शरीर के किसी अंग पर गरम चीज से पहुँचाई जानेवाली गर्मी, टकोर।
आँच के पास या आग पर रखकर गर्मी पहुँचाना या भूनना।
(सं. श्रेषण=जलाना, तपाना)
धूप में या गरमी पहुँचानेवाली चीज के सामने रहकर उसकी गर्मी से लाभ उठाना या उठाने को प्रवृत्त करना।
(सं. श्रेषण=जलाना, तपाना)
मुहा.- आँखें सेंकना-किसी (नारी) का सुन्दर रूप देखकर आँखें तृप्त करना।
एक पौधा जिसकी फलियों की तरकारी बनती है।
स्तन से निकलने वाली दूध की धार।
मूँज या सरकंडे के सींके का निचला मोटा हिस्सा।
अपने पास से कुछ खर्च या व्यय न होना।
मुहा.- सेंत का-(१) जिसके लिए खर्च न करना पड़ा हो, मुफ्त में मिला हुआ। (२) बहुत सा, ढेर का ढेर। उ.-दधि में पड़ी सेंत की मोपै चीटी सबै कढ़ाईं-१०-३२२। सेंत में- (१) बिना कुछ दाम दिये या खर्च किये। (२) व्यर्थ, निष्प्रयोजन।
रचकर या बनाकर तैयार करने की क्रिया या भाव।
उ.- मानौं आन सृष्टि करिबे कौं अंबृज नाभि जम्यौ - 1- 273।
संसार या जगत के चर-अचर प्राणी।
उ.- इनतैं प्रगटी सृष्टि अपार- 3-8।
सृष्टिकर्ता, सृष्टिकर्त्ता
सृष्टि या संसार की रचना करनेवाला, ब्रह्मा।
सृष्टिकर्ता, सृष्टिकर्त्ता
वह शास्त्र जिसमें सृष्टि की उत्पत्ति, रचना, विकास आदि का विचार किया जाता है।
बिना दाम दिये, मुफ्त में।
[हिं. सेंत + मेंत (अनु.)]
उ.- कलुषी अरू मन मलिन बहुत मैं सेंतमेंत न बिकाऊँ-१-१२८।
मुहा. सेंतमेंत का - मुफत का। सेंतमेंत में- (१) मुफ्त में। (२) व्यर्थ।
बेमतलब, वृथा, निष्प्रयोजन।
[हिं. सेंत + मेंत (अनु.)]
कुछ खर्च या व्यय का न होना।
मुहा. सेंति के- बहुत से। उ.- सखा संग लीन्हें जु सेंति के फिरत रैनि दिन बन में धाए-१०९३। सेंति या में - बिना मूल्य के, मुफ्त में। उ.- प्रानन के बदले न पाइयत सेंति बिकाय सुजस की ढेरी-२८५२।
पुरानी हिन्दी की करण और अपदान की विभक्ति, से।
[प्रा. सुंतो (पंचमी विभक्ति)]
उ.- (क) ता रानी सेंती सुत ह्यैहै-६-५। (ख) तप कीन्हैं सो दैहैं आग। ता सेंती तुम कीनौ जाग-९-२। (ग) बहुरि सक्र सेंती कहथौ जाइ-९-१७४।
उ.- इंद-जीत लीनी जब सेंथी (पाठा. - सक्ती) देवनि हहा करथौ। छूटी बिज्जु-रासि वह मानौ, भूतल बंधु परथौ-९-१४४।
चोरी करने के लिए दीवर में किया गया छेद जिसमें से होकर चोर घर में जा सके और सामान बाहर निकाल सके।
वह पुल जो श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करने के उद्देश्य से नल, नील आदि बानरों की सहायता से बँधवाया था।
दक्षिण में शिव का एक मंदिर जिसकी स्थापना सेतु बंधन के अवसर पर श्रीराम द्वारा की जाना प्रसिद्ध है। यह हिन्दुओं के चार मुख्य धामों में से एक है।
हर्ष, लज्जा आदि से पसीना आना जो एक सात्विक अनुभाव है।
पसीने से उत्पन्न होनेवाला।
मल-त्याग, कुल्ला- दातुनआदिकृत्य।
सूची-कर्म से जीविकार्जन करनेवाला, दरजी।
उ.- (क) लेहु सँभारि देहु पिय अपनी विन प्रमान सब सौज धरी। (ख) जन पुकारे हरि पै जाइ। जिनकी यह सब सौज राधिका तेरे तनु सब लई छँड़ाइ।
वह पशु या पक्षी जिसका शिकार किया जाता हो।
किसी स्त्री के प्रेमी या पति की दूसरी प्रेमिका या पत्नी, सवत।
उ.- (क) मानौं स्वर्गहिं तैं सुरपति-रिपु-कन्या-सौति आइ ढरि सिंदहिं-१०-१०७। (ख) चेरि सौति भइ आइ-६५६। (ग) नींद जो सौति भई रिपु हमको, सहि न सकी रति तिल की-२७८६।
उ.- धरनी नख चरननि कुरवारति सौतिन भाग सुहाग दुहीली-१३०९।
सौत के कारण होनेवाली कुढ़न या मिलनेवाला दुख।
उ.- (क) इक टक चितै रही प्रतिबिंबहिं सौति-साल जिय जानी-१८६५। (ख) सौति-साल उर में अति साल्यौ नखसिख लौं भहरानी-२६७३।
सामना, समक्ष, समक्षता प्रत्यक्षता।
उ.- देखि बदन चकृत भई सौतुक की सपने।
जिसका संबंध सौत के रिश्ते या पक्ष से हो।
सौदामनी, सौदामिनि, सौदामिनी
उ.- बंदन सो ससि में बए मनो सौदामिनि के बीज-२०६५।
सौदामनी, सौदामिनि, सौदामिनी
बिजली जैसा चंचल और चमकदार।
वह चीज जो खरीदी या बेची जाय।
मुहा.- सच्चा सौदा-खरा सौदा, ऎसा सौदा जिसमें किसी प्रकार का धोखा या हानि न हो।
खरीदने-बेचने या लेन-देन की बातचीत।
खरीदने-बेचने की बातचीत पक्की करना।
मुहा.- सौदा करना-खरीदने की बात-करना। सौदा कराना-खरीदने की बातचीत कराना। सौदा पटना या होना- खरीदने की बातचीत पक्की होना। सौदा पटाना-खरीदने की बातचीत पक्की करना या कराना।
मुहा.- सच्चा सौदा, सौदा साँचौ-खरा व्यापार, व्यापार जिसमें किसी प्रकार का छल-कपट न हो। उ.- सूर स्याम को सौदा साँचौ-१-३१०।
सौदा-सुलुफ-खरीदन की चीजैं। सौदा-सूत-व्यापार, व्यवहार।
पागल, बादला या दीवाना-पन।
उर्दू के एक प्रसिद्ध शायर।
मुहा.- सौदाई होना- बहुत आसक्त होना। सौदाई बनाना-अपने ऊपर किसी को आसक्त करना।
सौनंद' नामक मूसलधारी, बलराम।
सभद्रा का पुत्र, अभिमन्यु।
एक ऋषि जिन्होंने यमुना में एक मत्स्य को मछलियों से भोग करते देख, काम-वासना से मान्धाता की पचास कन्याओं से विवाह करके उनसे पाँच हजार पुत्र उत्पन्न किये। अंत में भोग से तृप्ति न होते देख विरक्त होकर कठोर तपस्या करने के उपरंत शरीर त्याग दिया था।
उ.- सौभरि रिषि जमुना-तट गयौ। तहाँ मच्छ इक देखत भयौ-९-८।
सौभागिन, सौभागिनि, सौभागिनी
स्त्री के सधवा होने की अवस्था।
उ.-सूत सौनकनि सौं यौं कहथौ-१-२०७।
पीली जूही या चमेली, स्वर्ण यूथिका।
गांधार के राजा सुबल का पुत्र शकुनि जो दुर्योंधन का मामा था।
सिंधु नद के आसपास के प्रदेश का प्राचीन नाम।
अस्त्रों को निष्फल करनेवाला अस्त्र।
आनंद या प्रसन्नता देनेवाला।
सुमित्रा जो लक्ष्मण की माता थी।
उ.- सौमित्रा कैकेवी मन आनंद वह सवहिन सुत जायौ-९-२२।
सुमित्रा के पुत्र लक्ष्मण।
नियम पूर्वक खाने-पीने आदि के कार्य करना।
किसी स्थान पर निरंतर वास करना या पढ़े रहना।
दूर न करके व्यर्थ के लिए दैठे रहना।
मादा चिड़िया का गरमी पहुँचाने के लिए अंडे पर बैठना।
देव-सेनापति स्वामि कार्तिकेय का एक नाम।
(चार) शुभ ग्रह-चंद्र, बुध, बृहस्पति और शुक्र।
सुर्य के अनुसार या उससे प्रभावित।
सूर्य और उसकी परिक्रमा करनेवाले ग्रहों का समूह।
एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय तक का समय।
उ.- (क) त्रिबिध समीर सुमन सौरभ मिलि मत्त मधुप गुंजार। (ख) ज्यौं सौरभ मृग-नाभि बसत है द्रुम-तृन सूंधि फिरथौ-२-२६।
सुरभि अर्थात् गाय से उत्पन्न।
तीस दिन का वह समय जब सूर्य बारह राशियों में से किसी एक राशि में रहता है; एक संक्रांति से दूसरी संक्रांति तक का समय।
उतना काल जिताना सूर्य को बारह राशियों पर धूमने में लगता है; एक मेष संक्रांति से दूसरी मेष संक्रांति तक का समय।
आधुनिक मथुरा और उसके आसपास के प्रदेश का पुराना नाम जो राजा शूरसेन के नाम पर पड़ा था।
गुजरात-काठियावाड़ का पुराना नाम, सोरठ देश।
सौराष्ट्र प्रदेश का निवासी।
वह स्थान जहाँ स्त्री प्रसव करे, सूतिकागार।
जिसका स्थान निन्यानबे की संख्या के बाद पड़े।
सिंधु नद के आसपास के प्रदेश का प्राचीन नाम।
उक्त प्रदेश का निवासी या राजा।
जिसका स्थान निन्यानबे की संख्या के बाद पड़े।
उ.- सौवों जज्ञ सगर जब टयौ। इंद्र अस्व कौं हरि लै गयौ-९-९।
लाली मिला नीला या पीला रंग।
(सं. सम्मुख, प्रा. सम्मुह)
निकलने या बाहर आने की क्रिया।
गुप्त वंश का एक प्रसिद्ध सम्राट जो 'विक्रमादित्य' के नाम से भी प्रसिद्ध है।
स्कंद को जीतनेवाले विष्णु।
वृक्ष के तने का ऊपरी भाग जिसमें से डालियाँ निकलती हैं, कांड।
ग्रंथ का विभाग या खंड जिसमें कोई पूरा प्रसंग हो।
उ.- ब्यास कहथौ सुकदेव सौं, श्रीभागवत बखानि। द्वादस स्कंध परम सुभ प्रेम-भक्ति की खान-१०-१।
वह वस्तु जिसका राज्याभिषेक में उपयोग हो।
दर्शन शास्त्र में शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध।
देवसेनापति, स्वामी कार्तिकेय।
सेनापति का पद, कार्य या अधिकार।
युद्ध के लिए की गयी सेना-रचना या स्थापना।
वह पशु जो कंधों के बल बोझ खीचता हो।
चूका हुआ, लक्ष्य से हटा हुआ।
(हर्ष, लज्जा, भय आदि से) शरीर के अंगों का शिथिल या जड़ हो जाना, जो साहित्य में एक प्रकार का सात्विक भाव माना गया है।
शीघ्र वीर्य-पात को रोकने की औषध।
वह तांत्रिक प्रयोग जिससे किसी की चेष्टा, शक्ति आदि को रोका जाय।
कामदेव के पाँच वाणों- उन्माद, शोषण, तापन, सम्मोह, और स्तंभन-में एक।
जड़, सुन्न, निश्चल, निश्चेष्ट।
वह तांत्रिक प्रयोग जिससे किसी की चेष्टा, गति या शक्ति रोकी जाय।
वह व्यक्ति, तत्व आदि जो किसी संस्था, कार्य-सिद्धांत आदि का आधार-स्वरूप हो।
समाचार-पत्रों का विषय-विशेष के अनुसार किया गया विभाग।
संभोग-काल में वीर्य को शीघ्र स्खलित होने से रोकनेवाला (प्रयोग या औषध)।
स्तंभ' का भाव, अवरुद्धता।
स्त्रियों या मादा पशुओं के शरीर का वह अंग जिसमें दूध रहता है।
कार्य-संपादन, उत्सव आयोजन, जीवन-यापन आदि में व्यय इत्यादि की दृष्टि से लगायी जानेवाली अनुमानित उच्च, मध्यम अथवा निम्न श्रेणी।
किसी देनी-देवता की पद्यबद्ध स्तुति या गुण-गान, स्तोत्र।
स्तव, स्तुति या प्रार्थना करनेवाला।
फूलों का गुच्छा, गुलदस्ता।
पुस्तक का अध्याय या परिच्छेद।
जड़, सुन्न, अचल, निश्चेष्ट।
भूमि का वह विभाग जो भिन्न-भिन्न कालों में बनी हुई उसकी तहों या परतों के आधार पर होता है।
दूर तक फैला हुआ, विस्तुत।
इधर-उधर बिखरा हुआ, विकीर्ण।
प्रशंसा, गुणकथन, प्रार्थना।
उ.- (क) कपिल स्तुति तिहिं बहु बिधि कीन्हीं-९-९। (ख) अकूर बिमल स्तुति गानै-२५५७। (ग) लोक-लोकन बिदित कथा तुरतही गई, करन स्तुतिहिं जहाँ तहाँ आए-२६१८।
स्तुति या प्रशंसा करनेवाला।
देवी-देवता की पद्यबद्धस्तुति।
स्त्री या पत्नी के वश में रहनेवाला।
स्त्री' होने का भाव, गुण या धर्म।
स्त्रियों जैसा भाव, जनानापन।
स्त्री का वह गुण जिसके अनुसार वह पति के अतिरिक्त किसी से प्रेम या शरीर -संबंध नहीं करती सतीत्व।
उ.- किऎ नर की स्तुती कौन कारज सरै, करै सो आपनौ जन्म हारै-४-११।
स्तुति या प्रशंसा के योग्य।
मिटटी-पत्थर का ढूह, टीला।
वह ढूह या टीला जिसके नीचे भगवान बुद्ध या किसी अन्य बौद्ध महात्मा की अस्थि, दाँत, केश आदि स्मृति-चिह्न संरक्षित हों।
एक भक्त जो जाति का नाई था।
श्रीकृष्ण के एक पुत्र का नाम।
उ.-सप्त समुद्र देउँ छाती तर, एतिक देह बढ़ाऊँ। चली जाऊँ सेना (सैना) सब मोपर धरौ चरन रघुबीर-९-१०७।
उ.-(क) कोटि छ् यानबे नृप-सेना सब जरासंध बँध छोरे-१-३१। (ख) सेना साथ बहुत भाँतिनि की कीन्हें पाप अपार-१-१४१।
पूजा, उपासना या आराधना करना।
(व्याकरण में) शब्द का स्त्री-लिंग-वाची प्रत्यय।
ऎसा धन जो स्त्री को मैके या ससुराल से मिले और जिस पर एकमात्र उसी का अधिकार रहे।
स्त्री का (प्रति मास) रजस्वला होना।
व्याकरण में वह शब्द जो स्त्री जाति का अथवा वस्तु के अल्पार्थक या सुकुमार रूप का सूचक होता है।
पत्नी के अतिरिक्त दूसरी स्त्री की कामना न करना।
जो पत्नी के अतिरिक्त दूसरी स्त्री की कामना न करे।
स्त्री या पत्नी के वश में रहनेवाला।
जो कुछ समय के लिए रोक दिया गया हो।
ऎसी जगह जहाँ कोई विशंष रचना, निमर्ण आदि हो या होने को हो।
भूमि पर रहने-बसनेवाला (प्राणी)-।
भूमि पर रहने-बसनेवाला (प्राणी)-।
भूमि पर रहने या विचरण करनेवाला (प्राणी)।
जो स्त्रियों के संपर्क में ही रहता हो।
एक प्रत्यय जो शब्दांत में लगकर मुख्यतःचार अर्थ देता है-स्थित, विद्यमान, निवासी और लीन।
(कार्य, विचार, बैठक आदि) कुछ समय के लिए रोक देना।
उ.- पावै मेरो परम स्थान-११-६।
उ.- प्रगट भई कुच-स्थली सोख्यो जोबन-सूरि-२०६५।
(व्याकरण में) मुख का वह अंग जहाँ से किसी वर्ण का उच्चारण हो।
जगह (की जगह पर), बदला (केबदले में)।
उ.- पात्र स्थान हाथ हरि दीन्हें-२-२०।
जो अपने स्थान से गिर या हट गय हो।
जो अपने पद से हटा दिया गया हो।
किसी वस्तु का एक स्थान से हटाकर दूसरे स्थान पर रखा जाना।
किसी वस्तु का एक व्यक्ति से दूसरे के हाय में पहुँचना।
किसी कर्मचारी या कार्यकर्ता का एक विभाग से दूसरे विभाग में या एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजा जाना, बदली।
जिसका स्थान बदल दिया गया हो, जो एक स्थान से दूसरे पर रख या भेज दिया गया हो।
किसी के न रहने पर उसके स्थान पर अस्थायी रूप से बैठने या काम करनेवाला।
उस स्थान का जिसके संबंध में कुछ चर्चा या उल्लेख हो।
जो किसी स्थान पर स्थित हो।
उस स्थान से संबंधित जिसका उल्लेख हुआ हो।
(संस्था आदि की) स्थापना करनेवाला;, संस्थापक।
मूर्ति या प्रतिमा बनानेवाला।
(नाटक में) सूत्रधार का सहकारी।
वह विद्या जिसमें भवन-निर्माण-संबंधी विषयों का विवेचन हो, वास्तुशास्त्र।
दृढ़तापूर्व्रक जमाना, बैठाना या रखना।
स्थायी रूप से स्थित करना।
नयी संस्था का नया कार-बार खड़ा करना।
किसी विषय को (सप्रमाण) सिद्ध करना।
स्थायी होने का भाव, गुण, धर्म या अवस्था।
टिकने, ठहरने या स्थिर रहनेवाला।
बहुत दिन तक चलने या बना रहनेवाला।
संगीत में किसी गीत का पहला चरण, टेक (दूसरा पद 'अंतरा' होता है)।
वे तत्व या भाव जो मनुष्य के मन में सदा निहित रहते और विशिष्ट कारण से जाग्रत होते हैं और रस-परिपाक में, बिरुद्ध-अविरुद्ध भावों को अपने में समा लेते हुए, अंत तक बने रहते हैं। इनके आधार पर साहित्य में नौ रस माने गये हैं जिनके नाम और उनके स्थायी भाव ये हैं- श्रृंगार रस का स्थायीभाव रति, हास्य का हास, करूण का शोक , रौद्र का क्रोध, वीर का उत्साह, भयानक का भय, बीभत्स का घृणा, अदभुत का विस्मय और शांत का निर्वेद।
(हाँडी में पकते चावलों में से एक देखकर सबकी स्थिति जान लेने की तरह) एक बात देखकर अन्य बातें समझ लेना।
उ.- मुरली अति गर्व काहु बदति नाहिं आजु¨¨¨¨¨¨। स्थावर चर, जंगम जड़ करति जीति जीति-६५३।
जो अपने स्थान से हट ही न सके, 'जंगम' का विरुद-द्यार्थक।
उ.- (क) स्याम-हलधर संग सँग बहु गोप-बालक-सनु-४२७। (ख) जुरी ब्रज-बालक सेनु-४४८।
उ.- सफ सेब छुहारे पिस्ता जे तरबूजा नाम-१०-२१२।
एक स्थान पर ठहरा या टिका हुआ।
बैठन या आसीन रहने की अवस्था या भाव।
रहने या निवास करने की स्थिति।
