना- (१) गति या कौशल से काम करना। (२) मारने के लिए सैयार होना। (३) किसी वस्तु को छूने या लेने के लिए हाथ बढ़ाना। हाथ चूमना-किसी की करीगरी या कला-निपुणता पर इतना मुग्ध होना कि उसके हाथ को प्यार करने को ललक उठना। हाथ का चालाक-(१) फुर्ती से दूसरे की चीज उड़ा लेनेवाला। (२) किसी काम में हाथ की सफाई या कारीगरी दिखानेवाला। हाथ की चालाकी-(१) फुर्ती से दूसरे की चीज उड़ा लेने का कौशल। (२) किसी काम में हाथ की सफाई, कारीगरी या कौशल। हाथ चाटना- (१) सब कुछ खाकर भी तृप्‍त न होना। (२) बहुत स्वादिष्ट लगना। हाथ छोड़ना- (कोई काम किसी को) सौंपना। (किसी पर) हाथ छोड़ना-मारना, प्रहार करना। हाथ जड़ना-थप्पड़ मारना। (किसी को) हाथ जोड़ना-प्रणाम या नमस्कार करना। (२) (कृपा के लिए) अनुनय-विनय करना। (३) (ईश्वर या देवी-देवता) की बिनती या प्रार्थना करना। (४) दूर रहने का निश्चय करना। दूर से हाथ जोड़ना-बिलकुल दूर या अलग रहना किसी प्रकार का भी संबंध न रखना। हाथ जोड़े रहना-सेवक या दास-भाव से विनीत या नम्र रहना। रहत हाथ जोरैं-दास या सेवक की तरह नम्र या विनीत बना रहता है। उ.- प्रात जो न्हात, अघ जात ताके सकल, ताहि जमहूँ रहत हाथ जोरैं-१-२२२। हाथ जूठा होना- मुँह का स्पर्श होने से हाथ का अपवित्र हो जाना। (किसी काम में) हाथ जमना-ऎसा अभ्यास होना कि हाथ ठीक-ठीक चला करे। हाथ झाड़ना-खूब मारना, प्रहार करना। हाथ झुलाते आना-खाली हाथ आना। हाथ झाड़ देना- (१) मार बैठना। (२) कह देना कि कुछ भी पास नहीं है। हाथ झाड़ कर खड़े हो जाना-। (१) कह देना कि कुछ भी पास नहीं है। (२) बिलकुल अलग हो जाना। हाथ टेकना-लहारा देना। हाथ डालना- (१) कोई काम करना, काम में योग देना। (२) दखल देना, हस्तक्षेप करना। हाथ तंग होना- पास में कुछ न होना। हाथ तकना-दूसरे के देने के सहारे होना, दूसरे से सहारा चाहना। हाथ थिरकना-हाथ का हिलना या मटकना। हाथ थिरकाना-(बोलने में या नृत्य करते समय) हाथ मटकाना या हिलाना-डोलाना। हाथ दिखाना- (१) भावी शुभाशुभ जानने के लिए सामुद्रिक जाननेवाले से हस्तरेखाओं का विचार कराना (२) वैद्य को नाड़ी दिखाना। (३) धन आदि से रहित होने का संकेत करना। (४) हाथ से किसी बात का संकेत करना। हाथ दिलाना या दिवाना-(१) दूसरे से पिटवा देना। (२) भूत-प्रेत की बाधा शांत करने या वजर झड़वाने के लिए सयाने से हाथ फिरवाना। हाथ दिखावति डोलति-भूत-प्रेत की बाधा दूर करने या नजर झड़वाने के लिए सयानों या बूढ़ों से हाथ फिरवाती है। उ.-घर-घर हाथ दिवावति डोलति गोद लिए गोपाल बिनानी- १०-२५८। हाथ देखना- (१) सामुद्रिक का शुभाशुभ विचार करना। (२) वैद्य का नाड़ी देखना। (किसी के) हाथ देना-मारना-पीटना। (किसी को) हाथ देना-(१) सहारा देना, सहायक होना। (२) कार्य में सहयोग देने के लिए हाथ मिला कर समझौता करना या एक प्रकार से वचनबद्ध होना। (३) गुप्त रूप से सौदा तै करना। (४) हाथ के संकेत से रोकना या मना करना। (५) बाजी लगाना। हाथ देना-(१) हाथ के झोंके से दिया बुझाना। (२) भूत प्रेत की बाधा पर विचार करना। (किसी का) हाथ धरना- (१) कोई काम करने या अधिक देने से रोकना या मना करना। (२) किसी को सहारा देना। (३) सहारा या आश्रय देना। (४) किसी चलते हुए कार्य को रोकने पर विवश होना। हाथ पर गंगाजली धरना या रखना- गंगा की शपथ खिलाना। हाथ पर गंगाजली उठाना या लेना-गंगा की शपथ खाना। हाथ पर नाग खिलाना प्राण संकट में डालना। हाथ पर हाथ धरे या रखकर बैठे रहना-कुछ काम-धंधा ना करके खाली बैठे रहना। हाथ पर हाथ धरकर या रखकर बैठ जाना-निराश होकर काम छोड़ बैठना। हाथ पर हाथ मारना- (१) बाजी लगना, शर्त बदना। (२) किसी बात को पक्का करना। (किसी के आगे) हाथ पसारना या फैलाना-किसी से माँगने या कुछ लेने के लिए हाथ बढ़ाना। हाथ पसारे-माँगने या याचना करने के लिए हाथ फैलाये। उ.- तष्ना हाथ पसारे निसि दिन पेट भरे पर सोऊ-१-१८६। हाथ पसारे जाना-खाली हाथ जाना, परलोक में कुछ साथ न ले जाना। हाथ-पाँव (पैर) चलना-काम करने की सामर्थ्य, शक्ति या क्षमता होना। हाथ-पाँव (पैर) चलाना-काम-धंधा करना। (२) यत्न करना। हाथ-पाँव (पैर) जोड़ना-बहुत गिड़गिड़ाना, अनुनय-विनय करना। हाथ-पाँव (पैर) टूटना- (१) अंग-भंग होना। (२) शरीर में पीड़ा होना। हाथ-पाँव (पैर) ठंढे होना-(१) शरीर में गर्मी न रह जाना, मरणासन्न होना। (२) भय, आशंक आदि से ठक या स्तब्ध हो जाना। हाथ-पाँव (पैर) तोड़ना- (१) अंग-भंग कर लेना। (२) बहुत मारना पीटना। हाथ-पाँव (पैर) निकलना-सामान्य शरीर का मोटा-ताजा या लंबा हो जाना। हाथ-पाँव (पैर) निकालना- (१) नटखटी या शरारत करने लगना। (२) छेड़छाड़ करना (३) सीमा का अतिक्रमण करना। हाथ-पाँव (पैर) फूलना-डर या भय से इतना घबरा जाना कि कुछ कर न सके। हाथ-पाँव (पैर) बचाकर काम करना- इस प्रकार काम करना कि अपने को किसी तरह की हानि न पहुँचे। हाथ-पाँव (पैर) पटकना- (१) जी जान से कोशिश करना। (२) बहुत छटपटाना। (३) तैरने के लिए हाथ-पैर चलाना। हाथ-पाँव (पैर) मारना या हिलाना- (१) तैरने के लिए हाथ-पैर चलाना। (२) बहुत कोशिश या प्रयत्न करना। (३) दुख या पीड़ा से छटपटाना या तड़पना। (४) मेहनत या परिश्रम करना। हाथ-पाँव (पैर) से छटना-सहज में और सकुशल (स्त्रीका) प्रसव होना। हाथ-पाँव (पैर) हारना- (१) हिम्मत या साहस छोड़ना। (२) निराश होना। हाथ-पाँव (पैर) पीले पड़ना- इतना दुर्बल हो जाना कि शरीर में बहुत कम रक्‍त रह जाय। हाथ पीले करना- (विवाह के समय हलदी लगाने की रीति करके) कन्या का विवाह करना। (२) किसी प्रकार की तंगी या परेशानी से कन्या का विवाह कर पाना। हाथ-पाँव (पैर) फेंकना-बहुत कोशिश या मेहनत करना। हाथ फेंकना- (१) मारने क्रो हाथ चलाना। (२) वार या प्रहार करना। हाथ फेरना- प्यार से शरीर सहलाना। (किसी वस्तु पर) हाथ फेरना-सफाई या चालाकी से वह वस्तु उड़ा लेना या गयब कर देना। हाथ बँटाना-सहयोग देना। हाथ फैलना- (१) माँगने को हाथ बढ़ना। (२) लेने को हाथ बढ़ना। हाथ फैलाना-(२) माँगने को हाथ बढ़ाना। (किसी काम में) हाथ बँटाना-शामिल या सम्मिलित होना। हाथ बंद होना- (१) पास में रुपया-पैसा न होना। (२) रुपया-पैसा देने का क्रम रोकना। हाथ बढ़ाना- (१) कुछ लेने को हाथ फैलाना। (२) कुछ माँगने को हाथ फैलाना। (३) हद से बाहर जाना। हाथ बाँधकर खड़ा होना। (१) हाथ जोड़कर खड़ा होना। (२) सेवा में उपस्थित रहना। (३) कोई काम न करके खाली खड़े रहना। (किसी के आगे) हाथ बाँधे खड़े रहना-सेवा में पस्थित रहना। (किसी के) हाथ बिकना- (१) किसी को मोल ले कर दिया जाना। (२) उसके वश या अधिकार में होना। (किसी व्यक्ति का किसी के) हाथ बिकना- (१) किसी का खरीदा गुलाम या दास होना। (२) किसी के बिलकुल अधीन होना। उन हाथ बिकानी-उनके हाथ बिक गयी, उनके अधीन हो गयी, उनके वश या अधिकार में हो गयी। उ.- मैं उन तन उन मो तन चितयो, तब हीं तैं उन हाथ बिकानी- ना. २००३०। हाथ बिकानौ- किसी के वश या अधिकार में अथवा अधिन हो गया या है। उ.- (क) तदपि सूर मैं भक्तबछल हैं, भक्तनि हाथ बिकानौ-१-२४३। (ख) सूरदास भगवंत भजन बिनु जम कैं हाथ बिकानौ-१९-३२९। किसी के हाथ बेचना-मूल्य लेकर देना। (किसी काम में) हाथ बैठना-ऎसा अभ्यास होना कि हाथ बराबर ठीक तरह से काम करे। (किसी पर) हाथ बैठना- (१) जोर का थप्पड़ लगना। (२) वार खाली न जाना। हाथ भर आना-काम करते-करते हाथ का थक जाना। हाथ भरना-हाथ में रंग या महावर लगना। (किसी के) हाथ भरे होना- खाली या बेकार न होना, काम में व्यस्त होना। (स्त्री के) हाथ भरे होना- (१) स्त्री का हाथ में चूड़ी पहने रहने से सौभाग्यवती होना। (२) स्त्री के हाथ में कई या (हाथ के) सब गहने होना। किसी के हाथ भेजना-किसी के द्वारा भेजना। हाथ मँजना-अभ्यास होना। हाथ माँजना-निरंतर अभ्यास करना। हाथ मलना- (१) भूल-चूल होने पर पछताना। (२) निराश या दुखी होना। हाथ मारना- (१) बात पक्की करना। (२) बाजी लगाना। (३) (होड़ या स्पर्धा आदि में) आगे बढ़ जाना या जीत जाना। (किसी वस्तु पर) हाथ मारना- (१) बेईमानी से ले लेना। (२) सफाई से उड़ा देना गायब करना (भोजन पर) हाथ मारना-खुब डट कर खाना। हाथ मारे जात-(होड़ या स्पर्धा में) आगे बढ़ा या जीता जाता है। उ.- मेरी जोरी है श्रीदामा, हाथ मारे जात-१०-२१३। हाथ मिलाना-(१) भेंट होने पर सप्रेम या सहर्ष हाथ में हाथ लेना। (२) पंजा लड़ाना। (३) संपर्क या संबंध स्थापित करना। (४) सौदा पटाना। (५) एकमत होना। हाथ मींजना या मींड़ना- (१) भूल चूक होने पर पछताना। (२) निराश या दुखी होना। मींड़त हाथ-दुख या निराशा प्रगट करता है, या करते हैं। उ.- मींड़त हाथ, सीस धुनि ढोरत, रुदन करत नृप पारथ-१-२८७। हाथ में करना- (१) वश में या अधिन करना। (२) ले लेना, प्राप्त करना। (मन) हाथ में करना-प्रेम में फँसाना, लुभाना, मुग्ध या मोहित करना। हाथ में गंगाजली देना-गंगा की शपथ खाने को कहना या खिलाना। हाथ में गंगाजली लेना-गंगा की शपथ खाना या खाने को तैयार होना। हाथ में ठीकरा देना -भीख मँगवाना। हाथ में रा लेना-भीख माँगने लगना। हाथ में पड़ना- (१) मिलना, प्राप्त होना। (२) वश या आधिकार में होना। हाथ में लाना- (१) ले लेना, प्राप्त करना। (२) वश में या अधीन करना। हाथ में लेना-(१) ग्रहण या स्वीकार करना। (२) वश में या अधीन करना। (३) (काम) हाथ में लेना-काम का भार अपने ऊपर लेना, काम करने को सहमत होना। हाथ में हाथ देना- (१) कन्या का विवाह करना। (२) हेल-मेल कराना। हाथ में होना- (१) पास होना। (२) अपने वश में या अधीन होना। जीवन जाकैं हाथ (है)-जिसके हाथ में या जिसकी दया पर यह जीवन है। उ.- परम दयालु कृपालु है, (रे) जीवन जाकें हाथ-1-325। हाथ हाथ में गुन या हुनर होना- किसी बात में बहुत कुशल या निपुण होना। हाथ रँगना- (१) हाथ में मेंहदी रचाना। (२) किसी बुरे काम का कलंक अपने ऊपर लेना। (२) घूस या रिशवत लेना। (किसी के खून सै) हाथ रँगना-किसी का वध या हत्या करना। रँगे हाथ (हाथो) पाया जाना-कोई अपराध करते समय ही पूरे प्रमाण के साथ देख लिया जाना। हाथ रह जाना- (१) हाथ का सुन्न या गतिहीन हो जाना। (२) हाथ का थक जाना। (३) हाथ का रुक जाना। पचना या पचिबौ हाथ रहना-व्यर्थ परिश्रम करके हैरान होना ही मिलेगा, सारा परिश्रम नष्ट हो जायगा। हाथ रहैगी पचिबो-व्यर्थ परिश्रम करके हैरान होना पड़ेगा, सारा श्रम नष्ट हो जोयगा। उ.- अंतर गहत कनक-कामिनि कौं, हाथ रहैगो पचिबौ-१-५९। पछताना या पछतावा हाथ रहैगा -बहुत श्रम करने पर भी सफालना या यश न मिलकर पछताना ही होगा। हाथ रोकना- (१) किसी काम का करना बंद या स्थगित कर देना। (२) ठीक से या सामान्य गति से काम न करने देना। (३) स्वंयं किसी को मारने के लिए हाथ उठाकर ही रह जाना या रुक जाना। (४) खर्च करते समय आगापीछा सोचना, पूर्व गति से, अँधाधुंध खर्च न करके, सम्हालकर करना। (५) जो मारने की हाथ उठा रहा हो, उसे रोकना या मना करना। हाथ रोपना-माँगन के लिए हाथ बढ़ाना या फैलाना। हाथ लगना- (१) छू जाना। (२) शुरू होना। कोई वस्तु हाथ लगना- (१) कुछ मिलना या प्राप्त होना। (२) गणित करते समय वह संख्या जो पूर्व संख्या ले लेने पर बचतीं है, बाकी बचना। (किसी काम में) हाथ लगना-शुरु या आरंभ होना। (काम में किसी का) हाथ लगना- किसी के द्वारा किया जाना। (किसी वस्तु में) हाथ लगना- छू जाना। (किसी काम में) हाथ लगाना-(१) शुरु या आरंभ करना। (२) काम करने में योग या सहायता देना। (किसी वस्तु में) हाथ लगाना-छूना, स्पर्श करना। लगे हाथ (हाथों) -कोई काम करते समय या जैसे हीउसे पूरा कर लिया जाय वैसे ही;समाप्‍तप्राय कार्य के साथ-साथ। हाथ लगे टूटना-इतना कोमल या मुलायम होगा कि स्पर्श मात्र से टूट जाय। हाथ लगे मैला होना-इतना स्वच्छ होना कि केवल स्पर्श से मैला हो जाना हाथ सधंना-धीरे-धीरे अभ्यास हो जाना। हाथ साधना- (१) कोई काम करके यह देखना कि आगे भी वह या वसा ही कार्य हो सकता है या नही। (२) किसी कार्य में निपुण होने के लिए बार-बार अभ्यास करना। हाथ साफ करना-किसी कार्य में कुशल होने के लिए बार-बार अभ्यास करना। (किसी पर) हाथ साफ करना-किसी को मारना-पीटना। (किसी वस्तु पर) हाथ साफ करना- (१) बेइमानी से लेना। (२) हाथ की सफाई या फुर्ती दिखाकर गायब कर देना या उड़ा लेना। (भोजन पर) हाथ साफ करना-खूब डटकर खाना। (किसी के) सिर पर हाथ रखना- (१) किसी की रक्षा का भार लेना। किसी को आश्रय या शरण में लेना। (२) किसी को आशीवार्द देना।

(३) किसी की कसम खाना। (अपने) सिर पर हाथ रखना- अपनी कसम खाना। हाथ से-मारफत
द्वारा। हाथ से जाना या निकल जाना- (१) अपने पास न रहना। (२) वश में या अधीन न रह जाना। हाथ से हाथ मिलाना- अपने हाथ से किसी के हाथ में कुछ देना या रखना। हाथ हिलाते आना - (१) बिना कुछ लिये लौटना। (२) बिना कार्य सिद्ध किये हुए लौटना। हाथ (या हाथों)। में चाँद आना-मनचाही वस्तु मिलना। (स्त्री के) हाथ (या हाथों में) चाँद आना-पुत्र उत्पन्न होना। हाथ में रखना- बड़े लाड़-प्यार या आदर-सम्मान से रखना। हाथो-हाथ - (१) एक के हाथ से दूसरे के हाथ में
हर समय किसी न किसी के हाथ में। (२) एक के हाथ से दूसरे के
दूसरे से तीसरे के होते-होते। हाथों हाथ उड़ जाना- (१) एक के हाथ से दूसरे के और दूसरे से तीसरे के पहँचते-पहँचते गायब हो जाना। (२) बहुत जल्दी बिक जाना। हाथों-हाथ बिक जाना -बहुत जल्दी बिक जाना। हाथों-हाथ रहना-बहुत प्यार दुलार से रखा जाना। हाथों-हाथ लाना-बहुत आदर-सत्कार से लाना। हाथों हाथ लेना-बहुत आदर-सम्मान से स्वागत करना।"

हाथ
चौबीस अंगुल का एक मान।
संज्ञा
पुं.
(सं. हस्त, प्रा. हत्थ)
मुहा.- हाथ भर का कलेजा होना- (१) बहुत खुशी या प्रसन्नता होना। (२) बहुत उत्साह होना। (३) बहुत साहस की आवश्यकता होना।

हाथ
हाथ के खेलों में हर खिलाड़ी के खेलने की बारी या दाँव।
संज्ञा
पुं.
(सं. हस्त, प्रा. हत्थ)

हाथ
किसी कार्यालय आदि में काम करने बाले आदमी।
संज्ञा
पुं.
(सं. हस्त, प्रा. हत्थ)

हाथफूल
हथेली की पीठ पर पहनने का एक गहना।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथ + फूल)

हाथहिं
हाथ में।
संज्ञा
पुं.सवि.
(हिं. हाथ)
मुहा.- हाथहिं आए-पकड़ में आये हैं। उ.- निसि बासर मोहिं बहुत सताए अब हरि हाथहिं आए-१०-२९७।

हाथा
किसी औजार या हथियार का दस्ता या मूठ।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथ)

हाथा
पंजें की छाप जो मंगल या पूजन के अवसरों पर हलदी, ऎंपन आदि से दीवाल पर बनायी जाती है।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथ)
उ.-घर घर देतिं जुवतिजन हाथा- ना. १५१३।

हाथा
हाथ।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथ)
मुहा.- तुम्हरे हाथा-तुम्हारें ही हाथ में है तुम पर ही निर्भर है। उ.- हमरी पति सब तुम्हारे हाथा-७९९।

हाथापाई
वह लड़ाइ-भिड़ाइ जिसमें नोचने, खसोटने, थप्पड़ और ठोकर देने के लिए हाथ-पैर का खूब काम लिया जाय।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हाथ + पावँ)

हाथाहाथी
एक हाथ से दूसरे हाथ में, हाथोंहाथ।
अव्य.
(हिं. हाथ + हाथ)

हाथाहाथी
तुरंत।
अव्य.
(हिं. हाथ + हाथ)

हाथियाँ
हाथी।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथी)
उ.-(तब) धाइ धायौ अहि जगायौ, मनौ छूटे हाथियाँ-५७७।

हाथी
एक प्रसिद्ध चौपाया, गज, करि।
संज्ञा
पुं.
(सं. हस्तिन् ; हस्ती ; प्रा. हत्थी)
उ.- सुनत पुकार परग आतुर ह्वै, दौरि छुड़यौ हाथी-१-११२।
मुहा.- हाथी जैसा या सा-बहुत मोटा या स्थूल-काय। हाथी पर चढ़ना-बहुत धनी होना। हाथी बाँधना (१) बहुत अमीर होना। (२) ऎसे व्यक्ति को साथ लेना या ऎसा काम करना जिसके लिए बहुत अधिक व्यय करना पड़े। हाथी के संग गन्ने या गाँड़े खाना-किसी का अपने से इतने बड़े की बराबरी करने का दुस्साहस करना जिसके साथ किसी प्रकार की तुलना ही न हो।

हाथी
भीम के हाथी-भीमसेन के द्वारा आकाश में फेंके गये वे सात हाथी जिनके संबंध में प्रसिद्ध है कि वे आज तक वहीं चक्कर लगा रहे हैं।
पद.
उ.- अब मन भयौ भीम के हाथी, सुनियत अगम अपार- ना ४८७१।
कहा; हाथी का खाया कैथ- ऐसी वस्‍तु जो उपर से तो बिलकुल ठीक या सारपूर्ण जान पड़े, परन्‍तु वस्‍तुत: सार या तत्‍वहीन हो।

हाथी
शतरंज का एक मोहरा।
संज्ञा
पुं.
(सं. हस्तिन् ; हस्ती ; प्रा. हत्थी)

सैकतिक
भ्रम या संदेह में रहनेवाला।
वि.
(सं.)

सैकतिक
संन्यासी, क्षपणक।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सैकतिक
मंगलसूत्र या रक्षा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सैकती
रेतीला (तट)।
वि.
(सं. सैकतिन्)

सैकल
हथियारों आदि पर सान धरने का काम।
संज्ञा
पुं.
(अ. सैकल)

सैकलगर
हथियारों आदि पर सान धरनेवाला।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सैकल + फ़ा. गर)

सैथी
बरछी साँग, छोटा भाला।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शक्ति या हिं. सैहथी)

सैद
मुहम्मद साहब के नाती बुसेन के बंशजों की उपाधि।
संज्ञा
पुं.
(अ. सैयद)

सैद्धांतिक
सिद्धांत का ज्ञाता या पंडित।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सैद्धांतिक
तांत्रिक।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हाथी
हाथ का सहारा।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हाथ)

हाथीखाना
वह स्थान जहाँ हाथी पाले या बाँधे जाते हों।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथी + फ़ा. खाना )

हाथीदाँत
हाथी के मुँह के दोनों छोरों पर निकले हुए वे सफेद अवयव जिनसे कई चीजें बनायी जाती हैं।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथी + दाँत)

हाथीनाल
वह तोप जो हाथी की पीठ पर रखकर ले जायी या चलायी जाती थी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हाथी + नाल = तोप)

हाथीपाँव
एक रोग।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथी + पाँव)

हाथीवान
महावत।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाथी + वान)

हाथै
हाथ में।
संज्ञा
पुं.सवि.
(हिं. हाथ)
उ.- ज्यौं जानौ त्यौं करौ, दीन की बात सकल तब हाथै-१-११२।

हादसा
दुर्घटना, आपत्ति।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हान, हानि
न रह जाने का भाव, क्षय, नाश।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हानि)
उ.- मैं कीन्हीं बहु जिय की हानि-४-१२।

हान, हानि
टूटने-फूटने से होनेवाला क्षय।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हानि)

हान, हानि
वह अनुचित बात या आघात जिससे मान-मर्यादा आदि में कमी हो।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हानि)

हान, हानि
घाटा, टोटा, 'लाभ' का विप.।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हानि)
उ.- (क) लाभ-हानि कछु समुझत नाहीं-१-४६। (ख) और बनिज मैं नाहीं लाहा, होति मूल मैं हानि -१-३१०।

हान, हानि
नुकसान, आर्थिक क्षति।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हानि)
उ.-(क) अब लौं मैं करी कानि, सही दूध-दही हानि-१०-२७६। (ख) केतिक गोरस हानि, जा कौं करति है अपमान-३५०।

हान, हानि
अपूर्ण रहना, निष्फल होना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हानि)
उ.-तातैं भई जज्ञ की हान-४-५।

हान, हानि
न मिलना, न पाना, वंचित रहना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हानि)
उ.-अतिहिं अधीर नीर भरि आवत, सहत न दरसन हानि-ना. २९६७।

हान, हानि
स्वास्थ्य को पहुँचनेवाली खराबी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हानि)

हान, हानि
बुराई, अपकार।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हानि)
मुहा.- हानि उठाना-नुकसान सहना। हानि पहुँचना-नुकसान होना। हानि पहुँचाना-नुकसान करना।

हानिकर, हानिकरक, हानिकारी
जिससे नुकसान या हानि हो।
वि.
(सं. हानिकर)

हानिकर, हानिकरक, हानिकारी
अनिष्ट करने वाला।
वि.
(सं. हानिकर)

हानिकर, हानिकरक, हानिकारी
स्वास्थ्य बिगाड़नेवाला।
वि.
(सं. हानिकर)

हानी
हीन, रहित।
वि.
(सं. हीन)

हानी
हानि।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हानि)

हाफिज
रक्षक।
वि.
(अ. हाफ़िज)

हाफिज
वह (मुसलमान) जिसे कुरान कंठ हो।
संज्ञा
पुं.

हामी
हाँ' या स्वीकार करने का भाव, स्वीकृति।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हा)
मुहा.- हामी भरना- मंजूर या स्वीकार करना।

हामी
हिमायत करनेवाला।
वि.
(अ.)

हाय
शोक या दुखसूचक शब्द।
अव्य.
(सं. हा)

हाय
पीड़ा या कष्टसूचक शब्द।
अव्य.
(सं. हा)
मुहा.- हाय करना या मारना-(१) शोक से हाय-हाय करना। (२) दुख से कराहना।

हाय
कष्ट, पीड़ा, दुख।
संज्ञा
स्त्री.
मुहा.- (किसी की) हाय पड़ना-किसी सताये गये की हाय या दुरसीस का बुरा फल भुगतना।

हायन
साल, वर्ष।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हार
थकावट, शिथिलता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हारि)

हार
हानि, क्षति।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हारि)

हार
हार कर, हारता है।
क्रि.अ.
(हिं. हारना)
उ.- प्रबल माया ठग्यौ सब जग जनम जूआ हार-१-२९४।
मुहा.- हार कर- विवश या असमर्थ होकर।

हार
हड्डी, अस्थि, हाड़।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाड़)
उ.- छार सुगंध सेज पुहुपावलि हार छुवैं हिय हार जरैगौ-ना. ३९८६।

हार
(राज्य द्वारा) हरण।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हार
विरह, वियोग।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हार
गले में पहनने की मोतियों, फूलों आदि की माला।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- (क) मनि-गन-मुक्ता-हार-९-१२४। (ख) मानिक-मोती-हार रंग कौ- ना. २०९३। (ग) कंठ सुमाल हार मुकता के- ना. ४४३३।

हार
(अंकगणित में) भाजक।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हार
जंगल, वन।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

हार
मैदान।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

हायल
घायल, क्षत-विक्षत।
वि.
(सं. हात, प्रा. हाय, या सं. हत)

हायल
ढीला, शिथिल।
वि.
(सं. हात, प्रा. हाय, या सं. हत)

हायल
थका हुआ।
वि.
(सं. हात, प्रा. हाय, या सं. हत)

हायल
बहुत दुखी।
वि.
(सं. हात, प्रा. हाय, या सं. हत)

हायल
बीच में आड़ करनेवाला।
वि.
(अ.)

हाय-हाय
हाय।
अव्य.
(सं. हा)

हाय-हाय
शोक, दुख।
संज्ञा
स्त्री.

हाय-हाय
घबराहट।
संज्ञा
स्त्री.

हाया, हायो, हायौ
(किसी चीज के) लिए आतुर या व्याकुल।
अव्य.
(हिं. हाही)
उ.- मेल्यौ जाल काल जब खैंच्यो, भयौ मिन जल-हायौ-१-६७।

हार
पराजय, असफलता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हारि)
मुहा.- हार खाना- हारना, पराजित होना। हार देना-पराजित करना। हार मानना-अपनी पराजय स्वीकार करना। हार मानि कै-अपनी पराजय स्वीकार करके। उ.- कै प्रभु हार मानिकै बैठो, कै अब हीं निस्तारौ-१-१३९। मानै हार-पराजय माने या स्‍वीकार करे। उ.- तन-मन-धन-जोबन खसै (रे) तऊ न माने हार-१-३२५।

हार
खेत।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

हार
हरण करनेवाला।
वि.

हार
ले जाने या वहन करनेवाला।
वि.

हार
नाश करनेवाला, नाशक।
वि.

हार
दशा।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाल)

हार
परिस्थिति।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाल)

हार
वृत्तांत।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाल)

हार
विवरण।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाल)

हार
एक प्रत्यय जो कर्तत्व, स्वामित्व आदि का सूचक होता है।
प्रत्य.
(हिं. हारा)

हारक
हरण करनेवाला।
वि.
(सं.)

हारक
मन हरनेवाला।
वि.
(सं.)

हारक
जानेवाला।
वि.
(सं.)

हारक
चोर।
संज्ञा
पुं.

हारक
लुटेरा।
संज्ञा
पुं.

हारक
माला।
संज्ञा
पुं.

हारद
हृदय-संबंधी।
वि.
(सं. हार्दिक)

हारद
हृदय से निकला हुआ, सच्चा।
वि.
(सं. हार्दिक)

हारद
मन की बात।
संज्ञा
पुं.
(सं. हृदय)
उ.- मैं हरिभक्त नाम मम नारद। मोसौं कहि तू अपनौ हारद-४-९।

हारना, हारनो
विफल या पराजित होना।
क्रि.अ.
(हिं. हार + ना)

हारना, हारनो
थकना, शिथिल होना।
क्रि.अ.
(हिं. हार + ना)

हारना, हारनो
प्रयत्न में निराश या विफल होना।
क्रि.अ.
(हिं. हार + ना)

हारना, हारनो
(विफल या पराजित होकर धन या बाजी की) चीज जाने देना।
क्रि.स.

हारना, हारनो
खोना, गँवाना।
क्रि.स.

हारना, हारनो
छोड़ देना।
क्रि.स.

हारना, हारनो
दे देना।
क्रि.स.

हारयष्टि
हार की लड़ी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हारल
हारिल पक्षी।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

हारवार, हारवारा
जल्दी शीघ्रता।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हड़बड़ी)

हारवार, हारवारा
उतावली।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हड़बड़ी)

हारा
एक प्रत्यय जो कर्तत्व, स्वामित्व, धारण या संयोग आदि सुचित करता है।
प्रत्य.
(सं. धार = रखनेवाला ?)

हारा
हार, माला।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हार)

हारि
हार, पराजय, विफलता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)
उ.-(क) पूरे चीर अंत नहिं पायौ, दुरमति हारि लही-१-२३८। (ख) जीतैं जीति भक्त अपने कैं, हारैं हारि बिचारौं-१-२७१। (ग) चरन-कमल मन सनमुख राखौ, कहूँ न आवै हारि-७-३। (घ) लरें भई असुरनि की हारि-७-७।

हारि
कारवाँ, पथिक-समूह।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हारि
हरण करनेवाला।
वि.

हारि
मन हरनेवाला।
वि.

हारि
पराजित या विफल होकर।
क्रि.अ.
(हिं. हारना)
उ.-(क) संडामर्क रहे पचि हारि-७-२। (ख) तदपि सूर तरि सकीं न सोभा, रहीं प्रेम पचि हारि-६२८।
मुहा.- हारि मानि (कै)-पराजय या विफलता स्वीकार करके। उ.- (क) कै प्रभु हारि मानि कै बैठौ, कै करौ बिरद सही-१-१३७। (ख) सात दिवस जल बर्षि सिराने, हारि मानि मुख फेरो-९५९। (ग) हारि मानि हहरथो हरि चरननि, हरषि हिये अब हेतु करौ-९८९। (घ) हारि मानि कै रही मौन ह्वै-पृ. ३३२ (१६)। मानी हारि-पराजय स्वीकार कर ली। उ.-गिरी सुमार खेत बृंदाबन रन मानी नहिं हार- ना. ४२८०। हारि कै-लाचार या विवश होकर। उ.-हारि कै तब टेरि दीन्ही, पहुँचे गिरीधारी-१-१७६।

हारि
थके, शिथिल या क्लांत हुए।
क्रि.अ.
(हिं. हारना)
उ.- कहति रोहिनी, सोवन देहु न खेलत-दौरत हारि गए री-१०-२४७।

हारि
पराजित होकर बाजी या दाँव की चीज जाने देकर।
क्रि.स.
उ.- (क) हारि सकल भंडार-भूमि आपुन बनवास लहथौ-१-२४७। (ख) ज्यौं कुजुवारि रस बींधि, हारि गथ सोचतु पटकि चिती-१० उ.-२०३।

हारित
हरण किया या कराया हुआ।
वि.
(सं.)

हारित
लाया हुआ।
वि.
(सं.)

हारित
छीना हुआ।
वि.
(सं.)

हारित
खोया हुआ।
वि.
(सं.)

हारित
वंचित।
वि.
(सं.)

हारित
हारा हुआ।
वि.
(सं.)

हारित
मोहित, मुग्ध।
वि.
(सं.)

हारित
तोता, शुक।
संज्ञा
पुं.

हारित
एक वर्णवृत्त।
संज्ञा
पुं.

हारिल
एक पक्षी जो हर समय अपने चंगुल में कोई लकड़ी या तिनका लिये रहता है।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

हारिल
हारिल की लकरी-ऎसी वस्तु जिसे किसी भी स्थिति में छोड़ा न जाय।
पद.
उ.- हमरे हरि हारिल की लकरी-ना. ४६०६।

हारिल
हारा हुआ।
वि.
(हिं. हारना)

सै
सौ।
वि.
(सं. शत, प्रा. सय)

सै
सार, तत्व।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सत्व या फ़ा. शै = वस्तु)

सै
वीर्य।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सत्व या फ़ा. शै = वस्तु)

सै
बल, शक्ति।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सत्व या फ़ा. शै = वस्तु)

सै
बढ़ती, वृद्धि, लाभ।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सत्व या फ़ा. शै = वस्तु)

सैकत
रेतीला, बालुकामय।
वि.
(सं.)

सैकत
रेत या बालू का बना हुआ।
वि.
(सं.)

सैकत
बलुआ किनारा या तट।
संज्ञा
पुं.

सैकत
बलुई या रेतीली मिटटी।
संज्ञा
पुं.

सैकतिक
बालू या रेत संबंधी।
वि.
(सं.)

हारिल
थका हुआ।
वि.
(हिं. हारना)

हारी
हरण करनेवाला।
वि.
(सं. हारिन्)

हारी
ले कर चलनेवाला।
वि.
(सं. हारिन्)

हारी
चुराने या लूटनेवाला।
वि.
(सं. हारिन्)

हारी
दूर करने या हटानेवाला।
वि.
(सं. हारिन्)

हारी
नाश करनेवाला।
वि.
(सं. हारिन्)

हारी
वसूल करने या उगाहनेवाला।
वि.
(सं. हारिन्)

हारी
जीतनेवाला।
वि.
(सं. हारिन्)

हारी
मन हरनेवाला।
वि.
(सं. हारिन्)

हारी
हार पहननेवाला
वि.
(सं. हारिन्)

हारुक
ले जानेवाला।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हारे
प्रयत्न करते-करते निराश या असमर्थ हो गये।
क्रि.अ.
(हिं. हारना)
उ.- (क)मुसल मुगदर हनत त्रिबिध करमनि गनत मोहिं दंडत धरम-दूत हारे-१-१२०। (ख) तुव सुत कौ पढ़ाइ हम हारे-७-२। (ग) मधुबन बसत आस दरसन की जोइ नैन मग हारे-ना. ४८७०।
मुहा.- हारे-अटके-किसी वस्तु की अत्यंत आवश्यकता होने पर उसकी प्राप्ति के समस्त प्रयत्नों में निराश होकर, बहुत ही आवश्यकता के अवसर पर। हारे दर्जे- (१) सब प्रकार से निराश होकर, किसी तरह का कोई वश न चलने पर। (२) लाचार या, विवश होकर।

हारे
कर्तृत्व, स्वामित्व आदि सूचक एक प्रत्यय।
प्रत्य.
उ.- सूर सुगंध चुरावनहारे कैसैं दुरत दुराए-१२३३।

हारैं
थक जायँ, शिथिल हो जायँ।
क्रि.अ.
(हिं. हारना)
उ.- सुर-तरुवर की साख लेखिनी, लिखत सारदा हारैं-१-१८३।

हारैं
हारन की स्थिति या अवस्था में )।
क्रि.अ.
(हिं. हारना)
उ.-जीत जीति भक्त अपन के, हारैं हार बिचारौं-१-२७२।

हारै
(दाँव, बाजी आदि) हार जाय।
क्रि.स.
(हिं. हारना)
मुहा.- जनम या जन्म हारै-जीवन व्यर्थ या नष्ट करे। उ.- (क) माया-मद मों भयौ मत्त, कत जनम बादिहीं हारै-१-६३। (ख) कियैं नर की स्तुति कौन कारज सरै, कै सो आपनौ जन्म हारै-४-११।

हारै
माला या हार को।
संज्ञा
पुं.सवि.
(हिं. हार)
उ.- हारै तोरथौ, चीरहिं फारथौ-१०३३।

हारो, हारौ
थक जाओ, शिथिल हो जाओ।
क्रि.अ.
(हिं. हारना)
उ.- मैं हारी त्यौंही तुम हारौ, चरन चापि स्रम मेटौंगी-ना. १७६५।

हारो, हारौ
(दाँव या बाजी) हारी।
क्रि.स.
मुहा. अपुनपौ हारौ- अपना ज्ञान-विवेक, प्रतिष्ठा का ध्यान आदि सब कुछ भुला या मिटा दिया। उ.- धन-सुत-दारा काम न आवैं, जिनहिं लागि आपु-नपौ हारौ-१-८४।

हारो, हारौ
कर्तृत्व, स्वामित्व आदि का सूचक एक प्रत्यय।
प्रत्य.
(हिं. हारा)
उ.- सूर सुगंध चुरावनहारौ कैसैं दुरत दुरायौ-ना. २३१३।

हारौल
सेना में सबसे आगे चलनेवाला सैनिक दल।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हरावल)

हार्द
स्नेह।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हार्द
हृदय का, हृदय-संबंधी।
वि.