एक स्थान, अवस्था या रूप में बना रहना।
पर्याप्त समय, अवस्था या कार्य के पश्चात् प्राप्त व्यक्ति, संस्था आदि कीमर्यादा, सम्मान आदि की सूचक दशा।
किसी आरोप आदि के पक्ष में अपने संबंध को स्पष्ट करनेवाली बात।
जिसकी विवेकबुद्धि स्थिर हो।
एक ही स्थिति में बना रहनेवाला, निश्चल।
उ.- देख्थो भरत तरुन अति सुंदर। स्थूल सरीर, रहित सब द्वंदर ¨¨¨¨¨¨। तन स्थूल अरु दूबर होइ। परमातम कौं ये नहिं दोइ-५-४।
सहज में दिखायी देने या समझ में आ सकनेवाला, सूक्ष्म का विपरीतार्थक।
मोटे हिसाब से अनुमान किया या ध्यान में आया हुआ।
स्थूल' होने का गुण, भाव या धर्म।
जिस पर किसी प्रकार का प्रभाव पड़ा हो, ओत-प्रोत।
वह जिसने (ब्रह्मचर्यपूर्वक) विद्याध्ययन समाप्त कर लिया हो।
सदा बना रहनेवाला, स्थायी।
जो अपनी बात या विचार पर दृढ़ रहता हो।
वह जो विश्व विद्यालय की परीक्षा में उत्तीर्ण हो।
उ.- (क) स्नान करि अंजली-जल नृप लियौ-८-१६। (ख) तहँ उरवसी सखिनि समेत आई हुती स्नान कैं हेत-९-२। (ग) यहि अंतर यमुना तट आए स्नान-दान कि खरथौ-२५५२।
धूप, वायु आदि के सामने शरीर को इस प्रकार करना कि उसका सारे अंगों पर पूरा प्रभाव पड़े।
इस प्रकार किसी वस्तु का दूसरी पर पड़नेवाला प्रभाव।
वह कमरा जिसमें स्नान करने की व्यवस्था हो।
(हाथ, पैर आदि) कर्मेन्द्रिय।
शरीर की वे नसें जिनसे शीत, ताप, वेदना आदि की अनुभूति होती है।
जिसमें स्नेह या तेल लगा हो, चिकना।
प्रिय होने का भाव, प्रियता।
पुत्र की पत्नी, पतोहू, पुत्रवधू।
छोटों के प्रति वात्सल्य-भाव।
जिसका स्वभाव ही स्नेह करने का हो।
अंग़ों आदि की फड़क, धड़क।
किसी चीज का धीरै-धीरे हिलना-काँपना।
हिलता-काँपता या फड़कता हुआ।
हिलने, काँपने या फड़कनेवाला।
किसी के मुकाबले या किसी प्रतियोगिता में आगे बढ़ने की इच्छा, होड़।
सामर्थ्य या योग्यता से अधिक करने या पाने की इच्छा, हौंसला या साहस।
सद्भावपूर्वक किसी के समक्ष होने की कामना या चेष्टा।
स्पर्द्धा करनेवाला, जिसमें स्पर्द्धा का भाव हो।
(सं. स्पर्दिन्. हिं. स्पर्द्धी)
दो या अधिक वस्तुओं के परस्पर सटने, लगने या छूने का भाव।
त्वचा का वह गुण जिससे छूने, दबने आदि का बोझ या अनुभव हो।
व्याकरण में उच्चारण के आभ्यंतर प्रयत्नों केचार भेदों में से एक जिसमें उच्चारण करते समय यागिंद्रिय का द्वार बंद-सा हो जाता है (देवनागरी वर्णमाला के क' से 'म' तक के व्यंजनों का उच्चारण इसी प्रयत्न से होता है)।
ग्रहण' के समय सूर्य या चंद्रमा पर छाया पड़ने का आरंभ।
जो स्पर्श से या उसके कारण उत्पन्न हो, संक्रामक।
कोई बात इस प्रकार स्पष्ट करना कि वक्त पर संदेह न रहे।
कार्य-विशेष के संबंध में आपत्ति, आरोप आदि होने पर अपनी स्थिति स्पष्ट करना और अपने आचरण के कारणों पर प्रकाश डालना।
जिसका या जिससे स्पर्श हुआ हो, छुआ हुआ।
वर्णोच्चारण का स्पष्ट प्रयत्न।
जिसकी या जिसके लिए इच्छा या कामना की जाय, वांछनीय।
जो गौरव या बड़ाई के योग्य हो, गौरवशाली।
चारपाई के सिरहाने की पाटी।
(सं. शीतल, प्रा. सीअड़, हिं. सीयर, सीरा)
(सं. शीतल, प्रा. सीअड़, हिं. सीयर, सीरा)
(सं. शीतल, प्रा. सीअड़, हिं. सीयर, सीरा)
(सं. शीतल, प्रा. सीअड़, हिं. सीयर, सीरा)
मूर्ति आदि को जल में प्रवाहित करना या जमीन में गाड़ना।
साफ साफ दिखायी देने या समझ में आ सकनेवाला
मुहा.- स्पष्ट कहना या सुनाना-(बिना दुराव-छिपान के) साफ-साफ कहना।
जिसके संबंध में संदेह न हो।
व्यकरण में ('प' से 'म' तक के) वर्णों के उच्चारण का वह प्रयत्न जिसमें दोनों होंठ एक दूसरे से छू जाते है।
(बिना किसी संकोच या भय के) साफ और सच्ची बात कहनेवाला व्यक्ति।
एक तरह का सफेद पारदर्शी पत्थर, बिल्लौर।
उ.- (क) फल स्फटिक खंभ रचित कंचन हीं-२४०२। (ख) बिद्रुम स्फटिक पत्री कंचन खचि मनिमय मंदिर वने बनावत-१० उ.-५।
जो फैल या फूलकर बड़ा हो गया हो।
(फूल का) खिलना या विकसित होना।
किसी चीज का जरा-जरा हिलना।
किसी देखी, सुनी, कही, पढ़ी या अनुभव की हुई बात का फिर से याद या ध्यान में आना।
मुहा. स्मरण दिलाना-भूली हुई बात को याद कराना।
नौ प्रकार की भक्तियों में एक जिसमें उपासक निरंतर अपने उपास्य का ध्यान या याद किया करता है।
उ.- स्रवण कीर्तन स्मरण पादरत अरचन बंदन दास-सारा. ११६।
उपास्य के स्मरण या ध्यान के लिए होनेवाली आसक्ति जिसके फलस्वरूप उपासक हर समय उसका स्मरण करता है।
कामदेव को भस्म करनेवाले शिवजी।
धीरे-धीरे हिलना या फड़कना।
कार्य करने का भाव या उत्साह।
किसी पदार्थ का, ऊपरी आवरण तोड़कर, बाहर निकलना, फूटना।
उ.- मनौ सरासन धरे कर स्मर भौंह चढ़ै सर बरसै री-१०-१३७।
वह कृत्य, रचना आदि जो किसी की स्मृति बनाये रखने के लिए हो।
वह वस्तु जो अपनी स्मृति बनाये रखने के लिए किसी को दी जाय।
वे कृत्य, विधान आदि जो स्मृति-ग्रंथों में लिखे हुए हैं।
वह जो स्मृति-ग्रंथों में लिखे के अनुसार सब कृत्य करता हो।
वह जो स्मृति, ग्रंथों का अच्छा ज्ञाता या पंडित हो।
वह ज्ञान जो स्मरण-शक्ति से प्राप्त होता रहता है।
किसी पुरानी या भूली हुई बात का स्मरण हो आना जो साहित्य में एक संचारी भाव माना गया है।
प्रियतम के सम्बन्ध में पुरानी बातों का रह-रहकर याद आना जो साहित्य में पूर्वराग की दस अवस्थायों में से एक है।
वे हिन्दू धर्म- शास्त्र जिनकी रचना वेदों का स्मरण-चिंतन करके की गयी थी।
स्मरण' अलंकार का दूसरा नाम।
रथ, विशेषतः युद्ध में काम आने वाला रथ।
उ.- (क) स्यंदन खंडि महारथि खंडौं, कपिव्वज सहित गिराऊँ-१-२७०। (ख) जैसोइ स्याम बलराम श्री स्यंदन चढ़े, वहै छबि कुँवर सर माँझपेख्यौ-२५५४। (ग) धनुष तरंग भँवर स्यंदन पग जलचर सुभट सरीर-१० उ.-२।
एक प्रसिद्ध मणि जो सूर्य से सत्राजित नामक यादव को मिली थी और जिसकी चोरी का झूठा कलंक श्रीकृष्ण पर लगा था।
उ.- दीन्हीं मनि आदित्य स्यमंतक, कोटिक सूर- प्रकास-सारा. ६४२।
जैन दर्शन जिसमें अनेक विरुद्ध मतों का सापेक्षत्व स्वीकार किया जाता है और 'स्यात यह भी है' 'स्यात वह भी है' आदि कहा जाता है, अनेकांतवाद।
जो बालक न हो, बड़ा, वयस्क।
बड़ा-बूढ़ा या वृद्ध पुरुष।
चालाकी, काइयाँपन, धूर्तता।
वयस्क या स्याना होने की अवस्था।
उ.- आई सिखवन भवन पराऎं स्यानि ग्वालि बौरैया-३७१।
किसी संबंधी की मृत्यु पर परिवार और हेलमेल की स्त्रियों का कुछ दिन एकत्र होकर शोक मनाना और रोना-पीटना
मुहा.- स्यापा पड़ना-(१) रोना-पीटना होना। (२) (किसी स्थान का) बिलकुल उजाड़ या सूनसान हो जाना।
एक तरह की फली जिसकी तरकारी बनती है।
सेम जैसे हलके हरे रंग का।
मैदा के तागे-जैसे लच्छे जो धी में तलकर और दूध में पकाकर खाये जाते है।
एक पेड़ जिसके फल में से एक तरह की रूई निकलती है।
उ.-(क) अंब सुफल छाँड़ि कहा सेमर कौं धाऊँ-१-१६६। (ख) सेमर-ढाकहिं काटि कै बाँधौं तुम बेरौ-९-४२। (ग) सेमर फूल सुरँग अति निरखत मुदित होत खगभूप-१-१०२।
सेमर या सेमल का सुक, सुआ या सूआ-सेमल के सुंदर फूल में रस और गूदे के लोभ से चोंच मारने, परंतु रुई न निकलने पर पछतानेवाला तोता जो व्यर्थ की आशा लगाने, परंतु अंततः निराश होने और पछतानेवाले व्यक्ति के समान है।
उ.-(क) रसमय जानि सुवा सेमर कौं चोंच घालि पछितायौ-१-५८। (ख) कत तू सुवा होत सेमर कौ, अंतहीं कपट न बँचिबौ-१-५९। (ग) ज्यौं सुक सेमर सेव आस लगि निसि बासर हठि चित्त लगायौ-१-३२६।
सेम' नाम की फली जिसकी तरकारी बनती है।
उ.-सेमि सींगरी छमकि झोरई-२३२१।
उ.-सूरदास सेये न कृपानिधि जो सुख सकल मई-१-२९९।
उ.-जा कारन तुम बन सेयों सो तिय मदन-भुअंगम खाई-७४८।
एक तौल चो मन का चालीसवाँ भाग होती है।
उ.- छाँड़ौं नहीं स्याम-स्यामा की बृन्दाबन रजधानी-१-८७।
वह सफेद घोड़ा जिसका एक कान काला हो।
जिसका रंग कुछ कालापन लिये नीला हो।
उ.- बहुरौ देख्यौ ससि की ओर। तामैं देखि स्यामता कोर-५-३।
गोरो नंद, जसोदा गोरी, तू कह स्यामल गात-१०-२१५।
उ.- (क) भई न कृपा स्यामसुंदर की अब कहा स्बारथ फिरत बहै-१-५३। (ख) कुलही लसत सिर स्याम सुंदर कैं बहु बिधि सुरँग बनाई-१०-१०८।
उ.- छाँड़ौं नहीं श्याम-श्यामा की बृन्दावन रजधानी-१-८७।
सुरीले कंठवाली एक काली चिड़िया।
उ.- वा देही कौ गरब न करियै, स्यार-काग-गिध खैहैं -१-८६।
वह पशु जिसका शिकार किया जाता हो।
उ.- प्रभु जू मैं ऎसौ अमल कमायौ।¨¨¨¨¨¨ वासिल बाकी, स्याहा मुजमिल सब अधर्म की बाकी-१-१४३।
मुहा.- स्याही जाना-बालों का कालापन न बना रहना, युवावस्या बीत जाना।
उ.- (क) सुनु सिख कंत, दंत तृन धरिकै, स्यौं परिवार सिंधारौ-९-११५। (ख) स्यौं परबत सर बैठि पवन-सुत, हौं प्रभु पै पहुँचाऊँ-९-१५५।
उ.- (क) रचि स्रक कुसुम सुगंध सेज सजि बसन कुमकुमा बोरि-२८०७। (ख) स्रुति-कुंडल अरु पीत बसन स्रक वैसोइ साज बनाए-२९५९। (ग) स्रक चंदन बनिता विनोद रस-३२३०।
जो हार या माला धारण किये हो।
एक राजा जिसकी पुत्री सुकन्या का विवाह च्यवन ऋषि से हुआ था।
उ.-ता आस्रम स्रजात नृप गयो।¨¨¨¨¨¨तब स्रजात रानी सौं कही। जब तै कन्या ऋषि कौं दई-९-३।
आस्था, आदरपूर्ण और पूज्य भाव।
उ.- सुमति सुरूप सँचै स्रद्धा-बिधि उर-अंबुज अनुराग -२-१२।
शरीर को थकानेवाला काम, परिश्रम।
उ.- (क) चित चकोर गति करि अतिसय रति तजि स्रम सघन बिषय लोभा-१-६९।
मुहा.- स्रम साधना- (१) कठिन परिश्रम करना।
निरंतर अभ्यास करना। स्रम साधै-निरंतर अभ्यास करते हैं।
उ.- मुक्ति हेत जोगी स्रम साधै असुर बिरोधैं पावै-१-१०४।
जीविका-निर्वाह या घनोपार्जन के लिए किया जानेवाला काम।
उ.- जन जानत जदुनाथ जिते जन निज भुज-स्रम सुख पायौ-१-१५।
मुहा.- श्रम ठयना-बड़ी लगन से कठिन परिश्रम करना। श्रम ठयौ-बड़ी लगन से निरंतर परिश्रम किया। उ.- पिता सो तासु काल-बस भयौ। भ्रातनि हूँ स्रम बहु बिधि ठयौ-५-३।
उ.- जिय करि कर्म जन्म बहु पावै। फिरत-फिरत बहुतै स्रम आवै-५-४।
साहित्य में संभोग आदि के कारण होनेवाली थकावट जिसकी गिनती संचारी भावों में की गयी है।
उ.- सोभित सिथिल बसन मनमोहन सुखवत स्रम के पागे-६८६।
अधिक परिश्रम आदि के कारण शरीर से निकलनेवाली पसीने की बूदें।
उ.- उर भयौबिबस कर्म-निरअंतर स्रमि सुख-सरनि चहथौ-१-१६२।
अधिक श्रम के कारण थका हुआ या शिथिल।
उ.- स्रमित भयौ, जैसे मृग चितवत देखि - देखि भ्रम-पाथ-१-२०८।
दानवराज बृषपर्वा की पुत्री स्रमिष्ठा जो शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी की दासी बनकर राजा ययाति के यहाँ गयी थी और उनसे प्रम पाकर पुत्रवती हुई थी।
उ.- कह्थौ स्रमिष्ठा अवसर पाइ। रति कौ दान देह मोहिं राइ।¨¨¨¨। कहथौ, स्रमिष्ठा, सुत कहँ पाए। उनि कहथौ, रिषि किरपा तैं जाए-९-१७४।
बहने की क्रिया या भाव, बहाव,प्रवाह।
उ.- स्रवत स्रोनकन - १-२७३।
गिराता, बहाता या टपकता है।
उ.- (क) अमृत हूँ तैं अमल अति गुन स्रवत निधि आनंद -९-१०। (ख) परसत आनन मनु रवि कुंडल अंबुज स्रवत सीप-सुत-जोटी-१०-१८७।
उ.- (क) स्रवन सुनत करुना-सरिता भए, बाढ़थौ बसन उमंगी-१-२१। (ख) स्रवन न सुनत-१-११८। (ग) रोचन भरि लै देत सींक सौं स्रवन-निकट अतिही आतुर की-१०-१८०।
उ.- आनँद-मगन धेनु स्रवैं थनु पय-फेनु-१०-३०।
सृष्टि की रचना करनेवाला, ब्रह्मा।
उ.-नेंकहूँ न पावति भजि भजन सेरी।
एक प्रकार की रेशमी चादर या दुपट्टा।
पितरों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के उद्देश्य से किये गये पिंडदान, ब्राह्मण-भोजन आदि कृत्य।
किसी के अनिष्ट की कामना से कही गयी बात।
जिसे किसी ने शाप दिया हो, शापग्रस्त।
(खून आदि का) बह या रसकर निकलना।
वह जो बह रस या चू कर निकला हो।
उ.- अजहूँ स्रावग ऎसोहि करै। ताही कौ मारण अनुसरैं-५-२।
उ.-राजा रहत हुतौ तहँ एक। भयौ स्रावगी रिषभहिं देखि-५-२।
श्रवण या सुनने से संबंधित।
सावन मास की पूर्णिमा जो 'रक्षाबंधन' का दिन है।
रचने या निर्माण करने की क्रिया।
जो परंपरा से सुनने आये हों।
उ.- (क) और अनंत कथा स्रुति गाई-१-६। (ख) सोचि-बिचारि सकल स्रुति-सम्मति, हरि तैं और न आगर-१-९१। (ग) सकल स्रुति-दधि मथत पायौ; इतौई घृत-सार-२-३। (घ) जस अपार स्रुति पार न पावै-१०-३। (ङ) स्रुति, स्रमृति सब पुरान कहत मुनि बिचारी-३९४।
जो सुनने में कटु, कठोर या परुष जान पड़े।
स्रुतिकीरति, स्रुतिकीत, स्रुतकीर्ती
उर्मिला की छोटी बहन जो शत्रुघ्न को ब्याही थी।
कान या श्रवण द्रिय के सामने के भाग या द्वार पर।
उ.- संकर पारवती उपदेसत तारक मंत्र लिख्यौ स्त्रुति द्वार-२-३।
(सं. श्रुति + मस्तक या हिं. माथा)
उ.-स्रुती स्रमृति सब पुरान कहत मुनि बिचारी-३९४।
लकड़ी की कलछी जिससे हवन की अग्नि में घी की आहुति दी जाती है।
उ.- तड़ित धन संजोग मानो स्रेनिका सुकजाल-६२७।
उ.- स्व-पचहू स्रेष्ठ होत पद सेवत-१-२३३।
वह आधार या साधन जिससे कोई वस्तु बराबर आती रहे।
उ.-कूप समान स्रोन दोउ जानै-३-१३।
उ.- लै-लै स्रोन हृदय लपटावति चुंबति भृजा गँभीर-१-२९।
पसीने की बूँदें, स्वेदकण।
उ.- गोबिंद कोपि चक्र कर लीन्हौ।¨¨¨¨। स्रवत स्रोनकन, तन शोभा, छबि-घन बरसत मनु लाल-१-२७३।
उ.- (क) तब रावन कौ बदन देखिहौं दससिर स्रोनित न्हाइ-९-७७। (ख) लै लै चरन-रेनु निज प्रभु की रिपु कैं स्रोनित न्हात-९-१४७।
संस्कृत का पद्य या अनुष्टुप छंद।
उ.-(क) श्रीमुख चारि स्लोक दए ब्रह्मा कौं समुझाइ-१-२२५। (ख) तब नारद तिनकैं ढिग आइ चारि स्लोक कहे समुझाइ-१-२३०।
स्वःसरित, स्वःसरित्, स्वःसरिता
उ.- स्व कर काटत सीस-१-१०६।
क प्रत्यय जो शब्दांत में जुडकर भाववाचकता, प्राप्य धन आदि का अर्थ देता है।
केवल अपने ही काम से मतलब रखनेवाला, स्वार्थी।
वह नीयिका जो केवल अपने ही पति से प्रेम करती हो, पर पुरुष का ध्यान तक न करती हो।
स्वयं ही अपनी प्रशंसा करके अपने को प्रसीद्ध करना।
आप ही आप या स्वतः (कुछकहना या बोलना)।
अपने में आया या लाया हुआ, आत्मगत।
नाटत में अन्य पात्रों की उपस्थिति में किसी पात्र का इस प्रकार कुछ कहना जौसे वह अपने से ही या अपने मन में कुछ कह रहा है जिसे दर्शक तो सुन लें, परंतु मंच पर उपस्थित पात्र न सुनें। इसे 'अश्राव्य' या 'आत्मगत' भी कहते हैं।