हार्दिक
हृदय का, हृदय संबंधी।
वि.
(सं.)

हार्दिक
हृदय से निकला हुआ, सच्चा।
वि.
(सं.)

हारथो, हारथौ
पराजित हुआ, हार गया।
क्रि.अ.
(हिं. हारना)
उ.- (क) कियौ युद्ध, पै असुर न हारथौ-६-५। (ख) जीतै सबै असुर हम आगै, हरि कबहू नहिं हारथौ-४३३।
मुहा.- हारथौ हिय अपनैं-अपने हृदय में हार गया, हृदय से पराजय स्वीकार कर ली। उ.- भ्रमि भ्रमि अब हारथौ हिय अपनैं, देखि अनल जग छायौ-१-१५४।

हारथो, हारथौ
दाँव, बाजी या उसमें लगायी गयी वस्तु) हार गया।
क्रि.स.
उ.- (क) तिन हारथौ सब भूमि भँडार-२-४६। (ख) चितवत नंद ठगे से ठाढ़े, मानौ हारथौ हेम जुआर-२६७१।
मुहा.- उवसर या औसर हारथौ-उचित अवसर पर चूक गया, उपयुक्त अवसर का लाभ नहीं उठाया। उ.- औसर हारथौ रे, तैं हारथौ-१-३३६।

हारथो, हारथौ
खो दिया, गवाँ दिया, व्यर्थ कर दिया।
क्रि.स.
मुहा.- जनम या जन्म हारथौ-जीवन व्यर्थ नष्ट कर दिया। उ.- करी न प्रीति कमल लोचन सो, जन्म जुआ ज्यौं हारथौ-१-१०१।

हाल
दशा, स्थिति, अवस्था।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हाल
दुर्दशा, दुर्गति।
संज्ञा
पुं.
(अ.)
उ.- कौन हाल हमरैं ब्रज बीतत जानत नहीं बिरह की रीति-ना. ४४१०।
मुहा.- हाल करना-(१) दुर्दशा बनाना, बहुत परेशान करना, दुर्गति करना। (२) दंड देना। हाल करिहौं या करौं-अच्छी तरह दंड दूँगी। उ.- (क) कैसे हाल करौं धरि हरि के, तुमकौं प्रगट दिखाऊँ-१०-३४१। (ख) सूर हाल कैसे करिहौं धरि, आवै तो हरि अबहीं- ना. २०४१। हाल किए (किये)-दुर्दशा की, दुर्गति बनायी। उ.- (क) जसुमति माइ कहा सुत सिखयौ, हमकौं जैसे हाल किए-७७१। (ख) जैसे हाल किए हरि हमकौं, भए कहूँ जग आहैं न-७७२। (ग) ¨¨¨¨¨¨ करै हाइ हाइ, देखौ जैसे हाल करथौ है- ना.2053। (घ) ऎसौ हाल हमारौ कीन्हौ, जाति हुतीं दहि लै हौं-ना. २०८४। हाल करत-दुर्दशा या दुर्गति करता है। उ.-ऎसे हाल करत री कोऊ, रहीं अकेली नारि-ना. २४५९।

हारी
हार, पराजय।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हारना)

हारी
पराजित हुई।
क्रि.अ.
(हिं. हारना)
उ.- परबस परी सुनौ करुनामय मम मति-तिय अब हारी-१-१६५।

हारी
थक गयी, थकी।
क्रि.अ.
(हिं. हारना)
उ.- मैं हारी, त्यौंही तुम हारौ, चरन चापि स्रम मेटौंगी-ना. १७६५।
मुहा.- कहि हारी-कहते कहते थक गयी। उ.-मैं बरजति सुत जाहु कहूँ जनि, कहि हारी दिनजाम-३७६। जतन करि हारी-बहुत प्रकार के उपाय करते-करते थक गयी। उ.- अधिक पिराति सिराति न कबहूँ बहुत जतन करि हारी-ना. ४१८८। सिखवति हारी-सिखाते-सिखाते थक गयी। उ.-सूर स्याम कौं सिखवति हारी, मारेहुँ लाज न आवति-ना, २०४५।

हारी
(दाँव, बाजी आदि) में जीत न सका।
क्रि.स.
उ.- सुर एक पौ नाम बिना नर फिरि फिरि बाजी हारी-१-६०।
मुहा.- रसना हारी- बात खाली जाय, माँग पूरी न हो। उ.- जाँचक पैं जाँचक कह जाँचै, जौ जाँचै तौ रसना हारी-१-३४।

हारी
बाजी या दाँव हारने पर उससे संबंधित-वस्तु जीतनेवाले को दी।
क्रि.स.
उ.- (क) हारी बहुरि द्रौपदी नार-१-२४६। (ख) रही न पैज प्रबल पारथ की जब तैं धरम-सुत धरनी हारी-१-१७६।

हारी
छोड़ दी, रख न सका।
क्रि.स.
उ,- ग्राह जब गजराज घेरथौ, बल गयौ हारी-१-१८६।
मुहा. चलि सत हारी- अपना सत्य या वचन छोड़ या तोड़ दे। उ.- आध पैंड़ बसुधा दै राजा, नातरु चलि सत हारी-८-१४। पत जाहु हारी-अपनी मान-मर्यादा छोड;दो, अपनी अप्रतिष्‍ठा कराओ।उ;- बचन जो करथौ. प्रतिपाल ताकौ करौ, कै सभा माहिं पत जाहु हारी- ना. ४८३३।

हारीत
चोर, डाकू, लुटेरा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हारु
माला, हार।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हार)

हारु
हाड्, हड्डी।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाड़)
उ.-छार सुगंध सेज पुहुपावलि, हार छुवैं हिय हार जरैगो-२८७०।

हारुक
हरण करनेवाला।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हाल
करनी, करतूत।
संज्ञा
पुं.
(अ.)
उ.- बन भीतर जुवतिनि कों रोकत हम खोटी तुम्हरे ये हाल-१११२।

हाल
माजरा, परिस्थिति।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हाल
समाचार, वृत्तांत।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हाल
ब्योरा, विवरण।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हाल
आख्यान, चरित्र।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हाल
भक्तों या साधकों की वह स्थिति जबवे अपने को भूलकर-ईश्वर-प्रेम में लीन या तन्मय हो जाते हैं।
संज्ञा
पुं.
(अ.)
मुहा.- (किसी पर) हाल आना-प्रेम में तन्मयता या लीनता होना।

हाल
मौजूद, वर्तमान, उपस्थित।
वि.
मुहा.- हाल में-कुछ ही दिन पहले। हाल का-(१) बहुत थोड़े दिन का। (२) नया, ताजा।

हाल
अभी, इसी समय।
अव्य.

हाल
चटपट, तुरंत।
अव्य.

हाल
हिलने की क्रिया या भाव, गति।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हालना)

हाल
कंप, कंपन।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हालना)

हाल
झटका, झोंका।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हालना)

हाल
लोहे का बंद जो पहिये पर चढ़ाया जाता है।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हालना)

हाल
खेल, दाँव।
संज्ञा
पुं.
(देश.)
उ.- बलै अछत छल-बल करि जीते, सूरदास प्रभु हाल- ना. ४७८४।

हालगोला
गेंद।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाल + गोला)

हालडोल
हिलने की क्रिया या भाव, गति।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हालना + डोलना)

हालडोल
कंप, कंपन।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हालना + डोलना)

हालडोल
हलचल।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हालना + डोलना)

हालत
अवस्था, दशा।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हालत
आर्थिक स्थिति।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हालत
परिस्थिति।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हालना, हालनो
हिलना-डोलना।
क्रि.अ.
(हिं. हिलना)

हालना, हालनो
काँपना।
क्रि.अ.
(हिं. हिलना)

हालना, हालनो
झूमना।
क्रि.अ.
(हिं. हिलना)

हालरी
बच्चों को हाथ में लेकर हिलाने-डुलाने की क्रिया।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हालना)

हालरी
झोंका।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हालना)

हालरी
लहर, हिलोर।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हालना)

हालरी
बच्चों को सुलाने का गीत, लोरी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हालना)

हालहूल
शोरगुल।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हल्ला)

हालहूल
हलचल।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हल्ला)

हालाँकि
गो कि, यद्यपि।
अव्य.
(फ़ा.)

हाला
शराब, मदिरा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हालाहल
भयंकर विष।
संज्ञा
पुं.
(सं. हलाहल)

हाली
जल्दी, शीघ्र।
अव्य.
(अ. हाल)

हाली
हाली हाली -जल्दी-ज्लदी, शीघ्रता से।
यौ.

हाले
अभी।
अव्य.
(अ. हाल)

हाले
तुरत।
अव्य.
(अ. हाल)

हाल्यो, हाल्यौ
हिला-डुला।
क्रि.अ.
(हिं. हालना)
उ.-नेंक नहीं हाल्यो नख पर तें मेरो सुत अहंकारी-१००१।

हाव
(साहित्य में) संयोग के समय नायक को मोहित करने, उससे मिलन की इच्छा प्रकट करने अथवा तत्संबंधी सहमति या स्वीकृति सूचित करने के लिए की जानेवाली स्वाभाविक चेष्टाएँ जो कायिक तथा मानसिक अनुभावों के अंतर्गत ग्यारह प्रकार की कही गयी हैं-लीला, विलास, विच्छित्ति (शोभावर्द्धक श्रृंगार), विभ्रम (उतावली में उलटे-पलटे या अस्तव्यस्त भूषण, वस्त्र धारण करना), मोट्टायित (मुग्ध होकर अनुराग व्यक्त करना), विव्वोक (मानपूर्वक प्रिय या उसकी प्रदत्त वस्तु के प्रति उपेक्षा दिखाना), विहृत (लज्जा के कारण प्रिया पर अपना भाव प्रकट न करना), कुट्टमित (संयोग के समय बनावटी दुख चेष्टा), लालत (सुकुमार भाव से और आकर्षक रूप से अंग-संचालन) और हेला (आँखें या भौहें नचाकर मिलन की अभिलाषा स्पष्ट करना) इन ग्यारह के अतिरिक्त कहीं-कहीं 'बोधक' (प्रेमी-प्रिया का संकेतों से अपनी कामना व्यक्त करना) बारहवाँ हाव माना गया है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- हाव अरु भाव करि चलत, चितवत जबै, कौन ऎसौ जो मोहित न होई-८-१०।

हाव-भाव
पुरुष का चित्त आकर्षित करने के लिए की गयी स्त्री की मनोहर चेष्टा, नाज-नखरा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हाशिया
कोर, किनारा।
संज्ञा
पुं.
(अ. हाशियः)

हाशिया
गोट।
संज्ञा
पुं.
(अ. हाशियः)

हाशिया
कागज पर किनारे छोड़ी हुई जगह।
संज्ञा
पुं.
(अ. हाशियः)

हास
हँसने की क्रिया या भाव, हँसी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- ईषद हास दंत-दुति बिगसति-१०-२१०।

हास
मजाक, परिहास।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हास
उपहास।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- लाल गोपाल बाल-छबि बरनत कबि कुल करिहै हास री-१०-१३९।

हास
केवल कौतुक के लिए कही गयी बात या बनाया गया वेश जो साहित्य में सात्विक भावों के अंतर्गत है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हासक
हँसने-हँसानेवाला।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हासक
हँसोड़।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हासकर
जिसमें हँसी आवे।
वि.
(सं.)

हासिल
मिला हुआ , प्राप्त।
वि.
(अ.)
मुहा.- हासिल करना-पाना। हासिल होना-मिलना।

हासिल
गणित में किसी संख्या का वह अंश जो शेष भाग के लिखे जाने पर बच रहे।
संज्ञा
पुं.

हासिल
पैदावार, उपज।
संज्ञा
पुं.

हासिल
नफा, लाभ।
संज्ञा
पुं.

हासिल
(जमीन का) लगान।
संज्ञा
पुं.

हासिल
(चौथ, खिराज जैसा) धन जो किसी से अधिकारपूर्वक लिया जाय।
संज्ञा
पुं.

हासी
हँसनेवाला।
वि.
(सं.हासिन् )

हास्य
जिस पर लोग हँसें, हँसने के योग्य।
वि.
(सं.)

हास्य
उपहास के योग्य
वि.
(सं.)

हास्य
हँसने की क्रिया या भाव, हँसी।
संज्ञा
पुं.

सैद्धांतिक
सिद्धांत का, सिद्धांत संबंधी।
वि.

सैद्धांतिक
जो सिद्धांत के आधार पर हो।
वि.

सैन
(आँख या उँगली का) इशारा, संकेत या इंगित।
संज्ञा
स्त्री.पुं.
(सं. संज्ञपन, प्रा. सण्णवन)
उ.-(क) नैन की सैन अंगद बुलायौ-९-१२९। (ख) कमल नैन माखन माँगत हैं करि करि सैन बतावत-१०-१०२। (ग) सन देइ सब सखा बुलाए-१०-२८२। (घ) मोहि लई नैनंनि की सैन-७४२। (ङ) बात करत तुलसी मुख मेलै नैन सैन दै मुँह मटकी-1३-०१। (च) ताहू मैं अति चारु बिलोकनि गूढ़ भाव सूचतसखि सैन-१३१३। (छ) रीझत नारि कहत मथुरा की आपुस मैं दै सैन-सारा. ५०४।

सैन
निशान, चिह्न, लक्षण।
संज्ञा
स्त्री.पुं.
(सं. संज्ञपन, प्रा. सण्णवन)

सैन
सोना, निद्रा लेना।
संज्ञा
पुं.
(सं. शयन)

सैन
लेटना।
संज्ञा
पुं.
(सं. शयन)

सैन
शैया।
संज्ञा
पुं.
(सं. शयन)

सैन
बिछौना।
संज्ञा
पुं.
(सं. शयन)

सैन
फौज, कटँक, सेना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सेना)
उ.- (क) नातरु कुटँब सैन संहरि सब कौन काज कौं जीजै-१-२७५। (ख) हरि प्रभाउ राजा नहिं जान्यौ, कहथौ सैन मोहिं देहु हरि-१-२६८। (ग) दामिनि कर करवार, बूँद सर, इहिं बिधि साजे सैन-२८१९। (घ) सखी री पावस सैन पलान्यौ-२८२०।

सैन
बाज पक्षी।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्येन)

हा हा
जोर-जोर से हँसना।
यौ.
मुहा- हाहा हीही करना-(1) जोर से हसना।(2)(निम्‍न कोटि की) हँसी करना। हाहा हीही मचना या होना- बहुत जोर की हॅसी होना

हा हा
दीनता की या बहुत बिनती की पुकार, दुहाई।
संज्ञा
पुं.
(अनु.)
उ.-हाहाकंत मानि बिनती यह-ना. १४२१।
मुहा.- हाहा करना-बहुत गिड़गिड़ाना या बिनती करना। हाहाकरि-बहुत गिड़गिड़ाकर या बिनती करके। उ.- (क) हाहाकरि द्रौपदी पुकारी, बिलंब न करौ घरी-१-२५४। (ख) मैं आज तुम्हैं गहि बाँधौ। हा हा करि अनुराधौं-१०-१८३। (ग) सूर स्याम जसुमति भैया सौं, हाहा करि कहै केति-४२४। (घ) दोहनि नहिं देत कर तैं हरि, हाहा करि परै पाइ- 737। (ङ) हाहा करि, दसननि तृन धरि-धरि लोचन नीर बहाऊँ री-ना. २७२१। हाहा करति-बहुत गिड़गिड़ाकर बिनती करती है। उ.- हा हा करति पाइ तेरे लागति अब जनि दूरि जाइ मेरे बारे-६०८। हाहा करिहौ-बहुत गिड़गिड़ाकर बिनती करोगे। उ.- जो पाऊँ तौ तुमहिं दिखाऊँ हाहा करि हौ अबहीं-ना. २०४१। हाहा खाना-बहुत गिड़गिड़ाना या बिनती करना। हाहा खात-बहुत गिड़गिड़ाकर बिनती करता है। उ.- साँटी लै जसुमति अति तरजति हरि बसि हाहा खात।

हा हा
शोक, दुख आदि का सूचक शब्द।
अव्य.
(सं. हा)
उ.- सूर उसाँस छाँड़ि हा हा ब्रज जल अँखियाँ भरि लीनी-ना. ४७७२।

हाहाकार
जन-समूह की, भय, दुख आदि सूचक पुकार या चिल्लाहट, कुहराम।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- हाहाकार भयौ सुरलोकनि-सारा. १०७।

हाहाठीठी
हँसी-ठट्ठा।
संज्ञा
स्त्री.
(अनु.)

हाहाहूत
हाहाकार।
संज्ञा
पुं.
(अनु.)

हाहाहूत
बहुत बड़ा।
वि.

हाहाहूती
बहुत बड़ा या बड़ी।
वि.
(हिं. हाहाहूत)

हाहू
कोलाहल।
संज्ञा
पुं.
(अनु.)

हाहू
हलचल।
संज्ञा
पुं.
(अनु.)

हास्य
साहित्य के नौ रसों में एक जो असंगत-विकृत घटनाओं, बातों आदि से उत्पन्न होता है ; इसका स्थायी भाव 'हास' है।
संज्ञा
पुं.

हास्य
ठठोली, मजाक, दिल्लगी।
संज्ञा
पुं.

हास्य
उपहास।
संज्ञा
पुं.

हास्यकर
जिसमें हँसी आवे।
वि.
(सं.)

हास्यकर
हँसानेवाला।
वि.
(सं.)

हास्यास्पद
जिसे देखकर लोग हँसें।
वि.
(सं.)

हास्यास्पद
उपहास के योग्य।
वि.
(सं.)

हा हंत
अत्यंत शोकसूचक शब्द-हे ईश्वर ! यह क्या हो गया ! !
अव्य.
(सं.)

हा हा
जोर से हँसने का शब्द।
संज्ञा
पुं.
(अनु.)

हा हा
हाहा हीही-(निम्न कोटि का) हँसी-ठट्ठा।
यौ.

हिंकरना, हिंकरनो
पीड़ा से कराहना।
क्रि.अ.
(सं. हिंकार)

हिंकरना, हिंकरनो
(घोड़ों का) हींसना, हिनहिनाना।
क्रि.अ.
(सं. हिंकार)

हिंकरना, हिंकरनो
(गाय, बैल का) रँभाना।
क्रि.अ.
(सं. हिंकार)

हिंकार
रँभाने का शब्द।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिंकार
'हि' का उच्चारण।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिंग
हींग।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हिंग)

हिंगलाज, हिंगलाजा
दुर्गा या देवी की एक मुर्ति।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हिंगुलाजी)

हिंगु
हींग।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिंगुल
ईंगुर।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिंगुलाजा
दुर्गा या देवी की एक मुर्ति जो सिंध और बिलोचिस्तान के बीच की पहाड़ियों में है।।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हिंगोट
एक कटीला पेड़ जिसके फलों से तेल निकलता है, इंगुदी।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिंगुपत्र, प्रा. हिंगुवट)

हिंछना, हिंछनो
इच्छा करना।
क्रि.अ.
(सं. इच्छण)

हिंछा
चाह, कामना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. इच्छा)

हिडन
घूमना-फिरना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिंडोरना, हिंडोरनो, हिंडोरनौ, हिंडोरा
हिंडोला।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हिडोला)
उ.- (क) सुरँग हिंडोरना माई झूलत स्यामा-स्याम-ना. ३४३७। (ख) जमुना पुलिनहिं रच्यौ रंग सुरंग हिंडोरनौ-ना. ३४५०।

हिंडोरनि
हिंडोले में।
संज्ञा
पुं. सवि.
(हिं. हिंडोरे)
उ.-हरषि हिंडोरनि गावहिं-ना. ४००५।

हिंडोरें, हिंडोरैं
हिंडोले में।
संज्ञा
पुं. सवि.
(हिं. हिंडोला)
उ.-झूलत सुरँग बिंडोरें-सारा. ३१०।

हिंडोल
हिंडोला।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिन्दोल)
उ.-डरत लाल हिंडोल झूलत, हरैं देत झुलाइ-३९८।

हिंडोल
एक राग।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिन्दोल)

हिंडोलना, हिंडोलनो, हिंडोलनौ, हिंडोला
काठ का ऊपरनीचे जानेवाला चक्करदार झूला।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिन्दोल, हिं. हिंडोला)

हिंदी
उत्तरी और मध्य भारत की सर्वप्रमुख भाषा जो अब भारतीय राष्ट्र की राष्ट्रभाषा है।
संज्ञा
स्त्री.
मुहा.- हिंदी की चिंदी निकालना- (१) बहुत सूक्ष्म पर व्यर्थ के दोष निकालना। (२) कुतर्क करना।

हिंदुस्तान
भारत।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. हिंदोस्तान)

हिंदुस्तानी
भारतीय।
वि.
(फ़ा.)

हिंदुस्तानी
भारतवासी।
संज्ञा
पुं.

हिंदुस्तानी
भारत की भाषा।
संज्ञा
स्त्री.

हिंदुस्तानी
हिंदी भाषा का वह व्यावहारिक रूप जिसमें अरबी-फारसी और संस्कृत के क्लिष्ट शब्द न हों।
संज्ञा
स्त्री.

हिंदुस्थान
भारतवर्ष।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. हिंदू + सं. स्थान)

हिंदू
भारतीय आर्यों के वर्तमान भारतीय वंशज जो भारत में प्रवर्तित और पल्लवित धर्म-संस्कार और समाज-व्यवस्था को मानते और वेद, स्मृति, पुराण आदि के प्रति श्रद्धा-भाव रखते हैं।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा.)

हिंदूपन
हिंदुत्व।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. हिंदू + पन)

हिंदोल
हिंडोला।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिन्दोल)

हिंडोलना, हिंडोलनो, हिंडोलनौ, हिंडोला
झूला।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिन्दोल, हिं. हिंडोला)
उ.-तैसेइ मोर पिक करत कुलाहल हरषि हिंडोलना गावहिंगे-२८८९।

हिंडोलना, हिंडोलनो, हिंडोलनौ, हिंडोला
पालना।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिन्दोल, हिं. हिंडोला)

हिंडोलना, हिंडोलनो, हिंडोलनौ, हिंडोला
वह गीत जिसमें नायक-नायिका के हिंडोले पर झूलने का वर्णन हो।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिन्दोल, हिं. हिंडोला)

हिंडोली
एक रागिनी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हिंताल
एक तरह का खजूर।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिंद
भारतवर्ष।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा.)

हिंदवी
हिंद की भाषा, हिंदी।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)

हिंदी
हिंद का, भारतीय।
वि.
(फ़ा.)

हिंदी
हिंद-वासी, भारतवासी।
संज्ञा
पुं.

हिंदी
हिंद की भाषा।
संज्ञा
स्त्री.

हिंदोल
हिंडोल नामक राग।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिन्दोल)

हिंयाँ
यहाँ।
अव्य.
(हिं. यहाँ)

हिंब
बरफ।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिम)

हिंब
पाला।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिम)

हिंवर
बरफ।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिमालि)

हिंवर
पाला।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिमालि)
मुहा.- हिंवार पड़ना-(१) बरफ गिरना (२) पाला पड़ना। (२) बहुत सर्दी होना।

हिंस
(घोड़ों के) हींसने या हिनहिनाने का शब्द।
संज्ञा
स्त्री.
(अनु. हिं हिं)

हिंसक
हत्यारा, घातक।
वि.
(सं.)

हिंसक
जीवों को मारनेवाला।
वि.
(सं.)

हिंसक
दूसरों का अहित या हानि करनेवाला।
वि.
(सं.)

हिंसक
(पशु) जो जीवों को मारकर उनका मांस खाता हो।
संज्ञा
पुं.

हिंसन
(जीवों का) वध या घात करना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिंसन
(जीवों को) पीड़ा या कष्ट देना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिंसन
किसी का अनिष्ट करना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिंसना, हिंसनो
हत्या करना।
क्रि.स.
(सं. हिंसन)

हिंसना, हिंसनो
बहुत पीड़ा या कष्ट पहुँचाना।
क्रि.स.
(सं. हिंसन)

हिंसना, हिंसनो
निंदा, बुराई या अनिष्ट करना।
क्रि.स.
(सं. हिंसन)

हिंसा
प्राणियों को मारना या अस्यंत कष्ट देना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)
उ.- हिंसा-मद ममता-रस भूल्यौ, आसा हीं लपटानौ-१-४७।

हिंसा
हानि पहुँचाना, अनिष्ट करना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हिंसात्मक
जिसमें हिंसा हो।
वि.
(सं.)

हिंसालु
हिंसा करनेवाला।
वि.
(सं.)

हिंस्र, हिंस्रक
हिंसा करनेवाला।
वि.
(सं.)

हि
एक पुरानी विभक्ति जो पहले तो प्रायः मभी कारकों में प्रयुक्त होती थी, परंतु कालांतर में, 'को' के अर्थ में, केवल कर्म और संप्रदान में प्रयुक्त होने लगी थी।
विभ.

हि
एक अव्यय जिसका प्रयोग निश्चय, अल्पता या परिमिति, हीनता या उपेक्षा, किसी बात पर बल देने आदि के लिए होता है।
अव्य.
(हिं. ही)

हिअ, हिआ
हृदय।
संज्ञा
पुं.
(प्रा. हिअ)

हिअ, हिआ
छाती।
संज्ञा
पुं.
(प्रा. हिअ)

हिआउ, हिआव
जिगरा, हिम्मत, साहस।
संज्ञा
पुं.
(प्रा. हिअ + हिं. आव)

हिएँ, हिऎं
हृदय में।
संज्ञा
पुं.सवि.
(हिं. हिंय)
उ.- (क) उनके मुऎं हिऎं सुख होइ-१-२८९। (ख) पै संतोष न आयौ हिऎं-९-२।

हिकमत
नयी बात खोजने या निर्माण करने की बुद्धि या कौशल।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हिकमत
कार्य-सिद्धि की युक्ति या उपाय।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हिकमत
चतुराई की चाल या ढंग।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हिकमत
किफायत।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हिकमत
हकीम का पेशा, हकीमी।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हिकमती
कार्य-साधन की युक्ति या उपाय निकालनेवाला।
वि.
(अ. हिकमत)

हिकमती
चालाक, चतुर।
वि.
(अ. हिकमत)

हिकमती
किफायती।
वि.
(अ. हिकमत)

हिक्का
हिचकी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हिक्का
एक रोग जिसमें बहुत हिचकियाँ आती हैं।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हिचक
किसी काम को करने में आने वाली मानसिक रुकावट, आगा-पीछा।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हिचकना)

हिचकना, हिचकनो
किसी काम में भय, संकोच आदि के कारण तत्परता से प्रवृत्त न होना, आगा-पीछा करना।
क्रि.अ.
(अनु.हिच + ना)

सैन
एक तरह का बगला।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

सैननि
संकेत से।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सैन)
उ.- राजिवनैन मैन की मूरति सैननि दियो बताई-९-४५।

सैनपति, सैनपती
सेनानायक, सेनापति।
संज्ञा
पुं.
(सं. सेनापति)

सैनभोग
रात्रि का नैवेद्य जो मंदिरों में चढ़ता ह।
संज्ञा
पुं.
(सं. शयन + भोग)

सैना
फौज, कटक, सेना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सेना)
उ.- बाँधै सिंधु सकल सैना मिलि-९-११०।

सैनापति, सैनापती
सेनानायक।
संज्ञा
पुं.
(सं. सेनापति)
उ.- (क) मुहाँचुही सेनापति कीन्हीं सकटै गर्व बढ़ायौ-१०-६१। (ख) बरषत मुसलघार सैनापति महामेघ मघवा के पायक-९५४।

सैनिक
फौज में रहकर लड़नेवाला सिपाही।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सैनिक
प्रहरी, सैन्यरक्षक।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सैनिक
सेना का, सेना-संबंधी।
वि.

सैनिका
एक छंद।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्येनिका)

हिचकना, हिचकनो
हिचकियाँ लेना।
क्रि.अ.
(हिं. हिचकी)

हिचकिचाना, हिचकिचानो
आग-पीछा करना।
क्रि.अ.
(हिं. हिचकना)

हिचकिचाहट
हिचक, आगा-पीछा।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हिचकिचाना + आहट)

हिचकिची
हिचक।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हिचक)

हिचकिनि
सिसक-सिसक कर।
क्रि.वि.
(हिं. हिचकी)
उ.- कमलनैन हरि हिचिकिनि रोवै-३४६।

हिचकी
पेट की वायु का, झोंक के साथ, कंठ में धक्का देते हुए निकलने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
स्त्री.
(अनु. हिच या सं. हिक्का)
मुहा.- हिचकी (हिचकियाँ) लगना-मरने के निकट होना।

हिचकी
सिसक-सिसक कर रोने का शब्द।
संज्ञा
स्त्री.
(अनु. हिच या सं. हिक्का)

हिचर-मिचर
आगा-पीछा, सोच-विचार।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हिचक + अनु.)

हिचर-मिचर
टाल-मटोल।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हिचक + अनु.)

हिजड़ा
नपुंसक।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

हिजरत
एक स्थान छोड़कर दूसरे को जाना।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हिजरत
मुहम्मद साहब का मक्के से मदीने जाना।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हिजरी
मुसलमानी सन् जो मुहम्मद साहब के मक्के से मदीने जाने या हिजरत की तारीख (१५ जूलाई,६२२ ई.) से चला था।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हिज्जे
अक्षरी, वर्तनी।
संज्ञा
पुं.
(अ. हिज्जः)

हिज्र
जुदाई, विछोह, वियोग।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हिडिंव
एक राक्षस जिसे भीम ने मारा था।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिडिंबा
हिड़िब राक्षस की बहन जिससे भीमसेन ने विवाह करके घटोत्कच नामक पुत्र उत्पन्न किया था।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हित
लाभदायक।
वि.
(सं.)

हित
अनुकूल।
वि.
(सं.)

हित
भलाई करने या चाहनेवाला।
वि.
(सं.)

हित
(किसी की) भलाई या प्रसन्नता के लिए।
अव्य.

हित
लिए, हेतु, कारण, निमित्त।
अव्य.
उ.- (क) पारबती सिव-हित तप करथौ-४-७। (ख) ज्यौ कपि सीत हतन-हित गुंजा सिमिटि होत लौलीन-१-१०२। (ग) ब्यास पुत्र-हित बहुतप कियौ-१-२२६।

हितकर
भलाई, उपकार या कल्याण करनेवाला।
वि.
(सं.)
उ.- परम उदार स्याम-घन सुंदर, सुखदायक संतन हितकर हरि-१-३१२।

हितकर
लाभ पहुँचानेवाला।
वि.
(सं.)

हितकर
स्वास्थ्य के लिए उपयोगी।
वि.
(सं.)

हितकर्ता, हितकर्त्ता
भलाई या कल्याण करनेवाला।
वि.
(सं. हितकर्त्ता)

हितकाम
भलाई की कामना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हितकाम
भलाई चाहनेवाला।
वि.

हितकार, हितकारक
भलाई, उपकार या कल्याण करनेवाला।
वि.
(सं. हितकारक)
उ.- सहज स्वभाव भक्त-हितकर-१०७०।

हितकार, हितकारक
लाभदायक।
वि.
(सं. हितकारक)

हित
कल्याण, मंगल।
संज्ञा
पुं.

हित
भलाई, उपकार।
संज्ञा
पुं.
उ.- अति उदार पर-हित डोलत हैं, बोलत बचन सुसीले-ना. ४२१२।

हित
फायदा, लाभ।
संज्ञा
पुं.

हित
अनुराग, प्रेम।
संज्ञा
पुं.
उ.- (क) हित करि स्याम सौ कह पायौ। (ख) तहँ मृगछौना सौ हित भयौ-५-४।
मुहा.- हित लगाना- प्रेम या अनुराग करना। हित न लगावै- प्रेम या अनुराग नहीं किया। उ.- खान-पान सो सब पहुँचावै, पै नृप तासौं हित न लगावै-४-१२।

हित
श्रद्धा, भक्ति।
संज्ञा
पुं.
उ.- श्रीभागवत सुनै जो हित करि, तरै सो भव-जल पार-१-२३१।

हित
अनुकूलता।
संज्ञा
पुं.

हित
मित्रता।
संज्ञा
पुं.

हित
हितैषी।
संज्ञा
पुं.

हित
नाता, रिश्ता, संबंध।
संज्ञा
पुं.

हित
नातेदार, संबंधी।
संज्ञा
पुं.

हितकार, हितकारक
स्वास्थ्य के लिए उपयोगी।
वि.
(सं. हितकारक)

हित-कारन
भलाई या कल्याण करनेवाला।
वि.
(सं. हितकारिन्)
उ.- जसुमति-भाव भक्ति हितकारन- ना. १५६९।

हितकारि
स्वास्थ्य के लिए उपयोगी, स्वास्थ्यकर।
वि.
(हिं. हितकारी)
उ.-दूध अकेली धौरी कौ यह, तन कौं अति हितकारि-४९६।

हितकारिणी, हितकारिनि, हितकारिनी
मंगल या कल्याण चाहनेवाली।
वि.
स्त्री.
(सं. हितकारिणी)
उ.-संग-संग जसुमति-रोहिनी हितकारिनि मैया-१०-११६।

हितकारिणी, हितकारिनि, हितकारिनी
स्वास्थ्यकर।
वि.
स्त्री.
(सं. हितकारिणी)

हितकारी
भलाई, उपकार या कल्याण करनेवाला।
वि.
(सं. हितकारिन्)
उ.-(क) जाकौ चरनोदक सिव सिर धरि तीन लोक हितकारी-१-१५। (ख) मुनि-मद मेटि दास-ब्रत राख्यौ अंबरीष हितकारी-१-१७। (ग) ऎसे कान्ह भक्त-हितकारी-१-२९। (घ) हते बंधु हितकारी-१-१७३। (ङ) संतनि के हितकारी-१-२८२। (च) जो कोऊ तेरौ हितकारी, सो कहै काढ़ि सबेरौ-१-३१९। (छ) सूर तुरत मधुबन पग धारे, धरनी के हितकारी-२५३३।

हितकारी
लाभ पहुँचानेवाला।
वि.
(सं. हितकारिन्)

हितकारी
स्वास्थ्यकर।
वि.
(सं. हितकारिन्)

हितचिंतक
शुभचिंतक, हितैषी।
वि.
(सं.)

हितचिंतन
(किसी की) भलाई, उपकार या कल्याण की बात सोचना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हितता
भलाई, उपकार।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हित)

हितता
मंगल, कल्याण।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हित)

हितता
अनुराग, प्रेम।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हित)

हितबचन
कल्याण का उपदेश।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हितवना, हितवनो
हिताना।
क्रि.अ.
(हिं. हिताना)

हितवाई
हिताई।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हित)

हितवादी
मंगल-कल्याण या लाभ की बात कहनेवाला।
वि.
(सं. हितवादिन्)

हिताई
नाते-रिश्तेदारी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हित + हिं. आई)

हिताई
हितचिंतन।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हित + हिं. आई)

हिताई
मेल-जोल।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हित + हिं. आई)

हिताना,हितानो
लाभदायक या अनुकूल होना।
क्रि.अ.
(सं. हित + हिं. आना)

हिताना,हितानो
कल्याणकारी होना।
क्रि.अ.
(सं. हित + हिं. आना)

हिताना,हितानो
प्रेम या स्नेहयुक्त होना।
क्रि.अ.
(सं. हित + हिं. आना)

हिताना,हितानो
प्रिय या रुचिकर होना।
क्रि.अ.
(सं. हित + हिं. आना)

हितानी
स्नेह, प्रेम अथवा मंगल कामना के भाव से युक्त हो गयी।
क्रि.अ.
स्त्री.
(हिं. हिताना)
उ.-बाँध्यो देखि स्याम को परबस गोपी परम हितानी।

हितावह
कल्याणकारी।
वि.
(सं.)

हिताहित
भलाई-बुराई, उपकार-अपकार।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिताहित
लाभ-हानि।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिती
हितकर।
वि.
(सं. हित)

हिती
हितैषी।
वि.
(सं. हित)

हिती
संबंधी।
वि.
(सं. हित)

हिती
स्नेही।
वि.
(सं. हित)

हितु
हित।
संज्ञा
पुं.
(सं. हित)

हितु
हितू।
वि.
(सं. हितू)

हितुआ, हितुवा
हितू।
वि.
(सं. हितू)

हितू
भलाई करने या चाहनेवाला, हितैषी।
वि.
(सं. हित)
उ.-(क) कमल नयन हरि हितू हमारे-१-२४०। (ख) बाहर हेत हितू कहवावत, भीतर काज सयाने-ना. ४६२६।

हितू
संबंधी।
वि.
(सं. हित)

हितू
स्नेही।
वि.
(सं. हित)

हितूकर
हितकारक।
वि.
(सं. हितकर)

हितूकर
हितैषी।
वि.
(सं. हितकर)

हितौना, हितौनो
लाभदायक होना।
क्रि.अ.
(हिं. हिताना)

हितौना, हितौनो
प्रेम करना।
क्रि.अ.
(हिं. हिताना)

हितौना, हितौनो
भलाई करना।
क्रि.अ.
(हिं.) हिताना)

हिदायत
सीख, उपदेश।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हिदायत
निर्देश।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हिदायत
पथ-प्रदर्शन।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हिनकाना
(घोड़े का) हींसना या हिनहिनाना।
क्रि.अ.
(अनु. हिन हिन + करना)

हिनती
छोटापन, तुच्छता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हीनता)

हिनती
अप्रतिष्ठा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हीनता)
उ.-गैवर मोहि चढ़ावत रासभ, प्रभुता मेटि करत हिनती-ना. २३०७।

हिनहिनाना, हिनहिनानो
घोड़े का बोलना, हिंसना।
क्रि.अ.
(अनु. हिन हिन)

हितूकर
स्नेही।
वि.
(सं. हितकर)

हितेच्छा
(किसी की) भलाई, उपकार या कल्याण की कामना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हितेच्छु
हितैषी।
वि.
(सं.)

हितैती
हिताई।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हितता)

हितैषिता
भलाई की कामना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हितैषी
भलाई या कल्याण चाहनेवाला, हितचिंतक।
वि.
(सं. हितैषिन्)

हितैषी
दोस्त, मित्र, सुहृद।
संज्ञा
पुं.

हितैहौं
प्रिय या रुचिकर लगूँगा।
वि.
(हिं. हिताना)
उ.-ऎसे करम नाहिं प्रभु मेरे जातें तुम्हैं हितैहौं।

हितोक्ति
कल्याणकारी कथन।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हितोपदेश
कल्याणकारी सीख।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

से
करण और अपादान कारकीय चिन्ह, तृतीया और पंचमी की विभक्ति।
प्रत्य.
[प्रा. सुंतो, पु. हिं. सेंति]

से
समान, सदृश।
वि.
(हिं. सा)

से
वे।
सर्व.
(हिं. सो)

सेइ
सेवा करके।
क्रि.स.
(सं. सेवन, हिं. सेना)
उ.- ताकौं सेइ परम गति पावत-५-२।

सेइए, सेइयै
उपासना या आराधना कीजिए।
क्रि.स.
(सं. सेवन, हिं. सेना)
उ.- (क) तातै सेइयै श्री जदुराइ-१-२६५। (ख) पिय अपना ना होइ तऊ ज्यौं ईस सेइए कासी-२२७५।

सेउ
एक तरह का पकवान।
संज्ञा
पुं.
(सं. सेविका)

सेउ
सेवा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सेवा)

सेऊँ
सेवा, उपासना या आराधना करूँ।
क्रि.स.
(सं. सेवन, हिं. सेना)
उ.- श्री बृषभानु-सुता-पति सेऊँ -१८५८।

सेए
सेवा, उपासना या आराधना की।
क्रि.स.
(सं. सेवन, हिं. सेना)
उ.- (क) सेए नाहि चरन गिरिधर के-१-१४७। (ख) द्वादस वर्ष सेए निसि-बासर तब संकर भाषी है लैन-९-१२।

सेए
सेए तैं - सेवा आदि करने से।
प्र.
उ.- सूरज दास स्याम सेए तें दुस्तर पार तरै-१-८२।

सैनी
नाई।
संज्ञा
पुं.
(सेना भगत नाई)
उ.- दरसन हूँ नासै जम सैनिक जिमि नह बालक सैनी।

सैनी
कटक, सेना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सेना)
उ.- जानि कठिन कलिकाल कुटिल नृप संग सजी अघसैनी-९-११।

सैनी
दल, समूह।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सेना)
उ.- एकै नाम लेत सब भाजै पीर सो भव-भय-सैनी-९-११।

सैनी
कतार, पंक्ति।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. श्रेणी)

सैनु
इशारा, संकेत, इंगित।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सैन)
उ.- ग्‍वाल- बाल कोउ कहूँ न देखौं, टेरत नाउँ लेत दै सेनु-५०१।

सैनु
शयन।
संज्ञा
पुं.
(सं. शयन)
उ.- सब जीवनि लै उदर माँझ प्रभु महा प्रलय-जल करत हौ सैनु-४८९।

सैनेह
सेना में रहकर लड़ने के योग्य।
वि.
(सं. सेना)

सैनेश, सैनेस
सेनापति।
संज्ञा
पुं.
(सं. सेन्य + ईश = सैन्येश)

सैन्य
सैनिक।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सैन्य
सेना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिनहिनाहट
घोड़े की बोली, हींसने की ध्वनि।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हिनहिनाना)

हिना
मेंहदी।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हिनाई
मेंहदी के रंग का, लाल।
वि.
(अ.)

हिनाई
उक्त रंग का घोड़ा।
संज्ञा
पुं.

हिफाजत
रक्षा।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हिफ़ाजत)

हिफाजत
देख-रेख, रखवाली।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हिफ़ाजत)

हिब्बा
दान।
संज्ञा
पुं.
(अ. हिब्बः)

हिब्बा
कौड़ी।
संज्ञा
पुं.
(अ. हिब्बः)

हिब्बा
दो जौ की एक तौल।
संज्ञा
पुं.
(अ. हिब्बः)
मुहा.- हिब्बा भर-जरा सा, बहुत थोड़ा।

हिमंचल
हिमालय पर्वत।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिमालय)

हिमकण
पाले या तुषार के छोटे-छोटे टुकड़े।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिमकर
चंद्रमा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.-(क) सूर स्याम-लोचन-जल बरसत जनु मुकता हिमकर तैं-३५४। (ख) छूटे चिकुर बदन कुम्हिलाने, ज्यो नलिनी हिमकर की मारी-ना. ४६७१।

हिमकर
चंदन।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिमदीधिति
चंद्रमा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिमपात
पाला पड़ना, बरफ गिरना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिमभानु
चंद्रमा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिमवान, हिमवान्
जिसमें बरफ या पाला हो।
वि.
(सं. हिमवत्)

हिमवान, हिमवान्
जिसमें शीतलता हो।
वि.
(सं. हिमवत्)

हिमवान, हिमवान्
हिमालय पर्वत।
संज्ञा
पुं.

हिमवान, हिमवान्
चंद्रमा।
संज्ञा
पुं.

हिमंत
अगहन-पूस की ऋतु।
संज्ञा
पुं.
(सं. हेमंत)

हिम
पाला, तुषार।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.-मानौ कमलहिं हिम तरसायौ- ३९१।

हिम
जाड़ा, ठंढ, शीत।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिम
जाड़े की ऋतु।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिम
चंद्रमा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिम
चंदन।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिम
कपूर।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिम
मोती।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिम
ठंढा, शीतल।
वि.

हिम-उपल
ओला।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिमांक
कपूर।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिमांक
शीत की वह स्थिति जिसमें पानी जमने लगता है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिमांशु
चंद्रमा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिमांशु
कपूर।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिमाकत
बेवकूफी, मूर्खता।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हिमाक़त)

हिमाचल
हिमालय पर्वत जो संसार का सबसे ऊँचा पर्वत है। पुराणों में यह मेना या मेनका का पति और पार्वती का पिता कहा गया है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.-कह्यौ हमाचल, सिव प्रभु ईस-४-७।

हिमाद्रि
हिमालय पर्वत।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिमानी
पाला, तुषार।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हिमानी
बरफ।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हिमानी
बरफ की चट्टान।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हिम्मत
साहस।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हिम्मत
पराक्रम।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)
मुगा.- हिम्मत पड़ना-साहस होना। हिम्मत हारना-साहस छोड़ना।

हिम्मती
साहसी।
वि.
(फ़ा.)

हिम्मती
पराक्रमी।
वि.
(फ़ा.)

हिय
हृदय, मन।
संज्ञा
पुं.
(सं. हृदय, प्रा. हिअ)
उ.-इन हिय हेरि मृगी सब गोपी सायक ज्ञान हए-३०५०।
मुहा.- हिय की फूटना-ज्ञान-नेत्र न होना; बुद्धि, विवेक या ज्ञान न होना। हिय की फूटी- ज्ञान-दृष्टि रहित; बुद्धि . विवेक या ज्ञान-हीन। उ.- एक आँधरौ, हिय ही फूटी, दौरत पहिरि खराऊँ-ना. ४७४४। हिय हारना-हिम्मत या साहस छोड़ना। हिय हारथौ-साहस छोड़ बैठा। उ.- भ्रमि भ्रमि अब हारथौ हिय अपनैं, देखि अनल जग छायौ-१-१५४।

हिय
छाती, वक्षस्थल।
संज्ञा
पुं.
(सं. हृदय, प्रा. हिअ)

हियरा, हियरो, हियरौ
हृदय, मन।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हियरा + रा)

हियरा, हियरो, हियरौ
छाती, वक्षस्थल।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हियरा + रा)
मुहा.- हियरा (हियरो) सुलगावत - जी जलाता या जलाते हो। उ.- (क) फूँकि फूँकि हियरौ सुलगावत उठि न इहाँ तैं जात- ना. ४१६३। (ख) काहे को हियरा सुलगावत- ३२७९।

हियाँ
इस स्थान पर।
अव्य.
(हिं. यहाँ)

हिया
हृदय।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हिय)

हिमायत
संरक्षा।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हिमायत
पक्षपात।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हिमायत
समर्थन, मंडन।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हिमायती
संरक्षक।
वि.
(फ़ा.)

हिमायती
सहायक।
वि.
(फ़ा.)

हिमायती
पक्षपाती।
वि.
(फ़ा.)

हिमायती
समर्थक।
वि.
(फ़ा.)

हिमाल, हिमालय
भारत के उत्तर का एक पर्वत जो संसार में सबसे ऊँचा है। पुराणों में यह मेना या मेनका का पति और पार्वती का पिता कहा गया है।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिमालय)

हिमि
हिम।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिम)

हिमीकर
बर्फ जैसा शीतल करनेवाला।
वि.
(सं. हिम + कर)

हिया
छाती।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हिय)
मुहा.- हिया जलना- (१) दुख होना। (२) क्रोध या ईर्ष्या होना। हिया जलाना- कुढ़ाना। हिया जुड़ाना या ठंढा होना- मन तृप्त और आनंदित होना। हिया ठंढा करना- मन को सुखी और संतुष्ट करना। हिया फटना- (कलेजा फटने जैसा) अत्यंत शोक या दुख होना। हिया फाड़ना- (कलेजा फाड़ डालने जैसा) घोर दुख या शोक देना।हिया भर आना- अत्‍यंत शोक या दुख होना। हिया भर लेना- दुख से लंबी साँसें लेना। हिया शीतल करना- किसी के हृदय को सुखी और संतुष्ट करना। हिया शीतल होना- मन का तृप्त ओर संतुष्ट होना।

हिया
हिम्मत, साहस।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हिय)

हियाव
जीवट, हिम्मत, साहस।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हिय + आव)
उ.- कहि हियाव यह सौंज लादि कै हरि के पुर लै जाहि-१-३१०।
मुहा.- हियाव खुलना- (१) हिम्मत बँधना, साहस हो जाना। (२) धड़क खुलना; संकोच, हिचक या भय न रह जाना। हियाव पड़ना- हिम्मत या साहस होना।

हिये, हियें, हियैं
हृदय में।
संज्ञा
पुं. सवि.
(हिं. हिय)
उ.- (क) सब कोउ कहत गुलाम स्याम कौ, सुनत सिरात हिये-१-१७१। (ख) राजा हियैं सुरूचि सौं नेह-४-९। (ग) प्रेम पुलक न समात हिये-१०-८८। (घ) सूरदास प्रेम हरि हियैं न समावै री-६२९। हरषि हियें अब हेतु करै-९८९।
मुहा. हिये का अंधा- परम मूर्ख। हिये की फूटना- बुद्धि या विवेकहीन होना। हिये की फूटी - बुद्धि- विवेक रहित। उ. एक आँधरौ, हिय की फूटी, दौरत पहिरि खराऊँ-३४६६। हिये लगना- गले या छाती से लगना। हिये लगाना- हृदय या छाती से लगाना। हिये में लोन-सा लगना- बहुत बुरा लगना, अत्यंत अप्रिय होना। हिये पर पत्थर रखना- अत्यंत धैर्यपूर्वक सहन करना।

हियो, हियौ
हृदय।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हिय)
उ.- (क) सूर-स्याम सरबज्ञ कृपानिधि करूना-मृदुल हियौ-१-१२१। (ख) अति अनुराग संग कमला-तन प्रफुलित अंग न समात हियौ-१०-१४३। (ग) सराहौं तेरी नंद हियौ- ना. ३७८३।
मुहा. हियौ फूलना- अत्यंत प्रसन्नता होना। फूल्यौ हियौ- अत्यंत प्रसन्नता हुई। उ.- लै लै अधरं-परस करि जेंवत देखत फूल्यौ मात-हियौ- १०-१६८। हियौ सिराना या शीतल होना- कलेजा ठंढा होना, बहुत सुख-संतोष होना। सिरायौ हियौ या सीतल भयौ -सुखी और संतुष्ट हुआ। उ.- (क) अब कुबिजा पै हियौ सिरायौ- ना. ४७१२। (ख) सातौं द्वीप राज ध्रुव कियौ। सीतल भयौ मातु कौ हियौ-४-९।

हियो, हियौ
छाती, वक्षस्थल।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हिय)
उ.- आपु कहति मेरौ सुत बारौ, हियौ उघारि दिखाऊँ-७७२।
मुहा. हियौ फाटनो- (अत्यंत शोक या दुख से) कलेजा फटना।फाटयौ न हियौ- (अत्यंत शोक या दुख होने पर भी) कलेजा नहीं फटा। उ.- हऱि बिछुरत फाटयौ न हियौ- ना. ३६२६।

हिरकना, हिरकनो
पास या निकट आना।
क्रि.अ.
(सं. हरुक = समीप)

हिरकना, हिरकनो
बहुत ही समीप होना, सटना।
क्रि.अ.
(सं. हरुक = समीप)

हिरकना, हिरकनो
परचना।
क्रि.अ.
(सं. हरुक = समीप)

हिरकना, हिरकनो
रोकना, हटकना, मना करना।
क्रि.अ.
(सं. हरुक = समीप)

हिरकाना, हिरकानो
निकट करना।
क्रि.स.
(हिं. हिरकना)

हिरकाना, हिरकानो
सटाना।
क्रि.स.
(हिं. हिरकना)

हिरकाना, हिरकानो
परचाना।
क्रि.स.
(हिं. हिरकना)

हिरकाना, हिरकानो
(किसी को) रूकने को प्रवृत्त करना।
क्रि.स.
(हिं. हिरकना)

हिरण
स्वर्ण।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिरण
कौड़ी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिरण
मृग (पशु)।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हिरन)

हिरण्मय
सुनहरा, सोने का।
वि.
(सं.)

हिरण्मय
ब्रह्मा।
संज्ञा
पुं.

हिरण्मय
जंबू द्वीप के नौ खंडों में एक।
संज्ञा
पुं.

हिरण्य
सोना (धातु), स्वर्ण।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिरण्यकशिपु, हिरण्यकश्यप
एक प्रसिद्ध दैत्य जो प्रहलाद का पिता था और जिससे प्रहलाद की रक्षा के लिए नृसिंह अवतार हुआ था।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिरण्यकशिपु)

हिरण्यकेश
विष्णु का एक नाम।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिरण्यगर्भ
वह ज्योतिर्मय अंड जिससे ब्रह्मा और सारी सृष्टि की उत्पत्ति हुई मानी जाती है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिरण्यगर्भ
ब्रह्मा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिरण्यगर्भ
विष्णु।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिरण्यनाभ
विष्णु।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिरण्यनाभ
मैनाक पर्वत।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिरण्याक्ष
एक प्रसिद्ध दैत्‍य जो हिरण्यकशिपु का भाई था। उसने पृथ्वी को पाताल में रख छोड़ा था जिसके उद्धार के लिए बाराह अवतार हुआ था।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हिरदय
दिल, हृदय।
संज्ञा
पुं.
(सं. हृदय)
मुहा. हिरदय धरौ- ध्यान लगाओ। उ.- नर-हरि-पद नित हिरदय धरौ-७-२।

हिरदै
हृदय में।
संज्ञा
पुं.सवि.
(सं. हृदय)
उ.- (क) मम सत्राई हिरदैं आन-४-२। (ख) हरि-जन हरि-चरचा जो करैं। दासी-सुत सो हिरदौं धरै-७-८।

हिरदै
दिल या हृदय (ने)।
संज्ञा
पुं.सवि.
(सं. हृदय)
उ.- हमारैं हृदयै कुलिसहु जीत्यौ-ना. ४००१।
मुहा. हिरदै महँ आन- हृदय में लाकर, ध्यान लगाकर। उ.- सो सुरूप हिरदै महँ आन-१-२८६। हिरदै महँ राखी- मन में बसा ली, स्मृति में रख ली, स्मरण कर ली। उ.- सची नृपति सौं यह कहि भाषी। नृप सुनिकै हिरदै महँ राखी-६-७। हिरदै राखि- ध्यान लगाकर। उ.- श्रीगोपाल हिरदै राखि-१-३०६। सुन्न हिरदै कौ-अत्यंत निष्ठुर या कठोर हृदयवाला। उ.-महा कठोर सुन्न हिरदै कौ, दोष दैन कौं नीकौ-१-१८६।

हिरदै
छाती, वक्षस्थल।
संज्ञा
पुं.सवि.
(सं. हृदय)
मुहा.- हिरदै माँझ रहे लपटाई-छाती से लिपट गये। उ.- अति आनंद सहित सुत पायौ, हिरदै माँझ रहे लपटाई-१०-५१।

हिरन
मृग (पशु)।
संज्ञा
पुं.
(सं. हरिण)
मुहा.- हिरन हो जाना-(१) बहुत तेजी से भाग जाना। (२) चटपट दूर या नष्ट हो जाना।

हिरन
सोना (धातु), स्वर्ण।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिरण्‍य)

हिरण्यकसिपु, हिरनाकुस
हिरण्यकशिपु नामक प्रसिद्ध दैत्य।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिरण्यकशिपु)
उ.-हिरण्यकसिपु हिरनाच्छ आदि दै रावन-कुंभकरन कुल खोवन- १-५४।

हिरनमय
जंबू द्विप के नौ खंडों या वर्षों में एक।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिरण्मय)
उ.-इलावर्त औ किम्पुरुषा कुरु औ हरिवर्ष केतुमाल। हिरनमय रमनक भद्रासन भरतखंड सुखपाल-सारा. ३३।

हिरनवारि
मृगतृष्‍णा।
संज्ञा
पुं.
(सं. हरिण + वारि)

हिरना
मृग (पशु)।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हिरन)

हिरना
ढ़ूँढ़ना।
क्रि.स.
(हिं. हेरना)

सैर
मन बहलाने के लिए घूमना फिरना।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)

सैर
मौज, आनंद।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)

सैर
खान-पान और आमोद-प्रमोद।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)

सैर
तमाशा, मनोरंजक दृश्य।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)

सैल
पहाड़, पर्वत।
संज्ञा
पुं.
(सं. शैल)
उ.- (क) ब्योम धर नद सैल कानन इते चरि न अघाइ-१-५६। (ख) मही सराव, सप्त सागर घृत, बाती सैल घनी-२-२८। (ग) सैल-सिला द्रुम बरषि ब्योम चढ़ि सत्रु-समूह सँहारौ-९-१०८।

सैल
बरछा, भाला।
संज्ञा
पुं.
(सं. शैल)

सैल
सैर।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सैर)

सैल
बाढ़।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा. सैलाब)

सैल
बहाव।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा. सैलाब)

सैलकुमारी
पार्वती।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शैलकुमारी)

हिराना
खो जाना, गायब होना।
क्रि.अ.
(सं. हरण)

हिराना
मिटना, दूर होना।
क्रि.अ.
(सं. हरण)

हिराना
न रह जाना, अभाव होना।
क्रि.अ.
(सं. हरण)

हिराना
हक्का-बक्का होना, दंग या चकित होना।
क्रि.अ.
(सं. हरण)

हिराना
अपने को भूल जाना, आपा खोना।
क्रि.अ.
(सं. हरण)

हिराना
भूल जाना, ध्यान में न आना।
क्रि.स.

हिरानी
मिट गयी, दूर हो गयी, क्षीण हो गयी, जाती रही।
क्रि.अ.
(हिं. हिराना)
उ.- मिट गई चमक दमक अँग-अँग की, मति अरु दृष्टि हिरानी-१-३०५। (ख) भूख न दिन निसि नींद हिरानी-२९०७।

हिरानी
खो गयी, इधर-उधर चली गयी।
क्रि.अ.
(हिं. हिराना)
उ.-बालक द्वै दए पठै धेनु बन कहूँ हिरानी-४३७।

हिरानी
दंग या चकित रह गयी, अपने को भूल गयी।
क्रि.अ.
(हिं. हिराना)
उ.-सबै हिरानी हरि-मुख हेरैं-ना. २२७१।

हिरानी
भूल गयी, ध्यान में नहीं रही।
क्रि.स.
उ.-बिकल भईं तन दसा हिरानी।

हिरना
देखना।
क्रि.स.
(हिं. हेरना)

हिरना
परखना, परीक्षा करना।
क्रि.स.
(हिं. हेरना)

हिरनाच्छ
हिरण्याक्ष नामक प्रसिद्ध दैत्य।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिरण्याक्ष)
उ.-हिरनकसिपु हिरनाच्छ आदि दै रानम कुम्भकरन कुल खोवन- १-५४।

हिरनौटा
हिरन का बच्चा, मृगशावक।
संज्ञा
पुं.
[हिं. हिरन + औटा (प्रा. उत्त से)]

हिरन्य
स्वर्ण।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिरण्य)

हिरनाछ, हिरन्याच्छ
हिरण्याक्ष नामक प्रसिद्ध दैत्य।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिरण्याक्ष)
उ.-हरि जब हिरन्याच्छ कौं मारथौ-७-२।

हिरमंजी, हिरमिंजी, हिरमजी, हिरमिजी
एक तरह की लाल मिटटी जो दीवार, धन्नी आदि रँगने के काम आती है।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हिरमजी)

हिरवा
हीरा, रत्न।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हीरा)

हिरस
हिर्स।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हिर्स)

हिराती
हिरात' देश का घोड़ा।
संज्ञा
पुं.
(हिरात देश.)

हिराने
खो गये, इधर-उधर चले गये।
क्रि.अ.
(हिं. हिराना)
उ.-(क) जनु खद्योत चमक चलि सकत न, निसि-गत-तिमिर हिराने-ना. ३२१९। (ख) उत नंदहिं सपनौ भयौ, हरि कहूँ हिराने-ना. ३५५३।

हिरानो, हिरानौ
हिराना।
क्रि.अ.
(हिं. हिराना)

हिरान्यो, हिरान्यौ
भूल गया।
क्रि.स.
(हिं. हिराना)
उ,-स्याम अधर पर बैठि नाद कियौ, मारग चंद हिरान्यौ-ना. १६८७।

हिरायो, हिरायौ
खो गया।
क्रि.अ.
(हिं. हिराना)
उ.-सपनैं माहिं नारि कौं भ्रम भयौ, बालक कहूँ हिरायौ-४-१३।

हिरायो, हिरायौ
दूर हो गया, मिट गया।
क्रि.अ.
(हिं. हिराना)
उ.- लखि गोपिन को प्रेम भुलायो। ऊधो को सब ज्ञान हिरायो।

हिरावल
सेना में सबसे आगे रहनेवाला सैनिक-दल।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हरावल)

हिरास
भय, त्रास।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)

हिरास
निराशा।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)

हिरास
खेद, खिन्नता।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)

हिरास
निराश।
वि.
(फ़ा. हिराँसा)

हिरास
उदासीन।
वि.
(फ़ा. हिराँसा)

हिरासत
किसी व्यक्ति की देखरेख के लिए रखा जानेवाला पहरा।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हिरासत
कैद।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)
मुहा.- हिरासत में करना या रखना-कैद करना।

हिरासाँ
निराश।
वि.
(फ़ा.)

हिरासाँ
उदासीन।
वि.
(फ़ा.)

हिरौंजी
हिरमिंजी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हिरमिंजी)

हिरौल
सेना में सबसे आगे रहनेवाला सैनिक-दल।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हिरावल)

हिर्स
लालच, लोभ।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हिर्स
तीव्र इच्छा, वासना।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हिर्स
स्पर्द्धा।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)
मुहा.- हिर्स दिलाना। (१) लालच दिलाना। (२) लालसा जगाना। (३) स्पर्द्धा करने को प्रवृत्त करना। हिर्स मिटना- (१) इच्छा में कमी आना। (२) लालच न रहना। (३) स्पर्द्धा का भाव दूर होना। हिर्स मिटाना- (१) इच्छा पूरी करना। (२) स्पर्द्धा का भाव शांत करना।

हिलकना, हिलकनो
हिचकी लेना।
क्रि.अ.
(सं. हिक्का)

हिलकना, हिलकनो
सिसकना।
क्रि.अ.
(सं. हिक्का)

हिलकना, हिलकनो
निकट आना।
क्रि.अ.
(हिं. हिलगना)

हिलकना, हिलकनो
सहना।
क्रि.अ.
(हिं. हिलगना)

हिलकना, हिलकनो
पचना।
क्रि.अ.
(हिं. हिलगना)

हिलकना, हिलकनो
रोकना, मना करना।
क्रि.अ.
(हिं. हिलगना)

हिलकिनि, हिलकियनि
सिसक-सिसककर।
क्रि.अ.
(हिं. हिलकना)
उ.- (क) देखौ माइ, कान्ह हिलकियनि रोवै-३४७। (ख) नैंकहूँ न दरद करति, हिलकिनि हरि रोवै-३४८।

हिलकी
हिचकी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हिक्का)

हिलकी
सिसक-सिसक कर रोने का शब्द, सिसकन।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हिक्का)
उ.-जौ जागौं तो कोऊ नाहीं, रोके रहति न हिलकीं-ना. ३८७९।

हिलकोर
पानी की तरंग, हिलोर या लहर।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हिलोर)

हिलकोरा
हिलकोर।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हिलकोर)
मुहा.- हिलकोरा (बहु. हिलकोरे) लेना-पानी का लहराना।

हिलकोरना, हिलकोरनो
लहराना, तरंगित होना।
क्रि.अ.
(हिं. हिलकोर)

हिलकोरना, हिलकोरनो
(पानी को हिलाकर) लहरें उठाना।
क्रि.स.

हिलग
हिलने-मिलने या परचने का भाव, हेलमेल।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं.हिलगना)

हिलग
लगाव, संबंध।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं.हिलगना)
उ.-खान-पान तनु की न सम्हार। हिलग छँड़ायौ गृह-व्यवहार-ना. १७९८।

हिलग
लगन, प्रेम, प्रीति।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं.हिलगना)

हिलगन
हेलमेल।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं.हिलगना)

हिलगन
लगाव।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं.हिलगना)

हिलगन
लगन, प्रेम।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं.हिलगना)

हिलगन
बान, टेव, आदत।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं.हिलगना)

हिलगना, हिलगनो
अटकना, फँसना, उलझना।
क्रि.अ.
(सं. अधिलग्न, प्रा. अहिपग्न)

हिलगना, हिलगनो
(सहारे से) लटकना, टँगना।
क्रि.अ.
(सं. अधिलग्न, प्रा. अहिपग्न)

हिलगना, हिलगनो
हिलमिल जाना, परचना।
क्रि.अ.
(सं. अधिलग्न, प्रा. अहिपग्न)

हिलगना, हिलगनो
सटना, भिड़ना।
क्रि.अ.
(सं. अधिलग्न, प्रा. अहिपग्न)

हिलगाना, हिलगानो
अटकाना, फँसाना।
क्रि.स.
(हिं. हिलगना)

हिलगाना, हिलगानो
लटकाना।
क्रि.स.
(हिं. हिलगना)

हिलगाना, हिलगानो
हेलमेल करना, परचाना।
क्रि.स.
(हिं. हिलगना)

हिलगाना, हिलगानो
सटाना, भिड़ाना।
क्रि.स.
(हिं. हिलगना)

हिलन
मेल-जोल, प्रेम।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हिलना)
मुहा.- हिलन-मिलन-मिलना-जुलना, प्रेम या प्रीति का संबंध। उ.-हिलन-मिलन दिन चारि कौ-ना. ३७३२।

हिलना
इधर-उधर डोलना, गति में आना।
क्रि.अ.
(सं. हल्लन = इधर-उधर लुढ़कना)
मुहा.- हिलना-डोलना- (१) थोड़ा इधर-उधर होना, चलायमान होना। (२) थोड़ा धूमना-फिरना। (३) काम-धंधा करना। (४) प्रयत्न या उद्योग करना।

हिलना
(अपने स्थान से) हटना, टलना या सरकना।
क्रि.अ.
(सं. हल्लन = इधर-उधर लुढ़कना)

हिलना
काँपना, थरथराना।
क्रि.अ.
(सं. हल्लन = इधर-उधर लुढ़कना)

हिलना
(अपने स्थान पर) जमा या दृढ़ न रहना।
क्रि.अ.
(सं. हल्लन = इधर-उधर लुढ़कना)

हिलना
झूमना, लहराना।
क्रि.अ.
(सं. हल्लन = इधर-उधर लुढ़कना)

हिलना
(पानी में) पैठना या धँसना।
क्रि.अ.
(सं. हल्लन = इधर-उधर लुढ़कना)

हिलना
(मन का) चंचल होना या डिगना।
क्रि.अ.
(सं. हल्लन = इधर-उधर लुढ़कना)

हिलना
हेल-मेल में होना, परचना।
क्रि.अ.
(हिं. हिलगाना)

हिलना
हिलना-मिलना-मेल-जोल रखना।
यौ.

हिलना
एकता के साथ रहना।
यौ.

हिलना
बहुत धनिष्ठ हो जाना।
यौ.

हिलाना, हिलानो
नीचे-ऊपर या इधर-उधर डुलाना।
क्रि.स.
(हिं. हिलना)

हिलाना, हिलानो
जमा हुआ या दृढ़ न रखना।
क्रि.स.
(हिं. हिलना)

हिलाना, हिलानो
(चित्त को) चंचल करना।
क्रि.स.
(हिं. हिलना)

हिलाना, हिलानो
(पानी में) धुसाना या पैठाना।
क्रि.स.
(हिं. हिलना)

हिलाना, हिलानो
परचाना।
क्रि.स.
(हिं. हिलागना)

हिलायो, हिलायौ
नीचे-ऊपर या इधर-उधर डुलायी।
क्रि.स.
(हिं. हिलाना)
उ.-निकसि कंदरा हूँ तें केहरि सिर पर पूँछ हिलायो-३४८०।

हिलि
मिलकर।
क्रि.अ.
(हिं. हिलना)
मुहा.- हिलिमिलि, हिलमिली-(१) मेल-जोल या प्रेमपूर्वक। उ.-(क) आनि खेलत रहौ प्यारि स्याम तुम हिलमिली-७०७। (ख) आपुन जाइ मधु पुरी छाए, उहाँ रहे हिलिमिलि-ना. ४४३९। (२) इकट्ठा एकत्र होकर।

हिलिमिलौ
हेल-मेल या प्रेम का व्यवहार करो।
क्रि.अ.
(हिं. हिलना + मिलना)
उ.-वाही बिधि मोसौं हिलिमिलौ- ९-२।

हिलोर
(पानी की) तरंग।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हिल्लोल)

हिलोरा
(पानी की) लहर।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हिलोर)
मुहा.- हिलोर (बहु. हिलोरे) लेना-(पानी का) लहराना या तरंगित होना। (जी का) हिलोरा (बहु. हिलोरे) लेना-खूब मौज या मस्ती पर आना।

हिलना
प्रेम या प्रीति का संबंध।
यौ.

हिलनि
प्रीति, प्रेम।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हिलना)

हिलनि
हिलनि-मिलनि-परस्पर मेल-जोल याप्रेम के साथ मिलना और रहना।
यौ.
सूरदास प्रभु की सुनजरि उदित अंग, हिलनि-मिलनि तुव प्रीति प्रगटाई-ना. ३२७६।

हिलनो
हिलना।
क्रि.अ.
(सं. हल्लन)

हिला
परचा हुआ।
वि.
(हिं. हिलना)

हिला
हिला-मिला-मेल-जोलमें आया हुआ।
यौ.

हिला
खूब परचा हुआ।
यौ.

हिलाना, हिलानो
चलायमान करना।
क्रि.स.
(हिं. हिलना)

हिलाना, हिलानो
(स्थान से) उठाना या हटाना।
क्रि.स.
(हिं. हिलना)

हिलाना, हिलानो
कँपाना।
क्रि.स.
(हिं. हिलना)

सैन्य
प्रहरी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सैन्य
छावनी, शिविर।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सैन्य
सेना का, सेना-संबंधी।
वि.

सैफ
तलवार।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. सैफ़)

सैयद
मुहम्मद साहब के नाती हुसेन के बंशजों की उपाधि।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

सैयाँ
पति, स्वामी।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वामी)

सैया
पलँग, सेज।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं.) शैया)

सैरंध
घर का नौकर।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सैरंध्री
दासी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

सैरंध्री
द्रौपती का वह नाम जो उसने अज्ञातवास काल में राजा विराट के यहाँ रहने के लिए रखा था।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हिलोरना
पानी को हिलाकर लहरें उठाना।
क्रि.स.
(हिं. हिलोर + ना)

हिलोरना
इधर-उधर हिलाना-डुलाना, लहराना।
क्रि.स.
(हिं. हिलोर + ना)

हिलोरि
तरंगित करके।
क्रि.स.
(हिं. हिलोरना)
उ.-अमृत-सिंधु हिलोरि पूरन, कृपा दरसन देइ-ना. २४४९।

हिलोरी
(जल को) तरंगित करके।
क्रि.स.
(हिं. हिलोरना)
उ.-ग्वाल-बाल सब संग मुदित मन जाइ जमुन-जल न्हाइ हिलोरी-ना. ३५२६।

हिलोरे
(मन की) तरंग या कामना।
संज्ञा
पुं. बहु.
(हिं. हिलोर)
तेरे बल भामिनी बदत नहिं उपजत काम हिलोरे-ना. ३४४४।

हिलोल, हिल्लोल
(जल की) लहर या हिलोर।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिल्लोल)

हिलोल, हिल्लोल
(मन की) मौज या तरंग।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिल्लोल)

हिलोल, हिल्लोल
हिडोल' राग का एक नाम।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिल्लोल)

हिलोलन, हिल्लोलन
(जल की) लहर।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिल्लोल)

हिलोलन, हिल्लोलन
(मन की) तरंग।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिल्लोल)

हिसाब
किफायत, मितव्यय।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हिसाब
विचार, स्वभाव आदि का साम्य या मेल।
संज्ञा
पुं.
(अ.)
मुहा.- हिसाब बैठना- स्वभाव या प्रकृति में समानता होना, मेल मिलना।

हिसाब-किताब
आय-व्यय का ब्योरा या लेखा।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हिसाब-किताब
रुपये-पैसे का लेन-देन, उधार लेना-देना।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हिसाब-किताब
चाल, रंग-ढंग, रीति-नीति।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हिसिखा, हिसिषा, हिस्का
बैर, द्वेष।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. ईष्या या हिंसा)

हिसिखा, हिसिषा, हिस्का
डाह, ईर्ष्या।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. ईष्या या हिंसा)

हिसिखा, हिसिषा, हिस्का
होड़, स्पर्धा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. ईष्या या हिंसा)

हिसिखा, हिसिषा, हिस्का
बराबरी, समता, तुलना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. ईष्या या हिंसा)

हिस्सा
अंश।
संज्ञा
पुं.
(अ. हिस्सः)

हिलोलना, हिल्लोलनो, हिल्लोलना, हिल्लोलनो
हिलोरना।
क्रि.स.
(सं. हिल्लोल)

हिवँ
बरफ।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिम)

हिवँ
पाला।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिम)

हिवंचल
हिमालय।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिम + अंचल)

हिवाँर, हिवार
हिमस्थान।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिम + हिं. वार ?)
उ.-राम-नाम सरि तऊ न पूजै, जौ तनु गारौ जाइ हिवार-२-३।

हिवड़ा
मन, हृदय।
संज्ञा
पुं.
(सं. हृदय)

हिसका, हिसखा
ईर्ष्या, डाह।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिंसा या हिं. हीस)

हिसका, हिसखा
द्वेष, शत्रुता।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिंसा या हिं. हीस)

हिसका, हिसखा
होड़, स्पर्द्धा।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिंसा या हिं. हीस)

हिसका, हिसखा
हिसका-हिसकी-पारस्परिक स्पर्द्धा।
यौ.

हिसना, हिसनो
कम या क्षीण होना, ह्रास होना।
क्रि.अ.
(सं. ह्रास)

हिसाब
गिनकर या गणित करके लेखा तैयार करने का कार्य।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हिसाब
लेनदेन या आय-व्यय का लिखित विवरण।
संज्ञा
पुं.
(अ.)
मुहा.- हिसाब करना-जो जिसको देना हो, देकर साफ करना। कच्चा हिसाब- ऎसा ब्योरा जो मोटे तौर पर या अधूरे ढंग से तैयार किया गया हो। चलता हिसाब-लेन-देन या उधार बिक्री का जारी सिलसिला। हिसाब चलना- (१) लेन-देन का लेखा रखा जाना। (२) उधार का लिखा जाना। हिसाब चुकता करना या चुकाना- (१) जो कुछ बाकी हो, वह अदा करना। (२) किसी के पिछले अपराध का उचित दंड देना। हिसाब जाँचना- आय-व्यय के विवारण की जाँच करना। हिसाब जोड़ना-आय-व्यय या लेनदेन का लेखा करना। टेढ़ा हिसाब- (१) गड़बड़ ढंग से लिखा गया लेन-देन का ब्योरा। (२) गड़बड़ व्यवहार या रीति। हिसाब देना- (१) आय-व्यय या लेन-देन का ब्योरा बताना या समझाना। (२) किसी कार्य के संपादन का ठीक या उचित उपाय या युक्ति बताना। हिसाब पर चढ़ना-लेखेमें लिखा जाना। हुसाब बंद करना -(१) लेन-देन का सारा विवरण तैयार कर जोड़ लेना। (२) लेने-देने का कार्य आगे न चलाना। हिसाब बराबर करना- (१) जो देना हो, वह देना ; जो लेना हो, वह लेना। (२) अपना काम पूरा करना। बेड़ा हिसाब- (१) कोई कठिन या जटिल कार्य। (२) गड़बड़ व्यवहार या रीति। बे हिसाब-बहुत ही अधिक। हिसाब बेबाक करना-जो बाकी हो, वह दे-लेकर हिसाब चुकता करना। हिसाब बैठना- (१) सब बातों की उचित व्यवस्था या इच्छानुसार प्रबंध हो जाना। (२) सुख-सुविधा का प्रबंध होना। हिसाब में जमा होना- लेन-देन के ब्योरे में किसी से पायी हुई रकम का लिखा जाना। हिसाब में लगना- लेन देन में लगना। (किसी) हिसाब मे लगना- किसी कार्य, युक्ति या उपाय में जुटना। हिसाब में लगाना-लेन-देन के ब्योरे में लिखना या सम्मिलित करना। (किसी) हिसाब में लगाना-किसी कार्य, युक्ति या उपाय के साधन में जुटाना। हिसाब रखना-आय-व्यय या लेन-देन का ब्योरा रखना। हिसाब लगना या लड़ना- (१) कोई तदबीर या युक्ति ठीक होना जिससे अभीष्ट सिद्ध हो सके (२) तबियत या मेल मिलना। हिसाब लेना या समझना- आय-व्यय या लेन-देन का ब्योरा या विवरण पूछना और समझना। हिसाब समझाना-आय-व्यय या लेन-देन का ब्‍योरा या विवरण समझाना। हिसाब से-(१) अनुमान से। (२) लिखे हुए ब्योरे या विवरण के अनुसार।

हिसाब
गणित विद्या।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हिसाब
गणित का प्रश्न।
संज्ञा
पुं.
(अ.)
मुहा.- टेढ़ा हिसाब-गणित का कठिन, पेचीदा या जटिल प्रश्न। (२) मुश्किल या जटिल कार्य।

हिसाब
किसी चीज की दर, भाव।
संज्ञा
पुं.
(अ.)
मुहा.- हिसाब से- (१) दर या भाव से। (२) क्रम, गति या परिणाम के अनुसार।

हिसाब
बॅधी हुई रीति या व्यवस्था।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हिसाब
समझ, धारणा।
संज्ञा
पुं.
(अ.)
मुहा.- हिसाब से-विचार या ध्यान से, औचित्य की दृष्टि से।

हिसाब
हाल, दशा।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हिसाब
रहन-सहन, रीति-नीति।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हींगड़ा
घटिया हींग।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हींग + ड़ा)

हींचना, हींचनो
बल लगा कर अपनी तरफ लाना या खींचना।
क्रि.स.
(हिं. खींचना)

हींचना, हींचनो
म्यान से अस्त्र निकालना।
क्रि.स.
(हिं. खींचना)

हींचना, हींचनो
चूसना, सोख लेना।
क्रि.स.
(हिं. खींचना)

हींचना, हींचनो
किसी चीज का गुण निकाल लेना।
क्रि.स.
(हिं. खींचना)

हींचना, हींचनो
लकीरों से कोई आकृति या आकार बनाना।
क्रि.स.
(हिं. खींचना)

हींछना, हींछनो
इच्छा करना।
क्रि.स.
(हिं. हींछा)

हींछा
इच्छा, चाह।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. इच्छा)

हींडना
व्यर्थ या निरुद्देश्य धूमना-फिरना।
क्रि.अ.
(हिं. हंडना)

हींडना
खोजना, ढूँढ़ना।
क्रि.स.