जो किसी के नियंत्रण में न ही, स्वतंत्र, स्वाधीन।
उ.- यह तौ जाइ उनै उपदेसी सनकादिक स्वच्छंद-२४०२।
मनमाना काम या आचरण करनेवाला, निरंकुश।
मैदे के सूत के लच्छे जो घी में तलकर और दूध में पकाकर खाये जाते हैं।
एक वृक्ष जिसके फलों से एक प्रकार की रुई निकलती है।
बेसन का बना हुआ एक पकवान जो नमकीन भी बनाया जा सकता है और पागकर मीठा भी।
उ.-(क) फेनी सेव अँदरसे प्यारे-३९६। (ख) सेव सुहारी घेवर घी के -२३२१।
उ.-राजा सेव भली बिधि करै। दंपति-आयसु सब अनुसरै-१-२८४।
उ.-(क) तातैं बिबस भयौं करुनामय छाँड़ि तिहारी सेव-१-४९। (ख) करै जो सेव तुम्हारी सो सेइयो बिष्नु सिव ब्रह्म मम रूप सारे-१० उ.-३५।
उ.-सेव चरन-सरोज-सीतल तजि बिषय रस पान-१-३०७।
बिना किसी संकोच या बिचार के।
बालक रूप ह्वै के दसरथ-सुत करत केलि स्वच्छंद-सारा.।
उ.- स्वच्छ सेज मैं तैं मुख निकसत गयौ तिमिर मिटि मंद-१०-२०३।
अपने परिवार के लोग, आत्मीय जन।
उ.- (क) सुत-संतान-स्वजन-बनिता-रति घन समान उनई-। (ख) बोलि-बोलि सुत-स्वजन मित्रजन लीन्यौ सुजस सुहायौ-।
जो अपने आप उत्पन्न हुआ हो (ईश्वर)।
अपने से उत्पन्न (पुत्री)।
जो किसी के अधीन न हो स्वांधीन।
मनमानी करनेवाला, निरंकुश।
बंधन, नियम आदि से रहित या मुक्त।
बिना किसी दबाव या रोकटोक के सब कुछ करने का पूर्ण अधिकार, आजादी स्वाधीनता।
वह नायिका जो केवल धन के लोभ से पर-पुरुषों से संबंध रखती हो, सामान्या नायिका, गणिका।
जो (बात या तत्व) बिना किसी तर्क या प्रमाण के आप ही ठीक, प्रत्यक्ष और सिद्ध या प्रमाणित हो।
स्व' या अपना होने का भाव, अपनापन।
वह अधिकार जिसके बल पर कोई चीज अपनी समझी या अपने पास रखी जाय।
वह जिसके हाथ में किसी बात या विषय का पूरा स्वत्व या अधिकार हो।
अपने देश में बना या उत्पन्न।
एक शब्द जिसका उच्चारण या प्रयोग यज्ञ में हवि देने के समय किया जाता है।
पितरों के उद्देश्य से दिया जानेवाला अन्न या भोजन।
जिसने अपने महान और गौरव-पूर्ण कार्यों से अपना नाम धन्य या प्रसिद्ध कर दिया हो।
उ.- ढूँढ़ि फिरे घर कोउ न बतायौ, स्वपच कोरिया लौं-१-१५१।
उ.- गायौ स्वपच परम अघपूरन-१-६५।
सोने की क्रिया या अवस्था, निद्रा।
निद्रावस्था में, ठीक-ठीक नींद न आने के कारण कुछ घटनाएँ आदि दिखायी देना।
उ.- बहुरि कहथौ, रिषि कौ कहि नाम ? कहथौ स्वप्न देख्यौ अभिराम-९-१७४।
वह घटना आदि जो निद्रित अवस्था में दिखायी दे और जिसे साहित्य में एक संचारी भाव माना गया है।
मन में उठनेवाली वह ऊँची कल्पना या विचार जिसे साधाणतया कार्य रूप न दिया जा सके।
मुहा.- स्वप्न में भी न करना-(जागने में तो मनुष्य को अपने पर अधिकार होता है, अतएव अनिच्छित कार्य करने से वह सहज ही बच जाता है; परंतु सोते समय स्पप्न पर उसका कोई अधिकार नहीं रहता; अतएव उस अवस्था में अप्रिय कार्य करते भी वह अपने को देख सकता है। अतः जागते-सोते) किसी भी दशा में करने को तैयार न होना। उ.- स्याम-बलराम बिनु दूसरे देव कौं स्वप्न हूँ माँहिं नहिं हृदय ल्याऊँ-१-१७७। स्वप्न समान जानना- झूठा, असत्य या मिथ्या समझना। स्वप्न समान जानौ- झूठा, मिथ्या या वश्वर समझो। उ.- सब जग जानौ स्वप्न समान-१-३४१।
व्यर्थ की कल्पनाएँ करनेवाला।
जो अपने ही तेज से प्रकाशित हो।
स्वभाइ, स्वभाई, स्वभाउ, स्वभाऊ
(किसी वस्तु आदि में) सदा लगभग एक-सा बना रहनेवाला मूल या प्रधान गुण।
उ.-जीव न तजै स्नभाव जीव कौ, लोकबिदित दृढ़ताई-१-१०७।
(किसी व्यक्ति के) मन की प्रवृत्ति, प्रकृति।
जो स्वभाव या प्रकृति-जन्य हो, स्वाभाविक, प्राकृतिक।
आप से आप, अपने आप, स्वतः।
वह नायक जो नायिका से अपने प्रेम की बात स्वयं ही प्रकट करे।
वह नायिका जो अपने प्रेम की बात नायक पर स्वयं प्रकट करे।
अपना भोजन स्वयं ही पकानेवाला।
वह जो अपने ही प्रकाश से प्रकासित हो।
इंद्र की एक अप्सरा जिसे मय दानव हर लाया था और जिसके गर्भ से उसने मंदोदरी नामक कन्या उत्पन्न की थी।
चौदह मनुष्यों में से प्रथम जो स्वयंभू ब्रह्मा से उत्पन्न माने गये हैं।
उ.- बहुरि स्वयंभू मनु तप कीनौ। (ख) ब्रह्मा सौं स्वयंभू मनु भयौ-३-१०।
जो (बिना योग्यता आदि के) स्वयं ही किसी पद पर प्रतिष्ठित हो गाया हो।
भारत की एक प्राचीन प्रथा जिसमें कन्या अपना वर स्वयं चुनती थी।
उ.- (क) जनक बिदेह कियो जु स्वयंवर बहु नृप बिप्र बुलाये-सारा. २०६। (ख) तोरि धनुष, मुख मोरि नृपनि कौं सीय स्वयंवर कीनौ-९-११५।
वह स्त्री जो स्वयं ही अपने उपयुक्त वर का वरण करे।
जो (बात ) अपने आप सिद्ध हो।
जो अपनी ही इच्छा से, केवल सेवा-भाव से कोई कार्य करे।
गले में बाँधने की चादर, गाँती।
बद्धी या माला जिसे योगी-यती गले में डालते या सिर में लपेटते हैं।
उ.-सीस सेली केस, मुद्रा कनक बीरी, बीर। बिरह-भस्म चढ़ाई बैरी सहज कंथा चीर-३१२६।
वह शासन-प्रणाली जिसमें किसी देश पर उसके ही निवासियों का पूर्ण शासन हो।
जो स्वयं प्रकाशमान हो और दूसरों को भी प्रकाशित करे।
मध्यम रूप से उच्चारित स्वर।
व्यक्ति, पदार्थ आदि की शकल या आकृति।
उ.- नारायन भुव भार हरो है अति आनंदस्वरूप-सारा. १४५।
रुकाव आदि का ध्यान रखते हुए किसी शब्द या पद का किया गया उच्चारण।
हर्ष, भय क्रोध, मद आदि के कारण गला रुँध जाने से कुछ कह न पाना या कुछ के बदले कुछ कह जाना जो साहित्य में एक सात्विक अनुभाव माना गया है।
सत्यभामा के गर्भ से उत्पन्न श्रीकृष्ण के दस पुत्रों में से एक का नाम।
गले के भीतर का वह अंग जिससे स्वर या शब्द निकलता है।
(संगीत आदि के लिए निकाली गयी) उतार-चढ़ाववाले स्वरों की लहर या क्रम।
संगीत में किसी गीत, तान आदि में आनेवाले स्वरों का क्रमबद्ध लेखन।
प्राणी के कंठ से अथवा किसी पदार्थ पर आघात होने से निकलनेवाला शब्द जिसमें कोमलता, कटुता आदि गुण हों।
संगीत में वे सात निश्चित ध्वनियाँ जिनका स्वरूप, तीव्रता आदि निश्चित है, सुर।
उ.-चाँपति चरन जननि अप अपनी कछुक मधुर स्वर गाये-सारा. १९६।
मुहा.- स्वर उतारना-सुर घीमा करना। स्वर चढ़ाना-सुर तेज करना। स्वर निकालना- सुर उत्पन्न करना। स्वर भरना-अभ्यास के लिए एक ही सुर बार-बार निकालना। स्वर मिलाना-(बाद्य आदि के) सुनायी देते स्वर के अनुसार सुर निकालना)
व्याकरण में वह वर्ण जिसका उच्चारण बिना किसी वर्ण की सहायता के हो और जो किसी व्यंजन के उच्चारण में सहायक हो।
संगीत के सातों स्वरों का समूह, सप्तक।
उच्चारण करते समय शब्द के किसी वर्ण पर रुकना।
उ.- देखत गज-से होय गये हैं, कीन्हों बृहत स्वरूप-सारा. ४०।
देवताओं आदि का धारण किया हुआ रूप।
वह जिसने देव-रूप धारण किया हो।
मुक्ति का वह रूप जिसमें भक्त अपने उपास्य देव का रूप प्राप्त कर लेता है।
उ.- हम सालोक्य स्वरूप सरो ज्यौं रहत समीप सदाई-३२९०।
जो आत्मा-परमात्मा का स्वरूप पहचानता हो, तत्वज्ञ।
जिसने किसी का स्वरूप धारण किया हो।
मुक्ति का वह रूप जिसमें भक्त अपने आराध्य का ही स्वरूप प्राप्त कर लेता है।
नथनों से निकली स्वाँस के द्वारा शुभ-अशुभ फल जानने की विद्या।
हिंदुओं केसात लोकों में से तीसरा जिसमें प्राणी पुण्यों और सत्कर्मों के फल-स्वरूप सुख भोगने जाता है।
उ.- सुनि-सुनि स्वर्ग रसातल भूतल, जहाँ तहाँ उठि धायौ-१-१५४।
मुहा.- स्वर्ग के पथ पर पैर देना या रखना (१) मरना। (२) जान जोखिम में डालना, प्राण संकट में डालना। स्वर्ग को उड. जाना- मर जाना। गयौ उडि. स्वर्ग को-मर गया। उ.- तुरँत गयौ उड़ि स्वर्ग को-२५७७। स्वर्ग जाना या सिधारना- मर जाना। स्वर्ग पठाना- (१) मार डालना। (२) मरने पर स्वर्ग का सुख भोगने को भेजना। उ.- तुम मौसे अपराधी माधव, कोटिक स्वर्ग पठाए हौ-१-७।
स्वर्ग सुख-वैसा सुख जैसा स्वर्ग में मिलता है। कोटि स्वर्ग सम सुख- कल्पना से भी बाहर का सुख।उ-कोटि स्वर्ग सम सुख अनुमानत, हरि समीप समता नहिं पावत-३१४२। स्वर्ग की धार, स्वर्ग-धारा-आकाशगंगा।
वह स्थान जहाँ बहुत अधिक सुख मिले।
स्वर्ग की कामना रखनेवाला।
जिसका स्वर्गवास हो गया हो, मृत।
जिसकी मृत्यु हाल ही में हुई हो।
जिसका शरीर सोने का या सोने सा हो।
एक सुनहरा कीड़ा, सोन किरवा।
किसी व्यक्ति, संस्था, कार्य आदि के पचास वर्ष पूरे होने पर की जानेवाली जयंती।
बहुत ही शुभ और महत्वपूर्ण दिन।
वह स्थान या देश जहाँ सभी श्री-संपन्न और सुखी हों।
मरना, स्वर्ग की प्राप्ति।
जो स्वर्ग में (स्थित) हो।
स्वर्ग का, स्वर्ग-संबंधी।
स्वर्ग में रहने या होनेवाला।
उ.- स्वल्प साग तैं तृप्त किए सब कठिन आपदा टारी-१-२८२।
बहुत थोड़ी, हलकी या घीमी।
उ.-सरस स्वल्प ध्वनि उघटत सुखद-१८२६।
जो अपनी इंद्रियों को वश में रखता हो।
उचित-अनुचित या युक्त-अयुक्त का विचार करने की बुद्धि, शक्ति या योग्यता।
ईँगुर की बुकनी, सिंदूर जो सौभाग्यवती स्त्रियाँ माँग में भरती हैं और जो उनके सौभाग्य का चिह्न माना जाता है।
उ.- (क) मुख मंडित रोरी रंग, सेंदुर माँग छही-१०-२४। (ख) आल मजीठ लाख सेंदुर कहुँ ऐसेहि बुधि अवरेखत-११०८। (ग) कहुँ जावक कहुँ बने तमोर रँग कहुँ अँग सेंदुर दाग्यौ-१९७२।
मुहा. सेंदुर चढ़ना- स्त्री का विवाह होना (विवाह में वर जब कन्या की माँग में सेंदुर भरता है तभी से वह उसकी पत्नी बन जाती है)। सेंदुर देना- विवाह के समय वर का कन्या की माँग भर कर उसको पत्नी बनाना।
सिंदूर रखने की डिबिया, सिंदूरा
(हिं. सेंदुर + फ़ा. दानी)
सेंदुर-जैसे लाँल रंग की गाय।
उ,- कजरी धौरी सेंदुरी धूमरि मेरी गैया-६६६।
जिसमें इंद्रियाँ हों, सजीव।
चोरी करने के लिए दीवार में किया गया ऐसा छेद जिससे होकर चोर घर के भीतर जा सके और माल बाहर लाया जा सके।
व्यर्थ ही निकट या पास (आशा लगाये) बैठा रहता है।
उ.-ज्यौं सुक सेमर सेव आस लागि निसि-बासर हठि चित्त लगायौ-१-३२६।
टहल या परिचर्या करनेवाला, नौकर-चाकर, भृत्य।
उ.-(क) इंदु समान हैं जाके सेवक, नर बपुरे की कहा गनी-१-३९। (ख) अनाचार सेवक सौं मिलि कै करत चबाइनि काम-१-१४१। (ग) सेवक राज, नाथ बन पठए, यह कब लिखी बिघाता-९-४९। (घ) सेवक कौ सेवापन एतौ, अज्ञाकारी होइ-९-९९। (ङ) सुर-नर-असुर-कीट-पसु-पच्छी सब सेवक प्रभु तेरे-५७०।
उ.-जिहिं जिहिं बिधि सेवक सुख पावै, तिहिं बिधि राखत मन कौं-१-९। (ख) तीनि लोक के ताप निवारन सूर स्याम सेवक सुखकारी-१-३०। (ग) सूर सुकृत सेवक सो साँचौ स्यामहिं सुमिरैगौ-१-७५।
व्यवहार या सेवन करनेवाला।
किसी स्थान में नियम पूर्वक अथवा उहेश्य-विशेष से वास करनेवाला।
उ.- (क) खरिक दुहावन जाति हों, तुम्हरी सेवकाई-७१३। (ख) चूक परी हरि की सेवकाई-२६९५।
सेवकनी, सेवकिन, सेवकिनि, सेवकिनी, सेविका, सेविकिन
सेवा करनेवाली, टहलिनो, परिचारिका।
उ.- रमा सेवकिनी देऊँ करि, कर जोरैं दिन याम-१६२५।
सेवकनी, सेवकिन, सेवकिनि, सेवकिनी, सेविका, सेविकिन
सेवकनी, सेवकिन, सेवकिनि, सेवकिनी, सेविका, सेविकिन
जिसका ज्ञान इंद्रियों से न हो सके, अगोचर।
(बात) जिसका अनुभव वही कर सकता हो, जिस पर बीती हो
ब्रह्मा की तीन पत्नियों में एक।
मंगल-चिह्न जो शुभ अवसरों पर दीवारों आदि पर अंकित किया जाता है।
शरीर के विशिष्ट अंगों में होनेवाला उक्त आकार का चिह्न जो बहुत शुभ माना जाता है।
एक प्रकार का मंगल-द्रव्य जो चावल को पानी में पीसकर बनाया जाता है।
मंगल कार्यों के प्रारंभ में किया जानेवाला एक धार्मिक कृत्य जिसमें गणेश-पूजन और मंगल-सूचक मंत्रों का पाठ किया जाता है।
उ.- एक दिना हरि लई करोटी सुनि हरषी नँदरानी। बिप्र बुलाय स्वस्तिबाचन करि रोहिनि नैन सिरानी-सारा. ४२1।
मंगल कार्यों के आरंभ में किया जानेवाला एक धार्मिक कृत्य जिसमें देव-पूजन और मंगल- पाठ आदि होता है।
उ.-बिप्र बुलाय बेद-धुनि कीन्हीं स्वस्तीबचन पढ़ायौ-सारा. ३९१।
एक धार्मिक कृत्य जो अशुभ बातों का नाश करके मंगल या कल्याण के लिए किया जाता है।
जिसे कोई रोग न हो, भलाचंगा।
जिसका स्वास्थ्य अच्छा हो।
जिसका चित्त ठिकाने हो, सावधान।
जिसमें कोई दोष या अश्लीलता न हो।
जो सब, बातें ठीक-ठीक समझने करने में समर्थ हो।
दूसरे का रूप बनने के लिए धारण किया गया बनावटी या कृत्रिम वेश, भेस।
उ.- उनपै कहथौ तुम कोऊ क्षत्रिया, कपट करि बिप्र को स्वाँग स्वाँग्यो-१० उ.- ५१।
परिहास-पूर्ण तमाशा, नकल या खेल।
उ.- (क) दर-द्रर लोभ लागि लिये डोलति नाना स्वाँग बनावै-१-४२। (ख) जैसे नटवा लोभ कारन करत स्वाँग बनाइ-१-४५। (ग) तीन्यौ पन मैं ओर निबाहे इहै स्वाँग कौं काछे-१-१३६। (घ) चौरासी लख जोनि स्वाँग धरि भ्रमि भ्रमि जमहिं हँसावै-२-१३। (ङ) रैनि नहीं तौ अब जु कृपा भइ, धनि जिनि स्वाँग करायौ जू-१९३४। (च) करि आए नट स्वाँग से मोको तुम वैसे-२५७६।
धोखा देने के लिए बनाया गया रूप या किया गया कार्य, आडंबर।
मुहा.- स्वाँग रचना या लाना-धोखा देने या कपट-व्यावहार करने के लिए आडंबर रचना।
बनावटी वेश या रूप धारण करना।
जो नकली या दूसरे का वेश बनाकर जीविकार्जन करता हो।
अनेक रूप धारण करनेवाला, बहुरूपिया।
उ.- स्वाँगी से ए भए रहत हैं छिन ही छिन ए और-पृ. ३३६ (५४)।
बनावटी वेश या रूप धारण किया, स्वाँग बनाया।
उ.-भीम अर्जुन सहित बिप्र को रूप धरि हरि जरासंध सों युद्ध माँग्यौ। दियौ उनपे कहथौ, तुम कोऊ क्षत्रिया कपट करि बिप्र को स्वाँग स्वाँग्यौ-१० उ.-५१।
जो मन या अंतः करण से उत्पन्न हो।
किसी के हाथ का हस्ताक्षर या लेख जो अपने पास स्मति-रूप में रखा जाय।
किसी मान्य या प्रिय व्यक्ति का आने पर आगे बढ़कर अभिनन्दन करना।
उ.- तेरी कही साँचि तुम जानो कीजै आगत स्वागत-१४८२।
स्वागत या अभ्यर्थना करनेवाला।
वह नायिका जो विदेश से पति के लौटने पर उत्साहपूर्ण और प्रसन्न हो।
उ.- बहिरौ तान स्वाद कहा जानै गूँगौ खात मिठास-३३३६।
मुहा.- स्वाद चखाना-(१) अपराध का दंड देना। (२) भयंकर बदला लेना।
जिसका स्वाद अच्छा हो, सुस्वादु।
वह नायक जो विदेश से पत्नी के लौटने से उत्साहपूर्ण और प्रसन्न हो।
सुख से, सहज में, स्वच्छंदतापूर्वक।
पंद्रहवाँ नक्षत्र जिसकी वर्षा के जल से सीप में मोती, बाँस में वंशलोचन और साँप में विष उत्पन्न होना माना जाता है।
उ.- स्वाति-सुत माला बिराजत स्याम तन इहिं भाइ-१०-१७०।
उ.- ज्योति प्रकाश सुघन में खोलत स्वाति-सुवन आकार।
किसी चीज के खाने-पीने से जीभ या रसनेंद्रिय को होनेवाला अनुभव, जायका।
उ.- (क) किंचित स्वाद स्वान-बानर ज्यौं घातक रीति ठटी-१-९८। (ख) साधु-निंदक स्वाद-लंपट, कपटी गुरु-द्रोही-१-१२४। (ग) जीह्वा-स्वाद मीन ज्यौं उरझ्यौ सूझी नहीं फयंदाई -१-१४७। (घ) रसना स्वाद सिथिल लंपट ह्वै अघटित भोजन करतौ-१-२०३। (ङ) सालन सकल कपूर सुबासत। स्वाद लेत सुंदर हरि गासत-३९६। (च) सूरदास तिल-तेल- सुंबादी स्वाद कहा जानै घृत ही री-१४९९।
शरीर के आठ चक्रों में दूसरा जिसका स्थान शिश्न के मूल में है।
नींद लानेवाला, निद्राकारक।
एक प्राचीन अस्त्र जिससे शत्रु को निद्रित किया जाता था।
नींद लानेवाला, निद्राकारक।
स्वभाव से या अपने आप होनेवाला, प्राकृतिक, नैसर्गिक।
स्वभाव से संबंध रखनेवाला, स्वभाव-संबंधी।
वह नायिका जिसका पति उसके वश में हो।
वेदों का विधिपूर्वक अध्ययन।
किसी विषय का अध्ययन-अनुशीलन।
उ.- (क) ह्वै गज चल्यौ स्वान की चालहिं-१-७४। (ख) बहुतक जनम पुरीष-परायन सूकर-स्वान भयौ-१-७८। (ग) स्रम करत स्वान की नाईं-१-१०३।
अपनी प्रतिष्ठा, मर्यादा या गौरव का अभिमान।
जिसे अपनी प्रतिष्ठा, मर्यादा या गौरव का अभिमान हो।
उ.- सेवक करै स्वामि सों सरवर इनि बातनि पति जाई -९८५।
उ.- (तुम) जाहु बालक छाँडि जमुना स्वामि मेरौ जागिहै-५७७।
प्रभु या स्वामी होने का भाव या स्थिति।
स्वामिकार्तिक, स्वामिकार्त्तिक
शिवजी के पुत्र स्कंद, कार्तिकेय।
स्वामिन, स्वामिनि, स्वामिनी
स्वामिन, स्वामिनि, स्वामिनी
स्वामिन, स्वामिनि, स्वामिनी
प्रभु या स्वामी की पत्नी।
उ.-सेष, महेष. लोकेस, सुकादिक, नारदादि मुनि की हैं स्वामिनी- पृ. ३४५ (४०)।
देव-मूर्ति के साथ का जलूस।
(अपना) मतलब, उद्देश्य या प्रयोजन।
मुहा.- स्वार्थ आना-काम आना, सहायक होना। (किसी बात में) स्वार्थ लेना-रुचि लेना, अनुराग रखना।
(किसी भले काम के लिए) अपने लाभ या हित का ध्यान छोड़ देना।
जो (किसी भले काम के लिए) अपने हित या लाभ को सहर्ष छोड़ दे।
(सं. स्वार्थ + हिं. त्यागी)
जिस पर अपना ही पूर्ण अधिकार और शासन हो।
उ.-मनहुँ देखि रवि-कमल प्रकासत तापर भृंगी सावक स्वायो-२०६३।
(अपना) मतलब, उद्देश्य या प्रयोजन।
उ.- (क) हरि बिनु को पुरवै मो स्वारथ-१-२८४। (ख) गोपी हरी सूर के प्रभु बिनु, रहत प्रान किहिं स्वारथ-१-२८७। (ग) तिन अंकनि कोउ फिर नहिं बाँचत गत स्वारथ समयौ-१-२९८।
उ.- भई न कृपा स्यामसुंदर की अब कहा स्वारथ फिरत बहैं -१-५३।
मुहा.- स्वारथ आना-भलाई या हित के लिए सहायक या उपयोगी होना। न आयौ स्वारथ-काम नहीं आया, सहायक नहीं हुआ। उ.- काहु न धरहरि करी हमारी कोउ न आयौ स्वारथ-१-२५९।
सफल, सिद्ध, फलीभूत, सार्थक।
उ.- सेवा सब भई अब स्वारथ।
उ.- सूरदास वै आपु स्वारथी पर-वेदन नहिं जान्यौ-१४१७।
किसी कारण से मिलनेवाला आनंद।
स्वामिन, स्वामिनि, स्वामिनी
उ.- सूर स्वामी स्वामिनी बने एक से कोउ न पट़तर-अरस-परस दोऊ-पृ. ३१३ (२४)।
घर का कर्ता-धर्ता या प्रधान।
परम आराध्य, ईश्वर, भगवान।
उ.- (क) सूरदास ऎसे स्वामी कौं देहिं पीठ सो अभागे-१-८। (ख) निधरक रहौं सूर के स्वामी, जनम न जानौं फेरि-१-५१। (ग) कौन भाँति हरि-कृपा तुम्हारी, सो स्वामी समुझी न परी-१-११५। (घ) सनमुख होइ सूर के स्वामी भक्तनि कृपा-निधान -९-१३४। (ङ) ब्रह्मपूरन सकल स्वामी रहे ब्रज निसि धाम-२५८२। (च) सूरदास स्वामी के आगे निगम पुकारत साखि-३३७३।
साधु, संन्यासी और धर्माचार्यों की उपाधि या संबोधन।
उ.- तिलक बनाइ चले स्वामी ह्णै, बिषयिनि के मुख जोए-१-५२।
चौदह मनुओं में प्रथम जो स्वयंभू ब्रह्मा से उत्पन्न माने गये हैं।
उ.- स्वायंभूव सौं आदि मनु जए-३-८।
ब्रह्मा से उत्पन्न प्रथम मनु।
उ.- स्वायंभू मनु के सुत दोइ-४-८।
उ.- रघुपति रिस पावक प्रचंड अति, सीता स्वास समीर-९-१५८।
एक शब्द जिसका प्रयोग हवन की हवि देते समय होता है।
मुहा.- स्वाहा करना-फूँक डालना, नष्ट करना। स्वाहा होना-नष्ट होना।
जो अपना मतलब साधने में इतना अंधा हो जाय कि भले-बुरे का ध्यान भी छोड़ दे।
अपने ही बल-भरोसे पर काम करना।
अपने ही बल-भरोसे पर काम करनेवाला।
जो स्वीकार करने योग्य हो या स्वीकार किया जाय।
वह कथन जिसमें अपना दोष, अपराध आदि स्वीकार किया गया हो।
मंजूरी, स्वीकार करने की क्रिया या भाव।
ग्रहण करने की क्रिया या भाव।
मानने या राजी होने की क्रिया या भाव।
अपने ही पति में पूर्ण अनुराग रखनेवाली नायिका।
मनमाने ढंग से काम करनेवाला, निरंकुश।
स्वेच्छा-बिहार, स्वेच्छा-विहार
निरंकुशतापूर्वक किया गया विहार।
निरंकुशतापूर्वक विहार या विलास करनेवाला।
(सं. स्वेच्छा + हिं. बिहारी)
उ.- असुर द्वै हुते बलवंत भारी। सुंद-उपसुंद स्वेच्छृबिहारी-८-११।
जिसकी मृत्यु उसकी इच्छा पर हो, इच्छानुसार मरनेवाला।
भीष्म पितामह जो अपनी इच्छानुसार मरे थे।
वह जो अपनी इच्छाओं का दास हो।
वह जो अपनी मर्जी या इच्छा से सेवक बना हो, स्वयंसेवक।
उ.- अप्सरा, पारिजातक, धनुष, अस्व गज स्वेत, ये पाँच सुरपतिहिं दीन्हें-८-८।
उ.- चलत चरन चित गयौ गलित झिर स्वेद सलिल भै भीनी-२९०६।
लज्जा, हर्ष, श्रम आदि से शरीर का पसीने से भर जाना जो एक सात्विक अनुभाव माना गया है।
पसीने से उत्पन्न होनेवाला।
(जूँ, खटमल आदि) जीव जो पसीनेसे उत्पन्न होते हैं।
भफारा दिया हुआ, भाप से सेंका हुआ।
सेवकनी, सेवकिन, सेवकिनि, सेवकिनी, सेविका, सेविकिन
स्थान-विशेष में नियमित रूप से वास करनेवाली।
उ.-सेवकु करै स्वामि सौं सरवर, इनि बातनि पति जाइ-९८५।
टहल, सेवा या परिचर्या करता है।
उ.-(क) सिव-विरंचि-सुरपति सब सेवत प्रभु-पद-चाए-१-१६३। (ख) बिबिध आयुध घरे सुभट सेवत खरे-९-१२९।
पूजा, उपासना या आराधना करके या करता है।
उ.- (क)स्वपचहु स्रेष्ठ होत पद-सेवत बिनु गोपाल द्विज जन्म न भावै-१-२३३। (ख) कर्मजोग करि सेवत कोई-१० उ.-१२७।
पंद्रहवाँ नक्षत्र जिसकी वर्षा के जल से मोती उपजना माना जाता है।
उ.-(क) जाही जूङी सेवती करना कनिआरी-१८२२। (ख) फूले मरुवो मोगरो सेवती फूल-२४०५।
नियमित प्रयोग या व्यवहार।
उ.- कोउ कहे तीरथ सेवन करो, कोउ कहै दान जज्ञ बिस्तरी-१-३४१।
मनमाना काम करनेवाला, निरंकुश।
ह-देवनागरी वर्णमाला का तैंतीसवाँ और अंतिमव्यंजन जो उच्चारण की दृष्टि से 'ऊँष्म' वर्ण है।
उच्च स्वर से किया हुआ संबोधन।
जोर से पुकारने या बुलाने की क्रिया या भाव।
उ.- जमुता तट मन बिचारि गाइनि हँकराई-६१९।
उ.- (क) मोहन ग्वाल-सखा हँकराए। (ख) कौन काज को हम हँकराए-१००५।
जोर से आवाज देना या संबोधन करना।
बुलाने या पुकारने का काम दूसरे से कराना, बुलवाना, पुकरवाना।
उ.- (क) इहीं काज तुमकौं हँकराए-१०४६। (ख) सूर इंद्र गण हँकराये-१०६२।
बुलाने की क्रिया या भाव, पुकार, बुलाहट।
बहुत से लोगों का कोलाहल करते हुए शेर, चीते, आदि को तीन ओर से घेरकर उस दिशा में ले चलना जिघर शिकारी उसे मारने को तैयार बैठा हो।
पुकारने का काम दूसरे से कराना, हाँक लगवाना।
उ.- मन मंत्री सो रथ हँकवैया-४-१२।
बुलाने की क्रिया या भाव, बुलाहट।
लेहु हँकारी-बुला या बुलवा लो।
उ.- ऎरावत को लेहु हँकारी-१०६६।
पुकारते, बुलाते या चिल्लाते हुए।
उ.- हमको देखत ही गए उत ग्वाल-बाल हँकारी-१५३२।
उठे हँकारी-वीरनाद या हुंकार कर उठे।
उ.- अंकुस राखि कुंभ पर करष्यो, हलधर उठे हँकारी-२५९४।
उ.- (क) तुम दारुक आगँ ह्वै देखौ, भक्त भवन किधौं अनत सिधारे। सुनि सुंदरि उठि उत्तर दीन्हथौ, कौरव-सुत कछु काज हँकारे-१-२४०। (ख) मल्ल-युद्ध प्रति कंस कुटिल मति छल करि इहाँ हँकारे-२५६९।
उ.- न्यौति नृप प्रजा कौं तब हँकारौ-४-११।
बुलाओ या पुकारो, बुलवाओ या पुकरवाओ।
उ.- नैंकु काहैं नसुत कौ हँकारौ-७५१।
हाँकने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
चौपायों को हाँककर या हँकाकर किसी ओर ले जाना।
हाँकने का काम दूसरे से कराना, हँकवाना।
जोर से पुकारने की क्रिया या भाव, पुकार।
मुहा.- हँकार पड़ना-(चारों ओर से) बुलाने के लिए आवाजें लगाना।
जोर से पुकारता है, ऊँचे स्वर से बोलता है।
उ.-ऊँचे तरु चढ़ि स्याम सखनि कौं बारंबार हँकारत।
जोर से पुकारना, ऊँचे स्वर से बुलाना।
अपने पास आने को कहना, बुलाना।
युद्ध के लिए ललकारना या आह्वान करना।
युद्ध में वीरों का हुंकार या दर्पनाद करना।
बुलावा, न्योता, निमंत्रण।
उ.- आगै हरि पाछै श्रीदामा, धरथौ स्याम हँकारि-१०-२१३।
लिए हँकारि-बुला या बुलवा लिये।
उ.-ग्वाल-बाल लिए हँकारि-६१९।
लोगों को बुलाकर लानेवाला व्यक्ति।
सम्मति मा स्वीकृति-सूचक अव्यय, हाँ।
(गाय बैल के) बोलने या रैभान का शब्द।
बतख की तरह का एक जल पक्षी जिसका वर्षाकाल में मानसरोवर आदि झीलों में चला जाना और शरत्काल में लौटना प्रसिद्ध है।
उ.- (क) मानसरोवर छाँड़ि हंस तट काग-सरोवर न्हावै-२-१३। (ख) मानौं चारि हंस सरवर तैं बैठे आइ, सदेहिया-९-१९।
माया से निर्लिप्त शुद्ध आत्मा, जीवात्मा।
उ.- (क) जा छन हंस तजी यह काया, प्रेत-प्रेत कहि भागी-१-७९। (ख) बिछुरत हंस बिरह कैं सूलनि, झूठे सबै सनेह-८०१।
मुहा.- हंस उड़ जाना- शरीर से प्राण निकल जाना।
विष्णु का एक अवातर जो सनकादिक का भ्रम और गर्व दूर करने के लिए हुआ था।
उ.- (क) सनकादिक, पुनि ब्यास बहुरि भए हंस -रूप हरि-२-३६। (ख) तब हरि हँस-रूप धरि आए-११-६।
उ.- कही आचार भक्ति-बिधि भाखी हंस धर्म प्रगटायो- सारा.।
वह रोशनी जिस पर शीशे की हंडे-जैसी बड़ी चिमनी हो।
मारे-मारे या व्यर्थ धुमाना-फिराना।
मिट्टी, पत्थर आदि का बना बरतन, हाँड़ी।
मिट्टी, पत्थर आदि का बना गोलाकार बरतन, हाँड़ी।
मुहा.- हँफनि या हँफनी मिटाना-दम लेना, सुस्ताना, थकावट दूर करना।
बुलाया-बुलवाया है, न्योता या निमंत्रण दिया या भिजवाया।
उ.- (क) दच्छ रिस मानि जब जज्ञ आरंभ कियौ, सबनि कौं सहित पत्नी हँकारथौ -४-६। (ख) आयो सुन्यो अहीर मनो महि काल हँकारथौ-१० उ.-८।
उ.- सुनि जरासंध बृत्तांत अस सुता से जृद्ध हित कटक अपनो हँकारथौ-१० उ.-१।
उ.- घात मन करत, लै डारिहौं दुहुँनि पर, दियो गज पेलि आपुन हँकारथो-२५९२।
मारे-मारे या व्यर्थ घूमना।
इधर-उधर ढूँढ़ना, छानबीन करना।
पीतल, ताँबे आदि का बहुत बड़ा बरतन।
मुहा.- हँसता चेहरा या मुख-हँसमुख। हँसता-हँसता-(१) प्रसन्नता के साथ। (२) सहज में, सरलता से।
उ.- रूखी ह्वै रहति हँसे ते हँसति-१८६९।।
हँसने की क्रिया, भाव या ढंग।
प्रसन्नता सूचित करने के लिए खिलखिलाना या ठट्ठा मारना, हास करना।
मुहा.- हँसना खेलना-प्रसन्नता या आनंद करना, आनोद-प्रमोद करना। हँसना-बोलना-प्रेमपूर्वक बातचीत करना। ठठाकर हँसना-जोर से हँसना, अट्टहास करना।
मुहा.- किसी व्यक्ति पर हँसना-उसकी हैसी उड़ाना, उसका उपहास करना। किसी वस्तु पर हँसना-तुच्छ या बुरी समझकर उसकी व्यंग्यपूर्ण निंदा करना।
शबर' जाति की एक भक्तिन जिसके जूठे बेर श्रीराम ने खाये थे।
विवाह की एक रीति जिसमें वर-पक्ष की कोई सधवा, थाली में दीपक रखकर वर के हाथ में देती, उसका माथा नवाती और अपना माथा छूती है।
पूजा, उपासना या आराधना करो।
उ.-करहिं बिचार सुन्दरी सब मिलि, अब सेवहु त्रिपुरारि-७६४।
पैर का 'नूपुर' नामक आभूषण।
मुहा.- हँसकर बात उड़ाना-तुच्छ या साधारण समझकर टाल देना।
पैर का 'बिछुआ' या 'नूपुर' नामक आभूषण।
हंस के समान सुंदर गति से चलनेवाली।
उ.- (क) हँसै हँसत, बिलखैं बिलखत हैं-१-१९५। (ख) हुलसत, हँसत, करत किलकारी, मन अभिलाष बढ़ावै-१०-४५।
हँसने की क्रिया, भाव या ढंग।
उ.- सूर प्रभु नंद-सुवन दोउ हंस-बाल उपाय-२५६५।
गरदन और छाती के बीच की धन्वाकार हड्डी।
सूर्य की पुत्री, यमुना नदी।
उ.- हंस-सुता की सुंदर कगरी अरु कुंजन की छाहीं- ना. ४७७४।
उ.- कहि राधा किन हार चुरायो ¨¨¨¨¨। प्रेमा दामा रूपा हंसा रंगा हरषा जाउ-१५८०।
हँसने की क्रिया, भाव या रीति।
उ.- (क) सूरदास कूबरि रँग राते ब्रज में होति हँसाई। (ख) सूरदास प्रभु बिरद लाज धरि मेटहु इहाँ के लोग हँसाई-३११८।
किसी को हँसने में प्रवृत्त करना।
मुहा.- अपने को हँसाना- ऎसा आचरण या व्यवहार करना जिससे दूसरे उपहास करें।
हँसने की क्रिया, भाव या रीति।
हँसने को प्रवृत्त करता हे।
उ.- (क) बालक-बृंद बिनोद हँसावत-६१८। (ख) गावत हँसत गवाय हँसावत -८०९।
हँसने या उपहास करने को प्रवृत करता है।
उ.- चौरासी लख जोनि स्वाँग धरि भ्रमि भ्रमि जमहि हँसावै -२-१३।
उ.- हँसि बोलौ जगदीस जगतपति-१-१५१।
उ.- की तू कहति बात हँसि मोसों की बूझति सति भाऊ-१२६०।
एक धारदार अर्द्धचंद्राकार औजार।
हाथी के अंकुश का टेढ़ा भाग।
उ.-कैसैं ल्याउँ संगीत सरोवर मगन भई गति हंसी-१६८५।
हँसने की क्रिया या भाव, हास।
हँसी-सुखी-प्रसन्नता। हँसी ठट्ठा-विनोद। हँसी-खेल-विनोद और क्रीड़ा।
मुहा.- हँसी छूटना-(बहुत जोर से) हँसी आना। (२) मजाक, दिल्लगी, ठट्ठा, परिहास।
हँसी-खेल-आमोद-प्रमोद, विनोद।
सहज या साधारण बात। हँसी-ठठोली-दिल्लगी, मजाक, हँसी-दिल्लगी।
मुहा.- हँसी उड़ाना-उपहास करना। हँसी समझना या हँसी-खेल समझना- खिलवाड़ या साधारण बात समझना। हँसी में उड़ाना- साधारण या उपेक्षणीय समझ कर टाल देना, परिहास या विनोद की बात कहकर टाल देना। हँसी में लेना या ले जाना-गंभीर या महत्वपूर्ण बात (पर गंभीरता से विचार न करके उस) को हँसी या मन-बहलाव की बात समझना। हँसी में खसी होना या हों जाना-दिल्लगी, मजाक या विनाद की बात करते करते परस्पर झगड़ने लगना या मारपीट कर बैठना।
अनादरसूचक हास, व्यंग्यपूर्ण निंदा।
मुहा.- हँसी उड़ाना-व्यंग्यपूर्ण निंदा करना।
मुहा.- हँसी होना-बदनामी या निंदा होना। हँसी (हाँसी) होने लगी -बदनामी या निंदाहोनेलगी है।उ.-हँसी (हाँसी) होने लगी या ब्रज में कान्हहिं जाइ सुनावौ।
उ.-(क) हँसैं हँसत, बिलखैं बिलखत हैं-१९५। (ख) हँसें तें हँसति-१८६९।
उ.-ऎसे चलौ हँसै नहिं कोऊ-१४९७।
हँसी उड़ायँगे, उपहास करेंगे।
मुहा.- नाउँ हँसैगो-नाम की हँसी उड़ायेंगे, उपहास करेंगे। उ.-यह बिचारि सुनि ग्वारिनी नाउँ हँसैगो लोग-११२०।
हँसी-ठट्ठा करनेवाला, मसखरा।
उ.-बात सुने तैं बहुत हँसौगे, चरन-कमल की सौं-१-१५१।