हींस
घोड़े के बोलने का शब्द, हिनहिनाहट।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हेष)
उ.- गर्जनि पणव निसान शंख रव हय गज हींस चिकार-पृ. ५७० (२)।

हींसना, हींसनो
घोड़े का बोलना, हिनहिनाना।
क्रि.अ.
(हिं. हींस + ना)

ही
एक अव्यय जिसका प्रयोग किसी बातपर जोर या बल देने, निश्चय सूचित करने, अल्पता या परिमिति बताने, हीनता या उपेक्षा जताने, स्वीकृति देने आदि के लिए होता है।
अव्य.
[सं. हिं. ( निश्चयार्थक)]
उ.-पहिलैं हौं ही हो तब एक-२-३८।

ही
हृदय।
संज्ञा
पुं.
(सं. हृदय, हिं. हिय)
उ.- जो बीतति मोको री सजनी कहौं काहि यह ही की -पृ ३३१ (९)।

ही
थी।
क्रि.अ.
(ब्रज. 'हो' का स्त्री.
उ.- एक दिवस मेरे गृह आए, मैं ही मथति दही। (ख) जो मन मैं अभिलाष करति ही, सो देखति नँद-घरनी-१०-१२३।

हीअ, हीअरा, हीआ
हृदय।
संज्ञा
पुं.
(प्रा. हिअ.)

हीअ, हीअरा, हीआ
छाती।
संज्ञा
पुं.
(प्रा. हिअ.)

हीक
हिचकी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हिक्का)

हीक
हल्की-हल्की अप्रिय गंध।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हिक्का)
मुहा.- हीक आना या मारना-हलकी-हलकी दुगंध आने लगना।

हीचना, हीचनो
हिचकना।
क्रि.अ.
(हिं. हिचकना या अनु. हिच्)

हिस्सा
टुकड़ा, खंड।
संज्ञा
पुं.
(अ. हिस्सः)

हिस्सा
बँटने या विभक्त होने पर प्राप्त भाग।
संज्ञा
पुं.
(अ. हिस्सः)

हिस्सा
व्यापार में पूँजी, लाभ-हानि आदि का साझा या भाग।
संज्ञा
पुं.
(अ. हिस्सः)

हिस्सा
अंग, अवयव।
संज्ञा
पुं.
(अ. हिस्सः)

हिस्सेदार
वह जिसे किसी वस्तु का हिस्सा मिला हो या मिलने को हो।
संज्ञा
पुं.
(अ. हिस्सः + फ़. दार)

हिस्सेदार
साझेदार।
संज्ञा
पुं.
(अ. हिस्सः + फ़. दार)

हिस्सेदार
किसी कार्य आदि में भाग लेनेवाला, सहभागी।
संज्ञा
पुं.
(अ. हिस्सः + फ़. दार)

हिस्सेदारी
हिस्सेदार होने का भाव या स्थिति, सहभागिता।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हिस्सेदार)

हिहिनाना, हिहिनानो
(घोड़ों का)बोलना, हींसना या हिनहिनाना।
क्रि.अ.
(अनु. हिं. हिं.)

हींग
एक प्रसिद्ध मसाला जो अफगानिस्तान और फारस में अधिकता से होनेवाले एक पौधे का जमाया हुआ दूध का गोंद होता है।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हींगु)
उ.- (क) हींग हरद म्रिच छौंके तेले-३९६। (ख) हींग मिरच पीपरि अजवाइनि ये सब बनिज कहावैं-पृ. २४३ (८)। मूँग ढरहरी हींग लगाई-पृ. ४२१ (२१)।

हीछना, हीछनो
चाहना, इच्छा या कामना करना।
क्रि.अ.
(हिं. हींछा + ना)

हीछा
चाह, इच्छा।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हींछा)

हीज
काहिल, आलसी।
वि.
(देश.)

हीड़ना
व्यर्थ या निरुद्देश्य धूमना-फिरना।
क्रि.अ.
(हिं. हंडना)

हीड़ना
खोजना, ढूँढ़ना, पता लगाना।।
क्रि.स.

हीठना
पास या ,समीप जाना।
क्रि.अ.
(सं. अधिष्ठा, प्रा. अहिट्ठा)

हीठना
जाना, पहुँचना।
क्रि.अ.
(सं. अधिष्ठा, प्रा. अहिट्ठा)

हीन
छोड़ा हुआ, परित्यक्त।
वि.
(सं.)

हीन
बिना, वंचित, रहित, शून्य।
वि.
(सं.)

हीन
घटिया, निम्नकोटि का, निकृष्ट।
वि.
(सं.)

हीन
बुरा, नीच।
वि.
(सं.)
उ.-मोसों कोउ पतित नहिं अनाथ हीन दीन-१-१८२।

हीन
तुच्छ, महत्व हीन, नगण्य।
वि.
(सं.)
उ.- अधर मधुर मुसुक्यानि मनोहर, करति मदन मन हीन-४७८।

हीन
सुख-समृद्धिहीन।
वि.
(सं.)

हीन
(पथ से) भटका हुआ।
वि.
(सं.)

हीन
कम, थोड़ा, अल्प।
वि.
(सं.)

हीन
(साहित्य में) अधम नायक।
संज्ञा
पुं.

हीनक
हीनता-सूचक।
वि.
(सं.)

हीनक भावना
अपने को व्यक्ति-विशेष अथवा व्यक्तियों से हीन समझने की क्षुद्र भावना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हीनकर्मा
निर्दिष्ट कर्म न करनेवाला।
वि.
(सं.)

हीनकर्मा
बुरा काम करनेवाला।
वि.
(सं.)

हीनकुल
नीच या निम्न कुल का।
वि.
(सं.)

हीनक्रम
एक काव्य-दोष जो क्रम-व्यवस्था भंग करने पर होता है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हीनचरित
जिसका चरित्र बुरा हो।
वि.
(सं.)

हीनता
कमी, अभाव, राहित्य।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हीनता
तुच्छता, क्षुद्रता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हीनता
बुराई, निकृष्टता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हीनता
ओछापन।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हीनत्व
हीनता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हीनपक्ष
वह तर्क या बात जो प्रमाण से सिद्ध या पुष्ट न हो।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हीनबल
जिसमें बल न हो या जिसका बल घट गया हो।
वि.
(सं.)

सैलजा
पार्वती।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शैलजा)

सैलसुता
पार्वती।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शैल + सुता)

सैला
मेख।
संज्ञा
पुं.
(सं. शल्य)

सैला
मुठिया।
संज्ञा
पुं.
(सं. शल्य)

सैलात्मजा
पार्वती।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शैलात्मजा)

सैलानी
सैर करने या मन-माना घूमनेवाला।
वि.
(हिं. सैल = सैर)

सैलानी
मनमौजी, आनंदी।
वि.
(हिं. सैल = सैर)

सैलाब
पानी की बाढ़।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा.)

सैलूख
नाटक का अभिनेता, नट।
संज्ञा
पुं.
(सं. शैलूष)

सैलूख
चालाक, धूर्त।
संज्ञा
पुं.
(सं. शैलूष)

हीनबुद्धि
मूर्ख, जड़।
वि.
(सं.)

हीनमति
मूर्ख, बुद्धिहीन।
वि.
(सं.)

हीनयान
बौद्ध धर्म की वह प्राचीन शाखा जिसका प्रचार सिंहल, बरमा, स्याम आदि देशों में हुआ था और जिसके ग्रंथ मुख्यतः पाली भाषा में हैं।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हीनयोनि
निम्न जाति या कुल का।
वि.
(सं.)

हीनरस
एक काव्य-दोष जो किसी रस के उत्कर्ष में बाधक प्रसंगों के समावेश से होता है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हीनवर्ण
निम्न या शूद्र वर्ण।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हीनवर्ण
जो निम्न या शूद्र वर्ण का हो।
वि.

हीनवाद
व्यर्थ या मिथ्या तर्क।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हीनवाद
ऎसा कथन जिसमें पूर्वापर विरोध हो।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हीनवीर्य
बलहीन।
संज्ञा
पुं.
(सं. हीनवीर्य्य)

हीन-हयात
जीवन-काल।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हीन-हयात
जीवन भर के लिए।
अव्य.

हीनांग
जिसका कोई अंग खंडित हो।
वि.
(सं.)

हीनांग
जो सर्वांग या पूर्ण न हो, अधूरा।
वि.
(सं.)

हीना
निम्न कोटि या श्रेणी का।
वि.
(सं.)
उ.-ताको करत हीना-पृ २८८ (९१)।

हीनार्थ
जिसका उद्देश्य या कार्य पूर्ण न हुआ हो, विफल।
वि.
(सं.)

हीनार्थ
जिसको लाभ न हुआ हो।
वि.
(सं.)

हीनी
किसी तत्व, गुण आदि से खाली, रहित।
वि.
स्त्री.
(सं. हीन)
उ.-सूरदास प्रभू क्हौं कहाँ लगि, हे अपान मति हीनी-पृ. ५६४ (४९)।

हीनी
निम्न, तुच्छ, क्षुद्र।
वि.
स्त्री.
(सं. हीन)
उ.- मम बुधि भई हीनी-४-५।

हीनो
तुलना में घटकर या घटिया।
वि.
स्त्री.
(सं. हीन)
उ.-कामधेनु तैं नैंकु न हीनी-१०-३२।

हीनो
क्षुद्र, तुच्छ, निकृष्ट।
वि.
(सं. हीन)
उ.-बरु ए प्रान जाहिं ऎसे ही बयन होहिं क्यों हीनो- पृ. ५१६ (३४)।

हीनोपमा
वह उपमा जिसमें बड़े या महत के लिए छोटा या क्षुद्र उपमान प्रस्तुत किया जाय।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हीनौ
किसी तत्व, गुण आदि से खाली, रहित।
वि.
(सं. हीन)
उ.-महा मत्त बुधि-बल कौ ही नौ देखि करै अंधेरा-१-१८६।

हीनौ
तुचछ, क्षुद्र, निकृष्ट।
वि.
(सं. हीन)
उ.-अहिपति-सुता-सुवन सन्मुख ह्वै बचन कहथौ इक हीनौ-१-२९।

हीय, हीयरा, हीया, हीयो, हीयौ
हृदय।
संज्ञा
पुं.
(सं.हृदय, प्रा़ हिअ, हि् हिय या हिया)
मुहा.- कँप्यौ हीयौ-हृदय काँपने लगा, अत्यंत भयभीत हो गया। उ.- तुव सतम जज्ञ अरंभ लखि इंद्र कौ राज-हित कँप्यौ हीयौ-४-११।

हीर
एक वर्णवृत्त।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हीर
एक मात्रिक छंद।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हीर
वज्र।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हीर
सर्प।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हीर
सिंह।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हीर
मोती की माला।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हीर
हीरा' नामक रत्न।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हीरा)

हीर
किसी वस्तु का सार भाग।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हीरा)

हीर
लकड़ी के भीतर का बढ़िया भाग।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हीरा)

हीर
शरीर के भीतर का सार, धातु, वीर्य।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हीरा)

हीर
बल, शक्ति।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हीरा)

हीरक
हीरा' नामक रत्न।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हीरक-जयंती
किसी व्यक्ति, संस्था आदि की साठवें वर्ष मनायी जाने वाली जयंती।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हीरा
एक बहुमूल्य रत्न जो बहुत कड़ा और चमकदार होता है।
संज्ञा
पुं.
(सं. हीरक)
उ.-कंठ सुमाल हार मुकता के हीरा रतन अपार-ना. ४४३३।
मुहा.- हीरा खाना या हीरे की कनी चांटना-हीरे का कण या चूर खाकर आत्महत्या करना।

हीरा
हीरे जैसा अत्यंत श्रेष्ठ व्यक्ति, नररत्न।
संज्ञा
पुं.
(सं. हीरक)
उ.-कत अपनी परतीति नसावत, मैं पायौ हरि-हीरा- १-१३४।

हीरा
हीरे जैसी बहुमूल्य वस्तु।
संज्ञा
पुं.
(सं. हीरक)

हीरा
हीरे के समान स्वच्छ, कांतियुक्त और मूल्यवान।
वि.

हीरा
राधा की एक सखी का नाम।
संज्ञा
स्त्री.
उ.-अमला अबला कंजा मुकुता हीरा नीला प्यारि-१५८०।

हीरा
हृदय।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हियरा)

हीरामन
प्रचीन कहानियों में वर्णित तोते की एक जाति जिसका रंग सुनहरा माना गया है।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हिरा + मणि)

हीलना, हीलनो
अपने स्थान से इधर-उधर होना।
क्रि.अ.
(हिं. हिलना)

हीलना, हीलनो
चलायमान या गतियुक्त होना।
क्रि.अ.
(हिं. हिलना)

हीलना, हीलनो
लहराना।
क्रि.अ.
(हिं. हिलना)

हीलना, हीलनो
काँपना।
क्रि.अ.
(हिं. हिलना)

हीलना, हीलनो
जमा हुआ या दृढ़ न रह जाना।
क्रि.अ.
(हिं. हिलना)

हीलना, हीलनो
(मन का) डिगना या चंचल होना।
क्रि.अ.
(हिं. हिलना)

हीला
बहाना, मिस।
संज्ञा
पुं.
(अ. हीलः)

हीला
हीला-हवाला-बहाना।
यौ.

हीला
कीसी कार्य की सिद्धि के लिए निकला हुआ मार्ग, उपाय या साधन।
संज्ञा
पुं.
(अ. हीलः)
मुहा.- हीला निकलना-कार्य-साधन का ढंग निकलना।

हुँ
भी।
अव्य.
(हिं. हूँ)

हुँ
एक शब्द जिसे कहकर सुननेवाला यह सूचित करता है कि मैं सुन रहा हूँ।
अव्य.
(हिं. हॉं)

हुँ
स्वीकृत्ति सूचक शब्द, हाँ।
अव्य.
(हिं. हॉं)

हुँकना, हुँकनो
हुंकारना।
क्रि.अ, क्रि.स.
(हिं. हुंकरना)

हुँकरना, हुँकरनो
हुंकारना।
क्रि.अ, क्रि.स.
(हिं. हुंकारना)

हुँकार
दपटने का शब्द, ललकार।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हुंड
अनाज की बाल।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हुंडन
अंग का सुन्न होना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हुंडा
वह धन जो कुछ जातियों में वरपक्ष की ओर से कन्या पक्ष वालों को विवाह-खर्च के लिए दिया जाता है।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हुंडी)

हुँडावन
हुंडी लिखने या भेजने की दस्तूरी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हुंडी)

हुंडी
वह निधि-पत्र जिस पर रुपया लिखकर महाजनों में लेन-देन होता है।
संज्ञा
स्त्री.
(देश.)
मुहा.- हुंडी पटना-हुंडी का रुपया चुकाया जाना। हुंडी सकारना-हुंडी का रुपया देना या देना स्वीकार करना।

हुंडी
दर्शनी हुंडी-वह हुंडी जिसको दिखाते ही उसका रुपया देने का नियम हो। मियादी हुंडी-वह हुंडी जिसका रुपया नियत तिथि तक या उसके बाद देने का नियम हो।
यौ.

हुँत
पुरानी हिंदी की पंचमी और तृतीया की विभक्ति, से।
प्रत्य.
(प्रा. विभक्तिं 'हिंतो' )

हुँत
(के) लेए, वास्ते, निमित।
प्रत्य.
(प्रा. विभक्तिं 'हिंतो' )

हुँत
द्वारा।
प्रत्य.
(प्रा. विभक्तिं 'हिंतो' )

हुंभा
गाय के रँभाने का शब्द।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हुँकार
गर्जन।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हुँकारत
गरजता है।
क्रि.अ.
(हिं. हुंकारना)

हुँकारत
गरजता हुआ।
क्रि. वि.
उ.-आगे सिंह हुँकारत आवत निर्भय बाट जनावें-सारा. ३७५।

हुंकारना, हुंकारनो
दपटना, ललकारना।
क्रि.अ.
(सं. हुंकार + ना)

हुंकारना, हुंकारनो
गरजना।
क्रि.अ.
(सं. हुंकार + ना)

हुंकारना, हुंकारनो
किसी को ललकारना।
क्रि.स.

हुँकारी
सुननेवाले की 'हूँ' करने की क्रिया जो सूचित करती है कि वह वक्ता की बात सुन रहा है।
संज्ञा
स्त्री.
(अनु. हुँ हुँ + करना)
उ.-(क) कहत बात हरि कछू न समुझत, झँठहिं भरत हुँकारी-१०-१६७। (ख) यह सुनि सूर स्याम मन हरषे, पौढ़ि गए हँसि देत हुँकारी-१०-१९७।

हुँकारी
स्वीकृति या सहमति-सूचक क्रिया।
संज्ञा
स्त्री.
(अनु. हुँ हुँ + करना)

हुँकारी
रुपया या रकम सूचित करने की रेखा, बिकारी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हुंडि + कारी)

हुंड
मूर्ख व्यक्ति।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हु
एक अतिरेकसूचक शब्द, भी।
अव्य.
(सं. उप, प्रा. उअ, हिं. ऊ)

हुऑं
उस स्थान पर, वहाँ।
अव्य.
(हिं.वहाँ)

हुआ
होना' क्रिया का भूतकालीन एकवचन रुप।
क्रि.अ.
(हिं. 'होना' )

हुआ
गीदड़ के बोलने का शब्द।
संज्ञा
पुं.
(अनु.)

हुआना,हुआनो
बार-बार 'हुआ-हुआ' कहना।
क्रि.अ.
(अनु. हुआ)

हुआना,हुआनो
गीदड़ों का 'हुआ-हुआ' बोलना।
क्रि.अ.
(अनु. हुआ)

हुकना, हुकनो
सोहन' चिड़िया।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

हुकना, हुकनो
भूल जाना।
क्रि.अ.
(देश.)

हुकना, हुकनो
निशाना या लक्ष्य चूकना।
क्रि.स.
(हिं. हुचना)

हुकरना, हुकरनो
दपटना, ललकारना।
क्रि.अ.
(हिं. हुंकारना)

हुकरना, हुकरनो
गरजना।
क्रि.अ.
(हिं. हुंकारना)

हुकरना, हुकरनो
(किसी को) ललकारना।
क्रि.स.

हुकर, पुकर
दिल की धड़कन।
संज्ञा
स्त्री.
(अनु.)
मुहा.- कलेजा (या जी) हुकर-पुकर करना- (१) डर या घबराहट से जी का धकधक करना। (२) बहुत घबराहट या अधीरता होना।

हुकारना, हुकारनो
दपटना, ललकारना।
क्रि.अ.
(हिं. हुंकारना)

हुकारना, हुकारनो
गरजना।
क्रि.अ.
(हिं. हुंकारना)

हुकारना, हुकारनो
किसी को ललकारना।
क्रि.स.

हुकारयो, पुकारयौ
ललकारा।
क्रि.
(हिं. हुंकारना)
उ.- फिरि कहि कहि हरि मल्ल हुकारथौ- पृ. ४६९ (६)।

हुकुम
आज्ञा, अदेश।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हुक्म)

हुकुम
ताश का एक रंग।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हुक्म)

हुकूमत
शासन, प्रभुत्व।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

सैव
शिव के उपासकों का वर्ग या संप्रदाय।
संज्ञा
पुं.
(सं. शैव)

सैव
शिव का, शिव-संबंधी।
वि.

सैवल
सेवार।
संज्ञा
पुं.
(सं. शैवाल)

सैवलिनी
नदी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शैलविनी)

सैवार, सैवाल
सेवार।
संज्ञा
पुं.
(सं. शैवाल)

सैसव
वचपन।
संज्ञा
पुं.
(सं. शैशव)

सैसव
शिशु का।
वि.

सैसव
बचपन का।
वि.

सैसवता
बचपन, बाल्यावस्था।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शैशव)
उ.- सैसवता में हे सखी, जोबन कियौ प्रवेस-२०६५।

सैहथी
बरछी, साँग।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शक्ति)

हुकूमत
आधिकार, आधिपत्य।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)
मुहा.- हुकूमत चलना-अधिकार या प्रभुत्व माना जाना। हुकूमत चलाना- (१) अधिकार या प्रभुत्व से काम लेना, दूसरों को केवल आज्ञा देते रहना। (२) रोब, अधिकार या बड़प्पन दिखाना। (२) राजनीतिक शामन या अधिकार।

हुक्का
तम्बाकू पीने का एक नल-यंत्र।
संज्ञा
पुं.
(अ. हुक्कः)

हुक्का-पानी
एक जात-बिरादरी के लोगों का एक दूसरे के हाथ का हुक्का और पानी पीकर, सामाजिक दृष्टि से समान मानने या समाज में सम्मिलित करने का व्यवहार।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हुक्का + पानी)
मुहा.- हुक्का-पानी बंद करना-किसी सामाजिक अपराध का दंड देने के लेए किसी का छूआ हुक्का-पानी न पीकर जैसे उसे बिरादरी से निकाल देना। हुक्का-पानी बंद होना- किसी सामाजिक अपराध के दंडस्वरूप बिरादरी से निकाल दिया जाना।

हुक्काम
अधिकारीवर्ग।
संज्ञा
पुं.
(अ. हाकिम का बहु.)

हुक्कारना
डराने के लिए जोर का शब्द करना।
क्रि.अ.
(हिं. हुंकारना)

हुक्कारना
गरजना।
क्रि.अ.
(हिं. हुंकारना)

हुक्कारना
ललकारना।
क्रि.अ.
(हिं. हुंकारना)

हुक्म
आज्ञा, आदेश।
संज्ञा
पुं.
(अ.)
मुहा.- हुक्म उठाना-(१) आज्ञा या आदेश लौटा लेना। (२) आज्ञा पालन के लिए सेवा में रहना। हुक्म उलटाना-एक आज्ञा का निराकरण करनेवाली दूसरी आज्ञा प्राप्त करना। हुक्म की तामील- आज्ञा का पालन। (किसी का) हुक्म चलना-किसी की आज्ञा का पालन करने के लिए सबका बाध्य होना, किसी की आज्ञा सर्वमान्य होना। हुक्म चलाना-(१) अपना बड़प्पन या अधिकार सूचित करते हुए कोई आज्ञा देना। (२) आज्ञा या आदेश को प्रचलित करना। हुक्म जारी करना- (सर्व साधारण के लिए) आज्ञा या आदेश को प्रचलित करना। हुक्म तोड़ना-आज्ञा या आदेश के विरुद्ध काम कराना। हुक्म देना-आदेश देना। हुक्म बजाना या बजा लाना-(१) आज्ञा का पालन करना, आदेश के अनुसार कार्य करना। (२) किसी की सेवा या अधीनता में रहकर उसकी इच्छानुसार कार्य करना। हुक्म मानना-किसी के आदेश के अनुसार काम करना। हुक्म मिलना-आज्ञा या आदेश दिया जाना। जो हुक्म-(आपके) आदेश से अनुसार ही सारा काम होगा।

हुक्म
इजाजत, अनुमति।
संज्ञा
पुं.
(अ.)
मुहा.- हुक्म लेना-इजाजत या अनुमति लेना।

हुक्म
सर्व-साधारण के लिए प्रचारित, राज्य या शासन की आज्ञा।
संज्ञा
पुं.
(अ.)
मुहा.- हुक्म उठाना-राज्य या शासन की पूर्व प्रचारित आज्ञा को रद्द हर देना।हुक्‍म उलटाना- राज्‍य या शासन की पूर्व प्रचारित आज्ञा का निराकरण करनेवाली दूसरी प्राप्त कर लेना। हुक्म चलाना या जारी करना-सर्वसाधारण के लिए किसी आज्ञा को प्रचलित करना।

हुक्म
शासन प्रभुत्व।
संज्ञा
पुं.
(अ.)
मुहा.- हुक्म में होना-शासन या अधिकार में होना।

हुक्म
विधि या धर्मशास्त्र की आज्ञा।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हुक्म
ताश का एक रंग।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हुक्मनामा
आज्ञा-पत्र।
संज्ञा
पुं.
(अ. हुक्म + फ़ा. नामा)

हुक्मबरदार
आज्ञाकारी।
संज्ञा
पुं.
(अ. हुक्म + फ़ा. बरदार)

हुक्मबरदार
सेवक।
संज्ञा
पुं.
(अ. हुक्म + फ़ा. बरदार)

हुक्मबरदारी
आज्ञा-कारिता।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हुक्मबरदार)

हुक्मबरदारी
सेवा।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हुक्मबरदार)

हुक्मी
आज्ञानुसार कार्य करनेवाला।
वि.
(अ. हुक्म)

हुक्मी
पराधीन।
वि.
(अ. हुक्म)

हुजूर
अधिकारी या शासक के लिए अधीनस्थ कर्मचारियों या सामान्य व्यक्तियों का संबोधन।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हुजूर
(किसी के) सामने या समक्ष।
क्रि. वि.
उ.-किनि देख्यो, किनि कही बात यह जो मो हुजूर कहै आनी-पृ ३८० (१३)।

हुजूरी
किसी प्रतिष्ठित या अधिकारी की समक्षता।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हुजूर +हिं. प्रत्य. ई)

हुजूरी
किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति, अधिकारी या शासक की सेवा में हर समय रहनेवाला सेवक।
संज्ञा
पुं.

हुजूरी
किसी की चापलूसी में हर समय लगा रहनेवाला मुसाहब।
संज्ञा
पुं.
मुहा.- जी हुजूरी करना-चापलूसी या खुशामद करना।

हुजूरी
अधिकारी या शासक का, सरकारी।
वि.

हुज्जत
व्यर्थ का तर्क-कुतर्क।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हुज्जत
कहासुनी, तकरार।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हुज्जती
व्यर्थ का तर्क-वितर्क करनेवाला।
वि.
(हिं. हुज्जत)

हुज्जती
कहासुनी या तकरार करने का आदी।
वि.
(हिं. हुज्जत)

हुक्मी
अचूक, अवश्य गुणकारी (औषध)।
वि.
(अ. हुक्म)

हुचकना, हुचकनो
हिचकियाँ ले लेकर रोना, सिसकना।
क्रि.अ.
(हिं. हुचकी)

हुचकना, हुचकनो
हच हच' करके झुकना।
क्रि.अ.
(हिं. हिचकना)

हुचकना, हुचकनो
लक्ष्य-भ्रष्ट होना।
क्रि.अ.
(देश.)

हुचकी
पेट की वायु का कुछ रुरक-रुक कर झोंके के साथ गले से निकलना।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हिचकी)

हुचकी
बहुत देर तक रोने पर इसी प्रकार सिसकी के साथ साँस का निकलना।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हुचकी)

हुचना, हुचनो
लक्ष्य से चूकना।
क्रि.अ.
(देश.)

हुजूम
भीड़, जमाव।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हुजूर
किसी प्रतिष्ठित या अधिकारी व्यक्ति की समक्षता।
संज्ञा
पुं.
(अ.)
मुहा.- (किसी के) हुजूर में- (किसी प्रतिष्ठित या अधिकारी के) आगे या सामने।

हुजूर
बादशाह या अधिकारी का दरबार या उसकी कचहरी।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हुड़क, हुड़कन
हुड़कने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
स्त्री.
(अनु.)

हुड़कना
बच्चे का, जिससे वह बहुत हिला हो, उसके वियोग में बहुत रोना और दुखी होना।
क्रि.अ.
(अनु.)

हुड़कना
बच्चे का किसी कारण से डर जाना।
क्रि.अ.
(अनु.)

हुड़कना
(जी) तरसना।
क्रि.अ.
(अनु.)

हुड़कनि
हुड़कने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
स्त्री.
(अनु.)

हुड़कनो
हुड़कना।
क्रि.अ.
(अनु.)

हुड़दंग, हुड़दंगा
धमा-चौकड़ी, उछल-कूद और उपद्रव।
संज्ञा
पुं.
(अनु. हुड़ + हिं. दंगा)

हुड़ुक
एक प्रकार का छोटा ढोल या बाजा।
संज्ञा
पुं.
(सं. बुडुक्क)
उ.-बाजत हुड़ुक मँजीरा नूपुर नाना भाँति नचायो-सारा. ४०७।

हुडुक्क
हुड़ुक' नामक छोटा ढोल या बाजा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हुडुक्क
मतवाला आदमी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हुतवह
अग्नि।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हुता
होना' का प्राचीन भूतकालिक रूप, था।
क्रि.अ.
(हिं. हुत)

हुतागि, हुतागिनि, हुताग्नि
वह जिसने हवन किया हो।
संज्ञा
पुं.
(सं. हुताग्नि)

हुतागि, हुतागिनि, हुताग्नि
हवन की अग्नि।
संज्ञा
पुं.
(सं. हुताग्नि)

हुताश, हुतास
आहुति खानेवाला, अग्नि।
संज्ञा
पुं.
(सं. हुताश)

हुताशन, हुतासन
आग, अग्नि।
संज्ञा
पुं.
(सं. हुताशन)
उ.- (क) लछिमन रचौ हुतासन भाई-९-१६१। (ख) मलयज गरल हुतासन मारुत साखामृग रिपुवीर- पृ. ३६९ (३)।

हुताशा, हुतासा
आग, अग्नि।
संज्ञा
पुं.
(सं. हुताश)
उ.-क्षमा भयो जल परे हुतासा-पृ २३१ (६९ )।

हुति
करण और अपादान करकों का चिह्र, से, द्वारा।
अव्य.
(प्रा. हिंतो)

हुति
तरफ से, ओर से।
अव्य.
(प्रा. हिंतो)

हुति
हवन, यज्ञ।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हुडु
उजड्ड।
वि.
(देश.)

हुडु
उद्दंड।
वि.
(देश.)

हुत
हवन करते समय अग्नि में डाला हुआ, आहुति रूप में दिया हुआ।
वि.
(सं.)

हुत
हवन की सामग्री।
संज्ञा
पुं.

हुत
शिव जी का एक नाम।
संज्ञा
पुं.

हुत
था।
क्रि.अ.
('होना' क्रिया का प्राचीन भूत.)

हुत
द्वारा, से।
अव्य.
(प्रा. हिंतो)

हुतभक्ष
अग्नि।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हुतभुक, हुतभुक्
अग्नि।
संज्ञा
पुं.
(सं. हुतभुक्)

हुतभुज, हुतभुज्
अग्नि।
संज्ञा
पुं.
(सं. हुतभुज्)

हुतीं
होना' का प्राचीन भूतकालिक, बहुवचन, स्त्रीलिंग रूप; थीं।
क्रि.अ.
(हिं. हुत)
उ.-(क) ऎसो हाल हमारो कीन्हौ जात हुतीं दहि लै हौ-ना. २०८४। (ख) गोपी हुतीं प्रेमरस माती-पृ ४२० (१६)।

हुती
होना' का प्राचीन भूतकालिक, एकवचन, स्त्रीलिंग रूप; थीं।
क्रि.अ.
(हिं. हुत)
उ.- (क) साबिक जमा हुती जो जोरी-१-१४३। (ख) ठानी हुती और कछु मन मैं-१-२९९। (ग) तहँ उरबसी सखिनि समेत आई हुती स्नान कैं हेत-९-२। (घ) बैठी हुती जसोदा मंदिर-१०-५०। (ङ) वह जो हुती प्रतिमा समीप की-पृ. ४९० (४)। (च) हुती बड़ी नगरी-पृ ५२४ (४)।

हुते
से, द्वारा।
अव्य.
(प्रा.हिंतो)

हुते
तरफ से, ओर से।
अव्य.
(प्रा.हिंतो)

हुते
होना' क्रिया का प्राचीन भूतकालिक, बहुवचन, या एकवचन आदरार्थक पुल्लिंग रूप।
क्रि.अ.
(हिं. हुत)
उ.- (क) जब हुते नंद-दुलारे-१-२५। (ख) अरजुन के हरि हुते सारथी-१-२६४। (ग) असुर द्वै हुते बलवंत भारी-८-११। (घ) इक हरि चतुर हुते पहिले हीं-पृ ५४६ (४)

हुतो, हुतौ
होना' क्रिया का प्राचीन भूतकालिक एकवचन, पुल्लिंग रूप।
क्रि.अ.
(हिं. हुत)
उ.- (क) गर्भ परीच्छित रच्छा कीनी, हुतौ नहीं वस माँ कौ-१- ११३। (ख) एकै चीर हुतौ मेरे पर-१-२४७। (ग) राजा रहत हुतौ तहँ एक-५-२। (घ) दसरथ नृपति हुतौ रघुबंसी-१०-१९८।

हुतो, हुतौ
तरफ से, ओर से।
अव्य.
(प्रा.हिंतो)

हुदकना, हुदकनो
उकसना, उभरना।
क्रि.अ.
(देश.)

हुदकाना, हुदकानो
उकसाना, उभारना।
क्रि.स.
(देश.)

हुदना, हुदनो
चकपकाना, स्तब्ध होना।
क्रि.अ.
(सं. हुंडन)

हुमकाना, हुमकानो
हुमकने को प्रवृत्त करना।
क्रि.स.
(हिं. हुमकना, हुमगना)

हुमगना, हुमगनो
जोर से या बलपूर्वक आगे बढ़ना या आघात करना।
क्रि.अ.
(सं. उमंग)

हुमगना, हुमगनो
प्रसन्न होना।
क्रि.अ.
(सं. उमंग)

हुमगाना, हुमगानो
जोर से या बलपूर्वक आगे बढ़ना या आघात करना।
क्रि.स.
(हिं. हुमगना)

हुमगाना, हुमगानो
प्रसन्न करना।
क्रि.स.
(हिं. हुमगना)

हुमचना, हुमचनो
किसी चीज पर चढ़कर उसे बार-बार जोर से नीचे दबाना।
क्रि.अ.
(अनु.)

हुमचना, हुमचनो
उछलना-कूदना।
क्रि.अ.
(अनु.)

हुमचना, हुमचनो
(बच्चों का) ठुमकना।
क्रि.अ.
(अनु.)

हुमड़ना, हुमड़नो, हुमरना, हुमरनो
(द्रव पदार्थ का) उतराकर बह चलना।
क्रि.अ.
(हिं. उमड़ना)

हुमड़ना, हुमड़नो, हुमरना, हुमरनो
(किसी हलके पदार्थ का) ऊपर उठकर फैलना या छा जाना।
क्रि.अ.
(हिं. उमड़ना)

हुनरमंद
कला-कुशल, निपुण।
वि.
(फ़ा.)

हुन्न
सोना, स्वर्ण।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हुन)

हुन्न
स्वर्ण-मुद्रा।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हुन)

हुब, हुब्ब
प्रेम, अनुराग।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हुब, हुब्ब
उमंग, उत्साह।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हुमकना, हुमकनो
किसी चीज पर चढ़कर उसे बार-बार नीचे दबाना।
क्रि.अ.
(अनु. हुँ)

हुमकना, हुमकनो
उछलना-कूदना।
क्रि.अ.
(अनु. हुँ)

हुमकना, हुमकनो
पैर से जोर लगाना।
क्रि.अ.
(अनु. हुँ)

हुमकना, हुमकनो
पैरों को तानकर जोर से आघात करना।
क्रि.अ.
(अनु. हुँ)

हुमकना, हुमकनो
(बच्चों का) ठुमकना।
क्रि.अ.
(अनु. हुँ)

सैहौं
सहन करूँगा या करूँगी।
क्रि.स.
(हिं. सहना)
उ.- एक गाँव एक ठाँव को बास एक तुम कैहौ, क्यौं मैं सैहौं-८४३।

सों
करण और आपादान कारकीय चिह्न, से, द्वारा।
प्रत्य., अव्य.
(प्रा. सुतो)

सों
समान, तुल्य।
अव्य.
(हिं. सा)

सों
सामने, सम्मुख।
अव्य.
(हिं. सौंह)

सों
कसम, शपथ।
संज्ञा
स्त्री.
उ.- बात सुने तें बहुत हँसोंगे चरन-कमल की सों।

सों
साथ, संग।
क्रि. वि.
उ.- मन हरि सों, तनु धरहिं चलावति।

सों
वह।
सर्व.
(हिं. सो)

सोंज
वस्तु।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सौंज)

सोंज
सामग्री।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सौंज)

सोंट, सोंटा
मोटा डंडा।
संज्ञा
पुं.
(सं. शुण्ड या हिं. सटना, सोंटा)
मुहा.- सोंटा चलना- मार-पीट होना। सोंटा चलाना या जमाना- सोंटे से प्रहार करना।

हुदना, हुदनो
रुकना, ठहरना।
क्रि.अ.
(सं. हुंडन)

हुदहुद
एक पक्षी।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हुन
सोना, स्वर्ण।
संज्ञा
पुं.
(सं. हूण)

हुन
स्वर्ण-मुद्रा।
संज्ञा
पुं.
(सं. हूण)
मुहा.- हुन बरसना बहुत आय या लाभ होना।

हुनना, हुननो
हवन करना।
क्रि.स.
(सं. हवन +हिं. प्रत्य. ना)

हुनना, हुननो
अहुति देना।
क्रि.स.
(सं. हवन +हिं. प्रत्य. ना)

हुनना, हुननो
भस्म करना।
क्रि.स.
(सं. हवन +हिं. प्रत्य. ना)

हुनर
कारीगेरी, कला।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा.)

हुनर
कार्य-संपादन का कौशल।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा.)

हुनरमंद
कारीगरी जाननेवाला, कलाविद्।
वि.
(फ़ा.)