कुछ-कुछ हँसता हुआ, कुछ कुछ हँसी लिये।
अचरज या आश्चर्यसूचक शब्द।
है ही' (का संक्षिप्त रूप)।
उ.- (क) मदन हई री-१४७४। (ख) प्रिया जानि अंकम भरि लीन्ही कहि कहि ऎसी काम हई-१८३२।
उ.- घटी घटा सब अभिन मोह मद तमिता तेज हई-२८५३।
ब्रजभाषा में उत्तमपुरुष, सर्वनाम का एक वचन रुप, मैं।
उ.- (क) दंतबक्र सिसुपाल जो भए। बासुदेव ह्वै सी पुनि हए-१०-२। (ख) कोट सबन भूलि गए हाँक देत चकृत भए लपकि लपकि हए उबरथौ नहिं कोऊ-२६१०।
आघात किया, लक्ष्य बनाकर आहत किया।
उ.- (क) सूर स्याम बिथुरे कच मुख पर नख नाराच हए-२०८४। (ख) इन हिय हेरि मृगी सब गोपी सायक ज्ञान हए -३०५०।
मुहा.- हक दबाना या मारना-किसी को प्राप्य वस्तु या बात से वेचित करना। हक पर या के लिए लड़ना-प्राप्य या अधिकार की रक्षा के लिए लड़ना। हक दबना या मारा जाना-प्राप्य या अधिकार से वंचित रहना। हक में-लाभ की दृष्टि से, पक्ष में।
मुहा.- हक अदा करना- कर्तव्य पालन करना।
वह वस्तु जिस पर न्यायतः अधिकार हो।
मुहा.- हक दबना या मारा जाना- दस्तूरी की रकम न मिलना। हक दबाना या मारना- दस्तूरी की रकम न देना।
मुहा.- हक पर होना-उचित बात का आग्रह करना।
जबर-दस्ती, धींगा-धींगी से।
(वाग्दोष के कारण) रुक-रुक कर बोलनेवाला।
वाग्दोष के कारण) रुकरुककर बोलना।
जोरों की लड़ाई, घोर युद्ध।
सेवक या भक्त का अंजुली में कूछ लेकर स्वामी या उपास्य को अर्पण करना।
उ.-राजनीति अरु गुरु की सेवा, गाइ-बिग्न प्रतिपारे-९-५४।
उ.-(क)जिहिं जिहिं भाइ करत जन सेवा अंतर की गति जानत-१-११। (ख) ब्रह्मा महादेव तै को बड़, तिनकी सेवा कछु न सुधारी-१-३४। (ग) तजि सेवा बैकुंठनाथ की, नीच नरनि कैं संग रहै-१-५३। (घ) मनमा और मानसी सेवा दोउ अगाध करि जानौ-१-२११। (ङ) जोग न जज्ञ, ध्यान नहिं सेवा,संत-संग नहिं ज्ञान-१-३०४।
मुहा.- सेवा में-पास, समीप, सामने।
पंद्रहवाँ नक्षत्र जिसकी वर्षा के जल से मोती का उत्पन्न होना माना जाता है।
बूंदसेवातीस्वाती नक्षत्र की वर्षा के जलकी दूँद।
बूंदसेवाती वह दुष्प्राप्य वस्तु जिसके प्राप्त होने पर असीम प्रसन्नता हो।
उ.- सूरदास प्रभु प्रानहिं राखहु होइ करि बूँद सेवाती-३११६।
असलियत, सत्य या वास्तविक बात।
मुहा.- हकीकत खुलना-ठीक बात का पता लगना। हकीकत में-सचमुच, वास्तव में।
सच्चा और ठीक-ठीक वृत्तांत।
हकीम का काम, पेशा या व्यवसाय।
मुहा.- हकूमत चलाना या दिखाना-अधिकार या बड़प्पन दिखाना।
उ.-मैं देखें की नाहीं देखे तुम तो बार हजार-१३११।
कितना ही, चाहे जितना अधिक।
(फूल) जिसमें हजार ये बहुत अधिक पंखुड़ियाँ हों, सहस्रदल।
एक हजार सिपाहियों का नायक या सरदार।
हच-हच' करके रुकना, झुकना या हिलना-डोलना।
काबे के दर्शन या परिक्रमा के लिए मक्के (अरब) जाना (मुसलमान)।
बेईमानी या अनुचित रुप से लिया हुआ।
मुहा.- हजम होना-बेईमानी या अनुचित रीति से ली गयी वस्तु का पास रहना या पच सकना।
दुष्ट या धूर्त (व्यंग्य)।
सिर के बाल काटने और दाढ़ी बनाने का काम या मजदूरी।
मुहा.- हजामत बनाना- (१) सिर या दाढ़ी के बाल काटना। (२) घन या अन्य वस्तु ठगकर ले लेना। (३) मारना-पीटना। हजामत होना - (१) धन या अन्य वस्तु का ठगकर लिया जाना। (२) मार पड़ना, दंड मिलना।
रोकना, मना करना, निषेध या वर्जन करना।
मना करने से मानना, रोकने से रुकना।
चौपायों को हाँकने की क्रिया।
उ.-बालक-बृन्द बिनोद हँसावत, करतल लकुट धेनु की हटकनि-६१८।
किवाड़ों को खुलने से रोकने के लिए लगाया गया काठ, अर्गल।
उ.- (क) सूर स्याम को हटकि न राखै, तैं ही पूत अनोखो डायौ-१०-३३१। (ख) कुल-अभि-मान हटकि हठि राखी, तैं जिय मैं कछु और धरी-८०६। (ग) बारहिंबार कहि हटकि राखति, निकसि गए हरि संत नहिं रहे घेरे- पृ. ६२२ (१६) (घ) जद्यपि हटकि हटकि राखति हौं, तद्यपि होति खरी- पृ. ३३७ (६३)।
पशुओं को किसी दिशा में जाने से रोककर।
उ.-पायँ परि बिनती करौंहौं हटकि लावौ गाय। (ख) अबकैं अपनी हटकि चरावहु, जैहैं भटकी घाली-५०३।
मुहा.- जबरदस्ती, हठात्। (२) बिना कारण।
मना करने या रोकने की क्रिया, वारण, वर्जन।
मुहा.- हटक मानना- मना करने पर रुक जाना, रोकने पर मान जाना। हटक न मानत- रोकने पर भीं नहीं रुकते। उ.-सूरदास ए हटक न मानत लोचन हठी हमारे-३०३६। हटक न मानति-मना करनैं पर भी नहीं मानती। उ.-बंसी धुनिमृदु कान परत ही गुरुजन-हटक न मानति।
पशुओं को हाँकने की क्रिया या भाव।
रोककर दूसरी ओर हाँकने (पर भी), मना या वर्जित करने (पर भी)
उ.-माधौ, मैंकु हटकौ गाइ। ¨¨¨¨¨¨ यह अति हरहाई, हटकत हूँ बहुत अमारग जाति-१-५१।
रोकती या मना करती, रोकने या मना करने (पर)।
उ.- (क) सुत को हटकति नाहिं, कोटि इक गारी दीन्हीं-१०७०। (ख) सूर जव हम हठकि हटकति बहुत हम पर लरी-पृ. ३३७ (६७)।
मना करना, रोकना, वारण, वर्जन।
चौपायों को हाँकने की लाठी।
हजारी बजारी-सरदारों से लेकर बनियों तक सब, अमीर-गरीब सभी।
किसी बड़े या अधिकारी की समक्षता।
बादशाह या शासनाधिकारी का दरबार या कचहरी।
उ.-दधि-माखन-धृत लेत छँड़ाए, आजुहिं मोहिं हजूर बोलावहु-१०९४।
किसी बड़े अधिकारी, शासक या स्वामी के लिए संबोधन शब्द।
किसी बड़े या शासनाधिकारी के सामने या समक्ष।
उ.-रजु लै सबै हजूर होति तुम सहित सुता वृषभान-२९३६।
किसी बादशाह, राजा या शासनाधिकारी के पास रहनेवाला सेवक।
मुहा.- जी-हजूर करना-चापलूसी, खुशामद या चाटुकारी करना।
उ.- माई री, गोबिंद सों प्रीति करत तबहीं काहे न हटकी री -१२००।
उ.-नैना बहुत भाँति हटके -पृ. ३३६ (४२)।
पशु को रोककर दूसरी ओर हाँको।
उ.-माधौ, नैंकु हटकौ गाइ-१-५६।
उ.-जुरीं आय सिगरीं जमुना तट हटक्यो, कोउ न मान्यो।
एक स्थान को छोड़कर दूसरे पर जाना।
(काम से) जी चुराना या विमुख होना।
मुहा.- पीछे न हटना-(काम करने को) तैयार रहना।
एक स्थान से दूसरे पर ले जाना।
स्थान छोड़ने पर विवश करना।
(किसी बात का) विचार छोड़ देना।
हाट में बेचनेवाला, दूकानदार।
किसी बात का नियत समय पर न होकर आगे के लिए टल जाना
हाट में सौदा लेना या बेचना, हाट का क्रय-विक्रय।
हटाने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
हटाने का काम दूसरे से कराना।
किसी देवालय में सेवा-व्यवस्था आदि करने का अधिकारी।
सेवक का धर्म, कर्तव्य या दायित्व।
उ.-सेवक कौ सेवापन एतौ आज्ञाकारी होइ-९-९९।
पानी में होने वाली एक तरह की घास।
उ.-(क) मनु सेवाल कमल पर अरुझे-१०-१४०। (ख) राम औ जांबवान सुभट ताके हते रुधिर की नहर सरिता बहाई। सुभट मनो मकर अरु केस सेवार ज्यौं धनुष त्वच चर्म कूरम बनाई-१० उ.-२१।
सेवी' का रूप जो समास में होता है।
देह का ढाँचा, शरीर की गठन।
उ.- (क) हठ, अन्याय, अधर्म, सूर नित नौबत द्वार बजावत-१-१४१। (ख) हठ न करहुतुम नंददुलारे-१०-१६०।
मुहा.- हठ पकड़ना-किसी बात के लिए अड़ जाना। हठ रखना-जिस बात के लिए जिद हो, उसे मान लेना। हठ में पड़ना-हठ करना। हठ माँड़ना-हठ ठानना। हठ माँड़ि रही-जिद कर रही है। उ.- क्यों हठ माँड़ि रही री सजनी टेरत स्याम सुजान।
दृढ़ प्रतिज्ञा, अटल संकल्प।
अनुचित बात के लिए की गयी जिद, दुराग्रह।
अपनी बात पर दृढ़तापूर्वक डटे रहना।
अनुचित बात पर भी डटे रहना, दुराग्रह।
मत या संप्रदाय की बात को लेकर अड़ना, कट्टरता।
अनुचित बात पर भी अड़ा रहनेवाला।
मुहा.- हठ कर-जबरदस्ती, बलात्।
योग का वह रूप जिसमें शरीर को साधने के लिए कठोर मुद्राओं और आसनों का विधान है।
मुहा.- हठहिं गहौं-हठ करूँ। उ.-प्रगट ताप तनु ताप सूर प्रभु केहि पर हठहिं गहौं-११-३।
उ.-अगम सिंधु जतननि सजि नौका हठि क्रम-भार भरत-१-५५।
उ.-ज्यौं सुक सेमर सेव आस लगि, निसि-बासर हठि चिंत्त लगायौ-१-३२६।
उ.- करिहैं न कबहूँ मान हम, हठिहैं न माँगत दान-२७३५।
उ.- सूरदास ए हटक न माँगत लोचन हठी हमारे-३०३६।
उ.- (क) सूदास प्रभु माखन माँगत, नाहिंन देति हठीली-१०-२९९। (ख) तू अजहूँ तजि मान हठीली कहौं तोहिं समुझाय। (ग) कहति नागरी स्याम सों तजो मान हठीली- पृ. ३१२ (१५)।
उ.-हारै तोरथौ, चीरहिं फारथौ बोलत बोल हठीले हो-१०३३।
उ.-प्रगट पाप संताप सूर अब कापर हठै गहौं-३-२।
उ.-सूरदास प्रभु इती बात कौं कत मेरौ लाल हठै-१०-१९५।
उ.-जो पै तुम या भाँति हठैहौ।
एक पेड़ जिसका फल औषध के रूप में काम आता है, हर्र।
हड़ के आकर का, नाक का एक गहना, लटकन।
मुहा.- हड़प करना-अनुचित रीति से ले लेना।
उतावली के कारण होनेवाली घबराहट।
मुहा.- हड़बड़ करना-बहुत जल्दी मचाना।
शीघ्रता करने को प्रवृत्त करना।
मुहा.- हड़बड़ी में पड़ना-ऎसी स्थिति होना कि सारा काम बहुत जल्दी निबटाना पड़े।
पागल कुत्ते के काटने पर पानी के लिए होनावाली व्याकुलता।
किसी वस्तु को पाने की रट या धुन।
कोई चीज न मिलने पर या किसी अभाव से दुखी होना।
तंग करने के लीए किसी को पीछे लगा देना, लहकारना।
किसी वस्तु के लिए बहुत उतावला।
किसी असंतोष को सूचित करने के लिए दूकाने या काम बंद करना।
जल्दी मचाकर दूसरे को घबराना।
इतना दुबला कि शरीर में हड़िडयाँ ही शेष रह गयी हों।
हड़ावर, हड़ावरि, हड़ावल, हड़ावलि
हड़ावर, हड़ावरि, हड़ावल, हड़ावलि
हड़ावर, हड़ावरि, हड़ावल, हड़ावलि
जो इतना दुबला हो कि केवल हडि्डयाँ बच रहें।
उ.- ज्यौं कपि सीत-हतन हित गुंजा सिमिटि होत लौलीन-१-१०२।
उ.-नगर नारि ब्याकुल जिय जानत प्रभु सूर स्याम गर्व-हतन नाम ध्यान करि करि वै हरषैं-२६०४।
शरीर के भीतर की वह कठोर वस्तु जो ढाँचे या आधार के रूप में होती है, अस्थि।
(सं. अस्थि, प्रा. अत्थि, अट्ठि)
मुहा.- हड्डी (हडि्डयॉं) गढ़ना या तोड़ना-बहुत मारना-पीटना। हड्डी (हडि्डयॉं) निकल आना - (रोग आदि के कारण) इतना दुबला हो जाना कि हडि्डयॉं दिखायी देने लगें।
पुरानी हड्डी-किसी वृद्ध या वृद्धा का मजबूत शरीर, पुराने समय के आदमी जैसा दृढ़ शरीर।
(सं. अस्थि, प्रा. अत्थि, अट्ठि)
जिसके आघात या ठोकर लगी हो।
उ.- बिधि- गर्व हत करत न लागी बार-४३७।
जिसका अधिकार न रह गया हो।
विमूढ़ , किंकर्तव्यविमूढ़।
जिसकी टहल वा सेवा की गयी हो।
जिसकी पूजा- उपासना की गयी हो।
जिसका प्रयोग या व्यवहार किया गया हो।
हतभाग, हतभागा, हतभागी, हतभाग्य
हतभागिन, हतभागिनि, हतभागिनी
होना' का भूतकालिक एक वचन रूप, था।
घायल होने, मरने आदि की क्रिया या भाव।
हत' करने को प्रवृत्त करना, हतवाना।
जिसकी आशा नष्ट हो गयी हो, निराश।
उ.-(क) अघ-बक-तृनाबर्त-धेनुक हति-१-१५८। (ख) कंस बंस बधि, जरासंध हति-१-१८१। (ग) हति गज-सत्रु-८-६।
डारत हति-तोड़ डालता है, भंग कर देता है।
उ.-ज्यों गज फटिक सिला मैं देखत, दसननि डारत हति (पाठा, जाइ परथो)-२-३६।
उ.-मैं देखों इनको अब हतिहैं, अति ब्याकुल हहरथौ-२५५२।
होना' क्रिया का भूतकालिक स्त्रीलिंग एकवचन रूप, थी।
उ.-तेरे हती प्रेम-संपति सखि, सो संपति केहि मूषी-२२७५।
होना' क्रिया का भूतकालिक बहुवचन रूप, थे।
उ.-नयन हते तिनहूँ पर बीती।
मुहा.- हत्थे चढ़ना-(१) हाथ में आना, मिलना, प्राप्त होना। (२) वश में होना।
उ.- करिकै क्रोध तुरत तिहिं मारथौ। हत्या हित यह मंत्र उचारथौ। चारि अंस हत्या के किए। ¨¨¨¨¨¨ ब्राह्मन हत्या कै दुख तयौ-६-५।
मुहा.- हत्या लगना या होना-किसी का वध करने का पाप लगना। हत्या लगी-वध करने के पाप के भागी बने। उ.- राम तिहिं हत्यौ, तब सब रिषिन मिलि कहथौ, बिप्र हत्या तुम्हैं लगी भाई- ना. ४८४१। हत्या होइ-वध करने का पाप लगेगा। उ.-हरि-जन मारैं हत्या होइ-५-३।
(वध करने के उद्देश्य से नहीं) अनजान में या संयोगवश किसी के प्राण ले लेना।
हैरान करनेवाली बात, झँझट, बखेड़ा।
मुहा.- हत्या टलना-झंझट से छुटकारा मिलना। हत्या गले पड़ना या सिर लगना-झंझट या बखेड़े के किसी काम में फँसना। हत्या गले डालना या सिर लगाना-बखेड़े या झंझट के काम में फँसाना।
मार डालने या वध कर देनेवाला।
(सं. हत्या + कार या हिं. आर, आरा)
(सं. हत्या + कार या हिं. आर, आरा)
(सं. हत्या + कार या हिं. आर, आरा)
उ.- (क)ज्ञान-बिबेक बिरोधे दोऊ, हते बंधु-हितकारी-१-१३। (ख) हरि कहथौ, राज न करत धर्मसुत। कहत, हते मैं भ्रात तात जुत-१-२६१। (ग) राम औ' जादवन सुभट ताके हते-१० उ.-२१।
होना' क्रिया का भूतकालिक एकवचन रूप, था।
जिसमें (कुछ करने की) उमंग या उत्साह शेष न रह गया हो।
एक अव्यय जिसका प्रयोग उपेक्षा, बुरापन आदि सूचिन करने के लिए होता है।
किसी औजार का दस्ता या मूठ।
हाथ के नीचे रखने का आधार।
ऎपन आदि से बनाया गया पंजे या हाथ का चिह्न।
उ.- (क) मागध हत्यौ-१-१७। (ख) हत्यौ कंस नरेस-२९७५।
मुहा.- पर-हथ बिकाऊँ-दूसरे के हाथ बिकू,दूसरे के वश में हो जाऊँ। उ.-काकैं द्वार जाइ सिर नाऊँ पर-हथ कहा बिकाऊँ-१-१६४।
'हाथ' का वह संक्षिप्त रूप जो समस्त पदों के प्रारंभ में लगता है।
वह ऋण जो थोड़े दिनों के लिए, बिना किसी लिखा-पढ़ी के, लिया जाय।
(काम निकालने के लिए की गयी) छिपी हुई चालबाजी या गुप्त चाल।
जंजीर या डोरी से बँधा लोहे के कड़ियों का जोड़ा जो अपराधी या कैदी के हाथ में पहनाया जाता है।
बारूद का गोला जो हाथ से फेंका जाता है।
जो जरा-जरा सी बात में किसी को मार बैठता हो।
वह तोप जो हाथी पर रखकर चलायी जाय, गजनाल।
हथेली के पीछे पहनने का एक जड़ाऊ गहना।
स्नेह या प्यार से शरीर पर हाथ फेरना।
हाथ की सफाई या चालाकी से किसी का माल उड़ा लेना।
कुछ समय के लिए, बिना किसी लिखा-पढ़ी के, लिया हुआ उधार या ऋण।
विवाह में वर द्वारा अपने हाथ में कन्या का हाथ लेने की रीति, पाणिग्रहण।
विवाह में कन्या का हाथ लेनेवाला, वर।
नाव का डाँड़ा, लग्गा, पतवार आदि।
किसी व्यवहारोपयोगी वस्तु का पहले पहल उपयोग करना।
हथसंकर, हथसाँकर, हथसाँकल, हथसाँकला
हथसार, हथसारा, हथसाल, हथसाला
हाथ का चिह्न जो दीवार आदि पर बनाया जाता है, थापा।
एक के हाथ से दूसरे के हाथ में, हाथोहाथ।
मुहा.- कसे साजे हथिआरा-अस्त्र-शस्त्र धारण किये हुए। उ.- सकल सभा जिय जानि कसे साजे हथिआरा-१० उ.-८।
(सं. हस्तिनी, प्रा. हत्थिणी)
उ.-मानो मत्त मदन के हथियन बल करि बंधन तोरे-२८१८।
अपने हाथ में करना, ले लेना।
दूसरे की चीज धोखा देकर ले लेना।
हाथ में लेकर काम करने का औजार या उपकरण।
हाथ से पकड़कर चलाया चानेवाला अस्त्र-शस्त्र।
उ.- लै लै ते हथियार आपने सान धराए ज्यौं-१-१५१।
मुहा.- हथियार उठाना- (१) लड़ाई के लिए तैयार होना। (२) प्रहार करने या मारने के लिए शस्त्र हाथ में लेना। हथिय़ार कसना, धरना, बाँधना, लेना या लगाना- (१) अस्त्र-शस्त्रधारण करना। (२) युद्ध के लिए तैयार होना। धरे हथियार-अस्त्र-शस्त्र सजाये हुए। उ.-धरे यंत्र-हथियार अहो हरि होरी है-२४१६।
जो हथियार लिये हो, अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित।
(सं. हस्ततल, प्रा. हस्थतल)
मुहा.- हथेली खुजलाना-कुछ मिलने या प्राप्त होना का शकुन होना। हथेली का फफोला-बहुत ही सुकुमार वस्तु जिसके टूटने-फूटने का डर सदा वना रहे। हथेली देना या लगाना- हाथ का सहारा देना, सहायता करना। किसकी हथेली में बाल जमे हैं - कौन सेसार में है।हथेली पर जान लेकर काम करना-जान जोखिम में या प्राण संकट में डालकर काम करना। हथेली में जान होना- बडे संकट में पड़ना।
वह औचित्य जहाँ तक कोई काम, व्यवहार या आचरण ठीक हो, मर्यादा।
मुहा .- हद पारना-मर्यादा या औचित्य का पालन या निर्वाह करना। हद पारी- (उचित कार्य संपादन द्वारा) मर्यादा या औचित्य का पालन या विर्वाह करो। हद से गुजरना -मर्यादा या औचित्य से भी आगे बढ़ जाना।
ऎसा भाव जो किसी को किंकर्तव्यविमूढ़ कर दे।
बहुत अधिक डरना या भयभीत होना।
मुसलमानों का एक धर्मग्रंथ जिसमें मुहम्मद साहब के वचन संगृहीत हैं।
प्रहार करता है, प्रहार करते - करते।
काम में हाथ लगाने की स्थिति क्रिया या भाव।
एक औजार जिसमे कुछ ठोंका, पीटा या गढ़ा जाता है।
वर-वधू के हाथ में मिठाई रखनें की रीति।
मुहा - हद्र बँधना- सीमा निश्चित होना। हद बाँधना- सीमा निश्चित करना। हद तोड़ना-सीमा के बाहर जाना या कुछ करना। हद से बाहर ठहरायी हुई या मान्य सीमा से आगे।
उचित संख्या या परिमाण, संख्या या परिमाण का मान्य औचित्य।
मुहा.- हद से ज्यादा- बहुत अधिक संख्या या परिमाण में। हद्र न होना- संख्या या परिमाण की दृष्टि से बहुत ही अधिक।
स्थान-विशेष पर निरंतर वास करनेवाला।
उ.- (क) सोइ करहु जिहिं चरन सेवै सूर जूठनि खाइ-१-१२६। (ख) भक्त सात्विकी सेवै संत-२-१३।
उ.- (क) जो जो जन निस्चै करि सेवै हरि निज बिरद सँभारै-१-२५७। (ख) ज्यौं सेवै त्योंही गति होई-१०उ.-१२७।
उ.-संत संग सेवौ हरि-चरना - ५-२।
जो सेवा या परिचर्या के योग्य हो या जिसकी सेवा परिचर्या की जाय।
(नगाड़ा आदि लकड़ी से) पीट-पीट कर बजाना।
उ.- पहिले ही इन हनी पूतना -सारा. ५६९।
अफ्रीका का एक देश जहाँ के निवासी बहुत काले होते हैं।
अफ्रीका के हब्श देश का निवासी जो बहुत काला होता है।
किसी चीज पर चढ़कर उसे बार-बार नीचे दबाना।
मुँह में चट से कुछ रखकर ओंठ बंद करने का शब्द।
मुहा.- हपकर जाना-चटपट खा जाना।
खाने या काटने के लिए मुँह खोलना या बाना।
मुहम्मद साहब जो ईश्वर के परम प्रिय माने जाते हैं।
बहुत प्यारा, अत्यंत प्रिय।
पानी का बुल्ला या बुलबुला।
श्रीराम के परम भक्त एक बानर जिन्होंने लंका के युद्ध में उनके अनेक कार्य बड़ी तत्परता से किये थे। अंजना इनकी माता और वायु या मरुत् पिता कहे जाते हैं।
उ.-बृषभ-गंजन मथन-केसी हने पूँछ फिराइ- ४९८।
उ.-मनहुँ चंद्र-मुख कोपि हन्यो रिपु राहु बिषय बलवान - 1897।
अपने को बहुत-कुछ समझने का अहम् भाव, अहंकार।
उ.- हमता जहाँ तहाँ प्रभु नाहीं सो हमता क्यौं मानै-१-११।
दुख का साथी, दुख की स्थिति में सहानुभूति दिखानेवाला।
साथ-साथ भोजन करने वाला धनिष्ठ मित्र।
मुहा.- हमराह करना-साथ कर देना। हमराह होना- साथ-साथ जाना।
उ.-अब इह सुरति करै को हमरी-१८३२।
मुहा.- हमरी उनकी सी मिलवत हौ- हमारी और उनकी हाँ में हाँ मिलाते हो, जो हम और वे कहते हैं उसी का समर्थन करते हो। उ.-हमरी उनकी सी मिलवत हौ तातें भए बिहंगी-२९९७।
उ.-हमरे डर करि दोऊ भाई नगर समुद्र बसायौ-सारा. ७५२।
उ.-बिना काम हमरैं नहिं चाह-९-२।
उ.-बालक बह्यो सिंधु में हमरो सो नित प्रति चित लाग्यौ- साराण्;५३९।
मारने के लिए झपटना, आक्रमण।
किसी को हानि पहुँचाने के लिए किया गया काम या प्रयत्न।
अपने-अपने लाभ का प्रयत्न।
अपने को ही सबसे ऊपर या सबके आगे करने का प्रयत्न।
उ.-सुनि सिख-साखि हमार-२-२।
हम' का संबंधकारकीय पुँल्लिंग रूप।
हम' का संबंधकारकीय स्त्रीलिंग रूप।
उ.- इंद्री खड्ग हमारी-१-१४४।
हमारो, हमारौ, हमार्यो, हमार्यौ
उ.- या ब्रज कोऊ नाहिं हमारथौ-२८९२।
रक्षा करने या सँभालनेवाला।
अपने-अपने लाभ या स्वार्थ के लिए किया हुआ आतुर प्रयत्न।
अपने को आगे बढ़ाने या ऊपर उठाने का आतुर प्रयत्न।
रणखंभोर का एक प्रसिद्ध चौहान राजा।
हम' का कर्म और संप्रदानकारकाय रूप, हमको।
सोने-चाँदी के सिक्के जैसे गोल दुकड़ों की माला।
उ.- (क) दुलरी अरु तिलरी बँद तापर सुभग हमेल बिराजत-१०७९। (ख) और हार चौकी हमेल अब तेरे कंठ न नैहौं-१५५०।
मुहा.- हमेव टूटना-शेखी या गर्व निकल जाना।
मुहा.- हमेशा के लिए-सब दिनों के लिए।
रणथंभोर का एक प्रसिद्ध चौहान राजा जो (सने १३०० में) अलाउद्दीन खिलजी से बड़ी बीरता से लड़कर मरा था।
इंद्र का उच्चैःश्रवा घोड़ा।
उ.-हय गयंद उतरि कहा गर्दभ चढि़ धाऊँ-१-१६६। इंद्र का एक नाम।
विष्णु का एक अवतार जो मधुकैटभ नामक दैत्यों से बेदों का उद्धार करने के लिए हुआ था।
उ.- (क) प्रगट भए हयग्रीव महानिधि प्रगट ब्रह्म अवतार-सारा. ८९। (ख) कपिल मनु हयग्रीव पुनि कीन्हौं ध्रुव अवतार-२-३६।
एक असुर जो ब्रह्मा की निद्रा के समय वेद उठा ले गया था। उससे वेदों का उद्धार करने लिए विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था।
न रहने देना, मिटाना, नष्ट करना।
जिसकी पूजा- उपासना करनी हो यः की जाय।
सेवक-सेव्य भाव-भक्ति का वह रूप या भाव जिसमें उपास्य को स्वामी और अपने को उसका सेवक समझा जाता है।
जिसमें ईश्वर की सत्ता मानी गयी हो।
उ.- (क) कंपत कमठ-सेष-बसुधा नभ रबि-रथ भयौ उतपात-९-७४। (ख) सिंह आगै, सेष पाछैं, नदी भइ भरिपूरि-१०-५।
लक्ष्मण जो शेष-नाग के अवतार माने जोते हैं।
उ.-लगत सेष-उर, बिलखि जगत गुरु, अद्भुत गति नहिं परति बिचारी-९-६२।
घोड़े पर से चलायी जानेवाली तोप।
हयशाला, हयसार, हयसारा. हयसाल, हयसाला
जिसे अनुचित काम करने में शर्म या लाज आती हो, लज्जाशील।
अनुचित काम करते समय लजाने का भाव, लज्जाशीलता।
उ.- (क) सोच सबको गयो, दनुज कुल सब हयो-२६१७। (ख) नए सखा जोरे जादव कुल अरु नृप कंस हयो-३३४७।
उ.- सखा बिप्र दारिद्र हयौ-१-२६।
बरबादी कर ली, नष्ट कर लिया।
उ.-सूर नंद-नंदन जेहिं बिसरथौ, आपुहिं आपु हयौ-१-७८।
ले लेनेवाला, छीनने या लूटनेवाला।
ले जाने या पहुँचानेवाला, वाहक।
एक प्रत्यय जो शब्दांत में लगकर उक्त अर्थ देता है।
उ.-हरि-हर संकर नमो नमो-१०-१७१।
एक राक्षस जो विभीषण का मंत्री था।
एक प्रत्यय जो शब्दांत में लगकर स्थान, घर आदि का अर्थ देता है।
उ.-बंजर भूमि गाँउ हर जोते, अरु जेती की तेती-१-१८५।
मुहा.- हर एक-एक-एक, प्रत्येक। हर कोई या किसी- सब कोई या किसी, सर्वसाधारण। हर दफा या बार-प्रत्येक अवसर पर। हर हाल या हालत में- प्रत्येक दशा में। हर दम-प्रतिक्षण, सदा।
पत्र या संदेश ले जानेवाला।
खुश. प्रसन्न या हर्षित होना।
खुश. प्रसन्न या हर्षित करना।
हर किसी से अनुचित संबंध करनेवाली।
हानि का बदला, क्षतिपूर्ति।
वह धन जो क्षति-पूर्ति के रुप में दिया जाय।
छीनता, लूटता या चुराता है।
उ.- ज्यों ठग निधिहिं हरत-२५४३।
उ.- कोटि ब्रह्मंड करत छिन भीतर हरत बिलंब न लावै-१०-१२६।
उ.- (क) हरता करता आपुहिं सोइ-१-२६१। (ख) मैं हरता-करता संहार-५-२। (ग) दाता-भुत्ता, हरता-करता बिस्वंभर जग जानि-४८७। (घ) ए हरता करता समर्थ और नाहीं-२५५६।
एक खनिज पदार्थ जिसमें स्याही या रंग उड़ाने का गुण होता है।
मुहा. हरताल लगाना-मिटाना, नष्ट करना।
एक तरह का पीला या गंधकी रंग।
चंद्रमा जो शिव के मस्तक पर है।
उ.- (क) जनौ हर-तिलकं कुहू उग्यौ री-६९१। (ख) हर को तिलक हरि बिनु दहत-२८५८।
पारा (जो शिव का वीर्य कहा जाता है।)
लूटता, चुराता या हरण करता हुआ।
उ.- स्रजन-बेष-रचना प्रति जन मनि आयौ पर-घन हरतौ-१-२०३।
उ.- (क) छिरकत हरद दही-१०-१९। (ख) हींग हरद म्रिच छौंके तेले-३९६। (ग) रंग कापै होत न्यारो हरद चूनौ सानि-८९५। (घ) हरद दूब केसर मग छिरकौ-१० उ.- २३।(ड;) दै करबॅदा हरदि रँग भीने-२३२१ (च) हरदि समान देखिअत गात-२७७९। (छ) नूतन सुभग दूब-हरदी-दधि हरषित सीस बँधाए-१०-८७।
उ.-एकै चीर हुतौ मेरे पर, सो इन हरन चहथौ-१-२४७।
उ.- (क) दुहूँ लोक सुखकरन, हरन-दुख बेद-पुराननि साखि-१-९०। (ख) भू-भर हरन प्रगत तुम भूतल-१-१२५।
उ.- रे रे अंध; बीसहॅू लोचन पर-तिय हरन, करन बिकारी -९-१३२।
उ.-सूर स्याम खल हरन, करन सुख.२५७२।
छीनना, लूटना, चुराना, हरण करना।
मुहा. मन हरना-लुभाना, मोहित करना।
दूर करना, हटाना, न रहने देना।
मुहा.- प्राण हरना- (१) मार डालना। (२) बहुत कष्ट देना। (३) उठाकर ले जाना, वहन करना।
एक दैत्य जो प्रहलाद का पिता था।
उ.-रिसनि मोहिं दहति, बन भई हरनी-६९८।
छीनने, लूटने या हरण करने वाली।
उ.- (क) सरद निसि कौ अंसु अगनित इंदु आभा हरनि-३५१। (ख) सोभित केस बिचित्र भाँति दुति सिखि सिखा हरनी-पृ. ३१६ (५४)।
मुहा. मन हरनी- लुभाने या मोहित करनेवाली। उ.- रुनुक-झुनुक पग बाजत पुति ही मन हरनी-१०-१२३।
उ.- असरन सरनी भव-भय हरनी बेद-पुरान बखानी- पृ. ३४६ (४१)।
मुहा.- किसी पर हरफ आना- दोष या अपराध लगना। हरफ उठाना-अक्षर पहचान कर पढ़ लेना। हरफ बनाना-सुंदर लिखने का अभ्यास करना। किसी पर हरफ लाना-दोष या अपराध लगाना।
उ.- हरबर चक्र धरे हरि आवत-८-३।
उ.-(क) हरबराइ उठि आइ प्रात ते-११८३। (ख) हरबराइ कोउ सखन बोलायो-१५६०।
वह नाग जिसके हजार फनों पर पृथ्वी ठहरी या टिकी हुई मानी गयी है।
(शेषनाग-जैसा) सफेद या श्वेत रंग।
(शेषनाग के अवतार) लक्ष्मण द्वारा खींची गयी वह रेखा जो उन्होंने मरीच का 'हा लक्ष्मण' पद सुनकर, सीताजी को अकेला छोड़कर जाते समय खींची थी और जिसके बाहर जाने का उनको निषेध कर दिया था। रावण ने उस रेखा को लाँघने का साहस नहीं किया था और सीताजी जब उस रेखा के बाहर आ गयी थीं, तभी उसने उनका हरण किया था।
उ.-सूनैं भवन गवन तैं कीन्हौ, सेष-रेख नाहिं टारी-९-१३२।
शेषनाग का आसन जिस पर विष्णु शयन करते कहै जाते हैं।
उ.-सप्त रसातल सेषासन रहे, तबकी सुरति भुलाऊ-१०-२२१।
उ.- (क) सेस सारद रिषय नारद संत चिंतत सरन-१-३०८। (ख) धरनि सीस धरि सेस गरब धरथौ इहिं भर अधिक सँभारयौ-५६७।
घबराते या उतावली करते हो।
उ.- अजहूँ रैनि तीन याम है जू काहे को हरबरात स्याम जू-२२४१।
जल्दी आ शीघ्रता करने की उतावली।
उ.-सिंहि को सुत हर-भूषन ग्रसि, सोइ गति भई हमारी-२७५१।
सेना में सबसे आगे रहनेवाला सैनिक-दल।
हल चलानेवाला नौकर या किसान।
बैल चलाने का काम या मजटूरी।
उ.-बोझ पृथ्वी को हरवो भयो-१० उ.-१३८।
गंगा (जिसका वास शिवजी के सिर पर माना गया है)।
उ.-दनुज कुल सब हयौ तिहूँ भुवन जै जयो हरष कूबरी के -२६१७।
उ.- हरषीं पास-परोसिनैं, हरष नगर के लोग-१०-४०।
उ.-छिरकत हरद दही, हिय हरषत-१०-१९।
प्रसन्न या आनंदित करते हैं।
उ.- बिषय-भोग हृदय हरषावैं-४-१२।
प्रसन्न या आनंदित होती हैं।
उ.-ब्रज जुवती निरखि निरखि हरषाहीं-१३४२।
उ.-हरषि निरखहिं नारि-१०-१६९।
उ.-मथुरा हर्षित आज भई-२५-२।
प्रसन्नता या हर्ष के साथ।
उ.-नूतन सुभग दूब-हरदी-दधि हरषित सीस बँधाए-१०-८७।
उ.-हरषीं पास-परोसिनैं-१०-४०। (ख) गईं ब्रजनारि जमुना तीर, देखि लहरि तरंग हरषीं-१२९१।
उ.- (क) ब्रज नर नारि अतिहिं मन हरषे-६०७। (ख) सुनत अक्रूर यह बात हरषे-२५५४।
प्रसन्न होती या होते हैं।
उ.-(नगर नारि) ध्यान करि करि वै हरषैं-२६०४।
उ.-बिषया जात हरष्यौ गात-२-२४।
उ.-सूरदास प्रभु के गुन गावत हरषवंत निज पुरी सिधाए-३८६।
उ.- प्रेमा, दामा, रूपा, हंसा, रंगा हरष नाउ-१५८०।
उ.- ब्रज-तरुनी हरषावति री-२९५०।
एक प्रसिद्ध वृक्ष या उसका फूल।
नटखट (गाय), जो बार-बार खेत चरने दौड़े या इधर-उधर भागती फिरे।।
उ.- यह (गाइ) अति हरहोई, हटकत हूँ बहुत अमकग जाति-१-५१।
उ.-हरहु लोचन प्यास-१०-२१८।
जो (कोई बात) हारकर छोड़ चुका हो।
हर या शिव की पत्नी, पार्वती।
हारने की क्रिया या भाव, हार, पराजय।
उ.-कह्यौ करि कोप, प्रभु, अब प्रतिज्ञा तजौ, नहीं तौ जुद्ध निज हम हराए-१-२७१।
युद्ध, प्रतियोगिता आदि में शत्रु या प्रतिद्वंदी को पराजित या परास्त करना।
वह काम या प्रयत्न करना जिससे कोई परास्त या पराजित हो जाय।
सुअर (जिसके खाने का कहीं-कहीं निषेध है)।
मुहा.- (कोई बात) हराम कर देना-ऎसा प्रयत्न करना कि उस कार्य को करना अत्यन्त कष्ट दायक या असंभव ही हो जाय। (कोई बात) हराम होना-किसी काम का करना बहुत मुश्किल हो जाना।
बेईमानी, अधर्म, बुराई, पाप।
मुहा.- हराम का- (१) जो बेईमानी, पाप या अधर्म से कमाया या पाया गया हो। (२) जो बिना मेहनत का हो, मुफ्त का।
स्त्री-पुरुष का अनुचित संबंध।
पाप या अधर्म की कमाई खानेवाला।
बिना मेहनत के कमाने-खानेवाला, धन लेकर भी काम न करनेवाला।
घास-पत्ती के रंग का, हरित।
मुहा. हरा बारा- ऎसी बात जो व्यर्थ की आशा बँधाने या लुभानेवाली हो। हरा भरा- (१) जो सूखा या मुरझाया. न हो। (२) जो हरे पेड़-पौधों से भरा हो।
घास-पत्ती जैसा रंग, हरित रंग।
सेना में सबसे आगे रहनेवाला सैनिक-दल।
एक तरह का नमक जो खान से निकलता है। यह सब नमकों में उत्तम माना जाता है और व्रत में प्रायः इसी का प्रयोग किया जाता है। इसे ‘लाहौरी’ भी कहते हें।
मैदे के सुखाये हुए सूत के से लच्छे जो घी में तलकर और दूध में पकाकर खाये जाते हैं। कुछ हिंदू जातियों में रक्षाबन्धन के और मुसलमानों में ईद के दिन सेंवई अवश्य बनती है।
एक पेड़ जिसके फल में से एक तरह की रूई निकलती है।
फूलों और सुनहरे-रुपहले तारों आदि की मालाओं से बना वह जालपुंज जो विवाह के समय दूल्हे के मौर के नीचे लटकता या पाग आदि पर बाँधा जाता है।
मुहा.- किसी के सिर सेहरा बाँधना-किसी को कार्य-विशेष के संपादन का श्रेय देना।