हुमड़ना, हुमड़नो, हुमरना, हुमरनो
तल या सतह से कुछ ऊँचा होना, उकसना।
क्रि.अ.
(हिं. उभड़ना)

हुमड़ना, हुमड़नो, हुमरना, हुमरनो
ऊपर निकलना, उठना।
क्रि.अ.
(हिं. उभड़ना)

हुमड़ना, हुमड़नो, हुमरना, हुमरनो
पैदा होना।
क्रि.अ.
(हिं. उभड़ना)

हुमड़ना, हुमड़नो, हुमरना, हुमरनो
अधिक या प्रबल होना।
क्रि.अ.
(हिं. उभड़ना)

हुमसना, हुमसनो
हुमचना।
क्रि.अ.
(हिं. हुमचना)

हुमसना, हुमसनो
(हवा न चलने पर) गर्मी होना।
क्रि.अ.
(हिं. उमसना)

हुमसाना, हुमसानो
जोर से ऊपर उठाना, उछालना।
क्रि.स.
(हिं. हुमसना)

हुमसाना, हुमसानो
बढ़ाना।
क्रि.स.
(हिं. हुमसना)

हुमसाना, हुमसानो
उकसाना, उत्तेजित करना।
क्रि.स.
(हिं. हुमसना)

हुमा
एक कल्पित पक्षी जिसके संबंध में प्रसिद्ध है कि उसकी छाया जिस पर पड़ जाती है, वह राजा हो जाता है।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)

हुमेल
वह माला या हार जिसमें रजत या स्वर्ण मुद्राएँ गुँथी हों।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हमायल)

हुरकें
हुड़ुक' नामक ढोल या बाजा।
संज्ञा
पुं. सवि.
(हिं. हुड़क)
उ.- ढाढ़ी और ढाढ़िनि गावैं, ठाढ़े हुरकें बजावैं-१०-३१।

हुरदंग, हुरदंगा
धमा-चौकड़ी।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हुड़दंग)

हुरदंग, हुरदंगा
उपद्रव और उछलकूद।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हुड़दंग)

हुरमत
इज्जत-आबरू।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हुरुमयी
एक तरह का नृत्य।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हुलरना, हुलरनो
हिलना-डोलना।
क्रि.अ.
(हिं. हिलना)

हुलराना, हुलरानो
हिलाना-डुलाना।
क्रि.स.
(हिं. हिलाना)

हुलसत
प्रसन्न होता है।
क्रि.अ.
(हिं. हुलसना)
उ.-हुलसत, हँसत, करत किलकारी, मन अभिलाष बढ़ावैं-१०-४५।

हुलसना, हुलसनो
बहुत प्रसन्न होना, अत्यंत उल्लास में होना।
क्रि.अ.
(हिं. हुलास)

हुलसना, हुलसनो
उठना, उभरना।
क्रि.अ.
(हिं. हुलास)

हुलसना, हुलसनो
बढ़ना, उमड़ना।
क्रि.अ.
(हिं. हुलास)

हुलसना, हुलसनो
प्रसन्न या प्रफुल्लित करना।
क्रि.स.

हुलसना, हुलसनो
जो सदा प्रसन्न रहे, हँसमुख।
वि.

हुलसाना
हुलसना।
क्रि.अ.
(हिं. हुलसना)

हुलसाना
प्रसन्न या प्रफुल्लित करना।
क्रि.स.

हुलसाना
उठाना, उभारना।
क्रि.स.

हुलसाना
बढ़ाना, उमड़ाना।
क्रि.स.

हुलसानी
प्रसन्न या आनंदित हुई।
क्रि.अ.
(हिं. हुलसना)
उ.- महरिनिरखि मुख हिय हुलसानी-१०-४६।

हुलसाने
प्रसन्न या आनंदित हुए।
क्रि.अ.
(हिं. हुलसना)
उ,- ब्रजजन निरखत हिय हुलसाने-१०-११७।

हुलसानो
हुलसना।
क्रि.अ.
(हिं. हुलसना)

हुलसानो
हुलसाना।
क्रि.स.
(हिं. हुलसाना)

हुलसावति
प्रसन्न या आनंदित होती है।
क्रि.अ.
(हिं. हुलसावना)
उ.-आजु गयौ मेरौ गाइ चरावन, कहि-कहि मन हुलसावति-४२२।

हुलसावन
प्रसन्न या आनंदित करनेवाले।
वि.
(हिं. हुलसावना)
उ.-सूरदास प्रभु जनमे भक्त-हुलसावन रे-१०-२८।

हुलसावना
हुलसना।
क्रि.अ.
(हिं. हुलसना)

हुलसावना
हुलसाना।
क्रि.स.
(हिं. हुलसाना)

हुलसावनी
प्रसन्न या प्रफुल्लित करनेवाली।
वि.
स्त्री.
(हिं. हुलसावना)
उ.- जैसी ही हरी हरी भूमि हुल-सावनी मोर मराल मुख होत न थोरनो-पृ. ४१४ (८०)।

हुलसावनो
हुलसना।
क्रि.अ.
(हिं. हुलसना)

हुलसावनो
हुलसाना।
क्रि.स.
(हिं. हुलसाना)

हुलसि
प्रसन्न होकर, उमंग में भरकर।
क्रि.अ.
(हिं. हुलसना)
उ.- मुख प्रतिबिंब पकरिबे कारन हुलसि घुटुरुवनि धावत-१०-१०२।

हुलसित
बहुत प्रसन्न, बहुत उमंग में भरा हुआ।
वि.
(हिं. हुलास)

हुलसी
उल्लास, उमंग।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हुलसना)

हुलसी
कुछ लोगों के अनुसार, गो. तुलसीदास की माता का नाम।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हुलसना)

हुलसे
प्रसन्न या आनंदित हुए।
क्रि.अ.
(हिं. हुलसना)
उ.- त्यौं ब्रज-जन हुलसे सबै आवत हैं नँद-नंद-५८९।

हुलस्यो, हुलस्यौ
उमंग या उल्लास से भर गया।
क्रि.अ.
(हिं. हुलसना)
उ.- रति-जल-जलज हियौ हुलस्यौ मन पलक पाँखुरी फूली-पृ ३९९ (७९)।

हुलहुल
एक पौधा जिसकी पत्तियों का साग खाया जाता है।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

हुला
लाठी का छोर।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हूलना)

हुलाना
लाठी, भाले आदि को जोर से पेलना।
क्रि.स.
(हिं. हूलना)

हुलाल
लहर, तरंग।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हुलसना)

हुलास
हर्ष की उमंग, उल्लास, आह्लाद।
संज्ञा
पुं.
(सं. उल्लास)
उ.- (क)मारथौ ताहि प्रचारि हरि सुर-मन भयौ हुलास-३-१२। (ख) आए बाहरि निकसि कै, मन सब कियौ हुलास-४३१। (ग) सूर स्याम जसुमति घर लै गई, ब्रज जन मनहिं हुलास-६०४। (घ) सूर अरुन आगमन देखि कै प्रफुलित भए हुलास-पृ. २७५ (४४)।

हुलास
हौसला, उत्साह।
संज्ञा
पुं.
(सं. उल्लास)

हुलास
बढ़ने या उमगने का भाव।
संज्ञा
पुं.
(सं. उल्लास)

हुलास
सुँघनी।
संज्ञा
स्त्री.

हुलासी
आनंदी, उल्लसित।
वि.
(हिं. हुलास)

हुलासी
हौसलेवाला, उत्साही।
वि.
(हिं. हुलास)

हुलिया
शकल, आकृति।
संज्ञा
पुं.
(अ. हुलियः)

हुलिया
किसी व्यक्ति के रूप-रंग या उसकी आकृति का ऎसा विवरण जिससे उसको सहज ही पहचाना जा सके।
संज्ञा
पुं.
(अ. हुलियः)

हुल्लड़
हो-हल्ला, कोलाहल।
संज्ञा
पुं.
(अनु.)

हुल्लड़
उत्पात, उपद्रव।
संज्ञा
पुं.
(अनु.)

हुल्लास
एक छंद।
संज्ञा
पुं.
(सं. उल्लास)

हुसियार
समझदार।
वि.
(फ़ा. होशियार)

हुसियार
दक्ष, कुशल।
वि.
(फ़ा. होशियार)

हुसियार
सचेत, सावधान।
वि.
(फ़ा. होशियार)
उ.- सब दल होहि हुसियार चलहु मठ घेरहिं जाई- पृ. ५७२ (८)।

हुसियार
जो समझने योग्य अवस्था का हो, सयाना।
वि.
(फ़ा. होशियार)

हुसियार
चालाक, धूर्त।
वि.
(फ़ा. होशियार)

हुसैन
मुहम्मद साहब के नाती जो करबला के मैदान में मारे गये थे। मुहर्रम इन्हीं के शोक में मनाया जाता है।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हुस्न
सौंदर्य।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हुस्यार
होशियार।
वि.
(फ़ा. होशियार)

हूँ
स्वीकृति-सूचक शब्द।
अव्य.
(अनु.)

हूँ
समर्थनसूचक शब्द।
अव्य.
(अनु.)

हूँस
बुरी नजर, टोंक।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हिंस)

हूँस
कोसना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हिंस)

हूँसना, हूँसनो
बुरी नजर लगाना।
क्रि.स.
(हिं. हूँस)

हूँसना, हूँसनो
ईर्ष्या से जलना।
क्रि.अ.

हूँसना, हूँसनो
जलन या बैर से कोसना।
क्रि.अ.

हू
भी।
अव्य.
(सं. उप = आगे, प्रा. उव, हिं. ऊ.)

हूक
कलेजे की पीड़ा या हृदय की वेदना जो रहरह कर उठे।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हिक्का)

हूक
दर्द, पीड़ा, कसक।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हिक्का)
उ.-हृदय जरत है दावानल ज्यों, कठिन बिरह की हूक - पृ. ४८६ (४९)।

हूक
मानसिक संताप।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हिक्का)

हूक
खटका, आशंका।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हिक्का)

हूँ
ध्यानपूर्वक सूनना सूचित करने का शब्द।
अव्य.
(अनु.)

हूँ
भी।
अव्य.
(हिं. हू)
उ.-स्याम-बलराम बिनु दूसरे देव कौं स्वप्न हूँ माहिं नहिं हृदय ल्याऊँ-१-१७७।

हूँ
होना' क्रिया का वर्तमानकालिक, उत्तम पुरुष, एकवचन रूप। सर्व. हौ, मैं।
क्रि.अ.

हूँकति
विशेष दुःख सूचित करने के लिए गैयाँ धीरे-धीरे या हुँड़ककर बोलती हैं।
क्रि.अ.
(हिं. हूँकना)
उ.-(गाय) जल-समूह बरसति दोउ आँखें, हूँकति लीने नाउँ-पृ. ५५८ (२१)।

हूँकना, हूँकनो
गाय का, विशेष दुख सूचित करने के लिए हुड़क-हुड़ककर बोलना।
क्रि.अ.
(सं. हुंकार वा अनु.)

हूँकना, हूँकनो
सिसक-सिसककर बोलना।
क्रि.अ.
(सं. हुंकार वा अनु.)

हूँकना, हूँकनो
गरजकर बोलना, हुंकारना।
क्रि.अ.
(सं. हुंकार वा अनु.)

हूँठ
साढ़े तीन।
वि.
(सं. अर्द्धचतुर्थ, प्रा. अद्धुट्ठ)

हूँठा
साढ़े तीन का पहाड़ा।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हूँठ)

हूँस
जलन, ईर्ष्या, डाह।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हिंस)

सोंट, सोंटा
भंग घोटने का मोटा डंडा।
संज्ञा
पुं.
(सं. शुण्ड या हिं. सटना, सोंटा)

सोंठ, सोंठि
सुखाया हुआ अदरक।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शुण्ठी)
उ.- (क) अति प्यौसर सरस बनाई। तिहिसोट-मिरिच रुचि नाई-१०-१८३। (ख) कूट काइफर सोंठि चिरैतौ कटजीरा कहुँ देखत-११०८।

सोंठौरा
(प्रसूता स्त्री के लिए) सोंठ तथा कुछ मेवा-मसालों का बना हुआ लडडू।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोंठ + औरा)

सोंध
सामने, सम्मुख।
अव्य.
(हिं. सौंह)

सोंधा
खुशबूदार, सुगंधित।
वि.
(हिं. सुगंध)

सोंधा
तपी हुई भूमि पर वर्षा का पहला पानी पड़ने या भुने हुए चने या बेसन की सुगंध के समान।
वि.
(हिं. सुगंध)

सोंधा
एक तरह का सुगंधित मसाला जिससे स्त्रियाँ केश धोती हैं।
संज्ञा
पुं.

सोंधा
एक मसाला जो तेल को सुगंधित करने के लिए उसमें मिलाया जाता है।
संज्ञा
पुं.

सोंधा
खुशबू, सुगंध।
संज्ञा
पुं.

सोंधी
सुगंधित।
वि.
स्त्री.
(हिं. सोंधा)
उ.- बासौंधी सिखरनि अति सोंधी-२३२१।

हूकना,हूकनो
कसक, पीड़ा या वेदना होना।
क्रि.अ.
(हिं. हूक)

हूकना,हूकनो
पीड़ा से चौंक-चौंक पड़ना।
क्रि.अ.
(हिं. हूक)

हूजत
होता है।
क्रि.अ.
(हिं. हूजना)
उ.- बासर स्याम बिरह अहि ग्रासित हूजत मृतक समान-पृ. ४२३ (३१)।

हूजना, हूजनो
होना।
क्रि.अ.
(हिं. होना)

हूजिए
हो जाइए, बन जाहए।
क्रि.अ.
(हिं. हूजना)
उ.-बृंदाबन द्रुम लता हूजिए-पृ. ३४४ (३२)।

हूजियत
होना चाहिए, होना उचित है।
क्रि.अ.
(हिं. हूजना)
उ.- पर-मद पिये. मत्त न हूजियत काहे कौं इतरात-ना. ४३०५।

हूज्यो, हूज्यौ
हुआ।
क्रि.अ.
(हिं. हूजना)
उ.-परसन हमहिं सदा प्रभु हूज्यो-१०३८।

हूटना, हूटनो
अपने स्थान से हटना या टलना।
क्रि.अ.
(सं. हूड् या हिं. हटना)

हूटना, हूटनो
(लड़ाई या संघर्ष से) पीछे हटना या पीठ फेरना।
क्रि.अ.
(सं. हूड् या हिं. हटना)

हूठना, हूठनो
(चिढ़ाने के लिए) किसी की भावभंगी, मुद्रा आदि की नकल करना या होंठ बिचकाना।
क्रि.अ.
(हिं. होंठ ?)

हूठा
(किसी को चिढ़ाने य बनाने के लिए) अँगूठा दिखाने, होंठ बिचकाने और हाथ मटकाने की चेष्टा या क्रिया।
संज्ञा
पुं.
(हिं. अँगूठा ?)
मुहा.- हूठा देना-उक्त क्रिया या चेष्टा करना।

हूड़
उजड्ड।
वि.
(देश.)

हूड़
उद्दंड।
वि.
(देश.)

हूण
एक प्राचीन मंगोल जाति जिसने चौथी पाँचवीं शताब्दी में अनेक बार भारत पर आक्रमण किये थे।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

हूत
बुलाया हुआ।
वि.
(सं.)

हूनना, हूननो
आग में डालना।
क्रि.स.
(सं. हवन)

हूनना, हूननो
विपत्ति में फँसाना।
क्रि.स.
(सं. हवन)

हू-बहू
ज्यों का त्यों।
वि.
(अ.)

हू-बहू
(किसी के) ठीक समान।
वि.
(अ.)

हूय
आवाहन।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हूर
स्वर्ग की अप्सरा (मुसलमान)।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हूरना, हूरनो
ठेलना, घुसेड़ना, हूलना।
क्रि.स.
(हिं. हूलना)

हूरना, हूरनो
मारना।
क्रि.स.
(हिं. हूलना)

हूल
हूलने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शूल)

हूल
हूक, टीस।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शूल)

हूल
हल्ला, कोलाहल।
संज्ञा
स्त्री.
(अनु.)

हूल
हर्ष या आनंद की ध्वनि।
संज्ञा
स्त्री.
(अनु.)

हूल
ललकार।
संज्ञा
स्त्री.
(अनु.)

हूलना, हूलनो
लाठी, भाले आदि की नोक जोर से घुसाना या धँसाना।
क्रि.स.
(हिं. हूल)

हूश, हूस
गँवार, उजड्ड।
वि.
(हिं. हूड़)

हूह
हुंकार, ललकार।
संज्ञा
स्त्री.
(अनु.)

हूहू
लपटों के साथ अग्नि के जलने पर होनेवाला शब्द।
संज्ञा
पुं.
(अनु.)

हृत
छीनकर लिया या हरण किया हुआ।
वि.
(सं.)

हृति
छीनने या हरण करने की क्रिया या भाव, लूट, हरण।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हृत्कंप
हृदय की धड़कन।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हृत्कंप
जी का (भय से) दहलना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हृत्तंत्री
हृदयरूपी वीणा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हृत्तल
दिल, कलेजा, हृदय।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हृत्पिंड
वह मांस-पिंड जो 'हृदय' कहलाता है, हृदय-कोश।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हृद, हृद्
हृदय।
संज्ञा
पुं.
(सं. हृद्)
उ.- जे पद-कमल संभु-चतुरानन हृद अंतर लै राखे-५७१।

हृदयग्राही
मन को मुग्ध करने या रुचिकर लगनेवाला।
वि.
(सं. हृदयग्राहिन् )

हृदय-निकेत
मनोज, कामदेव।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हृदय-प्रमाथी
मन को क्षुब्ध या चंचल करनेवाला।
वि.
(सं. हृदयप्रमाथिन् )

हृदय-प्रमाथी
मन को मोहनेवाला।
वि.
(सं. हृदयप्रमाथिन् )

हृदय-वल्लभ
प्रियतम, प्राणप्यारा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हृदयवान, हृदयवान्
जिसके हृदय में कोमल भावों का सहज ही उदय हो जाय, सहृदय, भावुक।
वि.
(सं. हृदयवत्)

हृदयवान, हृदयवान्
रसिक।
वि.
(सं. हृदयवत्)

हृदय-विदारक
(शोक, करुणा आदि की वह घटना) जिससे हृदय को बहुत शोक हो या जिससे हृदय में करुणा का उदय हो।
वि.
(सं.)

हृदय-वेधी
मन को अत्यंत मुग्ध करनेवाला।
वि.
(सं. हृदयवेधिन् )

हृदय-वेधी
अत्यंत शोक या करुणा उत्पन्न करनेवाला।
वि.
(सं. हृदयवेधिन् )

हृद, हृद्
ताल, सरोवर।
संज्ञा
पुं.
(सं. हृद)
उ.-नाभि हृद, रोमावली-अलि चले सहज सुभाव-१-३०७।

हृदयंगम
जो अच्छी तरह समझ में आ गया हो, जिसका ठीक ठीक बोध बोध हो गया हो।
वि.
(सं.)

हृदय
छाती की बायीं ओर का वह भीतरी मांसकोश-जैसा अवयव जिसमें धड़कल होती है और जिसमें से होकर शुद्ध लाल रक्त शरीर की नाड़ियों में पहुँचता है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
मुहा.- हृदय धड़कना-(१) जीवित होने की स्थिति सूचित होना। (२) भय, आशंका आदि से हृदय की धड़कन बढ़ जाना।

हृदय
छाती, वक्षस्थल।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
मुहा.- हृदय से लगाना- छाती से लगाना, भेंटना, आलिंगन करना।

हृदय
छाती के मध्य भाग में स्थित माना हुआ वह रागात्मक अंग जो प्रेम, हर्ष, शोक, करुणा, क्रोध आदि मनोविकारों का उत्पत्ति-स्थान माना जाता है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.-ता छिन हृदय-कमल प्रफूलित ह्वै जनम सफल करि लेखौं-।
मुहा.- हृदय उमड़ना-मन में प्रेम, करुणा आदि का वेग उत्पन्न होना। हृदय जलना- (१) मन में दुख, शोक आदि का उत्पन्न होना। (२) किसी की उन्नति, समृद्धि आदि देखकर ईर्ष्या होना। हृदय जरत है-मन को बहुत बिकल कर देनेवाले दुख, शोक आदि का अनुभव होता है। उ.-हृदय जरत है दावानल ज्यौं कठिन विरह की हूक- पृ. ४८६ (४९)। (हरष, सुख आदि) हृदय में न अमाना या समाना-बहुत ही हर्ष या प्रसन्नता होना। हरष हृदय न माइ, सुख न हृदय समाइ-बहुत ही आनद या सुख का अनुभव होता है। उ.- (क) सूरदास प्रभु सिसुता कौ सुख सकै न हृदय समाइ-१०-१७८। (ख) हरष अक्रूर हृदय न माइ-पृ. ४६२ (५६)। हृदय भर आना-मन में प्रेम, शोक, करुणा आदि का उत्पन्न होना। हृदय विदीर्ण होना-दुख, शोक करुणा आदि के कारण मन को बहुत कष्ट होना।

हृदय
मन, अतःकरण।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
मुहा.- हृदय धरना या धारना-हृदयंगम करना। हृदय धरि-हृदयंगम करके या करो। उ.-सदगूरु कौ उपदेस हृदय धरि जिन भ्रम सकल निवारथौ-१-३३६। बचन हृदय नाहिं धारथौ-उपदेश को हृदयंगम नहीं किया या स्मरण नहीं रखा। उ.-उन यह बचन हृदय नहिं धारौ-३-६। हृदय की गाँठ- (१) मन का दुर्भाव। (२) छल कपट। हृदय लाना-ध्यान या स्मरण करना। हृदय ल्याऊ-ध्यान या स्मरण करूँ। उ.-स्याम बलराम बिनु दूसरे देव कौं स्वप्न हूँ माहिं नाहिं हृदय ल्याऊँ-१-१७७।

हृदय
अंतरात्मा, विवेक-बुद्धि।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हृदय
किसी वस्तु का सार या तत्व भाग।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हृदय
गूढ़ बात, रहस्य।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हृदय
अत्यंत प्रिय व्यक्ति।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हृदय-वेधी
अत्यंत अप्रिय लगनेवाला।
वि.
(सं. हृदयवेधिन् )

हृदयस्पर्शी
हृदय पर विशेष प्रभाव डालनेवाला।
वि.
(सं. हृदयस्पर्शिन् )

हृदयस्पर्शी
हृदय में दया या करुणा उत्पन्न करनेवाला
वि.
(सं. हृदयस्पर्शिन् )

हृदयहारी
मन को लुभाने या मोहनेवाला।
वि.
(सं. हृदयहारिन् )

हृदयाल, हृदयाला, हृदयालु
भावुक, सहृदय।
वि.
(सं. हृदयालु)

हृदयाल, हृदयाला, हृदयालु
सदय, उदार।
वि.
(सं. हृदयालु)

हृदयाल, हृदयाला, हृदयालु
दृढ़ हृदय-वाला।
वि.
(सं. हृदयालु)

हृदयाल, हृदयाला, हृदयालु
साहसी।
वि.
(सं. हृदयालु)

हृदयेश, हृदयेश्वर, हृदयेस्वर
प्रियतम।
संज्ञा
पुं.
(सं. हृदय = ईश, ईश्वर)

हृदयेश, हृदयेश्वर, हृदयेस्वर
पति।
संज्ञा
पुं.
(सं. हृदय = ईश, ईश्वर)

हृदयोन्मदिनी
हृदय को उत्मत्त कर देनेवाली।
वि.
स्त्री.
(सं.)

हृदयोन्मदिनी
मन को अत्यंत मुग्ध करनेवाली।
वि.
स्त्री.
(सं.)

हृदयोन्मदिनी
संगीत में एक श्रुति।
संज्ञा
स्त्री.

हृदि
हृदय में।
संज्ञा
पुं.
(सं. 'हृद' का अधिकरण रूप)

हृदै
हृदय।
संज्ञा
पुं.
(सं. हृदय)
उ.- ऎसौ ज्ञान हृदै मैं आनौ-३-१३।

हृदै
(सवि.) हृदय में।
संज्ञा
पुं.
(सं. हृदय)
उ.- तेरे हृदै न संसय राखौं-२-३७।

हृद्गत
हृदय का, मन का, आंतरिक।
वि.
(सं.)

हृद्गत
समझ या ध्यान में आया हुआ।
वि.
(सं.)

हृद्गत
मनचीता, रुचिकर।
वि.
(सं.)

हृद्देश
हृदयस्थल, मन।
संज्ञा
पुं.
(सं. हृत + देश)

हृद्देश
प्रियतम।
संज्ञा
पुं.
(सं. हृदयेश)

हृद्देश
पति।
संज्ञा
पुं.
(सं. हृदयेश)

हृद्य
हृदय का, हृदयसंबंधी।
वि.
(सं.)

हृद्य
हृदय को रुचनेवाला।
वि.
(सं.)

हृद्य
हृदय को सुखी करनेवाला।
वि.
(सं.)

हृषि
आनंद।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हृषि
कांति।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हृषीक
इंद्रिय।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हृषीकेश
विष्णु का एक नाम।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हृषीकेश
श्रीकृष्ण।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हृषु
प्रसन्न, हर्षित।
वि.
(सं.)

हृषु
अग्नि।
संज्ञा
पुं.

हृषु
सूर्य।
संज्ञा
पुं.

हृषु
चंद्र।
संज्ञा
पुं.

हृष्ट
प्रसन्न।
वि.
(सं.)
उ.- दिति दुर्बल अति, अदिति हृष्ट चित देखि सूर संधान-९-२०।

हृष्ट
खड़ा हुआ (रोआँ या रोम)।
वि.
(सं.)

हृष्ट
जो कड़ा हो गया हो।
वि.
(सं.)

हृष्टपुष्ट
मोटा-ताजा।
वि.
(सं.)

हृष्टपुष्ट
स्वस्थ।
वि.
(सं.)

हृष्टि
हर्ष, प्रसन्नता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

सोंधु
सुगंधित।
वि.
(हिं. सोंधा)

सोंधे
सुगंध।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोंधा)
उ.- सूरदास प्रभु की बानक देखे गोपी-ग्वाल टारे न टरत निपट आवै सोंधे की लपट-८३९। (ख) पवन गवन आवें सोंधे की झकोरे-२२८७।

सोंवनिया
नाक का एक आभूषण।
संज्ञा
पुं.
(सं. सुवर्ण)
उ.- नासिका अति सुंदर राजत सोंवनिया।

सोंह
कसम, शपथ।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सौंह)

सोंह
सामने, सम्मुख।
अव्य.

सोंहट
सीधा-सादा, सरल।
वि.
(देश.)

सोंही
सामने, सम्मुख।
अव्य.
(हिं. सौंह)

सो
वह।
सर्व.
(सं. सः)
उ.- सूरदास ऎसे स्वामी कौं देहिं पीठि सो अभागे-१-८।

सो
इसलिए, अतः, निदान।
अव्य.

सो
समान, तुल्य।
वि.
(हिं. सा)

हेंगा
मिटटी चूर करने का पाटा (खेती)।
संज्ञा
पुं.
(सं. अभ्यंग)

हें हें
धीरे-धीरे हँसने का शब्द।
संज्ञा
स्त्री.
(अनु.)

हें हें
दीनतापूर्वक या गिड़गिड़ाकर हँसने का शब्द।
संज्ञा
स्त्री.
(अनु.)
मुहा.- हें हें करना- (१) खीसें निपोरना। (२) दीनतापूर्वक या निर्लज्जता से हँसना।

हे
संबोधन-सूचक अव्यय।
अव्य.
(सं.)

हे
थे।
क्रि.अ.
(ब्रज. 'हो' का बहु.)
उ.- (क) मानी हार बिमुख दुरजोधन जाके जोधा हे सौ भाई-१-२४। (ख) मनसा करि सुमिरत हे जब-जब मिलते तब तबहीं-१-२८३। (ग) माता सौं कछु करते कलह हे, रिस डारी बिसराई हो-७००।

हेकड़
कड़े बदन का।
वि.
(हिं. हुया + कड़ा)

हेकड़
प्रबल, प्रचंड।
वि.
(हिं. हुया + कड़ा)

हेकड़
अक्खड़, ऎंठू, उद्धत।
वि.
(हिं. हुया + कड़ा)

हेकड़ी
अधिकार, बल या ऎंठ दिखाने की क्रिया या भाव, अक्खड़पन, उद्धतता।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हेकड़)
मुहा.- हेकड़ी दिखाना- ऎंठ, अकड़ या अक्खड़पन दिखाना। (किसी की) हेकड़ी भुला देना या भुलाना- किसी को नीचा दिखाकर गर्व या अभिमान चूर करना। हेकड़ी भूल जाना या भूलना- (१) (दूसरे के सामने) नीचा देखकर मन ही मन हार मानना या लज्जित होना।

हेच
तुच्छ, हीन।
वि.
(फ़ा.)

हेच
सारहीन।
वि.
(फ़ा.)

हेठ
जो नीचे हो।
वि.
(सं. अधस्थः , प्रा. अहट्ठ)

हेठ
जो किसी बात में घटकर या कम हो।
वि.
(सं. अधस्थः , प्रा. अहट्ठ)

हेठ
नीचे।
क्रि. वि.

हेठ
बाधा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेठ
हानि।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेठा
जो नीचे हो।
वि.
(हिं. हेठ)

हेठा
जो (किसी से) घटकर या कम हो।
वि.
(हिं. हेठ)

हेठा
तुच्छ, हीन।
वि.
(हिं. हेठ)

हेठापन
तुच्छता।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हेठा + पन)

हेठी
तौहीनी, अप्रतिष्ठा।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हेठा)

हेड़ी
शिकारी, ब्याध।
संज्ञा
पुं.
(हिं. अहेरी)

हेत
प्रेम, अनुराग।
संज्ञा
पुं.
(सं. हित)
उ.- (क) देखौ करनी कमल की (रे) कीन्हौं रवि सौं हेत-१-३२५। (ख) सूरदास-प्रभु खात परस्पर माता अंतर-हेत बिचारथौ-४०७। (ग) इहिं बिधि रहसत-बिलसत दंपति, हेत हियैं नहिं थोरे-७३२। (घ) बाहर हेत हितू कहावत, भीतर काज सयाने-ना. ४६२६।

हेत
श्रद्धा।
संज्ञा
पुं.
(सं. हित)
उ.- जज्ञ-भाग नहिं लियौ हेत सौ, रिषिपति पतित बिचारे- १-२५।

हेत
अभिप्राय, उद्देश्य।
संज्ञा
पुं.
(सं. हेतु)
उ.-मुक्ति-हेत जोगी स्रम साधैं-१-१०४।

हेत
कारण।
संज्ञा
पुं.
(सं. हेतु)
उ.-सखी री, हरि आवें केहि हेत-२८००।

हेति
आग की लौ या लपट।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हेति
वज्र।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हेति
भाला।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हेति
अस्त्र।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हेतु
लगाव, राग, संबंध।
संज्ञा
पुं.
(सं. हित)

हेतु
प्रेम, अनुराग।
संज्ञा
पुं.
(सं. हित)
उ.-कपट हेतु कियौ हरि हमसे खोटो होहिं खरी-पृ. ४८५ (४१)।

हेतु
कृपा, अनुग्रह।
संज्ञा
पुं.
(सं. हित)
उ.-हारि मानि हहरथौ हरि चरननि हरषि हियैं अब हेतु करैं-पृ. २२० (८९)।

हेतुमान, हेतुमान्
जिसका हेतु या कारण हो।
वि.
(सं. हेतुमत)

हेतुमान, हेतुमान्
वह बात या कार्य जिसका कोई कारण हो।
संज्ञा
पुं.

हेतुवाद
तर्क-विद्या या शास्त्र।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेतुवाद
कुतर्क।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेतुवाद
नास्तिक।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेतुवादी
तर्क करनेवाला, तार्किक।
वि.
(सं. हेतुवादिन्)

हेतुवादी
कुतर्की।
वि.
(सं. हेतुवादिन्)

हेति
चोट, आघात।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हेति
सूर्य की किरण।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हेति
धनुष की टंकार।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हेती
के लिए, के उद्देश्य से।
क्रि. वि.
(सं. हेतु)
उ.- जानि पिय अतिहिं आतुर नारि आतुरी गई बन-तीर तनु सुद्ध हेती-ना. ३२२२।

हेतु
अभिप्राय, उद्देश्य।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेतु
वजह, सबब, कारण।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेतु
कारण-रूप वस्तु या व्यक्ति।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेतु
दलील, तर्क।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेतु
वह तर्कसंगत बात या युक्ति जिससे कोई सिद्धांत या निष्कर्ष निकाला जाय या दूसरी बात सिद्ध हो।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेतु
एक अर्थालंकार जिसमें कारण के साथ ही कार्य का अथवा कारण का ही कार्य-रूप में उल्लेख होता है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेमगिरि
सुमेरु पर्वत (जो पुराणों में सोने का बताया गया है)।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेमदंता
एक अप्सरा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हेमपुष्प
चंपा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेमपुष्प
अशोक।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेमपुष्पिका
सोनजुही।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हेममय
सुनहरा।
वि.
(सं.)

हेममाला
यमराज की पत्नी का नाम।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हेममाली
सूर्य।
संज्ञा
पुं.
(सं. हेममालिन्)

हेममुद्रा
सोने का सिक्का।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हेमयूथिका
सोनजुही।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हेतुवादी
नास्तिक।
वि.
(सं. हेतुवादिन्)

हेतुविद्या, हेतुशास्त्र
तर्कशास्त्र।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेतुहेतुमद्भाव
कार्य-कारण-संबंध।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेतुहेतुमद्भूत काल
क्रिया के भूतकाल का एक भेद।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेत्वाभास
किसी बात को सिद्ध करने के लिए बताया जानेवाला ऎसा कारण जो ठीक जान तो पड़े, पर वास्तव में ठीक न हो।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेमंत
शीत की वह ऋतु जो अगहन-पूस में होती है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेम
हिम, पाला।
संज्ञा
पुं.
(सं. हेमन्)
उ.-(क) कमलन यों हम हरी हेम अति कासौं कहै दुख टेरि-पृ. ४९९ (७५)। (ख) निरमोही नहिं नेह, कुमुदिनी अंतहु हेम हई-पृ. ५४६ (८)।

हेम
सोना, स्वर्ण।
संज्ञा
पुं.
(सं. हेमन्)
उ.-(क) गीध्यौ दुष्ट हेम तस्कर ज्यौं-१-१०२। (ख) सुंदर कुंडल हेम जराल-४७३।

हेमकूट
उत्तरी हिमालय का एक पर्वत।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेमकेश
शिवजी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेमसुता
दुर्गा देवी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हेमांग
चंपा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेमांग
सुमेरु पर्वत।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेमांग
विष्णु।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेमांग
गरुड़।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेमांग
ब्रह्मा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेमांगद
वसुदेव का एक पुत्र।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेमा
माधवी लता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हेमा
पृथ्वी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हेमा
सुंदर नारी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हेर
ढूँढ़, तलाश, खोज।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हेरना)

हेर
शिकार, मृगया।
संज्ञा
पुं.
(हिं. अहेर)

हेरत
देखता है।
क्रि.स.
(हिं. हेरना)
उ.-यह सुनि कान्ह भए अति आतुर द्वारैं तन फिरि हेरत-१०-२४३।

हेरन
देखने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हेरना)
उ.-चित चुभि रही मनोहर मूरति चपल दृगन की हेरन-पृ. ५४३ (७७)।

हेरना
ढूँढ़ना, खोजना, पता लगाना।
क्रि.स.
(सं. आखेट, पु. हिं. अहेर)

हेरना
देखना, ताकना, अवलोकना।
क्रि.स.
(सं. आखेट, पु. हिं. अहेर)

हेरना
जाँचना, परखना।
क्रि.स.
(सं. आखेट, पु. हिं. अहेर)

हेरना
खो देना, गँवाना।
क्रि.स.
(हिं. हारना)

हेरना
बिताना, व्यतीत करना।
क्रि.स.
(हिं. हारना)

हेरना-फेरना
इधर की चीज उधर करना।
क्रि.स.
(हिं. हेरना + अनु. फेरना)

हेमा
एक अप्सरा जो मंदोदरी की माता थी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हेमाचल
सुमेरु पर्वत।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेमाद्रि
सुमेरु पर्वत।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेमाभ
स्वर्ण-जैसी आभावाला।
वि.
(सं.)

हेमाल
एक राग।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेय
छोड़ने या त्यागने योग्य, त्याज्य।
वि.
(सं.)

हेय
बुरा, खराब।
वि.
(सं.)

हेय
तुच्छ।
वि.
(सं.)

हेरंब
गणेशजी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेर
मुकुट, किरीट।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोऽहम, सोऽहम्
वह (अर्थात् ब्रह्म) मैं ही हूँ।
पद.
(सं. सः + अहम्)

सोऽहमस्मि
वही (अर्थात् ब्रह्म) मैं ही हूँ।
पद.
(सं. सः + अहम् + अस्मि)

सोअना, सोअनो
नींद लेना।
क्रि.अ.
(हिं. सेना)

सोआ
एक तरह का साग।
संज्ञा
पुं.
(सं. मिश्रेया)

सोआए
सुला दिये।
क्रि.स.
(हिं. सोआना)
उ.- छोरे निगड़, सोआए पहरू, द्वारे कौ कपाट उघरथो-१०-८।

सोआना, सोआनो
सुलाना, सोने को प्रवृत्त करना।
क्रि.स.
(हिं. सोआना)

सोइ
वही।
सर्व.
(हिं. सो + ही)
उ.- (क) सोइ सगुन ह्वै नंद की दाँवरी बँधावै-१-४। (ख) सोइ प्रसाद सूरहिं अबं दीजै-१-२०४। (ग) ज्ञान बिराग तुरत तिहिं होइ। सूर बिष्नु पद पावै सोइ-६-४। (घ) पाप उजीर कह्यौ सोइ मान्यौ-१-६४।

सोइ
सोकर, सोने (पर)।
क्रि.अ.
(हिं. सोना)
उ.- जैसै सुपने सोइ देखियत तैसे यह संसार-१-३१।

सोइ
सोइ रहौ-सो रहो।
प्र.
उ.- सूर स्याम तुम सोइ रहौ अब प्रात जान मैं दैहौं-४२०।

सोइ
इसलिए, अतः।
अव्य.
(हिं. सो)

हेरना-फेरना
(चीजों की) अदला बदली करना।
क्रि.स.
(हिं. हेरना + अनु. फेरना)

हेरनि
देखने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हेरना)
उ.-तासों भिरहु तुमहिं मो लायक इह हेरनि मुसकानि-पृ. ४३८ (२०)।

हेरनो
देखना।
क्रि.स.
(हिं. हेरना)

हेरनो
ढूँढ़ना, खोजना।
क्रि.स.
(हिं. हेरना)

हेरनो
परखना।
क्रि.स.
(हिं. हेरना)

हेरनो
देखने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
पुं.
उ.-जब आवत बलराम, देख्‍यो, मधुमंगल तन हेरनो-पृ. ४१४ (८०)।

हेर-फेर
धुमाव-फिराव, चक्कर।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हेरना + फेरना)

हेर-फेर
चालवाजी, दाँव-पेंच।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हेरना + फेरना)

हेर-फेर
अदल-बदल, उलट-फेर।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हेरना + फेरना)

हेर-फेर
धुमाव-फिराव या दाँव-पेंच की बात।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हेरना + फेरना)

हेराना
कहीं न मिलना, अभाव हो जाना।
क्रि.अ.
(हिं. हरण)

हेराना
लुप्त, नष्ट या तिरोहित हो जाना।
क्रि.अ.
(हिं. हरण)

हेराना
किसी के सामने फीका, मंद या कांतिहीन पड़ जाना।
क्रि.अ.
(हिं. हरण)

हेराना
सुध-बुध भूलना, आत्मविस्मृत होना।
क्रि.अ.
(हिं. हरण)

हेराना
तलाश करवाना, ढूँढ़ने या खोजने को प्रवृत्त करना।
क्रि.स.
(हिं. हेरना का प्रे. )

हेरानी
तलाश हो गयी।
क्रि.अ.
(हिं. हेराना)
उ.-सूरदास प्रभु मोहन देखत जनु बारिधि जल बूँद हेरानी पृ. २०३ (५०)।

हेराफेरी
अदल-बदल।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हेरना + फेरना)

हेराफेरी
(किसी चीज का) इधर का उधर किया जाना या होना।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हेरना + फेरना)

हेराफेरी
बार-बार (और जल्दी-जल्दी) कहीं आना-जाना।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हेरना + फेरना)

हेरि
देखकर।
क्रि.स.
(हिं. हेरना)
उ.-चहुँ दिसि सूर सोर करि धावैं, ज्यौ करि हेरि सृगाल-९-१०४।

हेरि
रही हेरि-(चकपका कर या अचरज से) देखती रह गयी।
प्र.
उ.-भीति बिनु कह चित्र रेखै, रही दूती हेरि-२०४३।

हेरि
विचारकर, समझकर।
क्रि.स.
(हिं. हेरना)
उ.-इन हिय हेरि मृगी सब गोपी, सायक ज्ञान हए-पृ. ५१८ (५०)।

हेरिऎ, हेरियै
देखिए, अवलोकिए।
क्रि.स.
(हिं. हेरना)
उ.-कृपानिधान सुदृष्टि हेरियै, जिहिं पतितनि अपनायौ-१-२०५।

हेरी
पुकार, टेर।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हे + री या हेरना)
उ.-हेरी-टेर सुनत लरिकनि की, दौरि गए नँदलाल-४१३।
मुहा.- हेरी देत-पुकार मचाता (है), टेर लगाता (है)। उ.- (क) कोऊ हेरी देत परस्पर-४३१। (ख) हेरी देत चले सब बन तैं, गोधन दियौ चलाइ-५०५। (ग) हेरी देत चले सब बालक -६११। हेरी देना-पुकारना, टेरना। हेरी देहिं-पुकारते या टेरते हैं। उ.-एक हेरी दैहिं, गावहिं, एक भेंटहिं धाइ-१०-२६।

हेरी
देखने-ताकने लगी।
क्रि.स.
(हिं. हेरना)
उ.-(क) अंबर हरत सबन तन हेरी-१-२५२। (ख) देखति भई चकित ग्वालि इत-उत कौं हेरी-१०-२७५।

हेरुक
गणेश जी का एक नाम।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेरें, हेरैं
देखकर।
क्रि.स.
(हिं. हेरना)
उ.-सबै हिरानी हरि-मुख हेरें-पृ. २५९ (९४)। (पाठा. हेरैं-ना. २२७१)।

हेरै
देखती-अवलोकती है।
क्रि.स.
(हिं. हेरना)
उ.-दूतिका हँसति हरि-चरित हेरै-पृ. ३६७ (९४)।

हेरै
ढूँढ़ती-खोजती हे।
क्रि.स.
(हिं. हेरना)
उ.-गई लिवाइ ग्वालनि बुलाइ कै, जहँ-तहँ बन-बन हेरै हो-४५२।

हेरै
विचारता, ध्यान देता, समझता या मानता है।
क्रि.स.
(हिं. हेरना)
उ.-पिता एक अवगुन नहिं हेरै-५-४।

हेर-फेर
फर्क, अंतर।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हेरना + फेरना)

हेर-फेर
लेन-देन या खरीदने-बेचने का काम।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हेरना + फेरना)

हेरवा
तलाश, खोज।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हेरना)

हेरवाना, हेरवानो
खोना, गँवा देना।
क्रि.स.
(हिं. हेराना)

हेरवाना, हेरवानो
तलाश या खोज करवाना, पता लगवाना, ढुँढ़वाना।
क्रि.स.
(हिं. हेरना का प्रे. )

हेरा
पुकारने या बुलाने का शब्द।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हेरना)

हेरा
ढूँढ़ने-खोजने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हेरना)

हेराइ
कहीं चली (गयी), खो (गयी)।
क्रि.अ.
(हिं. हेराना)
उ.-सूरस्याम या दरस-परस बिनु निसिगई नींद हेराइ-पृ. ३९३ (२७)।

हेराई
खो गयी, (कहीं) चली गयी।
क्रि.अ.
(हिं. हेराना)
उ.-आसन देइ बहुत करि बिनती, सुत धोखें तव बुद्धि हेराई-पृ. ५९२ (१३)।

हेराना
रह न जाना, कहिं चला जाना, खो जाना।
क्रि.अ.
(हिं. हरण)

हेरो, हेरौ
देखो, अवलोको।
क्रि.स.
(हिं. हेरना)
उ.-(क) नैंकु इतै हँसि हेरौ- १०-२१६। (ख) मोहन, नेक बदन तन हेरौ- पृ. ४६० (३२)।

हेरो, हेरौ
देखा, अवलोका, निहारा।
क्रि.स.
(हिं. हेरना)
उ.-ऎसे भए मनो नहिं मेरे जबहीं स्याम मुख हेरो- पृ. ३३२ (१६)।

हेरो, हेरौ
विचार करो।
क्रि.स.
(हिं. हेरना)
उ.-जौ मेरी करनी तुम हेरौ-१-१९४।

हेरयो, हेरयौ
देखा, निहारा, अवलोका।
क्रि.स.
(हिं. हेरना)
उ.-(क) बार-बार झकझोरि, नैंकु हलधर तन हेरथौ-५८९। (ख) गावहिं सब सहचरी, कुँवरि तामस करि हेरथौ-पृ. ५७१ (८)।

हेरयो, हेरयौ
हेरथौ चाहत-देखना-परखना चाहते हैं।
प्र.
उ.-कर करि कै हरि हेरथौ चाहतं, भाजि पताल गयौ अपहारी- १०-१९६।

हेल
खेप।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हील या हिल्ला)

हेलन
तिरस्कार या अवज्ञा करना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेलन
किलोल या केलि-क्रिड़ा करना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हेलना, हेलनो
किलोल या केलि-क्रिड़ा करना।
क्रि.अ.
(सं. हेलन)

हेलना, हेलनो
ठिठोली या विनोद करके मन बहलाना।
क्रि.अ.
(सं. हेलन)

हेलना, हेलनो
खेल या खिलवाड़ समझना।
क्रि.अ.
(सं. हेलन)

हेलना, हेलनो
हेय या तुच्छ समझना।
क्रि.स.
(हिं.हेला)

हेलना, हेलनो
परवाह न करना ध्‍यान न देना।
क्रि.स.
(हिं.हेला)

हेलना, हेलनो
(पानी में) पैठना।
क्रि.अ.
(हिं. हेलना)

हेलना, हेलनो
तैरना।
क्रि.अ.
(हिं. हेलना)

हेलमेल
साथ-साथ उठने-बैठने, मिलने-जुलने आदि का संबंध, घनिष्ठता।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हिलना + मिलना)

हेलमेल
संग-साथ।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हिलना + मिलना)

हेलमेल
परिचय।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हिलना + मिलना)

हेलया
खेल ही खेल या खिलवाड़ में।
क्रि. वि.
(सं.)

हेलया
हँसी-मजाक में।
क्रि. वि.
(सं.)

हेलया
सहज में, सरलता से।
क्रि. वि.
(सं.)

हेला
उपेक्षा और तिरस्कार योग्य या तुच्छ समझना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हेला
परवाह न करना ध्‍यान न देना।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हेला
खिलवाड़।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हेला
प्रेमपूर्ण केलि-क्रीड़ा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हेला
सरल काम, सहज बात।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हेला
साहित्य में संभोग श्रृंगार के अंतर्गत एक 'हाव' जिसमें नायिका आँखें या भौंहें मटकाकर या नचाकर मिलन अथवा संभोगेच्छा सूचित करती है।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हेला
हाँक, पुकार।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हल्ला)

हेला
चढ़ाई, आक्रमण।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हल्ला)

हेला
ठेलने की क्रिया या भाव, रेला, धक्का।
संज्ञा
पुं.
(हिं. रेलना)

हेला
भंगी, मेहतर।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हेल, हील)

हेला
खेप, खेवा।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हेल = खेप)

हेला
बारी, पारी।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हेल = खेप)

हेलिन
मेहतरानी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हेल, हेला)

हेली
हे सखी।
अव्य.
(संबो. हे + अली)
उ.-बसे री हेली, नयननि में षट इंदु-पृ. ३१४ (४१)।

हेली
सहेली, सखी।
संज्ञा
स्त्री.

हेली
विनोदी, क्रीड़ाशील।
वि.
(हिं. हेला = क्रीड़ा)

हेली-मेली
जिसमें मेल-जोल यां घनिष्ठता हो।
वि.
(हिं. हेल-मेल)

हेली-मेली
संगी-साथी।
संज्ञा
स्त्री., पुं.

हेली-मेली
सखी-सहेली।
संज्ञा
स्त्री., पुं.

हैकड़
हृष्ट-पुष्ट।
वि.
(हिं. हेकड़)

हैकड़
प्रबल, प्रचंड।
वि.
(हिं. हेकड़)

हैकड़
अक्खड़, उद्दंड।
वि.
(हिं. हेकड़)

हैकड़ी
अकड़, उद्दंडता।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हेकड़ी)

हैकल
एक गहना जो घोड़े के गले में पहनाया जाता है।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हय + हिं. गला)

हैकल
गले का एक गहना, हुमेल।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हय + हिं. गला)

हैजा
विशूचिका रोग।
संज्ञा
पुं.
(अ. हैजः)

हैतुक
जिसका कोई हेतु या उद्देश्य हो।
वि.
(सं.)

हैतुक
निर्भर, अवलंबित।
वि.
(सं.)

हैतुक
तार्किक।
संज्ञा
पुं.

हेलुआ, हेलुवा
पानी में घुसकर या खड़े होकर संगी साथियों या सखी-सहेलियों पर पानी का हिलोरा या छींटा मारने का खेल।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हेलना)
उ.-जमुना, तोहिं, बहुथौ क्यौं भावै। तोमैं कृष्ण हेलुआ (हेलुवा) खेलै, सो सुरत्यौ नहिं आवै-५६१।

हेलुआ, हेलुवा
एक प्रसिद्ध खाद्य, हलुआ।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हलवा)

हेवंत
अगहन-पूस की ऋतु, हेमंत ऋतु।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हेमत)

हेव
थे।
क्रि.अ.
(ब्रज. हे)
उ.- जब बृंदाबन रास रच्यौ हरि तबहिं कहाँ तुम हेव-पृ. ५१० (८३)।

हेवाँय
पाला, हिम।
संज्ञा
पुं.
(सं. हिमालि)

हैं
है' का बहुवचन रूप।
क्रि.अ.
(हिं. होना)
उ.-खग-मृग कहँ हैं हम लीन्हें-पृ. २४५ (३१)।

हैं
एक अव्यय जो निषेध, असम्मति आदि का सूचक है।
अव्य.
(अनु.)

हैंगुल
हिंगुल या ईंगुर-संबंधी।
वि.
(सं.)

है
होना' का वर्तमानकालिक एक वचन रूप।
क्रि.अ.
(हिं. होना)
उ.-कतहिं बकत है काम-काज बिनु-ना. ४३२४।

है
घोड़ा।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हय)
उ.-हैबर गैबर सिंह हंसबर खग-मृग कहँ हैं हम लीन्हे-पृ. २४५ (३१)।

सोइयत
सोया जाता है।
क्रि.अ.
(हिं. सोना)
उ.- नाहिंन इतौ सोइयत सुनि सुत प्रात परम सुचि काल-१०-२०७।

सोई
वही।
सर्व.
(हिं. सो + ही)
उ.- (क) सहि सन्मुख तउ सीत-उष्न कौं सोई सुफल करै-१-११७। (ख) जो मैं कहत रह्यौ भयौ सोई सपनंतर की प्रगट बताई-९३२।

सोई
निंद्रा लेने लगी।
क्रि.अ.
(हिं. सोना)
उ.- टहल करत मैं याके घर की, यह पति संग मिलि सोई-१०-३२२।

सोऊँ
निद्रा लूँ, शयन करूँ।
क्रि.अ.
(हिं. सोना)
उ.- सुख सोऊँ, सुनि बचन तुम्हारे, देहु कृपा करि बाँह-१-५१।

सोऊ
वह भी।
सर्व.
(हिं. सो + ऊ)
उ.- महादेव-हित जो तप करिहैं। सोऊ भव-जल तैं नहिं तरिहैं-४-५।

सोऊ
सोनेवाला।
वि.
(हिं. सोना)
उ.- तृष्ना हाथ पसारे निसि दिन, पेट भरे पर सोऊ-१-१८६।

सोए
निद्रा लेते रहे, सो गये, शयन किया।
क्रि.अ.
(हिं. सोना)
उ.- (क) सूर अधम की कहौ कौन गति, उदर भरे परि सोए-१-५२। (ख) सूर स्याम बिरुझाने सोए-१०-१९६। (ग) अब लौं कहा सेए मनमोहन, और बार तुम उठत सबार-४०३।

सोक
प्रिय व्यक्ति की मृत्यु से होने वाला परम कष्ट।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोक)
उ.- दरसन सुखी, दुखी अति सोचति षट-सुत सोक-सुरति उर आवति-१०-७।
मुहा.- सोक मनाना-प्रियजन की मृत्यु पर शोकचिह्न धारण करना और सामाजिक उत्सव आदि में सम्मिलित न होना।

सोक
प्रियजन के विरह से होनेवाला कष्ट।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोक)
उ.- (क) करिहैं सोक-संताप धार पितु-मातहिं देखौ-४९२। (ख) मदन गोपाल देखत ही सजनी सब दुख-सोक बिसारे-१५६९।

सोक
दुख, कष्ट।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोक)
उ.- (क) सीत-उष्न सुख-दुख नहिं मानै हर्ष-सोक नहिं खाँचै-१-८१। (ख) अंबर हरत सभा मैं कृष्ना सोक-सिंधु तैं तारी-१-२८२। (ग) गदगद कंठ सोक सौं सोवत बारि बिलोचन छाए-९-६७।

हैतुक
कुतर्की।
संज्ञा
पुं.

हैतुक
संशय-वादी, नास्तिक।
संज्ञा
पुं.

हैना
मार डालना।
क्रि.स.
(हिं. हनना)

हैना
ऎसा ही है न ?
वाक्य
(हिं. है + ना)

हैफ
अत्यंत खेद या शोक-सूचक शब्द।
अव्य.
(अ. हैफ़)

हेबर
अच्छा घोड़ा।
संज्ञा
पुं.
(सं. हय + वर)
उ.-हैबर गैबर सिंह हंसबर खग-मृग कहँ हैं हम लीन्हे-पृ. २४५ (३१)।

हैम
सोने का बना हुआ।
वि.
[सं. (हेम)]

हैम
सोने के रंग का, सुनहरा।
वि.
[सं. (हेम)]

हैम
हिम-संबंधी।
वि.
[सं. (हिम)]

हैम
जाड़े में होनेवाला।
वि.
[सं. (हिम)]

हैमवत
हिमालय संबंधी।
वि.
(सं.)

हैमवत
हिमालय पर होनेवाला।
वि.
(सं.)

हैमवत
हिमालय का वासी।
संज्ञा
पुं.

हैमवत
पृथ्वी के एक वर्ष या खंड का नाम (पुराण)।
संज्ञा
पुं.

हैमवती
पार्वती।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हैमवती
गंगा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हैमा
सोनजुही।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

हैरंब
गणेश-संबंधी।
वि.
(सं.)

हैरंब
गणेश का उपासक, गाणपत्य।
संज्ञा
पुं.

हैरण्य
सोने का बना हुआ।
वि.
(सं.)

हैरण्य
सोने के रंग का, सुनहरा।
वि.
(सं.)

हैरत
आश्चर्य, अचरज।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हैरान
दंग, भौचक्का, चकित, स्तब्ध।
वि.
(अ.)

हैरान
तंग, परेशान।
वि.
(अ.)

हैवान
इंसान' का उलटा, जानवर, पशु।
संज्ञा
पुं.
(अ.)

हैवान
गँवार, उजड्ड।
वि.

हैवानियत
इंसानियत' का उलटा, जानवरपन।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हैवान)

हैवानियत
जंगलीपन, गँवारूपन।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हैवान)

हैवानी
जानवर का।
वि.
(अ. हैवान)

हैवानी
(कार्य) जो जानवर या पशु के करने योग्य हो।
वि.
(अ. हैवान)

हों
होना' का संभाव्यकालीन बहु-वचन रूप।
क्रि.अ.
(हिं. होना)

होंठ
ओंठ, ओष्ठ।
संज्ञा
पुं.
(सं. ओष्ठ, पु. हिं. ओठ)
मुहा.- होंठ काटना या चबाना-आंतरिक क्षोभ या क्रोध प्रकट करना। होंठ चाटना-कोई स्वादिष्ट वस्तु खाकर और खाने की इच्छा प्रकट करना। होंठ चिपकना- किसी स्वादिष्ट वस्तु का नाम सुनकर खाने को लालायित होना। होंठ हिलाना-बोलने का प्रयत्न करना, बोलना।

होंठल
मोटे-मोटे होंठवाला।
वि.
[हिं. होंठ + (प्रत्य.) ल]

हो
पुकारनेका शब्द, हे।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हो
होना' के अन्य पुरुष संभाव्य काल और मध्यम पुरुष, बहुवचन का वर्तमान कालीन रूप।
क्रि.अ.
(हिं. होना)

हो
वर्तमानकालिक क्रिया 'है' का सामान्य भूतकालिक रूप, था।
क्रि.अ.
(ब्रज. है)
उ.-(क) नरहरि ह्वै हिरनाकुस मारथौ काम परथौ हों बाँकौ-१-११३। (ख) लै लै फिरे नगर मैं घर-घर जहाँ मृतक हो हौं-१-१५१। (ग) पहिलै हौं ही हो तब एक -२-३८। (घ) जहाँ न कोऊ हो रखवैया-१०-३३५।

होइ
होता हे।
क्रि.अ.
(हिं. होना)
उ.-नागिन के काटैं बिष होइ-९-२।
मुहा.- होइ सो होइ (होई)- जो होना होगा, वह होगा। उ.-(क) पाछैं होनी होइ सो होइ-६-५। (ख) की मारि डारियो दुहुँनि को, होइ सो होइ यह कहत रान्यो- पृ. ४६९ (२)। (ग) दूध पिवाइ हृदय सों लावौं पाछे होइ सो होई-पृ. ५९५ (२८)।

होइसि
होगा।
क्रि.अ.
(हिं. होना)
उ.-गोड़ पसारि परथौ दोउ नीकैं अब कैसी कह होइसि-१-३३३।

होइहैं
होगी।
क्रि.अ.
(हिं. होना)

होइहैं
उपजेंगी, उगेंगी।
क्रि.अ.
(हिं. होना)
उ.-बेनु कें राज मैं औषधी गिलि गईं होइहैं सकल किरपा तुम्हारी-४-११।

हैसियत
सामर्थ्य, शक्ति।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हैसियत
समाई, बिसात, आर्थिक स्थिति।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हैसियत
वर्ग, श्रेणी।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हैसियत
मान-मर्यादा, प्रतिष्ठा।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हैसियत
धन-संपत्ति।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हैहय
एक प्राचीन क्षत्रिय वंश जिसके सबसे प्रसिद्ध राजा कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन को परशुराम ने मारा था।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हैहय
हैहय राजा कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

हैहयराज
कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

है है
हाय हाय।
अव्य.
(हिं. हा हा)

हैहौं
मार डालूँगा।
क्रि.स.
(हिं. हनना)
उ.-सुन सुग्रीव प्रतिज्ञा मेरी, एकहिं बान असुर सब हैहौ-९-१५७।

होई
होता है।
क्रि.अ.
(हिं. होना)
उ.-हाव अरु भाव करि चलत चितवत जबै कौनै ऎसै जो मोहित न होई-८-११।

होई
एक देवी की पूजा जोदीपावली के आठ दिन पहले संतान की प्राप्ति और उसकी रक्षा के लिए की जाती है।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. अहोई)

होउ, होऊ
हो, घटित हो।
क्रि.अ.
(हिं. होना)
उ.-(क) होनो होउ होउ सो अबहीं, यहि ब्रज अन्न न खाउँ-पृ. ४८९ (८०)। (ख) अब मेरे मन ऎसी षट-पद होवे होहु सु होऊ-पृ. ५५० (४९)।

होछ
इच्छा।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हीछा)

होछना, होछनो
इच्छा करना।
क्रि.अ.
(हिं. हीछना)

होड़
बाजी, शर्त।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.हार = विवाद, लड़ाई)
उ.-सूर स्याम कह्यौ काल्हि दुहैंगे, हमहूँ तुम मिलि होड़ लगाई-६६८।

होड़
एक दूसरे से बढ़ जाने का प्रयत्न, चढ़ा-ऊपरी, प्रतियोगिता, स्पर्द्धा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.हार = विवाद, लड़ाई)
उ.-(क) दंपति होड़ करत आपुस मैं, स्याम खिलौना कीन्हौ री-१०-९८। (ख) हाथ तारी देत भाजत सबै करि-करि होड़-१०-२१३।

होड़
समान करने, बनने या होने का प्रयास, बराबरी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.हार = विवाद, लड़ाई)
उ.-(क) मोहिं प्रभु, तुमसौं होड़ परी-१-१३०। (ख) अरुन अधर नासिका निकाई, बदत परस्पर होड़-पृ. २७७ (५७)। (ग) वीद्याधर कौ रूप धारि, कह्यौ नाथ करै को तुमरी होड़-पृ. ४१७ (९२)। (घ) नैननि होड़ बदी बरसा सों-पृ. ५६५ (५७)।

होड़
जिद, अड़, हठ।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.हार = विवाद, लड़ाई)

होड़ाबाजी
शर्त।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. होड़ + बाजी)

होत
पुकारने का शब्द, हो।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हो)

होतब, होतब्य, होतव्य
वह जिसका होना निश्चित हो, होनेवाला, होनहर।
संज्ञा
पुं.
(सं. भवितव्य)

होतब्यता, होतव्यता
वह बात जिसका होना निश्चित हो, होनहार।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. भवितव्यता)

होता
मंत्र पढ़कर हवन करने या यज्ञ में आहुति देनेवाला।
संज्ञा
पुं.
(सं. होतृ)

होत्यो, होत्यौ
हो जाता।
क्रि.अ.
(हिं. होना)
उ.-देती अबहिं जगाइ कै, जरि-बरि होत्यौ छार-५८९।

होन
होने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
पुं.
(हिं. होना)

होन
बढ़ने, विकसित होने या उन्नति करने आदि की क्रिया या भाव।
संज्ञा
पुं.
(हिं. होना)
उ.-अबहिं तैं तू करत ये ढँग, तोहिं अबही होन-७१९।

होन
होना (सहायक क्रिया)।
क्रि.अ.
उ.-हाँसी होन लगी है ब्रज में, जोगहिं राखौ गोई-ना. ४१६०।

होन
ठाढ़ौ होन-खड़े होना।
प्र.
उ.-तनक तनक भुज पकरि कै, ठाढ़ौ होन सिखावै-१०-११२।

होना
सत्ता, अस्तित्व, उपस्थितिसूचक क्रिया, उपस्थित या विद्यमान रहना, अस्तित्व में आना।
क्रि.अ.
(सं. भवन, प्रा. होन)
मुहा.- किसी का होना-(१) किसी के अधीन या वश में होना, किसी का दास या सेवक होना। (२) किसी का प्रियजन या प्रेमपात्र होना। (३) किसी का कुटुंबी या संबंधी होना। कहीं का होना (हो जाना या रहना)-कहीं जाकर बहुत देर में लौटना या वहीं रुक या ठहर जाना। (कहीं से) होकर या होते हुए- (१) जाकर, मिलकर। (२) रुककर और आवश्यक कार्य करके। हो आना-मिलने के लिए जाना। होता सवाता या सोता-जो अपना निकट संबंधी (विशेषतः पुत्र) हो। कौन होता है-क्या संबंध है ?

होना
सूरत या हालत बदलना, पहला रूप छोड़कर नये रूप में आना।
क्रि.अ.
(सं. भवन, प्रा. होन)
मुहा.- हो बैठना- (अपने को) कुछ समझ बैठना या समझने-जताने लगना।

होना
कार्य का संपन्न या संपादित किया जाना।
क्रि.अ.
(सं. भवन, प्रा. होन)
मुहा.- (कार्य) होना-कार्य संपादित हो जाना। (कार्य) हो चुकना या जाना- (कार्य का) लगभग समाप्ति पर होना। बस हो चुका-कुछ भी न हो सकेगा।

होना
बनने या तैयार होने की स्थिति में रहना।
क्रि.अ.
(सं. भवन, प्रा. होन)

होना
कोई बात या संयोग आ पड़ना, घटित किया जाना।
क्रि.अ.
(सं. भवन, प्रा. होन)
मुहा.- भई, न होना- न आज तक घटित हुआ है और न आगे होने की संभावना ही है। उ.-(क) जोबन-दान कहा धौं माँगत भई कहूँ नहिं होना-पृ. २३६ (३७)। (ख) ऎसी छवि कहूँ भई न होना -पृ. ४३८ (२१)। होकर रहना-अवश्य घटित होना, कभी न टलना। हो न हो-निश्चय ही, निस्संदह। हो पड़ना-जान या अनजान में (भूल-चूक) हो जाना।

होना
किसी रोग, व्याधि आदि का आना।
क्रि.अ.
(सं. भवन, प्रा. होन)

होना
बीतना, गुजरना।
क्रि.अ.
(सं. भवन, प्रा. होन)

होना
फल या परिणाम निकलना,
क्रि.अ.
(सं. भवन, प्रा. होन)

होना
प्रभाव या गुण दिखायी देना।
क्रि.अ.
(सं. भवन, प्रा. होन)

होना
जन्म लेना।
क्रि.अ.
(सं. भवन, प्रा. होन)

होना
काम निकलना, प्रयोजन सधना।
क्रि.अ.
(सं. भवन, प्रा. होन)

होड़ाबाजी
स्पर्द्धा।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. होड़ + बाजी)

होड़ाहोड़ी
किसी के बराबर होने या उससे बढ़ जाने का प्रयत्न, लाग-डाँट, चढ़ा-ऊपरी, स्पर्द्धा, प्रतियोगिता।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. होड़)
उ.-होड़ाहोड़ी मनहिं भावते किए पाप भरि पेट-१-१४६।

होड़ाहोड़ी
बाजी, शर्त।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. होड़)

होढ़
चोरी का, चुराया हुआ।
वि.
(सं.)

होत
होने की क्रिया या भाव, अस्तित्व।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. होना)

होत
पास में कुछ होने का भाव या दशा, संपन्नता, आढथता।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. होना)

होत
बिसात, समाई, वित्त, सामर्थ्य य़
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. होना)

होत
होता है।
क्रि.अ.
उ.-(क) ब्याकुल होत हरे ज्यौं सरबस-१-५०। (ख) भोर भयौ दधिमथन होत-४०४।

होत
जन्मता, उपजता या अस्तित्व में आता है।
क्रि.अ.
उ.-ज्यौं पानी में होत बुद-बुदा पुनि ता माहिं समाहीं- पृ.५९५ (३१)।

होत
कार्य आदि संपादित होता या किया जाता है।
क्रि.अ.
उ.-रंग कापै होत न्यारो हरद चनो सानि-पृ. २०८ (९५)।

होमि
जलाकर, भस्म करके।
क्रि.स.
(हिं. होमना)
उ.-तो देखत तनु होमि मदन मुख मिलौं माधवहिं जाहिं-पृ. ४९३ (१२)।

होमीय
होम-संबंधी।
वि.
(सं.)

होम्य
होमने योग्य।
वि.
(सं.)

होम्य
होम का।
वि.
(सं.)

होम्य
घी, घृत।
संज्ञा
पुं.

होयगो, होयगौ
होगा।
क्रि.अ.
(हिं. होना)
उ.-मेरो अंस अवतार होयगो-सारा. ५२।

होर
रुका या ठहरा हुआ।
वि.
(अनु.)

होरसा
पत्थर का चकला या चौका जिस पर चंदन घिसा जाता है।
संज्ञा
पुं.
(सं. घर्ष = घिसना)

होरा
आग में भुने हुए हरे चने (बूट) की फलियाँ।
संज्ञा
पुं.
(सं. होलक, हिं. होला)

होरा
चने का हरा दाना।
संज्ञा
पुं.
(सं. होलक, हिं. होला)

सेक
सिंचाव, छिड़काव।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेक
(राजा का) अभिषेक।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेख
बाकी।
संज्ञा
पुं.
(सं. शेष)

सेख
समाप्ति।
संज्ञा
पुं.
(सं. शेष)

सेख
शेषनाग।
संज्ञा
पुं.
(सं. शेष)

सेख
लक्ष्मण।
संज्ञा
पुं.
(सं. शेष)

सेख
मुसलमानों कें चार वर्गो में से एक प्रसिद्ध वर्ग।
संज्ञा
पुं.
(अ. शेख)

सेखर
सिर, माथा।
संज्ञा
पुं.
(सं. शेखर)

सेखर
मुकुट, किरीट।
संज्ञा
पुं.
(सं. शेखर)

सेखर
पहाड़ की चोटी या शिखर।
संज्ञा
पुं.
(सं. शेखर)

सोकना, सोकनो
दुख या शोक करना, कष्ट पाना।
क्रि.स.
(सं. शोक)

सोकना, सोकनो
सोख लेना।
क्रि.स.
(हिं. सोखना)

सोकित
जिसे दुख या शोक हो।
वि.
(सं. शोक)

सोख
चूस या शोषण (करके)।
क्रि.स.
(हिं. सोखना)

सोख
लिये सोख-सुखा डाले, प्राण खींच या चूस लिये।
प्र.
उ.- कुंभकरनपुनि इंद्रजीत यह महाबली बलसार। छिन में लिये सोख मुनिवर ज्यों छत्री बली अपार-सारा.२९२।

सोख
ढीठ, धृष्ट।
वि.
(फ़ा. शोख)

सोख
नटखट, पाजी।
वि.
(फ़ा. शोख)

सोख
चंचला।
वि.
(फ़ा. शोख)

सोख
गहरा और चमकदार (रंग)।
वि.
(फ़ा. शोख)

सोखक
सुखा डालने या शोषण करनेवाला।
वि.
(सं. शोषक)

होम
आहुति देने का कर्म, हवन, यज्ञ।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.-होम हवन द्विज पूजा गनपति सूरज सक्र महेस-सारा. २३४।
मुहा.- होम कर देना (करना)-(१) जलाकर भस्म कर डालना। (२) बरबाद या नष्ट करना। (३) त्याग, अर्पण या उत्सर्ग करना।

होमकुंड
वह गढ़ा जिसमें होम की अग्नि रखी जाय।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

होमत
जलाता है, आहुति देता है।
क्रि.स.
(हिं. होमना)
उ.-(क) तर्फत नैन हृदय होमत हवि मन-बच-क्रम औरै नहिं काम-पृ. ४०५ (३०)। (ख) सूर सकल उपमा जो रही यों ज्यों होइ आवै कहत होमत हवि-पृ. ४२० (१४)।

होमना, होमनो
होम या हवन करना, आहुति देना।
क्रि.स.
[हिं. होम + ना(प्रत्य.)]

होमना, होमनो
जलाना।
क्रि.स.
[हिं. होम + ना(प्रत्य.)]

होमना, होमनो
त्याग, अर्पण या उत्सर्ग करना।
क्रि.स.
[हिं. होम + ना(प्रत्य.)]

होमना, होमनो
बरबाद या नष्ट करना।
क्रि.स.
[हिं.) होम + ना(प्रत्य.)]

होमि
आग, अग्नि।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

होमि
घी, घृत।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

होमि
जल।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

होना
हानि पहुँचना, क्षति आना।
क्रि.अ.
(सं. भवन, प्रा. होन)

होना
(स्त्री का) मासिक धर्म से बैठना।
क्रि.अ.
(सं. भवन, प्रा. होन)

होनि
होने' की क्रिया या भाव।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. होना)
उ.-मुरली अधर बिकट भौहैं करि ठाढ़ौ होनि त्रिभंग - पृ. ५१६ (३१)।

होनिहार
भवितव्यता।
संज्ञा
पुं.
(हिं. होनहार)

होनी
होने की क्रियाया भाव।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. होना)
उ.-पाछैं होनी होइ सो होई-६-५।

होनी
वह बात जो हो गयी हो।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. होना)

होनी
वह बात जिसका होना ध्रव या निश्चित हो, भावी, भवितव्यता।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. होना)

होनी
वह बात जिसका होना संभव हो।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. होना)

होनो
जो होने का हो, होनहार।
संज्ञा
पुं.
(हिं. होना)
उ.-होनो होउ होउ सो अबहीं, यहि ब्रज अंन्न न खाउँ -पृ. ४८९ (८०)।

होब
होगा।
क्रि.अ.
(हिं. होना)
उ.-या बिन होत कहा अब सूनो-पृ. ४९८ (५९)।

होरा
एक अहोरात्र का चौबीसवाँ भाग, घंटा।
संज्ञा
स्त्री.
(यूनानी

होरा
एक राशि का आधा भाग।
संज्ञा
स्त्री.
(यूनानी

होरा
जन्मकुंडली।
संज्ञा
स्त्री.
(यूनानी

होरिल, होरिला
नवजात शिशु।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

होरिहा, होरिहार, होरिहारा
होली खेलनेवाला।
संज्ञा
पुं.
(हिं. होली + गा, हार)

होरी
हिंदुओं का एक प्रसिद्ध त्योहार जो फागुन की पूर्णिमा को होता है। इसमें आग जलायी जाती है और लोग परस्पर रंग छिड़कते तथा अबीर-गुलाल लगाते हैं।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. होली)
उ.-(क) तनु जोबन ऎसे चलि जैहै जनु फागुन की होरी-पृ. ३८३ (४०)। (ख) मिटि गए कलह कलेस कुलाहल जनु करि बीती होरी-पृ. ५८४ (५२)।
मुहा.- खेलत होरी-परस्पर रंग छिड़कते, गुलाल लगाते और कोलाहल करते हैं। उ.-खेलत हो हो होरी अति सुख प्रीति प्रगट भई-पृ. ४३५ (६९)। खेलि होरी-परस्पर रंग छिड़ककर, गुलाल लगाकर, गीत गाकर और कोलाहल करके। उ.-सूरदास भगवत भजन बिनु चले खेलि फागुन की होरी-१-३०३।

होरी
लकड़ियों और खर-पतवार का वह ढेर जो होली के दिन जलाया जाता है।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. होली)

होरी
एक प्रकार के गीत जो फागुन में गाये जाते हैं।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. होली)
उ.-औरौ सखी जाल बिनु सोभित सकल ललित तनु गावति होरी-पृ. ४३१ (९३)।

होलक
होरा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

होला
होली का त्योहार।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

होली
लकड़ी, खर-पतवार घास-फूस आदि का वह ढेर जो होली के दिन जलाया जाता है।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. होलिका)

होली
एक प्रकार के होली-संबंधी श्रृंगारिक गीत जो फागुन में गाये जाते हैं।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. होलिका)

होलैया
होलिहार।
संज्ञा
पुं.
(सं. होली)

होवनहार, होवनहारा
जो अवश्य होने को हो, होनहार, भावी।
वि.
(हिं. होना + हारा)

होवनहारि, होवनहारी
वह बात जो अवश्य होनेवाली हो, होनी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. होना + हारी)
उ.-दीखति है कछु होवनहारी-४-५।

होवनहारि, होवनहारी
जो (बात) अवश्य होने वाली हो।
वि.
स्त्री.

होवना, होवनो
होना।
क्रि.अ.
(हिं. होना)

होवै
हो, घटित हो।
क्रि.अ.
(हिं. होना)
उ.-अब मेरे मन ऎसी षटपद होवै होहु सु होऊ-पृ. ५५० (४९)।

होश
चेत, चेतना, संज्ञा।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा.)
मुहा.- होश उड़ना या जाते रहना- कष्ट, भय या आशंका से चित्त का इतना व्याकुल होना कि सुधृबुध भूल जाना। होश करना- बुद्धि ठीक-ठिकाने रखना। होश की दवा करना-बुद्धि ठीक-ठीकाने करना, समझ-बूझ कर काम करना। होश ठिकाने होना-(१) मोह, भ्रम या भ्रांति दूर होना। (२) थकावट, घबराहट या अधीरता का कारण न रहने पर चित्त स्वस्थ होना। (३) हानि सहकर या दंड पाकर गर्व मिटना और भूल पर पछतावा होना। होश दंग हो जाना या होना-बहुत चकित होना। होश पकड़ना-चेतना प्राप्त करना, सचेत होना। होश में आना-बेहोशी या मूर्च्छा दूर होने पर पुनः चेतना प्राप्त करना। होश सँभालना-अनजान न रहना; समझदार, सयाना या वयस्क होना।

होश
याद, सुध, स्मरण।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा.)
मुहा.- होश दिलाना-याद दिलाना, स्मरण कराना।

होला
सिखों की होली जो होली जलने के दूसरे दिन होती है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

होला
हरे चने या मटर आदि की आग में भुनी फलियाँ।
संज्ञा
पुं.
(सं. होलक)

होला
चने का हरा दाना।
संज्ञा
पुं.
(सं. होलक)

होलाका
होली का त्योहार।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

होलाष्टक
होली के पहले आठ दिन जिनमें विवाह आदि शुभ कृत्य नहीं किये जाते।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

होलिका
होली का त्योहार।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

होलिका
लकड़ी, खर-पतवार आदि का वह ढेर जो होली के दिन जलाया जाता है।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

होलिका
एक राक्षसी का नाम।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

होलिहा, होलिहार, होलिहारा
धूम-धाम से होली खेलनेवाला।
संज्ञा
पुं.
(हिं. होली)

होली
फागुन की पूर्णिमा को मनाया जानेवाला, हिंदुओं का एक प्रसिद्ध त्योहार जिसमें आग जलाकर लोग परस्‍पर रंग छिड़कते, अबीर-गुलाल लगाते और गले मिलते हैं।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. होलिका)
मुहा.- होली खेलना-एक दूसरे पर रंग छिड़कना, अदीर-गुलाल लगाना और खूब कोलाहल कर के आनंद मनाना।

होश
अक्ल, समझ, बुद्धि।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा.)