वे मांगलिक गीत या पद्य जो विवाह के अवसर पर वर के यहाँ गाये जाते हैं।
उ.- (क) लटकत सिर सेहरों मनो सिखी सिखंड सुभाव- पृ. ३४९ (६०)। (ख) सेहरो सिर पर मुकुट लटक्यौ, कंठमाला राजई-३४२४।
हारने की क्रिया, भाव या इच्छा।
उ.-बृहदभानु ह्वैके हरि प्रगटे-सारा.३५२।
उ.-एक दिना ब्रज-पति की पौरी खेलत हरि ब्रजबाल- सारा. ४४५।
उ.- कुटिल 'हरि' -नख हिऎं हरि के-१०-१६९।
उ.- इंद्र अस्व कौं हरि लै गयौ-९-९।
प्रसन्न या प्रफुल्लित होना।
हरे-भरे पेड़-पौधों का समूह या विस्तार।
मुहा. हरिआली सूझना-चारों ओर आनंद ही आनंद दिखायी पड़ना, संकट में भी विनोद, प्रसन्नता या उमंग की बातें सूझना।
भगवान या उनके अवतारों का चरित्र-वर्णन।
उ.- कहौँ हरि-कथा सुनौ चित लाइ-३-१।
भगवान या उनके अवतारों के नाम या गुण का भजन या कीर्तन।।
अस्पृश्य जाति का सामूहिक नाम।
मृग जैसी सुंदर आँखोंवाली।
हिरन जैसी सुंदरआँखोंवाली।
'चित्रिणी' ,त्री जो कम सुकुमार, चंचल तथा क्रीड़ाशील प्रकृति की होती है (कामशास्त्र)।
उ.- (क) अतिहिं उठथौ अकुलाइ, डरथौ हरि-बाहन खग सौं-५८९। (ख) कद्रुज पैठि पताल दुरि रहे खगपति हरि-बाहन भए जाइ-२२२४।
उ.- तब लगि सेवा करि निश्चय सौं, जब लगि हरियर खेत-१-३२२।
हरापन लिये हुए, हरे रंग की आभा या कांतिवाला।
भादों के शुल्क पक्ष की तीज या तृतीया जब सौभाग्यवती स्त्रियाँ निर्जल व्रत रखकर शिव-पार्वती का पूजन करती हैं।
उत्तरी भारत का एक प्रसिद्ध तीर्थ जहाँ गंगा पहाड़ों को छोड़कर मैदान में आती है। 'हरिद्वार' नाम पड़ने का कारण यह विश्वास है कि इस तीर्थ के सेवन से विष्णुलोक का द्वार खुल जाता है।
सिंह या बाघ का नाखून। बच्चों को नजर से बचाने के लिए पहनायी जानेवाली वह ताबीज जिसमें बाघ या सिंह का नख बँधा हो।
उ.- कुटिल हरि-नख हिऎं हरि के -१०-१६९।
एक दैत्य जो प्रहलाद का पिता था।
हरिनाक्ष, हरिनाच्छ, हरिनाछ
आषाढ़ शुक्ल एकादशी जिस दिन विष्णु शेष-शेया पर (कार्तिक प्रबोधिनी एकादशी तक के लिए) सोते हैं।
एक सूर्यवंशी राजा जो त्रिशंकु के पुत्र थे और अपनी सत्यनिष्ठा के लिए प्रसिद्ध हैं।
श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न।
दूर करेंगे, हल्का करेंगे।
उ.- भूमि-भार येई हरिहें-१०-८५।
उ.- (क) हरी घास हूँ सो नहिं चरै-५-३। (ख) इतनी कहत सुकाग उहाँ तैं हरी डार उड़ि बैठथौ-९-१६४।
एक वर्णवृक्त जिसे 'अनंद' भी कहते हैं।
विष्णु या उनके अवतार राम-कृष्ण।
उ.- (क) हमारी तुमकौं लाज हरी-१-१८४। (ख) नाम बिना श्री स्याम हरी-१-११५। (ग) हरि-प्रभाउ राजा नहिं जान्यौ, कहथौ सैन मीहिं देहु हरी-१-२६८।
हरी घासग्यां हरे-भरे पेड़-पौधों का समूह या विस्तार।
(सं. हरित + अवलि, हिं. हरियाली)
मुहा.- हरियाली सूझना-चारो ओर आनंद ही आनंद जान पड़ना, संकट में भी विनोद, उमंग या प्रसन्नता की बातें सूझना।
एक प्रसिद्ध ग्रंथ जिसमें श्रीकृष्ण और उनके कुल का विस्तृत वर्णन मिलता है।
जंबू द्वीप के नौ खंडों में एक।
उ.- इलावर्त और किंपुरुष कुरु औ हरिवर्ष केतु-माल। हिरनमय रमनक भद्रासन भरतखंड सुखपाल-सारा. ३३।
उ.- सेसनाग के ऊपर पौढ़त तेतिक नाहिं बड़ाई-१-२१५।
(शेषनाग जैसे) सफेद रंगवाला।
ताश के तीन-तीन पत्तों से खेला जानेवाला एक तरह का जुआ।
(फ़ा. सेह = तीन + सर = बाजी)
चालबाजी, जालसाजी, छलकपट, धूर्तता।
(फ़ा. सेह = तीन + सर = बाजी)
(फ़ा. सेह = तीन + सर = बाजी)
चालबाजी या छल-कपट करनेवाला।
(शेषवतार) लक्ष्मण द्वारा, मारीच का 'हा लक्ष्मण' पद सुनकर और सीताजी को अकेली छोड़कर जाते समय, खीची गयी वह रेखा जिसको लाँघने का सीता जी को निषेध था और जिसके बाहर आ जाने पर ही उनको रावण हर सका था।
हिसार, रोहतल और करनाल का निकटवर्ती प्रदेश, बाँगड़।
हरियाना प्रदेश की बोली, बाँगड़ू।
हरेपन या हरे रंग का विस्तार।
(सं. हरित + अवलि, हिं. हरियाली)
सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र।
उ.-हरीचंद्र सो को जग दाता, सो घर नीच भरै-१-२६४।
हरे-भरे पौथों का समूह या विस्तार, हरियाली।
एक पेय जो दूध में मेवे-मसाले डालकर बनता है।
भारीपन का प्रभाव, हलकापन।
उ.- कर धनु लै किन चंदहिं मारि। तू हरुआय जाय मंदिर चढ़ि ससि सन्मुख दर्पन बिस्तारि।
उ.- आपु गए हरुंऎं सूनैं घर-१०-२८२।
इस प्रकार कि आहट न मिले, चुपके से।
उ.- (क) फिरि चितई, हरि दृष्टि गए परि, बोलि लए हरुऎं सूनैं घर-१०-३०१। (ख) बरजति है घर के लौगनि कौं, हरुऎं लै लै नाम-५१५। (ग) ना जानौं कित तें हरुए हरि आय मूँदि दिए नैन।
उ.-पौढ़ि गई हरुऎं करि आपुन अंग मोरि तब हरि जँभुआने- १०-१९७।
बेहुत हलके हाथ से, इस प्रकार कि जरा भी गति न हो।
उ.- दोउ जननी मिलि कैं हरुऎं करि, सेज सहित तब भवन लए री-१०-२४७।
उ.- दुहुँनि गोद अकूर लिए हँसि सुमनहुँ तें हरुवाई-२४९२।
उ.-ब्याकुल होत हरे ज्यौं सरबस-१-५०।
उ.- मैं तो जे हरे हैं, ते तौ सोवत परे हैं-४८४।
मुहा.- चित्त हरे- मन को लुभाया या आकर्षित किया। उ.- बिवि लोचन सु बिसाल दुहुँनि के चित-वत चित्त हरे-६८९।
उ.- (क) हरैं बोलि जुवतिनि कौं लीन्हौ-३८८। (ख) हरत लाल हिंडोल झूलत, हरैं देत झुलाइ-४९८।
उ.-हरैं हरैं बेनी गहि पाछैं, बाँधी पाटी लाइ-१०-३२२।
छीनता, खसोटता या लूटता है।
उ.- रिपु-तन-ताप हरै-१-११७।
मुहा.- प्रान हरैगो-जान ले लेगा। उ.- पिय को प्रेम तेरो प्रान हरैगो-२८७०।
लूटने, खसोसने या छीननेवाला।
सेना में सबसे आगे रहनेवाला सैनिक-दल।
लूट या छीन लूँ, हरण करूँ।
उ.- सूर प्रभु अनुमान कीन्हौं, हरौं उनके चीर-७८३।
उ.- सूरज सोच हरौं मन अबहीं, तौ पूतना कहाऊँ-१०-४९।
उ.- सेत हरौ, रातौ अरु पियरौ रंग लेत है धोई-१-६३।
उ.- मोसौं पतिल न और हरे-१-१९८।
(शब्द) जो ऊँ चा या तेज न हो।
(आघात, स्पर्श आदि) जो कठोर या तीव्र न हो।
उ.- मांडव रिषि जब सूली दियौ। तब सो काठ हरौ ह्वै गयौ-३-५।
सेना में सबसे आगे का सैनिक दल।
उ.- (क) हर्ता-कर्ता आपै सोइ-७-२। (ख) तुम हर्ता, तुम कर्ता-२५५८। (ग) तुमहीं कर्ता तुमही हर्ता और न कोई-१० उ.-२८।
भय या हर्ष से रोयों का खड़ा होना।
कामदेवँ के पाँच वाणों में एक।
उ.- कृष्न पच्छ रोहिनी अर्द्ध निसि हर्षन जोग उदार-१०-८६।
प्रसन्न या प्रफुल्लित होना।
उ.- (क) करुनासिंधु दयाल दरस दै, सब संताप हरथौ-१-१७। (ख) सूरदास प्रभु अंतर्यामी भक्त संदेह हरथो-१५५२।
लूटा, छीना, चुराया, हरण किया।
उ.- (क) बेष धरि-धरि हरथौ पर धन-१-४५। (ख) ढूँढ़ि-ढूढ़ि गोरस सब घर कौ, हरथौ तुम्हारैं तात-१०-२९०। (ग) सुनि सखी, सूर सरबस हरयौ सावरैं-१०-३०७। (घ) मदन मोहन रूप धरयौ। तब गरब अनंग हरयौ-६२३।
हर्र, हर्रा, हर्रे, हर्रै
उ.- बाइबिरंग बहेरा हरैं-१-१०८।
उ.- सीत-उष्न, सुख-दुख नहिं मानै, हर्ष-सोक नहिं खाँचे-१-८१।
भय या प्रसन्नता के कारण रोएँ खड़े होना या रोमांच होना।
संयोग श्रृंगार का एक संचारी भाव जिसमें प्रसन्नता या प्रफुल्लता से रोएँ खड़े हो जाते या मुख पर पसीना आ जाता है।
एक पौधा जिसकी फलियों की तरकारी बनती है।
उ.- कंचन मनि तजि काँचहिं सैंतत या माया के लीन्हे-१-१७७।
शुद्ध व्यंजन जिसके उच्चारण में स्वर न उच्चरित हो
जमीन जोतने का एक प्रसिद्ध यंत्र।
उ.- धर बिधंसि नल करत किरषि हल बारि बीज बिथरै-१-११७।
मुहा.- हल जोतना- (१) खेत में हल चलाना। (२) खेती करना। (३) देहाती या गँवार जैसा काम करना।
एक प्राचीन अस्त्र का नाम।
उ.- लख्यो बलराम यह सुभटवंत है कोऊ, हल-मुसल सस्त्र अपनो सँभारथो-१० उ.-४५।
मुहा.- हलक के नीचे उतरना- (१) (किसी बात का) मन में बैठना या असर होना। (२) (किसी बात का) ठीक या युक्तिसंगत जान पड़ना।
(पात्र में) भरे जल के हिलाने से उसका हिलना-डोलना या शब्द करना।
हिलोरें लेना, तरंग मारना।
बत्ती की लौ का झिलमिलाना।
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)
जो (रंग) गहरा या चटक न हो।
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)
जो (सर आदि) गहरा न हो, उथला।
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)
जो (दुःख-दर्द) जोर का न हो।
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)
जो (चोट) कठोर, ज्यादा या तेज न हो।
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)
जिसमें गंभीरता या बड़प्पन न हो, ओछा, तुच्छ।
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)
जिसमें कुछ भरा न हो, खाली।
(सं. लधुक, प्रा. लहुक, विपर्यय़ ‘हलुक’)
मुहा.- हलका करना - अपमानित करना। हलका काम- (१) ओछा या तुच्छ काम। (२) बुरा काम। हलका-भारी होना-लोगों की दृष्टि में ओछा बनना। हलका-भारी बोलना-खरी-खोटी सुनाना।
पशुओं (विशेषत: हाथियों) का झुंड।
(किसी काम के लिए नियत) मुहल्लों, गाँवों या कसबों का समह।
(बरतन में भरे) पानी को हिलाना डुलाना।
हलका होने का भाव, भार का अभाव।
तितर-बितर करना, छितराना, बिखराना।
पत्र या संदेश पहुँचानेवाला।
कपड़ा रँगते समय रँग चटक करने के लिए फिटकरी, हड़ आदि की पुट देना।
हिलने-डुलने की क्रिया या भाव।
हिलता-डोलता या डगमगाता हुआ।
हल या खेती से जीविकार्जन करनेवाला।
उ.- कर भटकत, चकडोरि हलति-६०१।
विवाह के (तीन या पाँच दिन) पहले वर-वधू के शरीर में हलदी-तेल लगाने की रीति, हलदी चढ़ना।
एक प्रसिद्ध पौधा जिसकी जड़ मसाले और रँगाई के काम आती है।
मुहा.- हलदी उठना या चढ़ना-विवाह के (तीन या पाँच दिन) पहले वर-वधू के शरीर में हलदी-तेल लगाने की रीति होना। हलदी लगना-विवाह होना। हलदी लगाकर बैठना- (१) कोई काम-धाम न करके एक जगह बैठा रहना। (२) घमंड, ऎंठ या अकड़ में फला रहना। कहा. हलदी लगे न फिटकरी रँग चोखा आ (हो) जाय- बिना कुछ खर्च या परिश्रम किये ही सारा काम बन जाय।
हल को धारण करनेवाला, किसान।
हल नामक अस्त्र को धारण करनेवाला, बलराम।
उ.-सुबल हलधर अरु श्रीदामा करत नाना रंग-१०-२१३।
बलराम (जिनके हाथ में 'हल' नामक अस्त्र रहता था)।
मुहा. हलफ उठवाना या देना-(ईश्वर को साक्षी करके) शपथ खिलाना या खाने को कहना। हलफ उठाना या लोना-(ईश्वर को साक्षी करके) शपथ खाना।
मुहा.- हलफ मारना-लहरें उठना, लहराना।
फारस की तरफ का एक देश जहाँ का शीशा प्रसिद्ध था।
मोटे दल का और बढ़िया (शीशा)।
भला बनने के लिए की गयी चाटुकारी की बात।
मुहा.- मुँह की हलभलई-भला बनने के लिए केवल मुँह से (दिल या जी से नहीं) कही गयी चाटुकारी की बात। उ.- मुँह की हलभलई मोहूँ सो करन आए, जिय की जासों, ताही सों, तुम बिनु सूनौं वाको गेहरा-२००१।
हलराना, हलरानो, हलरावना, हलरावनो
(बच्चों को प्यार-दुलार से) हाथ पर लेकर हिलाना-डुलाना या झुलाना।
(बच्चों को प्यार-दुलार से) हाथ पर लेकर हिलाती-डुलाती या झुलाती है।
उ.-गावति हलरावति कहि प्यारे-१०-४६।
उ.- नंद-जसोदा हरषि, हलरावैं-१०-४५।
उ.-(क) हलरावै, दुलराइ मल्हावै-१०-४३। (ख) जसोदा हलरावै अरु गावै-१०-१२८।
मुहा.- हलवा-माँड़े से काम-अपने लाभ या स्वार्थ से मतलब। हलवा निकालना-बहुत मारना-पीटना।
हल चलाने वाला नौकर या किसान।
उ.-सैन जानि तब ग्वाल जहाँ तहँ द्रुम द्रुम डार हलाए-१०८४।
उ.- यक सैंतत घर के सब बासन-१०५२।
सहेजती और सँभाल कर रखती है।
उ.-(क) सैंतति महरि खिलौना हरि के-७१२। (ख) धरति, सैंतति धाम बासन-९५०। (ग) महरि सबै नेवज लै सैंतति-१०१०।
इकट्ठ, एकत्र या संचित करना।
बिखरी हुई चीज को हाथ से समेटना।
सहेजना, सँभालकर या सावधानी से रखना।
चालीस से सात अधिक की संख्या।
(सं. सप्तचत्वारिंशत्, पा. सत्तचत्तालीसति, प्रा. सत्तालिस, हिं. सैतालीस)
उ.-कहा होत जल महा प्रलय को राख्यौ सैति सैति है गेह। भुव पर एक बूॅद नहिं पहुँची निझरि गए सब मेह।
उ.- (क) नीलाम्बर पीताम्बर लीन्हें, सैंति धरति करि ध्यान-५११। (ख) अपनो जोग सैंति धरि राखौ यहाँ देत कत डारे-३०११।
तीस से सात अधिक की संख्या।
(सं. सप्तत्रिंशत्, पा. सत्ततिंसति, प्रा. सत्तिंसइ, हिं. सैतीस)
उ.- इन्द्रजीत लीन्हीं जब सैंथी (पाठा, सक्ती) देवन हहा करथौ-९-१४४।
उ.- बेनी डोलति दुदूँ नितंब पर मानहुँ पूँछ हलावै-८७६।
वह प्रचंड विष जो समुद्र-मंथन करने पर सबसे पहले निकला था और जिसका पान शिव जी ने किया था।
उ.- भयौ हलाहल प्रगट प्रथमहीं मथत जब, रुद्र कैं कंठ दियौ ताहिं धारी-८-८।
उ.- घोरि हलाहल सुन री सजनी औसर तेहि न पियौ-२५४५।
बलराम (जिनका आयुध 'हल' कहा गया है )
जो हराम न हो, जो धर्मानुकूल हो
वह पशु जिसका माँस खाने का निषेध न हो।
मुहा.- हलाल करना- (१) (गला रेतकर) पशु की हत्या करना। (२) मार डालना। (३) ईमानदारी के साथ पूरा काम करना।
हलाल का-हराम का नहीं, ईमानदारी का।
मिठाई, अनाज, वस्त्र आदि वे वस्तुएँ जो विवाह के एक दिन पहले लड़की के यहाँ से लड़केवाले के यहाँ भेजी जाती हैं।।
हिले-डोले, चलायमान या कंपित हुए।
उ.-धीर चलत मेरे नैनन देखे तिहि छिन अंस हले-२७१२।
साफ करने के लिए पानी में लहर या तरंग उत्पन्न करना।
(धन आदि) दोनों हाथों से समेटना।
एक उपरूपक जिसमें एक ही अंक रहता है और नृत्य की प्रधानता रहती है।
मंत्र पढ़कर धी, जौ, तिल आदि अग्नि में डालने का धार्मिक कृत्य, होम।
उ.-होम, हवन, द्विज पूजा गनपति, सूरज, सक्र, महेस,-सारा. २३४।
अहुति डालने का चमचा, श्रुवा।
मुहा.- हलस पकाना-व्यर्थ की कामना करना। हवस पूरी करना-इच्छा पूरी करना। हवस पूरी होना-इच्छा पूरी होना। हवस रखना - (१) इच्छा करना। (२) इच्छा पूरी करना।
(साफ करने के लिए) पानी हिलाकर।
उ.- जल हलोरि गागरि भरि नागरि जबहीं सीस उठायौ-८४२।
व्यंजन का वह शुद्ध रूप जिसके साथ स्वर न उच्चरित हो।