होश-हवास
चेतना और बुद्धि।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. होश + अ. हवास)
मुहा.- होश-हवास गुम होना-चेतना और बुद्धि का ठीक-ठीक काम न करना, कर्तव्य-अकर्तव्य न सूझना। होश-हवास ठीक या दुरूस्त करना-(१) ऎसा दंड देना कि बुद्धि ठीक-ठीक काम करने लगे। (२) ऎसा प्रतीकारात्मक कार्य करना जिससे व्यक्ति अकड़, घमंड आदि भूलकर सामान्य स्थिति में आ जाय। होश-हवास ठीक या दुरुस्त होना-ऎसा दंड मिलना कि बुद्धि ठीक-ठिकाने हो जाय। (२) प्रतीकारात्मक कार्य कियैं जाने पर अकड़, घमंड आदि भूलकर व्यक्ति का सामान्य व्यवहार करने लगना।

होशियार
समझदार, बुद्धिमान।
वि.
(फ़ा.)

होशियार
निपुण, कुशल।
वि.
(फ़ा.)

होशियार
सावधान, सचेत।
वि.
(फ़ा.)
मुहा.- होशियार करना- (कष्ट, अनिष्ट आदि से बचने या सतर्क रहने को) सावधान या सचेत करना।

होशियार
जिसने होश सँभाला हो, जो समझदार, सयाना और वयस्क हो गया हो।
वि.
(फ़ा.)

होशियार
चालाक धूर्त।
वि.
(फ़ा.)

होशियारी
समझदारी, बुद्धिमानी।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)

होशियारी
कुशलता, निपुणता।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)

होशियारी
सावधानी, सतर्कता।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)

होशियारी
कौशल, युक्ति।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)

होशियारी
सयानापन।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)

होशियारी
चालाकी, धूर्तता।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)

होस
होश।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. होश)

होस
चाह, लालसा, कामना।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हवस)

होस
हौसला, उमंग, उत्साह।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हवस)

होसा-होसी
लाग-डाँट, होड़, स्पर्द्धा।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हवस = ललसा)

होहि
होता है।
क्रि.अ.
(हिं. होना)
उ.-कतहिं बकत है काम-काज बिनु होहि न ह्याँ तैं हातौ-ना. ४३२४।

होहु
हो।
क्रि.अ.
(हिं. होना)
उ.-(क) सूरदास प्रभु कंस मारि कै, होहु यहाँ के भूप- पृ. ४६३ (६१)। (ख) सब दल होहु हुसियार- पृ. ५७२ (८)।

हो हो
कोलाहल करके।
क्रि. वि.
(अनु. हो)
उ.-हो-हो हो-हो होरी अति सुख प्रीति प्रगट भई-पृ. ४३५ (६९)।

हौं
ब्रजभाषा में उत्तमपुरुष सर्वनाम का एकवचन रूप, मैं।
सर्व
(सं. अहम्)
उ.-हौं इक नई बात सुनि आई-१०-२०।

हौं
होना' का वर्तमानकालिक उत्तमपुरुष एकवचन रूप, हूँ।
क्रि.अ.
(हिं. होना)

हौंकना, हौंकनो
गरजना।
क्रि.अ.
(हिं. हुंकार)

हौंकना, हौंकनो
हाँफना।
क्रि.अ.
(हिं. हुंकार)

हौंस
चाह, कामना, लालसा।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हवस)
उ.-(क) हौंस होइ तौ ल्याऊँ पूआ-३९ ६। (ख) होति हौंस न ताहि बिष की, कियो जिन मधु पान-पृ. ५५९ (२९)।
मुहा.- हौंस रखना-इच्छा बाकी न रखना, कामना पूरी करना। उ.-कछू हौंस राखै जनि मेरी, जोइ-जोइ मोहिं रुचै री-१०-१७६।

हौंस
उमंग, उत्साह।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. हौंसला)

हौ
होना' के मध्यमपुरुष, एकवचन का वर्तमानकालिक रूप, हो।
क्रि.अ
(हिं. होना)

हौ
'है' का सामान्य भूतकालिक रूप, था।
क्रि.अ
(हिं. होना)

हौ
पुकारने का शब्द, हे।
संज्ञा
पुं.
(सं. हो)

हौ
स्वीकृति-सूचक शब्द, हाँ।
अव्य.
(हिं. हाँ)

हौआ
बच्चों को डराने के लिए कल्पित, एक भयंकर जीव या वस्तु, हाऊ।
संज्ञा
पुं.
(अनु. हौ)

हौका
किसी चीज को पाने की बहुत प्रबल इच्छा, लोभ या तृष्णा।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाय)

हौका
अभाव, विवशता आदि से ली गयी लंबी साँस।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हाय)

हौज, हौद, हौदा
पानी का छोटा कुंड।
संज्ञा
पुं.
(अ. हौज)

हौदा
हाथी की पाठ पर सवारी के लिए कसा जानेवाला चौखटे जैसा आसन।
संज्ञा
पुं.
(अ. हौदज)

हौदी
छोटा हौद।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हौदा = हौज)

हौन
अपनापन, निजता।
संज्ञा
पुं.
(सं. अहम्)

हौन
होम, हवन।
संज्ञा
पुं.
(सं. हवन)

हौन
होना है, बढ़ना है, उन्नति करना है।
क्रि.अ
(हिं. होना)
उ.-पाँच बरस कै सात कौ, आगैं तोकौं हौन-५८९।

हौरा
हल्ला, कोलाहल।
संज्ञा
पुं.
(अनु.)

हौल
डर, भय।
संज्ञा
पुं.
(अ.)
मुहा.- हौल पैठना या बैठना-जी में दहशत या डर समा जाना।

हौलदिल
दिल की धड़कन।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा.)

हौलदिल
एक रोग जिसमें दिल बहुत धड़कता है।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा.)

हौलदिल
जिसका दिल डर से धड़कता हो।
वि.

हौलदिल
जो बहुत डरा या घबराया हुआ हो।
वि.

हौलदिला
डरपोक।
वि.
(फ़ा. हौलदिल)

हौलदिली
दिल की धड़कन।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)

हौलदिली
दिल धड़कने का रोग।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)

हौलदिली
घबराहट, व्याकुलता।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)

हौलदिली
एक तरह के पत्थर का टुकड़ा जो दिल धड़कने-जैसे रोगी को दूर करने के लिए रोगी को पहनाया जाता है।
संज्ञा
स्त्री.
(फ़ा.)

सोखक
नाश करनेवाला।
वि.
(सं. शोषक)

सोखता
जला हुआ, दग्ध।
वि.
(फ़ा. सोख्तः)

सोखता
(स्याही) सोखनेवाला, मोटा कागज।
संज्ञा
पुं.

सोखना, सोखनो
नमी या रस चूस लेना या सुखा डालना, शोषण करना।
क्रि.स.
(सं. शोषण)

सोखना, सोखनो
बहुत अधिक पानी जैसा पेय पदार्थ पी लेना (व्यंग्य)।
क्रि.स.
(सं. शोषण)

सोखना, सोखनो
प्राण खींच लेना, मार डालना।
क्रि.स.
(सं. शोषण)

सोखा
चतुर।
वि.
(हिं. चोखा से अनु.)

सोखि
सुखाकर, शोषण करके।
क्रि.स.
(हिं. सोखना)
उ.- (क) सोखि समुद्र, उतारौं कपि दल-९-१०९। (ख) जनु जल सोखि लयो से सविता जोबन गज मतवार-२०६२।

सोखू
सोखनेवाला।
वि.
(हिं. सोखना)

सोखे
खींच लिये।
क्रि.स.
(हिं. सोखना)
उ.- पूतना के प्रान सोखे-४९८।

हौली
देशी शराब बनने-बिकने की जगह।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. हाला)

हौले
धीरे-धीरे।
क्रि. वि.
(हिं. हरुआ)

हौले
चुपके-चुपके।
क्रि. वि.
(हिं. हरुआ)

हौले
हलके हाथ से।
क्रि. वि.
(हिं. हरुआ)

हौवा
संसार की वह पहली स्त्री जो आदम की पत्नी थी और जिसने मनुष्‍य जाति को जन्म दिया था।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

हौवा
हौआ, हाऊ।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हौआ)

हौस
प्रबल च्छा या कामना।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हबस)

हौस
हौसला, उत्साह।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हबस)
उ.-पुनि गए तहाँ जहाँ धनुष, बोले सुभट, हौस मन जिनि करौ बन-बिहारी- पृ. ४६६ (८४)।

हौस
हर्षोत्कंठा।
संज्ञा
स्त्री.
(अ. हबस)

हौसनि
इच्छा या कामना से (में)।
संज्ञा
स्त्री. सवि.
(हिं. हौस)
उ.-मरियत देखिबे की हौसनि -पृ. ४८६ (४७)।

ह्रद
बड़ा ताल, झील।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

ह्रद
सरोवर।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.-चली जाति धारा ह्वै अध कौं, नाभी ह्रद अवगाह-६३७।

ह्रद
ध्वनि।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

ह्रद
किरण।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

ह्रदिनी
नदी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

ह्रसित
जिसका ह्रास हुआ हो।
वि.
(सं.)

ह्रस्व
छोटा, लघु।
वि.
(सं.)

ह्रस्व
छोटे आकार का, नाटा।
वि.
(सं.)

ह्रस्व
कम, थोड़ा।
वि.
(सं.)

ह्रस्व
नीचा।
वि.
(सं.)

हौसला
कोई काम करने की उमंग या उत्कंठा।
संज्ञा
पुं.
(अ. ह़ौसिलः)
मुहा.- (जी या मन का) हौसला निकलना-इच्छा पूरी होना, अरमान निकलना। (ज़ी या मन का) हौसला निकालना-सारा प्रयत्न कर डालना।

हौसला
जोश और हिम्मत, उत्साह।
संज्ञा
पुं.
(अ. ह़ौसिलः)
मुहा.- हौसला पस्त होना-जोश ठंढा पड़ जाना, हिम्मत न रह जाना, उत्साह न बचना।

हौसला
बढ़ी हुई तबियत, प्रफुल्लता।
संज्ञा
पुं.
(अ. ह़ौसिलः)
मुहा.- (जी या मन का) हौसला निकालना-किसी उत्सव या हर्षावसर पऱ इच्छानुसार धूमधाम कर लेने का अरमान पूरा हो जाना। (जी या मन का) हौसला निकालना-खूब धूम-धाम और आनंद से काम करके जी का अरमान पूरा करना।

हौसलामंद
जिसमें लालसा या कामना हो।
वि.
(फ़ा.)

हौसलामंद
जिसमें खूब उमंग हो।
वि.
(फ़ा.)

हौसलामंद
साहसी, उत्साही।
वि.
(फ़ा.)

हौसाहौस
लागडाँट, होड़।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हौस)

ह्याँ
इस स्थान पर, यहाँ।
अव्य.
(हिं. यहाँ)
उ.-(क) काके हित श्रीपति ह्याँ ऎहैं-१-२९। (ख) याकौ ह्याँ तैं देहु निकारि-१-२८४। (ग) ह्याँ के बासी-९-१६५।

ह्यो, ह्यौ
हृदय।
संज्ञा
पुं.
(हिं. हिया)

ह्यो, ह्यौ
था।
क्रि.अ
(ब्रज. हो

ह्रस्व
तुच्छ।
वि.
(सं.)

ह्रस्व
वर्णमाला में वे स्वर जो दीर्घ की अपेक्षा कम खींचकर बोले जाते हैं जैसे अ, इ, उ आदि; ऎसे स्वरों की मात्रा (छंद में) एक समझी जाती है।
संज्ञा
पुं.

ह्रस्वता
छोटापन, लघुता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

ह्राद
ध्वनि।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

ह्राद
शब्दस्फोट।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

ह्रदिनी
नदी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

ह्रादी
ध्वनि या गर्जन करनेवाला।
वि.
(सं. ह्रादिन्)

ह्रास
वैभव, गुण, तत्व आदि में कम हो जाने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

ह्रास
घिसने, छीजने आदि की क्रिया या भाव।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

ह्रास
कमी, क्षीणता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

ह्रास
उतार, घटाव।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

ह्रासन
कम करना, घटाना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

ह्री
लज्जा, संकोच।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

ह्री
दक्ष प्रजापति की एक कन्या जो धर्म को ब्याही थी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

ह्लाद
आनंद, प्रफुल्लता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

ह्लादन
आनंदित करना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

ह्लादिनी
प्रफुल्लित करनेवाली।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

ह्वाँ
उस स्थान पर, वहाँ।
अव्य.
(हिं. वहाँ)
उ.-(क) यह सुनि ह्वाँ तैं भरत सिधायौ-५-३। (ख) जाइ करौ ह्वाँ बोध सबनि कौं-पृ. ३६६ (८३)।

ह्वैं
वहीं।
अव्य.
(हिं. वहाँ + ही)

ह्वै
होकर।
क्रि.अ
(हिं. होना)
उ.-जाति चली धारा ह्वै अध कौं-६३७।

ह्वै
ठाढ़े ह्वै-खड़े होकर।
प्र.
उ.-बिछुरन भेंट देहु ठाढ़े ह्वै-पृ. ४६० (३२)।

ह्वै
भिन्न या परिवर्तित रूप धारण करके।
क्रि.अ
(हिं. होना)

ह्वै
ह्वै गए- हो गये, बन गये।
प्र.
उ.-छोरी बंदि बिदा किए राजा, राजा ह्वै गए राँकौ-१-११३।

ह्वै
बनकर।
क्रि.अ
(हिं. होना)
उ.-अंग सुभग सजि ह्वै मधु मूरति, नैननि माँह समाऊँ-१०-४९।

ह्वै
जन्म लेकर, शरीर धारण करके, अवतार लेकर।
क्रि.अ
(हिं. होना)
उ.-(क) सोई सगुन ह्वै नंद की दाँवरी बँधावै-१-४। (ख) नरहरि ह्वै हिरनाकुस मारथौ-१-११३। (ग) दंतबक्र सिसुपाल जो भए, बासुदेव ह्वै सो पुनी हए-१०-२।

ह्वैहैं
(कार्य आदि) आरंभ या संपादित होंगे।
क्रि.अ
(हिं. होना)
उ.-ह्वैहैं जज्ञ अब देव मुरारी- ७-२।

ह्वैहैं
होंगे, बनेंगे।
क्रि.अ
(हिं. होना)
मुहा.- कौन के ह्वैहैं-किसके सगे या आत्मीय होंगे। उ.-काके भए कौन के ह्वैहैं, बँधे कौन की डोरी-पृ. ४९८ (६३)।

ह्वैहै
जन्म लेगा, जन्मेगा।
क्रि.अ
(हिं. होना)
उ.-(क) ता रानी सेंती सुत ह्वैहैं-६-५। (ख) पाछैं भयौ, न आगैं ह्वैहैं, सब पतितनि सिरताज-१-९६।

ह्वैहै
घटित होगा।
क्रि.अ
(हिं. होना)
उ.-सूरदास प्रभु रची सु ह्वैहैं-१-२६४।

ह्वैहौं
होऊँगा।
क्रि.अ
(हिं. होना)
उ.-नंद राइ, सुनि बिनती मेरी तबहिं बिदा भल ह्वैहौं-१०-३५।

ह्वैहौं
बनूँगा, कहलाऊँगा।
क्रि.अ
(हिं. होना)
उ.-ह्वैहौं पूत नंद बाबा कौं, तेरौ सुत न कहैहौं-१०-१९३।

सोख्ता
एक प्रकार का खुरदरा कागज जो स्याही सोख लेता है।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. सोख्तः)

सोख्ता
जला हुआ, दग्ध।
वि.

सोग
प्रिय जन की मृत्यु का परम कष्ट।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोक)
मुहा.- सोग मनाना- प्रियजन की मृत्यु पर शोकचिह्न धारण करना और किसी उत्सव आदि में सम्मि लित न होना।

सोग
प्रियजन के वियोग का दुख।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोक)
उ.- (क) देवकी-बसुदेव-सुत सुनि जननि कैहै सोग-२९३३। (ख) सूर उसाँस छाँड़ि भरि लोचन बढ़थो बिरह-ज्वर सोग-३४९२।

सोग
दुख, कष्ट।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोक)
उ.- (क) जोग, भोग रस रोग-सोग-दुख जाने जगत सुनावत-३२७६। (ख) अपने-अपने भाव सु पेखत, मिट़यौ सकल मनसोग-सारा. ५१४।

सोगन
कसम, शपथ।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सौगंद)

सोगवारा
वह स्थान जहाँ प्रियजन की मृत्यु का शोक मनाया आ रहा हो।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोक + हिं. वारा)

सोगिनी
शोक करनेवाली।
वि.
स्त्री.
(हिं. सोग)

सोगी
प्रियजन की मृत्यु का शोक करनेवाला।
वि.
पुं.
(हिं. सोग)

सोगी
वियोगी।
वि.
पुं.
(हिं. सोग)

सोचना, सोचनो
दुख या खेद करना।
क्रि.अ.
(सं. शोचन)

सोच-विचार
सोचने, समझने और विचार करने की क्रिया या भाव, गौर।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोच + सं. विचार)

सोचहु
सोच-विचार करो।
क्रि.अ.
(हिं. सोचना)
उ.- जिनि सोचहु सुख मान सयानी, भली रितु सरद भई-२८५३।

सोचान
सोचने-विचारने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सोचना)

सोचाना, सोचानो
सोचने विचारने को प्रवृत्त करना।
क्रि.स.
(हिं. सोचना)

सोचाना, सोचानो
सोचने विचारने के लिए (किसी संबंध में) ध्यान आकृष्ट करना।
क्रि.स.
(हिं. सोचना)

सोचि
विचार करके।
क्रि.अ.
(हिं. सोचना)

सोचि-विचारि
(अच्छी तरह) समझ-बूझ लो।
क्रि.अ.
(हिं. सोचना + विचारना)
उ.- (क) सोचि विचारि सकल स्रुति सम्मति, हरि तैं और न आगर-१-९१। (ख) रे मन, समुझि सोचि-बिचारि-१-३०९।

सोचु
फिक्र, चिंता।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोचु)

सोचु
दुख, शोक।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोचु)

सोगी
दुखी।
वि.
पुं.
(हिं. सोग)

सोच
फिक्र, चिंता।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोच)
उ.- (क) सूरदास प्रभु रची सु ह्वैहै, को करि सोच मरै-१-२६४। (ख) कंसराय जिय सोच परी-१०-४८। (ग) सूरज सोच हरौं मन अबहीं, तौ पूतना कहाऊँ-१०-४९। (घ) सुन्यौ कंस पूतना सँहारी। सोच भयौ ताकैं जिय भारी-१०-५८। (ङ) तब तैं यो जिय सोच, जबहिं तैं बात परी सुनि-५८९।

सोच
रंज दुख।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोच)
उ.- (क) औगुन की क्रछु सोच न संका-१-१८६। (ख) कियौ न कबहुँ बिलम्ब कृपानिधि सादर सोच निवारौ-१-१५७।

सोच
पछतावा, पश्चाताप।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोच)
उ.- देखि कै उमा कोरुद्र लज्जित भए, कहथौ मैं कौन यह काम कीनौ।¨¨¨¨¨¨। चतुर्भुज रूप हरि आइ दरसन दियौ, कहथौ, सिव सोच दीजै बिहाई-८-१०।

सोचत
(किसी विषय में) विचार करता है।
क्रि.अ.
(हिं. सोचना)
उ.- (क) विदुखि सिंधु सकुचत, सिव सोचत, गरलादिक किमि जात पियौ-१०-१४३। (ख) कैसे कैं वाकौ मारैंगे, सोचत हैं पुर-नारी-सारा. ५०५।

सोचति
चिंतित होती है, चिंता करती है।
क्रि.अ.
(हिं. सोचना)
उ.- (क) दरसन सुखी, दुखी अति सोचति षट सुत-सोक सुरति उर आवति-१०-७। (ख) कैसेहुँ ये बालक दोउ उबरैं, पुनि पुनि सोचति परी खभारे-५९५।

सोचन
विचार या चिंता में।
संज्ञा
पुं. सवि
(हिं. सोच)
उ.- भवन मोहिं भाटी सों लागत मरति सोच ही सोचन-१४१७।

सोचन
लगे या लागे सोचन-सोचने, विचारने या चिंता करने लगे।
प्र.
उ.- (क) भूमि परे तैं सोचन लागे महा कठिन दुख भारे-१-३३४। (ख) अबकी बेर बहुरि फिरि आवहु कहा लगे जिय सोचन-२७०८।

सोचना, सोचनो
किसी बात, विषय या प्रसंग पर विचार करना।
क्रि.अ.
(सं. शोचन)

सोचना, सोचनो
फिक्र या चिंता करना।
क्रि.अ.
(सं. शोचन)

सोचु
पछतावा, पश्चाताप।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोचु)

सोचै
फिक्र या चिंता करो।
क्रि.अ.
(हिं. सोचना)
उ.- अब हरि आइ हैं, जिनि सोचै ¨¨¨¨¨¨।

सोज
सूजन, शोथ।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सूजना)

सोज
वस्तु।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सौंज)

सोज
सामग्री।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सौंज)

सोजन
सुई।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. सोजन)

सोजन
काँटा।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. सोजन)

शोझ, सोझा
सीधा-सादा, सरल।
वि.
(सं. सम्मुझ, म. प्रा. समुज्झ)

सोटा
मोटा डंडा।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोंटा)

सोटा
तोता, शुक।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सुअटा)

सोती
छोटा स्रोत।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सोता)

सोती
स्वाति नक्षत्र।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. स्वाती)

सोती
वह जो वेद-शास्त्रों का अच्छा ज्ञाता हो।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रोत्रिय)

सोती
ब्राह्मणों की एक जाति।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रोत्रिय)

सोथ
वरम, सूजन।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोथ)

सोदर
सगा भाई, सहोदर।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोदरा, सोदरी
सगी बहन।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सोदर)

सोध
खोज-खबर, पता टोह।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोध)
उ.- (क) हरि के दूत जहाँ-तहाँ रहैं। हम तुम उनकी सोंध न लहैं-६-४। (ख) आए तीर समुद्र के कछु सोध न पायौ-९-१२। (ग) सब सोधि रह्यौ, न सोध पायौ, बिन सुने का कीजिए-१० उ.-२४।

सोध
सुधारन, संशोधन।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोध)

सोध
चुकता होना, अदा होना।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोध)

सोढ
सहनशील, सहिष्णु।
वि.
(सं.)

सोढर
भोंदू, मूर्ख।
वि.
(देश.)

सोढी
जिसने सहन किया हो।
वि.
(सं. सोढिन)

सोत
सोता।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्रोत, हिं. सोता)

सोतली
सौत, सपत्नी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सौत)

सोता
प्राकृतिक जल-धारा, झरना।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्रोत)

सोता
नदी की शाखा।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्रोत)

सोता
नहर।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्रोत)

सोतिया
छोटा सोता।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सोता)

सोतिहा
कुँआ या जलाशय जिसमें सोते का पानी आता है।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोता)

सोध
सुध, ध्यान।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सुध)
उ.- आनँद मगन भए सब डोलत कछु न सोध सरीर-९-१८।

सोध
महल, प्रासाद।
संज्ञा
पुं.
(सं. शौध)

सोधक
ढूँढ़ने खोजनेवाला।
वि.
(सं. शोधक)

सोधक
ठीक या शुद्ध करनेवाला।
वि.
(सं. शोधक)

सोधन
ढूँढ़, खोज, तलाश।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोधन)

सोधन
जाँच, छानबीन।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोधन)

सोधना, सोधनो
साफ, शुद्ध या शोधन करना, शुद्धता की जाँच करना।
क्रि.स.
(सं. शोधन)

सोधना, सोधनो
गलती, त्रुटि या दोष दूर करना।
क्रि.स.
(सं. शोधन)

सोधना, सोधनो
ठीक या निश्चित करना।
क्रि.स.
(सं. शोधन)

सोधना, सोधनो
खोजना, ढूँढ़ना, पता लगाना।
क्रि.स.
(सं. शोधन)

सोधना, सोधनो
धातु-संस्कार करना।
क्रि.स.
(सं. शोधन)

सोधना, सोधनो
दुरुस्त या ठीक करना सुधारना।
क्रि.स.
(सं. शोधन)

सोधना, सोधनो
ऋण अदा करना, चुकाना।
क्रि.स.
(सं. शोधन)

सोधाना, सोधानो
शोधन या शुद्धता की जाँच कराना।
क्रि.स.
(हिं. शोधना का प्रे. )

सोधाना, सोधानो
दोष दूर कराना।
क्रि.स.
(हिं. शोधना का प्रे. )

सोधाना, सोधानो
निश्चित कराना।
क्रि.स.
(हिं. शोधना का प्रे. )

सोधाना, सोधानो
ढुँढ़वाना।
क्रि.स.
(हिं. शोधना का प्रे. )

सोधाना, सोधानो
धातु का संस्कार कराना।
क्रि.स.
(हिं. शोधना का प्रे. )

सोधाना, सोधानो
सुधरवाना।
क्रि.स.
(हिं. शोधना का प्रे. )

सोधाना, सोधानो
अदा करवाना।
क्रि.स.
(हिं. शोधना का प्रे. )

सेखर
सबसे अच्छा या श्रेष्ठ।
वि.

सेखावत
एक राजपूत जाति।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. शेख)

सेखी
घमंड।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. शेखी)

सेखी
ऐंठ, अकड़।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. शेखी)

सेखी
बढ़बढ़कर बातें करना, डींग।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. शेखी)

सेगा
विभाग।
संज्ञा
पुं.
(अ. सेगा)

सेगा
सत्र।
संज्ञा
पुं.
(अ. सेगा)

सेचक
सींचनेवाला।
वि.
(सं.)

सेचक
बादल, मेघ।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेचन
जल से सींचना, सिंचाई।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोधि
ढूँढ़ या खोजकर।
क्रि.स.
(हिं. सोधना)
उ.- पारथ-सीस सोधि अष्टाकुल तब जदुनंदन ल्याए-१-२९।

सोधि
विचार या गणना द्वारा निश्चित करके।
क्रि.स.
(हिं. सोधना)
उ.- (क) ग्रह-लगन-नषत-पल सोधि कीन्ही बेद-धुनी-१०-२४। (ख) लगन सोधि सब जोतिष गनिकै चाहत तुमहिं सुनायौ-१०-८६। (ग) बिप्र बुलाइ नाम लै बूझयौ रासि सोधि एक सुदिन धरथौ-१०-८८।

सोधु
शोध, सोध।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोध)

सोधे
खोज की, पता लगाया।
क्रि.स.
(हिं. सोधना)
उ.- खग-मृग-मीन पतंग लौं मैं सोधे सब ठौर-१३२५।

सोधी
ढूँढ़ने-खोजनेवाला।
वि.
(सं. शोधक)

सोधी
ठीक या शुद्ध करनेवाला।
वि.
(सं. शोधक)

सोन
एक प्रसिद्ध नद जो बिहार में दानापृर से दस मील उत्तर गंगा में मिला है।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोण)

सोन
लाल, अरुण।
वि.

सोन
सोना, सुवर्ण।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोना)

सोन
जलाशय के निकट रहनेवाला एक पक्षी।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

सोन
एक लता जो बारहों महीन हरी रहती है; इसके फूल पीले होते हैं।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सोना)

सोनकिरवा
चमकीले परोंवाला एक कीड़ा।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोना + किरवा = कीड़ा)

सोनकिरवा
जुगनूँ।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोना + किरवा = कीड़ा)

सोनगहरा
गहरा सुनहरा रंग।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोना + गहरा)

सोनगहरा
गहरे सुनहरे रंग का।
वि.

सोनचंपा
पीली चंपा।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोना + चंपा)

सोनचिरी
नट जाति की स्त्री, नटिनी, नटी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सोना + चिरी = चिड़िया)

सोनजरद, सोनजर्द
पीली जूही, स्वर्ण यूथिका।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सोना + फ़ा. जर्द = पीला)

सोनजूरी
पीले फूलवाली जूही जिसके फूल सफेद जूही से अधिक सुगंधवाले होते हैं।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सोना + जूही)

सोनपेड़ुकी
एक पक्षी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सोना + पेड़की)

सोना
नींद लेना, शयन करना।
क्रि.अ.
(सं. शयन)

सोना
शरीर के किसी अंग का सन्न हो जाना।
क्रि.अ.
(सं. शयन)

सोना
किसी विषय या कार्य की ओर से उदासीन होकर चुप या निष्क्रिय होना।
क्रि.अ.
(सं. शयन)

सोनापाठा
एक वृक्ष।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोण + हिं. पाठा)

सोनापेट
सोने की खान।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोना + पेट)

सोनामक्खी, सोनामाखी
एक खनिज पदार्थ जिसमें सोने का कुछ अंश और गुण रहता है।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्वर्णमक्षिका)

सोनामक्खी, सोनामाखी
रेशम का क कीड़ा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्वर्णमक्षिका)

सोनार
सुनार।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सुनार)

सोनित
खून, लहू, रक्त, रुधिर।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोणित)
उ.- सोनित (पाठा. स्रोनित)-छिंछ उछरि आकासहिं गज-बाजिनि सिर लागि-९-१५८।

सोनित
लाल, अरुण।
वि.

सोनभद्र
शोण नद जो विहार में दानापुर से उत्तर में गंगा से मिलता है।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोणभद्र)

सोनरास, सोनरासा
पका हुआ सफद या पीला पान।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोना + राशि)

सोनवान, सोनवाना
सोने के रंग का, सुनहरा।
वि.
(हिं. सोना + वर्ण)

सोनहरा, सोनहला
सोने के रंग का।
वि.
(हिं. सुनहला)

सोनहा
कोगी' नामक हिंसक जतु जो शेर तक को मार डालता है।
संज्ञा
पुं.
(सं. शुन = कुत्ता)

सोनहार
एक पक्षी।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

सोना
एक प्रसिद्ध पीली धातु जिसके गहने आदि बनते हैं, कंचन, कनक।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वर्ण)

सोना
अत्यंत मूल्यवान वस्तु।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वर्ण)

सोना
बहुत सुंदर वस्तु।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वर्ण)

सोना
एक प्रकार का हंस, राजहंस।
संज्ञा
पुं.
(सं. स्वर्ण)

सोनी
सुनार, स्वर्णकार।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोना)

सोनी
एक वृक्ष।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

सोने
स्वर्ण के।
संज्ञा
पुं.
सवि,(हिं. सोना)
उ.- सूरदास सोने कैं पानी मढ़ै चोंच अरु पाँखि-९-१६४।

सोने
सोने या स्वर्ण से।
संज्ञा
पुं.
सवि,(हिं. सोना)

सोने
ताँबे रुपे सोने सजि राखीं वै बनाइ कै-२६२८।
प्र.
मुहा.- सोने का घर मिटटी करना- बहुत अधिक धन-सम्पत्ति नष्ट कर देना। सोने का घर मिटटी होना- अत्यन्त धन-धान्य पूर्ण घर या परिवार का वैभव नष्ट हो जाना।सोने में घुन लगना-अनहोनी या असंभव बात होना। सोने में सुगंध (होना)-किसी बहुत अच्छी चीज में (कारण-विशेष से ) और भी गुण या विशेषता आ जाना।

सोने
वह चीज जो देखने में तो बहुत सुन्दर और आकर्षक हो, परन्तु वस्‍तुतः हानिकारिणी और घातक हो।
पद.

सोनैं
सोने य़ा स्वर्ण से।
संज्ञा
पुं.
सवि (हिं. सोना)
उ.- खुर ताँबैं, रूपैं पीठि, सोनैं सींग मढ़ी-१०-२४।

सोनो
सोना, स्वर्ण।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोना)

सोपत
सुबीता, सुपास।
संज्ञा
पुं.
(सं. सूपपत्ति)

सोपान
जीना, सीढ़ी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोपानित
जिसमें सीढ़ियाँ हों।
वि.
(सं.)

सोऽपि, सोपि, सोपी
वही।
वि.
(सं. सः + अपि)

सोऽपि, सोपि, सोपी
वह भी।
वि.
(सं. सः + अपि)
उ.-बरि कुबजा के रंगहिं राचे तदपि तजी सोपी-३४८७।

सोफता
एकांत स्थान।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सुभीता)

सोफता
अवकाश का समय।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सुभीता)

सोफता
रोग में कमी की दशा या स्थिति।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सुभीता)

सोफियाना
सूफियों का, सूफीसंबंधी।
वि.
(हिं. सूफियाना)

सोफियाना
जो सादा पर भला लगे।
वि.
(हिं. सूफियाना)

सोफी
मुसलमानों का एक धार्मिक संप्रदाय।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सूफी)

सोफी
इस संप्रदाय का अनुयायी।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सूफी)

सोबुन
सोना (धातु)।
संज्ञा
पुं.
(सं. सुवर्ण)

सोभ
कांति।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शोभा)

सोभ
सुंदरता, छटा।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शोभा)

सोभ
सजावट।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शोभा)

सोभन
सुंदर।
वि.
(सं. शोभन)

सोभन
सुहावना।
वि.
(सं. शोभन)

सोभन
उत्तम।
वि.
(सं. शोभन)

सोभन
शुभ।
वि.
(सं. शोभन)

सोभन
भूषण।
संज्ञा
पुं.

सोभन
कल्याण।
संज्ञा
पुं.

सोभन
सौंदर्य।
संज्ञा
पुं.

सोभना, सोभनो
सोहना, शोभित होना।
क्रि.अ.
(सं. शोभन)

सोभर
स्थान जहाँ स्त्रियाँ प्रसव करती है।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोभा या शुभ + गृह ?)

सोभांजन
सहिंजन' वृक्ष जिसमें लंबी फलियाँ लगती हैं।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोभांजन)

सोभा
चमक, कांति, दीप्ति।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शोभा)

सोभा
छटा, सुंदरता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शोभा)
उ.- (क) मृग मूसी नैननि की सोभा जाति न गुप्त करी-९-६३। (ख) स्याम उलटे परे देखे, बढ़ी सोभा-लहरि-१०-६७। (ग) सोभा मेरे स्यामहिं पर सोहै-१०-१५८। (घ) तदपि सूर तरि सकीं न सोभा, रहीं प्रेम पचि हारि-६२८।

सोभा
सजावट।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शोभा)
उ.- बरनौं कहा सदन की सोभा बैकुंठहूँ तैं राजै री-१०-१३९।

सोभा
किसी की सुंदरता बढ़ानेवाली कोई वस्तु, बात या विशेषता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शोभा)
उ.- कुबिजा भई स्याम-रँग राती तातैं सोभा पाई-१-६३।

सोभा
मान-सम्मान, आदर।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शोभा)
उ.- (क) गनिकासुत सोभा नहिं पावत जाके कुल कोऊ न पिता री-१-३४। (ख) पति कौं ब्रत जो धरै तिय, सो सोभा पावै-२-९।

सोभाकारि, सोभाकारी
शोभा बढ़ाने या देनेवाला, सुंदर।
वि.
(सं. शोभाकर)
उ.- (क) तिलक ललित ललाट केसरि-बिंदु सोभाकारि-१०-१६९। (ख) केहरी-नख उर पर रुरै सुठि सोभाकारि-१०-१३४।

सोभात
फबता या सोहता है।
क्रि.स.
(हिं. शोभाना)
उ.- (क) गत पतंग राका ससि बिष संग घटा सघन सोभात -२१८५। (ख) नैन दोऊ ब्रह्म से परम सोभात से-२६१७।

सोभाना, सोभानो
शोभा देना।
क्रि.स.
(सं. शोभन)

सोभायमान
शोभा बढ़ाने या देनेवाला, सुंदर।
वि.
(सं. शोभायमान)

सोभार
जिसमें उभार हो, उभरा हुआ, उभारदार।
वि.
(सं. स + हिं. उभार)

सोभार
उभार के साथ, उभरकर।
क्रि. वि.

सोभावै
सोहती, फबती या शोभित होती है।
क्रि.अ.
(हिं. शोभना)
उ.- कर सिर-तर करि स्याम मनोहर अलक अधिक सोभावै-१०-६५।

सोभित
सुंदर।
वि.
(सं. शोभित)

सोभित
शोभा देने या बढ़ानेवाला।
वि.
(सं. शोभित)

सोभित
फबता या सुंदर लगता हुआ।
वि.
(सं. शोभित)
उ.- (क) छाता लों छाँह किए सोभित हरि छाती-१-२३। (ख) उर सोभित भृगु रेख-१०-४। (ग) सोभित सीस लाल चौतनियाँ -१०-१०६। (घ) मानौ गज-मुक्ता मरकत पर सोभित सुभंग साँवरे गात -१०-१५९। (ङ) सोभित अति कुंडल की डोलनि-६३९।

सोम
एक लता जिसका रस पीले रंग का और मादक होता था। यह रस वदिक ऋषिपान किया करते थे।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोम
एक प्राचीन वैदिक देवता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोम
चंद्रमा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)
उ.- मानौ सोम संग करि लीने, जानि आपने गोती री-१०-१३९।

सोम
सोमवार।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोम
अमृत।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोम
जल।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोम
एक राग।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोमकर
चंद्रमा की किरणें।
संज्ञा
पुं.
(सं. सोम + कर = किरण)

सोमकांत
चंद्रकांत मणि।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोमकांत
चंद्रमा-सा प्रिय।
वि.

सोमकांत
जिसे चंद्र प्रिय हो।
वि.

सेचन
छिड़काव।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेचन
अभिषेक।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेज
पलंग, शैया।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शय्या, प्रा. सज्जा)
उ.-(क) सेज छाँड़ि भू सोयौ-१-४३। (ख) बैठत उठत सेज-सोवत मैं कंस डरनि अकुलात-१०-१२। (ग) स्वच्छ सेज मैं तैं मुख निकसत गयौ तिमिरि मिटि मंद-१०-२०३। (घ) दामिनि की दमकनि बूँदनि की झमकनि सेज की तलफ कैसे जीजियत माई है-२८२७।

सेजपाल
राजा की शैया या शयनगृह पर पहरा देनेवाला।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सेज + पाल)

सेजरिया, सेजिया
छोटा पलँग, शैया।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सेज)
उ.-सोइ रहौ सुथरी सेजरिया-१०-२४६।

सेज्या
पलँग, सेज, शैया।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शय्या)
उ.-(क) कमलनैन पौढ़े सुख-सेज्या-१-१६८। (ख) किंज-भवन कुसुमनि की सेज्या अपने हाथ निवारत पात -१८९३। (ग) कोमल कमल दलनि सेज्या रची-२२९८।

सेझना, सेझनो
हटना, दूर होना।
क्रि.अ.
(सं. सेधन)

सेटना, सेटनो
मानना, समझना।
क्रि.अ.
(सं. श्रत)

सेटना, सेटनो
महत्व स्वोकार करना।
क्रि.अ.
(सं. श्रत)

सेठ
बड़ा महाजन या साहूकार।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रेष्ठी)

सोमग्रहण
चंद्रग्रहण।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोमज
जो चंद्रमा से उत्पन्न हो।
वि.
(सं.)

सोमज
बुष ग्रह।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोमजाजी
सोम' यज्ञ करनेवाला।
वि.
(हिं. सोमयाजी)

सोमदिन
सोमवार।
संज्ञा
पुं.
(सं. सोम + हिं. दिन)

सोमदेव
सोम' नामक वैदिक देवता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोमदेव
चंद्रमा देवता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोमन
एक अस्त्र।
संज्ञा
पुं.
(सं. सौमद)

सोमनस
सज्जनता।
संज्ञा
पुं.
(सं. सौमनस्य)

सोमनस
प्रसन्नता।
संज्ञा
पुं.
(सं. सौमनस्य)

सोमनस
प्रेम।
संज्ञा
पुं.
(सं. सौमनस्य)

सोमनस
संतोष।
संज्ञा
पुं.
(सं. सौमनस्य)

सोमनाथ
द्वादश ज्योतिलिंगों में एक।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोमनाथ
उक्त ज्योतिलिंग का मंदिर जो कठियावाड़ में है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोमपायी
सोम रस पीने या उसका पान करनेवाला।
वि.
(सं. सोमपायिन)

सोमपुत्र
चंद्रमा का पुत्र, बुध।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोमप्रभ
चंद्र-सी कांतिवाला।
वि.
(सं.)

सोमवंधु
कुमुद।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोमवंस
क्षत्रियों का चंद्रवंश।
संज्ञा
पुं.
(सं. सोमवंश)
उ.- सोमवंश पुरुरवा सौं भयौ-९-२१।

सोमवंसी
चंद्रवंश-संबंधी।
वि.
(सं. सोमवंशीय)

सोमवंश
क्षत्रियों का चंद्रवंश।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोमवंशी, सोमवंशीय, सोमवंसी, सोमवंसीय
चंद्रवंश-संबंधी।
वि.
(सं. सोमवंशीय)

सोमवंशी, सोमवंशीय, सोमवंसी, सोमवंसीय
चंद्रवंश में उत्पन्न।
वि.
(सं. सोमवंशीय)

सोमवती
सोमवार को होनेवाली।
वि.
(सं.)

सोमवती अमावस्या
सोमवार को पड़नेवाली अमावस्या जो पुण्य तिथियों या पर्वो में गिनी जाती है और हिंदू उस दिन नदी-स्नान करते हैं।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

सोमवार
सात वारों में एक जो रविवार और मंगलवार के बीच में पड़ता है और सोम या चंद्रमा का वार माना जाता है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोमवारी
सोमवार-संबंधी।
वि.
(सं. सोमवार)

सोमसुत
(चंद्र-पुत्र) वुध।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोमसुता
नर्मदा नदी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

सोमांशु
चंद्र-किरण।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोमवंसी
चंद्रवंश में उत्पन्न।
वि.
(सं. सोमवंशीय)

सोमभू
(चंद्र-पुत्र) वुध।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोमभू
चंद्रमा से उत्पन्न।
वि.

सोमभू
चंद्रवंशी।
वि.

सोमयज्ञ, सोमयाग
एक यज्ञ।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोमयाजी
जिसने सोमयज्ञ किया हो, जो सोमयज्ञ करता हो।
वि.
(सं. सोमयाजिन)

सोमरस
सोमलता का रस।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोमरस
मादक द्रव, मदिरा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोमराज
चंद्रमा।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोमराज्य
चंद्रलोक।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोमावती
चंद्रमा की माता का नाम।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

सोमास्त्र
एक अस्त्र।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोमाह
चंद्रमा का दिन, सोमवार।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोमित्र
लक्ष्मण।
संज्ञा
पुं.
(सं. सौमित्र )

सोमेश्वर
काशी का एक शिवलिंग।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोमेश्वर
सोमनाथ।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोमेश्वर
श्रीकृष्ण का एक नाम।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोय
वही।
सर्व.
(हिं. सो + ई, ही )

सोय
वह।
सर्व.
(हिं. सो)

सोया
एक साग।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोआ)

सोयो, सोयौ
निद्रा ली, शयन किया।
क्रि.अ.
(हिं. सोना)
उ.- (क) संकर कौ मन हरथौ कामिनी, सेज छाँड़ि भू सोयौ-१-४३। (ख) सूरदास जो चरन सरन रहथौ, सो जन निपट नींद भरि सोयौ-१-५४।

सोर
हल्ला, कोलाहल।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. शोर)
उ.- (क) होत जय-जय सोर-१-२५३। (ख) चहुँ दिसि सूर सोर करि घावै-९-१०४। (ग) कटक सोर अति घोर-९-११५। (घ) लंक मैं सोर परथौ-९-१३९।
मुहा.- सोर पारना-ललकारना। सोर पारि-ललकारकर, चुनौती देकर। उ.-सोर पारि हरि सुबलहिं धाए, गहथौ श्रीदामा जाइ-१०-२४०।

सोर
पुकार, आर्तनाद।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. शोर)
उ.- रोर कैं जोर सैं सोर घरनी कियौ, चल्यौ द्विज द्वारिका द्वार ठाढ़ौ-१-५।

सोर
घोर शब्द।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. शोर)
उ.-झहरात गहरात दवानल आयौ। घेरि चहुं ओर करि सोर अंदोर बन धरनि आकास चहुं पास छायी-५९६।

सोर
नाम, प्रसिद्धि, ख्याति।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. शोर)

सोर
जड़, मूल।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शटा, प्रा. सड़)

सोर
टेढ़ीचाल, वक्र गति।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोरटठ, सोरठ
गुजरात और दक्षिण काठियावाड़ का प्राचीन नाम।
संज्ञा
पुं.
(सं. सौराष्ट, हिं. सोरठ)

सोरटठ, सोरठ
उस देश की राजधानी सूरत।
संज्ञा
पुं.
(सं. सौराष्ट, हिं. सोरठ)

सोरटठ, सोरठ
एक राग।
संज्ञा
स्‍त्री. पुं.

सोरठ, मल्लार
एक राग जिसमें जब शुद्ध स्वर लगते हैं।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोरठ + मल्लार)

सोरठा
एक प्रसिद्ध छंद।
संज्ञा
पुं.
[सोरठ (देश.)]

सोरठी
एक रागिनी।
संज्ञा
स्त्री.
[सोरठ (देश.)]

सोरन
जि मीकंद।
वि.
(सं. शूरण)

सोरनी
झाड़ू, बुहारी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सँवरना ?)

सोरनी
मृत्यु के तीसरे दिन होनेवाला संस्कार जिसमें मृतक की राख बटोरकर नदी में बहा दी जाती है।
संज्ञा
स्त्रि.
(हिं. सँवरना ?)

सोरबा
तरकारी का रसा।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. शोरबा)

सोरह
सोलह।
वि.
(हिं. सोलह)
उ.- सोरह सहस घोष कुमारि-७४५।

सोरहिया, सोरही
सोलह चित्ती कौड़ियाँ जिनसे जुआ खेला जाता है।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सोलह)

सोरहिया, सोरही
वह जुआ जो सोलह कौड़ियों से खेला जाता है।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सोलह)

सोवत
सोने या शयन करने (में)।
क्रि.अ.
(हिं. सोवना)
उ.- (क) सोवत सपने मैं ज्यौं संपति, त्यौं दिखाइ बौरावै-१-४२। (ख) सोवत मुदित भयौ सपने मैं पाई निधि जो पराई-१-१४७।

सोवत
सोते या शयन करते (ही)।
क्रि.अ.
(हिं. सोवना)
उ.- सोवत नींद आइ गइ स्यामहिं-५१५।
मुहा.- सोवत जागत-सोते-जागते, किसी भी समय। उ.- सूरदास मोहिं पलक न बिसरत मोहन मूरति सोवत-जागत-३४०७।

सोवत
सोता हुआ, निद्रित।
वि.
उ.- सूरदास रावन कुल खोवन सोवत सिंह जगायौ-९-८८।

सोवन
सोने की क्रिया या भाव, शयन, निद्रा।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोवना)

सोवना
नींद लेना, शयन करना।
क्रि.अ.
(हिं. सोना)

सोवना
शरीर के किसी अंग का सुन्न होना।
क्रि.अ.
(हिं. सोना)

सोवना
किसी बात या कार्य की ओर से उदासीन होकर मौन या निष्क्रिय हो जाना।
क्रि.अ.
(हिं. सोना)

सोवनार
शयनागार।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोना + आर = आगार)

सोवनो
सोना।
क्रि.अ.
(हिं. सोना)

सोवरी
वह स्थान जहाँ स्त्री प्रसव करती है।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सौरी)

सोरा
मिटटी से निकलनेवाला एक प्रसिद्ध क्षार।
संज्ञा
पुं.
(हिं. शोरा)

सोरी
आवाज, ध्वनि, कोलाहल।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. शोर)
उ.- देखत गोकुल लोग जहाँ नंद उठे सुनि सोरी-२४९२।

सोरी
बरतन में हो जानेवाला महीन छेद जिसमें से पानी आदि द्रव टपक-टपक कर बह जाते हैं।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. स्रवण)

सोलंक
क्षत्रियों का एक प्राचीन राजवंश जिसने बहुत समय तक गुजरात में राज्य किया था।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

सोलह
दस से छह अधिक की संख्या।
संज्ञा
पुं.
(सं. षोडश, प्रा. सोलस, सोरह)

सोलह सिंगार
स्त्रियों के श्रृंगार के सौलह अंग जिनसे श्रृंगार पूरा समझा जाता है- उबटन लगाना, स्नान करना, स्वच्छ बस्त्र धारण करना, केश-सज्जा, नेत्र आँजना, माँग भरना, महावर लगाना, भाल पर तिलक या बिंदी लगाना,चिबुक पर तिल बनाना, मेंहदी लगाना, सुगंध लगाना, आभूषण पहनना, फूलमाला पहनना, मिस्सी लगाना, पान खाना और होंठ रँगना।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोलह + सिंगार)

सोलहों
सोलह में सब।
वि.
(हिं. सोलह)
मुहा.- सोलहों आने- पूरा-पूरा, सब।

सोल्लास
उल्लासयुक्त।
वि.
(सं.)

सोल्लास
उल्लास के साथ।
क्रि. वि.

सोवज
वह पशु जिसका शिकार किया जाता है।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सावज)

सोवा
एक तरह का साग।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोआ)
उ.- (क) सरसौं मेथी सोवा पालक-३९७। (ख) सोवा अरु सरसौं सरसाई-२३२१।

सोवाना, सोवानो
सोने को प्रवृत्त करना।
क्रि.स.
(हिं. सुलाना)

सोवाना, सोवानो
मार डालना।
क्रि.स.
(हिं. सुलाना)

सोवावति
सुलाती या शयन कराती है।
क्रि.स.
(हिं. सोवाना)
उ.- रुचिर सेज लै गइ मोहन कौं भुजा उछंग सोवावति-१०-७३।

सोवावै
सुलाती या शयन कराती है।
क्रि.स.
(हिं. सोवाना)
उ.- जसुदा मदन गुपाल सोवावै-१०-६५।

सोवै
सोती या शयन करती है।
क्रि.अ.
(हिं. सोना)
उ.- भरि सोवै सुख-नींद मैं तहँ सुजाइ जगावै।¨¨¨¨¨¨। एकनि कौं दरसन ठगै, एकनि के सँग सोवै-१-४४।

सोवैया
सोनेवाला।
वि.
(हिं. सोवना)

सोवौं
नींद लूँ, शयन करूँ।
क्रि.अ.
(हिं. सोना)
उ.- आजु न सोवौं नंद-दुहाई, रनि रहौंगौ जागत-४२०।

सोवौ
शयन करो।
क्रि.अ.
(हिं. सोना)
उ.-तुम सोवौ, मैं तुम्हैं सुवाऊँ-१०-२३०।

सोपक
सोखने या सुखानेवाला।
वि.
(सं. शोषक)

सेतबंध
वह पुल जो लंका पर चढ़ाई के समय श्रीराम ने समुद्र पर बाँधा था।
संज्ञा
पुं.
(सं. सेतुबंध)

सेतवाह
अर्जुन (पांडव)।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्वेतवाहन)

सेतवाह
चंद्रमा।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्वेतवाहन)

सेति
संचित करके।
क्रि.स.
(हिं. सेतना)
उ.-वै कहा करैगी, सेति राखै री-१५४८।

सेति, सेती
करण और अपादान कारक की विभक्ति, से।
प्रत्य.
(प्र. सुंतो, पुं. हिं. सेंति, सेंती)
उ.-(क) कहन लग्यौ, मम सुत ससि गोद। ता सेती ससि करत बिनोद-५-३। (ख) तप कीन्हैं सो दैहैं आग। ता सेती तुम कीनौ जाग-९-३।

सेतु
बँधाव, बंधन।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेतु
मिटटी का ऊँचा पटाव धुस्स।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेतु
मेड़, डाँड़।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेतु
नदी, जलाशय आदि के पार जाने के लिए बनाया गया पुल।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सेतु
हद, सीमां।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सोस्मि
वह अर्थात ब्रह्म मैं ही हूँ।
पद.
(सं. सोऽहमस्मि)

सोहँ
सामने सम्मुख।
क्रि. वि.
(हिं. सौंह)

सोहं, सोहग, सोहंगम
वह अर्थात् ब्रह्म मैं ही हूँ।
पद.
(सं. सोऽहम)

सोहई
शोभित है।
क्रि.अ.
(हिं. सोहना)
उ.- मोरमुकुट सिर सोहई-४३७।

सोहगी
ब्याह की एक रीति जिसमें लड्के का तिलक चढ. जाने के बाद उसके यहॉं लड़की के लिए फल, मिठाई, गहने, कपड़े आदि चीजें भेजी जाती हैं।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सोहाग)

सोहगी
सिंदूर, मेंहदी आदि सुहाग-सूचक वस्तुएँ।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सोहाग)

सोहगैला
(सुहाग-सूचक) सिंदूर रखने की डिबिया, सिंदूरा।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सुहाग)

सोहत
शोभित होता है।
क्रि.अ.
(हिं. सोहना)
उ.- सीस मुकुट सिर सोहत-५६५।

सोहत
अच्छे लगते हैं।
क्रि.अ.
(हिं. सोहना)
उ.- वृदाबन बिहरत नँदनंदन ग्वाल सखा सँग सोहत-६४५।

सोहति
शोभित है।
क्रि.अ.
(हिं. सोहना)
उ.- कान्ह गरैं सोहति मनि-माला-१०-९४।

सोपक
दूसरों का धन हरनेवाला।
वि.
(सं. शोषक)

सोषन
सोखना।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोषण)

सोषन
सुखाना।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोषण)

सोषन
धन हरना।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोषण)

सोषन
नाश करना।
संज्ञा
पुं.
(सं. शोषण)

सोषना, सोषनो
शोषण करना।
क्रि.अ.
(हिं. सोखना)

सोषु
सोखनेवाला, शोषक।
वि.
(हिं. सोखना)

सोसन
एक पौधा जिसके फूलों के दलों से जीभ की उपमा दी जाती है।
संज्ञा
पुं.
(फ़ा. सौसन)

सोसनी
सौसन पौधे के फल-जैसे लाली लिये नीले रंग का।
वि.
(हिं. सोसन)

सोसु
सोखनेवाला, शोषक।
वि.
(हिं. सोखन)

सोहदा
लुच्चा, बदमाश, आवारा।
संज्ञा
पुं.
(अ. शोहदा)

सोहदा
लंपट।
संज्ञा
पुं.
(अ. शोहदा)

सोहन
सुंदर, सुहावना, मनभावना।
वि.
(सं. शोभन, प्रा. सोहण)
उ.- बजावत मृदंग ताल, अरस-परस करै बिहार सोभा को बरनी न पार एक-एक दै सोहन-२४२८।

सोहन
सुंदर पुरुष, नायक।
संज्ञा
पुं.

सोहन
एक पक्षी।
संज्ञा
पुं.

सोहन
कसम या शपथ।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सौंह)
उ.- (क) बार-बार कह बीर दोहाई, तुम मानत नहिं सोहन-८८६। (ख) त्रिय तनु को दुख दूरि कियौ पिय दै-दैं अपनी सोहन-पृ ३१५-४४।

सोहन पपड़ी
एक तरह की मिठाई।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सोहन + पपड़ी)

सोहन हलवा, (हलुआ)
एक तरह की मिठाई।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोहन + हलवा)

सोहना
सुंदर लगन, शोभित होना।
क्रि.अ.
(सं. शोभन, प्रा. सोहण)

सोहना
भला या रुचिकर लगना, फबना।
क्रि.अ.
(सं. शोभन, प्रा. सोहण)

सोहना
सुंदर, सुहावना, मनोहर।
वि.

सोहनी
झाड़ू, बुहारी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शोभनी)

सोहनी
सुहावनी, मनभावनी।
वि.
(हिं. सोहना)

सोहनी
सुंदरी स्त्री, नायिका।
संज्ञा
स्त्री.

सोहनी
एक प्रकार की रागिनी।
संज्ञा
स्त्री.

सोहनो
सोहना।
क्रि.अ.

सोहनो
सुंदर, मनोहर।
वि.
उ.- पहिरि पवित्रा सोहनो।¨¨¨¨¨¨। गिरिधरन लाल छबि सोहनो-२२८०।

सौहबत
संग, साथ, संगत।
संज्ञा
स्त्री.
(अ.)

सोहमस्मि
वह अर्थात् ब्रह्म मैं ही हूँ।
पद.
(सं. सोऽहमस्मि)

सोहर
बच्चे का जन्म होने पर गाए जानेवाले मंगलगीत।
संज्ञा
पुं.
(सं. सूतिगृह, प्रा. सूइहर)

सोहर
मंगलगीत
संज्ञा
पुं.
(सं. सूतिगृह, प्रा. सूइहर)

सोहर
स्थान जहाँ बच्चे का जन्म हो।
संज्ञा
स्त्री.

सोहर
नाव का पाल खींचने की रस्सी।
संज्ञा
स्त्री.
(देश.)

सोहराना, सोहरानो
किसी बस्तु या अंग पर धीरे-धीरे हाथ फेरना।
क्रि.स.
(हिं. सहलाना)

सोहला
बच्चे के जन्म पर गाए जानेवाले गीत।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोहर)

सोहला
मंगलगीत।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोहर)

सोहला
किसी देवी-देवता की पूजा के गीत।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोहर)

सोहहीं
शोभित होते हैं।
क्रि.अ.
(हिं. सोहना)
उ.- कमल मुख कर कमल लोचन कमल मृदु पद सोहहीं-१० उ.-२४।

सोहाइ
अच्छा या रुचिकर लगता हे।
क्रि.अ.
(हिं. सोहाना)
उ.- बिछुरे बारि मीनहिं अनत कहा सोहाइ-३४२४।

सोहाइन
मनोहर, सुंदर।
वि.
(हिं. सुहावन)

सोहोई
शोभित होती है।
क्रि.अ.
(हिं. सोहाना)
उ. बाँधत बंदन-माल, साथियै द्वारै धुजा सुहाई-सारा. ३९५।

सोहोई
भला या अच्छा लगता है।
क्रि.अ.
(हिं. सोहाना)
उ.- सूरदास प्रभु बिनु ब्रज ऎसो, एको पल न सोहाई-२५३८।

सोहोई
सुंदर, सुहावनी।
वि.
उ.- सरद सोहाई आई रात।

सोहाए
अच्छा या भला लगता है।
क्रि.अ.
(हिं. सोहाना)
उ.- कहा करहि, कहाँ जाइ सखी री हरि बिनु कछु न सोहाए-२९९६।

सोहाग
सौभाग्य।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सुहाग)
उ.- राज-सोहाग बढ़ो सबै कहा निहोरो मोहिं-१० उ.-८।

सोहागा
एक खनिज।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सुहागा)

सोहागिन, सोहागिनि, सोहागिनी, सौहागिल
सधवा या सौभाग्यवती स्त्री।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सुहागिन)
उ.- ता तीरथ-तप के फल लैके, स्याम सोहागिनि कीन्ही-६५६।

सोहागु
सौभाग्य।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सुहाग)
उ.- अबलन जोग सिखावन आए चेरिहिं चपरि सोहागु-३०९५।

सोहात
अच्छा या भला लगता है, रुचता है।
क्रि.स.
(हिं. सोहाना)
उ.- (क) सबन इहै सुहात-२६८१। (ख) कछु न सुहात दिवस अरु राती-२८८२। (ग)नहिंन सोहात कछु हरि, तुम बिनु-३४२३। (घ) स्रवन कछू न सोहात-३४२६।

सोहाता
सुंदर, सुहावना।
वि.
(हिं. सोहना)

सोहाती
मनभावनी, रुचिकर।
वि.
स्त्री.
(हिं. सोहाता)
उ.- बात बिचारि सोहाती कहियै-३२३१।

सोहाना, सोहानो
सुंदर लगना, शोभित होना।
क्रि.अ.
(हिं. सोहना)

सोहाना, सोहानो
प्रिय लगना, रुचना।
क्रि.अ.
(हिं. सोहना)

सोहाय
अच्छा लगता है।
क्रि.अ.
(हिं. सोहाना)
उ.- तब हरि कहथौ, मोहिं राधा बिन पल-छिन कछु न सेहाय-सारा. ७२२।

सोहाया, सोहायो, सोहायौ
मनभावना, रुचिकर।
वि.
(हिं. सोहाना)
उ.- मिल्यौ सोहायो साथ श्याम कौ कहाँ कंस, कहाँ काग-३०९५।

सोहारद
सज्जनता।
संज्ञा
पुं.
(सं.) सौहार्द)

सोहारद
मित्रता, प्रेम-भाव।
संज्ञा
पुं.
(सं. सौहार्द)

सोहारी
सादी पूरी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सु + आहार)

सोहारी
बहुत छोटी-छोटी सादी या मीठी पूरियाँ जो देवी-देवताओं के पुचापे के लिए की जाती हैं।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सु + आहार)
उ.- कान्ह कुँवर कौ कनछेदन है हाथ सोहारी भेली गुर की-१०-१८०।

सोहाल
एक तरह का सादा या नमकीन पकवाल जो मैदे का बनता है।
संज्ञा
पुं.
(सं. सु + आहार)

सोहाली
सुहारी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सुहारी)

सोहावन
सुंदर, मनभावना।
वि.
(हिं. सुहावना)

सोहावना
शोभित होना।
क्रि.अ.
(हिं. सोहाना)

सोहावना
प्रिय या रुचिकर लगना, रुचना।
क्रि.अ.
(हिं. सोहाना)

सोहावना
सुंदर , मनभावना, रुचिकर।
वि.

सोहावनि, सोहावनी
मनभावना, रुचिकर।
वि.
(हिं. सुहावना)

सोहासित
मनभावना, रुचिकर।
वि.
(हिं. सोहाना)

सोहासित
सुंदर, सुहावना।
वि.
(हिं. सोहाना)

सोहासित
ठकुरसुहाती।
संज्ञा
पुं.
(सुभावित)

सोहिं
सामने सम्मुख।
क्रि. वि.
(हिं. सौंहैं)

सोहिनी
सुहावनी, सुंदर।
वि.
स्त्री.
(हिं. सोहना)

सोहिनी
प्रिय लगनेवाली, रुचिकर।
वि.
स्त्री.
(हिं. सोहना)

सोहिनी
करुण रस की एक रागिनी।
संज्ञा
स्त्री.

सोहिल
अगस्त्य तारा।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सुहेल)

सोहिला, सोहिलो, सोहिलौ
बच्चे के जन्म पर गाए जानेवाले गीत।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोहला)
उ.- गावौं हरि कौ सोहिलौ मन-आखर दै मोहिं- १०-४०।

सोहिं, सोहीं, सोहें, सोहैं
सामने, आगे, सम्मुख।
क्रि. वि.
(हिं. सोह)

सोहैं
सोहते हैं।
क्रि.अ.
(हिं. सोहना)
उ.- संग-संग बल मोहन सोहैं- १०-११७।

सोहै
शोभित होता है, सुंदर लगता है।
क्रि.अ.
(हिं. सोहना)
उ.- (क) सेत उपरना सोहै-१-४४। (ख) मोर मुकुट पीताम्बर सोहै-३-१३। (ग) भृकुटि पर मसि-बिंदु सोहे-१०-२२५।

सौं
कसम, शपथ।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सौंह)
उ.- सुंदर स्याम हँसत सजनी सों नंद बबा की सौं री।

सौं
समान, तुल्य।
अव्य.
(हिं. सा.)
उ.- (क) तिनुका सौं अपने जन कौ गुन मानत मेरु समान- १-८। (ख) हरि सौं ठाकुर और न जन कौं-१-९।

सौं
से, द्वारा।
प्रत्य.
(प्र. सुंतो)
उ.- (क) जज्ञ-भाग नहिं लियौ हेत सौं- १-२५। (ख) गजराज ग्राह सौं अटक्थौ-१-३२। (ग) प्रेम पतंग दीप सौं- १-५५। (घ) बिमुखनि सौं रति जोरत दिन-प्रति- १-४९। (ङ) भावी काहूँ सौ न टरै-१-२६४। (च) कुँवरि सौं कहति वृषभानु-धरनी-६९८।

सौंकारा
सबेरा, प्रात:काल।
संज्ञा
पुं.
(सं. सकाल)

सौंकरै
सबेरे।
क्रि. वि.
(हिं. सौंकारा)

सौंकरै
नियत समय से पूर्व ही।
क्रि. वि.
(हिं. सौंकारा)

सौंघा
अच्छा।
वि.
(हिं. महँगा का विप.)

सौंघा
वाजिब, ठीक।
वि.
(हिं. महँगा का विप.)

सौंघा
सस्ता।
वि.
(हिं. महँगा का विप.)

सौंघाई
उत्तमता।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सौंघा)

सौंघाई
औचित्य।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सौंघा)

सौंघाई
सस्तापन।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सौंघा)

सेठ
थोक व्यापारी।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रेष्ठी)

सेठ
खत्रियों की एक प्रसिद्ध जाति।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्रेष्ठी)

सेठन
झाड़ू, बुहारी।
संज्ञा
स्त्री.
(देश.)

सेत
नदी आदि का पुल।
संज्ञा
पुं.
(सं. सेतु)
उ.-(क) सिला तरी जल माहिं सेत बैधि-१-३४। (ख) सकल विषय-बिकार तजि तू उतरि सायर-सेत-१-३११। (ग) करि कपि कटक चले लंका कौं छिन मैं बाँध्यौ सेत-सारा. २८।

सेत
खेत की मेंड़।
संज्ञा
पुं.
(सं. सेतु)

सेत
हद, सीमा।
संज्ञा
पुं.
(सं. सेतु)

सेत
सफेद, उजला।
वि.
(सं. श्वेत)
उ.-(क) सेत उपरना सोहै-१-४४। (ख) सेत सींग सुहाइ-१-५६। (ग) नीलांबर पाटंबर सारी सेत पीत चुनरी अरुनाए-७८४।
मुहा.- स्याम चिकुर भए सेत-काले बाल सफेद हो गये, युवावस्था से बुढ़ापा आ गया। उ.-इतनौ जन्म अकारथ खौयौ, स्याम चिकुर भए सेत-१-३२२।

सेतकुली
सफेद जाति का नाग जो सर्पों के अष्टकुल में एक है।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्वेतकुलीय)
उ.-मोकों तुम अब जज्ञ करावहु। तच्छक कुटुँब समेत जरावहु। बिप्रन सेतकुली जब जारी। तव राजा तिनसौं उच्चारी-१० उ.-२०५।

सेतदुति
चन्द्रमा।
संज्ञा
पुं.
(सं. श्वेतद्युति)

सेतना, सेतनो
इकट्ठा, संगृहीत या संचित करना।
क्रि.स.
(हिं. सैंतना)

सौंघाई
अधिकता।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सौंघा)

सौंघी
अच्छी।
वि.
स्त्री.
(हिं. सींघा)

सौंघी
ठीक, उचित।
वि.
स्त्री.
(हिं. सींघा)

सौंघी
सस्ती।
वि.
स्त्री.
(हिं. सींघा)

सौंचर
एक तरह का नमक।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सोंचर)

सौंज
वस्तु, सामग्री।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सौज)
उ.- (क) याहू सौंज संचि नहिं राखी-१-१३०। (ख) यह सौंज लादि कै हरि कै पुर लै जाहि-१-३१०। (ग) षटरस सौंज बनाइ जसोदा-३९७। (घ) दै सब सौज अनत लोकपति निपट रंक की नाई-१० उ.-१३३।

सौंजा
आपस का समझौता।
संज्ञा
पुं.
(हिं. समझना)

सौंजा
गुप्त रूप से किया गया मंतव्य।
संज्ञा
पुं.
(हिं. समझना)

सौंजा
सौंपने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
पुं.
(हिं. समझना)

सौंजाई
शोभा, पद और मान बढ़ानेवाली वस्तुएँ।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सौंज)
उ.- बल बिद्या धन धाम रूप गुन और सकल मिथ्या सौंजाई-१-१४।

सौंजु
वस्तु, सामग्री।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सौंज)

सौंड़, सौंड़ा
ओढ़ने की चादर, रजाई आदि।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

सौंतुख, सौंतुष
सामने, प्रत्यक्ष।
क्रि. वि.
(सं. सम्मुख)
उ.- देखि बदन चकित भई सौंतुष की सपनैं- ४३९।

सौंतुख, सौंतुष
सम्मुख, प्रत्यक्ष।
संज्ञा
पुं.

सौंदना, सौंदनो
सानना, ओत-प्रोत करना।
क्रि.स.
(सं. संधम् = मिलना)

सौंदना, सौंदनो
मिट्टी आदि लगाकर गंदा करना।
क्रि.स.
(सं. संधम् = मिलना)

सौंदर्ज, सौंदर्य
खूबसूरती, सुंदरता, रमणीयता।
संज्ञा
पुं.
(सं. सौन्दर्य)

सौंदर्यता
सुंदरता।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सौन्दर्य)

सौंध
महल।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सौध)

सौंध
चाँदी।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सौध)

सौंध
खुशबू, सुगंध।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सुगन्ध)

सौंधना, सौंधनो
सानना।
क्रि.स.
(हिं. सौंदना)

सौंधना, सौंधनो
सुगंधित करना।
क्रि.स.
(सं. सुगन्धि)

सौंधा
सुगंधित।
वि.
(हिं. सोंधा)

सौंधा
तपी हुई भूमि पर वर्षा का पहला छींटा पड़ने या भुने हुए चने या बेसन की सुगंध के समान सुगंधवाला।
वि.
(हिं. सोंधा)

सौंधा
सुंदर।
वि.
(हिं. सोंधा)

सौंधा
रुचिकर।
वि.
(हिं. सोंधा)

सौंधा
सुगंधित पदार्थ।
संज्ञा
पुं.

सौंनमक्खी
सोनामक्खी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सोनामक्खी)

सौंपति
सुपुर्द करती हूँ।
क्रि.स.
(हिं. सौपना)
उ.- दधि-माखन द्वै माट अछुते तोहिं सौंपति हौं सहियौ-१०-३१३।

सौंपना, सौंपनो
(देख-रेख आदि के लिए किसी के) सुपुर्द या हवाले करना।
क्रि.स.
(सं. समर्पण, प्रा. सउप्पण)

सौंपना, सौंपनो
सँभालने केलिए कहना, सहेजना।
क्रि.स.
(सं. समर्पण, प्रा. सउप्पण)

सौंपि
सुपुर्द या हवाले कर दे।
क्रि.स.
(हिं. सौंपना)
उ.- अजहूँ सिय सौंपि नतरु बीस भुजा भानै-९-९७।

सौंपि
सौंपि दई-सुपुर्द या समर्पण कर दिया।
प्र.
उ.-स्याम बिना ये चरित करै को, यह कहिकै तनु सौंपि दई।

सौंपि
सौंपि गए-सँभालने-सहेजने को सुपुर्द कर गये।
प्र.
उ.- भली भई तुम्हैं सोपि गए मोहिं, जान न दैहौं तुमकौं-६८१।

सौंपी
सँभालने-सहेजने को सुपुर्द किया।
क्रि.स.
(हिं. सौंपना)
उ.- कीजै कहा बाँधि करि सौंपी सूर स्याम के पानि-पृ. ३२२ (१३)।

सौंपो, सौंपौ
सँभालने-सहेजने के लिए दो।
क्रि.स.
(हिं. सौंपना)
उ.- यह तौ सूर ताहि लै सौंपो जिनके मन चकरी-३३६०।

सौंप्यो, सौंप्यौ
सुपुर्द या समर्पण किया।
क्रि.स.
(हिं. सौंपना)
उ.- (क) सूर सबै इनको क्यौं सौंप्यो, यह कहि पछितावै- पृ . ३३० (९०)। (ख) सिंधु तें काढ़ि संभु कर सौंप्यौ गुनहगार की नाई-३०७७।

सौंफ
एक पौधा जिसके बीज दवा और मसाले के काम आते हैं।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. शतपुष्पा)

सौंफिया, सौंफी
जिसमें सौंफ पड़ी हो।
वि.
(हिं. सौंफ)

सौंफिया, सौंफी
सौंफ की बनी शराब।
संज्ञा
स्त्री.

सौंभरि
एक प्राचीन ऋषि।
संज्ञा
पुं.
(सं. सौभरि)

सौंर
वह स्थान जहाँ स्त्री प्रसव करती है, सूतिकागार।
संज्ञा
पुं.
(हिं. सौरी)

सौंरई
साँवलापन।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. साँवला)

सौंरना, सौंरना
स्मरण करना।
क्रि.स.
(हिं. सुमरना)

सौंरना, सौंरना
सँवारा या ठीक किया जाना।
क्रि.अ.
(हिं. सँवरना)

सौंरना, सौंरना
सँवारना , ठीक करना।
क्रि.स.

सौंसे
सब, कुल।
वि.
(सं. समस्त)

सौंह
कसम, शपथ।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सौगंद, सौगंध)
उ.- (क) उनहूँ जाइ सौंह दै पूछौ मैं करि पठयौ सटिया-१-१९२। (ख) कहा कहौं बलि जाउँ, छोरि तू, तेरी सौंह दिवाई-३६३। (ग) कंस नृपति की सौंह है, पुनि-पुनि कही तुमको-२५७७। (घ) चरन कमल की सौह कहत हौं, इह सँदेस मोहिं बिष सों लागत-३४०७।

सौंह
सामना, समक्षता।
संज्ञा
पुं.
(सं. सम्मुख)

सौंह
सामने, सम्मुख।
क्रि. वि.

सौंहन
सुंदर, सुहावना।
वि.
(हिं. सोहन)

सौंहन
सुंदर पुरुष।
संज्ञा
पुं.

सौंहन
नायक।
संज्ञा
पुं.

सौंहन
एक पक्षी।
संज्ञा
पुं.

सौंही
एक तरह का हथियार।
संज्ञा
स्त्री.
(देश.)

सौंही
सामने, सम्मुख।
क्रि. वि.

सौंहें, सौंहैं
कसम, शपथ।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सौंह = शपथ)
उ.- (क) दै दै सौंहैं नंद बबा की जननी पै लै आइ-१०-२४०। (ख) मोहिं अपने बबा की सोहै कान्हहिं अब न पत्याउँ-३४५।

सौंहें, सौंहैं
सामने, समक्ष।
क्रि. वि.
(सं. सम्मुख)

सौ
नब्बे से दस अधिक की संख्या या अंक।
संज्ञा
पुं.
(सं. शत)

सौ
जो गिनती में पचास का दूना हो।
वि.
उ.- (क) जाके जोधा हे सौ भाई-१-२४। (ख) सौ भैया दुरजोधन राजा-१-४३।
मुहा.- सौ बातन की एक बात- सारांश, तात्पर्य। उ.- सौ बातन की एकै बात-१० उ.-१२६। सौ की सीधी एक-सबका निचोड़ या सार। सौ बार कहना- बार-बार या अनेक बार कहना। उ.-जो पे जिय लज्जा नहीं, कहा कहौं सौ बार-१-३२५।

सौ
समान, तुल्य।
अव्य.
वि.
(हिं. सा)

सौक
सपत्नी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सौत)

सौक
एक सौ।
वि.
(हिं. सौ + एक या क)

सौक
सौ के लगभग, लगभग सौ।
क्रि. वि.

सौक
किसी वस्तु की प्राप्ति या सुख के उपभोग की प्रबल इच्छा।
संज्ञा
पुं.
(अ. शौक़)
मुहा,- सौक से- प्रसन्नता से, सहर्ष।

सौक
चसका, व्यसन।
संज्ञा
पुं.
(अ. शौक़)

सौकन
सपत्नी।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. सौत)

सौकर्य
सुकर' का भाव, सुसाध्यता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौकर्य
सुबिधा, सुभीता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौकीन
जिसे किसी बात का शौक या व्यसन हो।
वि.
(हिं. शौकीन)

सौकीन
ठाट-बाट से या बना-ठना रहनेवाला।
वि.
(हिं. शौकीन)

सौकीनी
तरह-तरह के शौक या व्यसन करने का भाव।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. शौकीनी)

सौकीनी
बना-ठना या ठाट-बाट से रहने का भाव।
संज्ञा
स्त्री.
(हिं. शौकीनी)

सौकुमार्य
सुकुमारता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौकुमार्य
यौवन।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौकुमार्य
काव्य का एक गुण जो ग्राम्य और परुष शब्दों के त्याग एवं कोमल शब्दों के प्रयोग से आता है।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौक्ति
सूक्त संबंधी।
वि.
(सं.)

सौख
किसी वस्तु की प्राप्ति या उसके सुखोपभोग की प्रबल कामना।
संज्ञा
पुं.
(हिं. शौक)

सौख
चस्का, व्यसन।
संज्ञा
पुं.
(हिं. शौक)

सौखिक
सुख चाहनेवाला, सुखार्थी।
वि.
(सं.)

सौखीन
किसी बात का शौक या व्यसन करनेवाला।
वि.
(हिं. शौकीन)

सौखीन
बना-ठना रहनेवाला, छैला।
वि.
(हिं. शौकीन)

सौख्य
सुख का भाव, सुखता।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौख्य
सुख, आराम।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौगंद
कसम, शपथ।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सौगंध)

सौगंध
सुगंध।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौगंध
सुगंधित तेल आदि का व्यापार करनेवाला, गंधी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौगंध
सुगंधित, सुगंधयुक्त।
वि.

सौगंध
कसम, शपथ।
संज्ञा
स्त्री.
(सं. सौगन्ध)

सौगंधिक
गंधी।
संज्ञा
पुं.
(सं. सौगन्धिक)

सौगंधिक
सुगंधिक, सुवासित।
वि.

सौगत
सुगत (बुद्ध) का अनुयायी।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौगत
सुगत-संबंधी।
वि.

सौगत
बौद्ध मत का।
वि.

सौगतिक
सुगत (बौद्ध) का अनुयायी, बौद्ध भिक्षु।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौगतिक
नास्तिक।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

सौगरिया
क्षत्रियों की एक जाति।
संज्ञा
पुं.
(देश.)

सौगात
तोहफा, भेंट, उपहार।
संज्ञा
स्त्री.
(तु.)

सौगाती
सौगात या उपहार के योग्य।
वि.
(हिं. सौगात)