मुहा.- हवा उड़ना-खबर फैलना। हवा उड़ाना-खबर या अफवाह फैलाना। हवा करना-पंखा हाँकना। (कोई चीज) हवा करना-चीज उडा देना या गायब कर देना। हवा के मुँह पर या रुख जाना- जिस ओर हवा बहती हो, उसी ओर जाना। हवा के घोड़े पर सवार होना- (१) बहुत जल्दी या उतावली में होना। (२) किसी प्रकार की उमंग या नशे में होना। हवा खाना- (१) शुद्ध वायु-सेवन के लिए बाग-बगीचे या खुली जगह में घूमना-फिरना या टहलना। (२) (किसी से कोई चीज न पाकर) विकल या वंचित होना। हवा गिरना- (१) तेज हवा का चलना बंद होना। (२) (किसी चीज के) तेज भाव का सस्ता हो जाना। हवा गाँठ में बाँधना-अनहोनी या असंभव बात के लिए परेशान होना। हवा पीकर या फाँककर रहना-बिना भोजन-पानी के रहना (व्यंग्य)। हवा बताना-(१) (कोई चीज न देकर) यों ही टाल देना। (२) किसी के मनोरंजन स्वार्थसिद् में बाधक होकर उसे दूर हटा देना। हवा बाँधना-(१) शेखी हाँकना, लंबी-चौड़ी बातें करना। (२) जोड़ जोड़कर झूठी बातें कहना। हवा पलटना, फिरना या बँधना- (१) हवा का रुख बदलकर दूसरी ओर चलने लगना। (२) हालत, दशा या स्थिति का बदल जाना। हवा भर जाना-खुशी या घमंड से फूल जाना। हवा बिगड़ना-(१) कोई भयंकर, छुतहा या संकामक रोग फैलना। (२) रीति या चाल खराब होना या बिगड़ना। (३) दशा या स्थिति खराब होना या बिगड़ना। हवा बिगाड़ना- (मार-पीट कर) दुर्दशा कर देना। दिमाग में हवा भर जाना-(१) बहुत घमंड या गर्व हो जाना। (२) बुद्धि ठिकाने न होना। हवा देना-(१) (आग) फूँकना। (२) हवा में रखना। (३) झगड़ा बढ़ाना। हवा-सा-बहुत ही महीन और हलका। हवा से बोतें करना- (१) बहुत तेज चलना या दौड़ना। (२) आप ही आप या व्यर्थ ही बहुत बोलना। हवा से लड़ना-किसी से अकारण झगड़ बैठना। हवा लगना-(१) हवा का झोंका पड़ना। (२) वात रोग से ह्रस्त होना। (३) बुद्धि ठीक न रहना। (४) सीधी-सादी बोतें छोड़कर नयी-नयी हानिकारिणी बात आदि सीख लेना। किसी की हवा लगना- किसी की संगत के प्रभाव से नयी या बुरी बातें सीखना। हवा हो जाना- (१) बहुत जल्दी या झटपट चले जाना। (२) बहुत जल्दी गायब या समाप्त हो जाना। कहीं की हवा खाना-कहीं जाना। कहीं की हवा खिलाना-(१) खूब घुमाना-फिराना। (२) कहीं भेजना।
उत्तम व्यवहार की साख, ख्याति या विश्वास।
मुहा.- हवा उखड़ना-(१) प्रसिद्धि या ख्याति न रह जाना। (२) साख न बनी रहना, विश्वास उठ जाना। हवा बँधना-कीर्ति, यश या ख्याति फैलना। (२) बाजारमें साख होना या विश्वास जमना।हवा बिगड़ना-पहले की सी धात, साख, मर्यादा या विश्वास न रह जाना।
जिसमें सत्य का आधार न हो, निर्मूल।
मुहा.- मुँह पर हवाई (बहु. हवाइयाँ) उड़ना-चेहरे का रंग बहुत फीका पड़ जाना।
वह स्थान जिसमें कैदी या अभियुक्त रखा जाता है।
मुहा.- किसी के हवाले करना-किसी को सौंपना। किसी के हवाले पड़ना या होना- (१) किसी को सौंपा जाना। (२) किसी के हाथ या चंगुल में आ जाना।
मुहा.- हवास गुम होना-होश या बुद्धि ठिकाने न रहना, कर्तव्य न सूझना।
वह द्रव्य या वस्तु जिसकी अग्नि में आहुति दी जाय।
उ.-(क) तर्फत नैन हृदय होमत हवि मन-बच-क्रम और नहिं काम-२२३०। (ख) सूर सकल उपमा जो रही यों, ज्यों होइ आवै कहत होमत हवि-२३१४।
जिसमें हवा आने के लिए काफी दरवाजे, खिड़कियाँ आदि हों।
घटना, प्रमाण आदि का उल्लेख।
कब्जा, सुपुर्दगी, अधिकार।
उ.-ऎसी बातनि झगरौ ठानो हो, मूरख तेरो कौन हवाला -१०३४।
जिसकी आहुति दी जाने को हो।
वह वस्तु जिसकी आहुति दी जाय।
वह सात्विक आहार जो यज्ञ, व्रत आदि के दिन किया जाय।
उ.-मोहन-मोहन कहि कहि टेरै कान्ह हवौ यहि बन मेरे-१८१३।
(देवताओं के लिए) हवन की सामग्री। (पितरों के लिए हवन-सामग्री 'कव्य' कहलाती है)।
हजरत के दो बेटों में एक जो लड़ाई में मारे गये थे और जिनका शोक शिया मुसलमान मुहर्रम में मनाते हैं।
जो सिंध देश में जन्मा या उत्पन्न हुआ हो।
जो सिंध देश से संबंधित हो।
है' या 'हो' का अव्यय रूप।
जिस पर लोग हँसते हों, हास्यास्पद।
नृत्य में हाथों की मुद्रा।
उ.- हस्तक भेद ललित गति लाई-१८२८।
वर- कन्या की कलाई में मंगल-सूत्र बाँधने की रीति।
हाथ में आया या मिला हुआ, हासिल, प्राप्त।
नृत्य, गायन आदि में हाथ से भाव बताने का ढंग।
उ.- थाके हस्त, चरन गति थाकी-१-२८७।
संगीत या नृत्य में हाथ से भाव बताना।
श्रीकृष्ण के एक पुत्र का नाम।
हथेली में पड़ी हुई रेखाएँ जिन्हे देखकर जीवन की मुख्य-मुख्य घटनाएँ बतायी जाती हैं।
हाथ की चालाकी, फर्ती या सफाई।
(संपत्ति आदि का) एक के हाथ से टूसरे के पास जाना।
एक के हाथ से दूसरे को मिला हुआ।
वह वस्तु या विषय जिसका अंग-प्रत्यंग (हथेयी पर लिये हुए आँवले के समान) स्पष्टतः ज्ञात हो सके।
डराना, दहलाना, भयभीत करना।
दहल गया, थर्रा गया, भयभीत हो गया।
उ.- मैं देखौं, इनको अब हतिहै, अति ब्याकुल हहरथो-२५५२।
मुहा.- किसी की क्या हस्ती है-क्या गिनती या ताकत है ?
डाह या ईर्ष्या करना, सिहाना।
उ.- घहरात, तरतरात, गररात, हहरात, थररात, झहरात माथ नाए-९४४।
वह प्रचीन नगर जो वर्तमान दिल्ली से उत्तरपूर्व २८ कोस पर स्थित था, जिसे हस्तिन नामक एक चंद्रवंशी राजा ने बसाया था और जो कौरवों की राजधानी था।
उ.-तब अक्रूर बैठि हरि के रथ हस्तिनपुर जु सिधारे-सारा. ५९१।
साहित्य में चार प्रकार की स्त्रियों में सबसे निकृष्ट जो लोभयुक्त और स्थूल शरीरवालीतथाआहार और कामवासना में सबसे अधिक कही गयी है।
उ.-मद के हस्ती समान फिरति प्रेम लटकी-१२००।
वह चंद्रवंशी राजा जिसने हस्तिनापुर को बसाया था।
उ.- बसत श्री सहित बैकुंठ के बीच गजराज की हाँक पै दौरि आए।
(गाड़ी, रथ, यान आदि) चलाता हूँ या है।
उ.-(क) (रथ) हाँकत हरि-१-२३। (ख) हाँकत हौं रथ तेरौ-१-२७२।
हाँकनहार, हाँकनहारा, हाँकनहारे, हाँकनहारो, हाँकन-हारो
उ.-अति कुबुद्धि मन हाँकनहारे, माया जूआ दीन्हौ-१-१८५।
चिल्लाकर पुकारना या बुलाना।
युद्ध में ललकारना या हुंकारना।
जानवरों को चलाना या इधर-उधर हटाना और भगाना।
उ.- इंद्रजीत लीन्हीं तब सक्ती देवनि हंहा करथौ-९-१४४।
गिड़गिड़ाने या दीनता प्रकट करने का शब्द।
मुहा.- हहा खाना-बहुत गिड़गिड़ाना।
गिड़गिड़ाहट के साथ, बिनती के स्वर में।
उ.- सूर स्याम कर जोरि मातु सौं गाइ चरावन कहत हहा रे-४२३।
स्वीकृति, सहमति या समर्थन सूचक शब्द।
एक शब्द जिससे यह सूचित हो कि पूछी गयी बात ठीक है।
मुहा.- हाँ करना-(१) राजी होना, स्वीकारहोना (२) ठीक मान लेना। हाँ नकरना- (१) राजी न होना। (२) ठीक न मानना। हाँ जी हाँ जी करना या बोलना अथवा हाँ में हाँ मिलाना- (१) किसी को प्रसन्न करने के उद्देश्य से दिना विचार किये ही उसके मन की बात करना या उसका समर्थन करना। (२) खुशामद या चापलूसी करना। उ,- स्वारथ मानि लेत रति करिकै बोलत हाँ जी हाँ जी- पृ. ३२३। हाँ नाहीं न करना - (१) न स्वीकार करना, न अस्वीकार ही; कोई उत्तर न देकर मौन रहना। उ.-हाँ नाहीं नहीं कहत हौ, मेरी सौं काहै-ना. ३१०५। (२) स्पष्ट उत्तर न देकर टाल देना। हाँ हाँ करना- (१) स्वीकृति या सहमतिसूचक शब्द कहना। (२) बात न काटना। (३) खुशामद या चापलूसी करना।
वह शब्द जिसके द्वारा किसी बात का अंशतः माना जाना सूचित हो।
मुहा.- हाँक देना, मारना या लगाना-जोर से पुकारना या बुलाना। हाँक दई-जोर से पुकारा या बुलाया। उ.-हार-चीर लै चले पराई। हाँक दई कहि नंद-दुहाई-७९९। दै दै हाँक-जोर से चिल्ला कर, कूक देकर या आवाज लगा कर। उ.- ग्वाल सखा सँग लीन्हें डोलत, दै दै हाँक जहाँ तहँ धावत- ना. २०५२। हाँक-पुकार कर कहना-निर्भय और निसंकोच रूप से सबको सुनाकर कहना। हाँक पड़ना या होना-पुकार या बुलाहट होना। हाँक परी-पुकार या बुलाहट हुई। उ.- भोर भयौ दधि-मथन होत सब ग्वालि-सखनि की हाँक परी-४०४।
युद्ध में दपट, ललकार या हुंकार।
उ.- (क) हाँकत हरि हाँक देत गरजत ज्यौं ऎंठे-१-२३। (ख) हाँक दै तुरत गज कौ हँकारे-ना. २६७२।
पंखे से हवा करना, पंखा झलना।
जंगली पशु को तीन ओर से घेर कर शोर करते हुए ऎसे स्थान पर लाना जहाँ से वह शिकारी का लक्ष्य बन सके।
पशुओं को आगे बढ़ाकर या इधर-उधर हटाकर।
उ.-(क) न्यारौ जूथ हाँकि ले अपनौ-१०-२१६। (ख) कोउ हाँकि सुरभि-गन जोरि चलावत-४३१।
उ.- अर्जुन कौ रथ हाँकौ-१-११३।
उ.- संध्या कौ आगम भयौ, ब्रज-तन हाँकौ फेरि-४३७।
उ.-(क) आतुर रथ हाँक्यो मधुबन कौ- ना. ३६११। (ख) हँसत हँसत रथ हाँक्यौ-२५४६।
मुहा.- हाँगा छूटना-हिम्मत न रहना।
सिंधवासियों का राजा जयद्रथ।
इस झील के पानी से बननेवाला नमक।
हाँपना, हाँपनो, हाँफना, हाँफनो
मेहनत करने दौड़ने आदि से जोर-जोर और जल्दी-जल्दी साँस लेना।
किसी की हँसी या उपहास करना।
मुहा.- हाँगी भरना-मानना, स्वीकार करना।
व्यथ इधर-उधर घूमनेवाला, आवारा।
बटलोई या देगची की तरह का मिट्टी का छोटा बरतन।
मुहा.- हाँडी उबलना-खुशी से फूलना या इत राना। हाँडी पकना-(१) बकवाद होना। (२) कुचक्र या षडयंत्र रचा जाना। हाँड़ी चढ़ना-कोई चीज पकना। किसी के नाम पर हाँड़ी फ़ोड़ना-किसी के चले जाने पर प्रसन्न होना। काठ की हाँडी-ऎसा छल जो बार बार न चल सके।
इसी आकार का शीशे का पात्र जिसमें शोभा के लिए मोमबत्ती जलायी जाती है।
हँसने की क्रिया या भाव, हँसी, हास।
उ.-(क) दुख अरु हाँसी सुनौ सखी री, कान्ह अचानक आए-७९४। (ख) सूर स्याम कौ यहै परेखौ, इक दुख दूजे हाँसी-ना. ४६६१।
दिल्लगी, मजाक, हँसी-ठट्ठा, परिहास।
उ.- (क) हाँसी मैं कोउ नाम उचारै-६-४। (ख) पठै देहु मेरे लाल लड़ैतैं बारौं ऎसी हॉसी-ना. ३७९७। (ग) प्रान हमारे घात होत हैं तुम्हरे भाऎं हाँसी- ना. ४२२५। (घ) हमरौ प्रान घात ह्वै निसरैं तुम्हरे जानैं हाँसी-ना. १९७। (परि.)। (ङ) सूरदास प्रभु बेगि मिलहु अब पिसुन करत सब हाँसी- ना. ४७६५।
उ.- (क) यह तौ कथा चलैगी आगैं, सब पतितनि मैं हाँसी-१-१९२। (ख) ऐसी बातैं बहुतै कहि कहि लोग करत हैं हाँसी- ना. ३९९३। (ग) हाँसी होन लगी है ब्रज मैं जोगहिं राखौ गोई-ना. ४१६०। (घ) देस देस भयौ रहस सूर प्रभु जरासंध सिसुपाल की हाँसी-ना. ४८०२।
स्वीकृति, समर्थन या सहमति सूचक शब्द।
मना करने या रोकने अथवा निषेध या वारण करने का शब्द।
उ.- हा करुनामय कुंजर टेरयौ, रह्यौ नहीं बल थाक्यौ-१-११३।
उ.- जारत है मोहिं चक्र सुदरसन हा प्रभु लेहु बचाई-९-७।
आश्चर्य या प्रसन्नतासूचक शब्द।
हर बात का तुरंत और उचित उत्तर देनेवाला।
चट-पट उपयुक्त उत्तर देने की निपुणता।
उ.- भक्तनि हाट बैठि अस्थिर ह्वै हरि-नग निर्मल लेहि-१-३१०।
मुहा.- हाट करना- (१) दूकान लगाकर बैठना (२) सौदा लेने के लिए बाजार जाना। हाट की बेचन हारि (बेचनहारी)-हाट बाजार में सामान बेचनेवाली जिसे अपनी मान-मर्यादा का अधिक ध्यान न हो। उ.-ब्रज की ढीठी गुवारि, हाट की बेचनहारि, सकुचै न देत गारि झगरत हूँ-१०-२९५। हाट-बाजार करना-खरीदारी करना। हाट खोलना-(१) दूकान खोलना। (२) सौदा सामने रखना, दूकान लगाना। हाट लगना-बाजार में दूकानें लगना। हाट चढ़ना-बाजार में बिकने के लिए आना। हाट का दिन-(स्थान-विशेष में) जिस दिन बाजार लगता हो।
उ.- (क) किंकिनी कलित कटि हाटक रतन जटि-१०-१५१। (ख) फाटक दैकै हाटक माँगत भोरौ निपट सुधारी-३३४०।
शोक, दुख, पीड़ा आदि का सूचक शब्द।
उ.- भवन न भावै माई, आँगन न रह्यौ जाइ, करै हाइ हाइ देखौ जैसो हाल करयौ है-८७२।
तीव्र इच्छा या उत्कट लालसा रखनेवाला।
(हिं. हाही = तीव्र इच्छा)
चारों ओर से घिरा या बँघा हुआ।
उ.-ऊधौ दीनी प्रीति दिनाई। बातनि सुहृद, करम कपटी के, चले चोर की हाई।
बच्चों को डराने के लिए कल्पित भयानक चीज।
उ.- खेलन दूरि जात किन कान्हा। आज सुन्यौ बन हाऊ आयो तुम नहिं जानत नान्हा।¨¨¨¨¨। तब हँसि बोले कान्हा, मैया, कौन पठाए हाऊँ-१०-२२१।
मुहा.- हाजत में देना या रखना-हवालात में रखना।
भोजन पचने की क्रिया या पचाने की शक्ति।
मुहा.- हाजमा बिगड़ना-अन्न न पचना।
उ.-रिषि दधीचि हाड़ लै दान।¨¨¨¨¨¨¨। लिए हाड़ कियौ बज्र बनाइ-६-५।
तराजू का धड़ा करना, तराजू के दोनों पलड़े बराबर करना।
उ.- बालि जीति जिन बलि बंधन किये लुब्धक कैसी हातनि (पाठा. की सी घातनि) -ना. ४१६७।
एक प्राचीन अरब सरदार जो बड़ा दानी और परोपकारी था।
अलग या दूर किया हुआ, हटाया हुआ।
उ.-(क) छीरोदक धूँधट हातौ करि सन्मुख दियौ उधारि-ना. २७३६ (ख) कतहिं बकत है काम-काज बिनु, होहि न हथाँ तैं हातौ-ना. ४३२४।
उ.-तब नहिं निमिष बियोग सहत उर, करत काम नहिं हातौ-ना. ४५५१।
उ.-बाहर हेत हातो (पाठा. हितू) कहवावत, भीतर काज सयाने- ना. ४६२६।
उ.-(क) कुंज भवन कुसुमन की सेज्या अपने हाथ निवारत पात-१८९३। (ख) हृदय सिंगी, टेर मुरली, नैन खप्पर हाथ-ना. ४३१२।
मुहा.- हाथ आना (में आना) (१) मिलना, प्राप्त होना। (२) अधिकार या वश में आना। हाथ कछू नहिं आयौ-कुछ मिल न सका, प्राप्त नहीं हुआ। उ.-चाखन लाग्यौ, रुई उड़ि, हाथ कछू नहिं आयौ-। काहूँ हाथ न आवै-किसी के वश या अधिकार में नहीं आता। उ.- सूर स्याम अति करत अचगरी, कैसैंहुँ काहू हाथ न आवै-ना.। (किसी को) हाथ उठाना-सलाम या प्रणाम करना। (किसी पर) हाथ उठना-किसी को मारन-पीटने को तैयार होना। (किसी पर) हाथ उठाना-किसी को मारना-पीटना। हाथ उठाकर देना - अपनी खुशी से देना। हाथ उठाकर कोसना - किसी के अनिष्ट की ईश्वर से प्रार्थना करना। हाथ उठाकर कहना - ईश्वर को साक्षी करके प्रण करना। हाथ उतरना- (१) हाथ की हड्डी उखड़ जाना। (२) हाथ में पहले जैसी कारीगरी या कार्य-क्षमता न रह जाना। हाथ ऊँचा होना- (१) दान करने को प्रवृत्त होना। (२) देने या खर्च करने योग्य होना। हाथ छोड़ना- हाथ फैलाना, लेना, माँगना, याचना करना। हाथ कट जाना- (१) साघन या सहायक के अभाव से कुछ करने लायक न रह जाना। (२) प्रतिज्ञा, वचन आदि से बद्ध होने के कारण कुछ करने को स्वच्छंद न रह जाना। हाथ कटा देना- (१) साधन या सहायक खो कर अपने को कुछ कर सकने योग्य न रखना। (२) वचन, प्रतिज्ञा आदि करके अपने को कुछ कर सकने को स्वच्छंद न रखना। हाथ करना- वार या प्रहार करना। हाथ का झूठा- चोर, बेईमान। हाथ का दिया- (खुशी से) दिया। हुआ, प्रदत्त। हाथ का सच्चा- (१) ईमानदार। (२) ऐसा वार करनेवाला जो खाली न जाय। (३) ऐसा काम करनेवाला जिसमें भूल-चूक न हो। हाथ का (की) मैल- बराबर हाथ में आता-जाता रहनेवाला, ऐसी तुच्छ या साधारण चीज जिसके जाने का जरा भी दुख करना उचित न हो। किसी के हाथ की चिट्ठी या पुरजा- स्वयं उसी का लिखा हुआ अर्थात् प्रामाणिक लेख। हाथ की लकीर- (१) हथेली, में पड़ी हुई रेखाएँ जिनका शुभाशुभ फल भोगना ही पड़ता है। (२) किस्मत, भाग्य। हाथ के तले (नीचे) आना- इस प्रकार काबू या वश में आना कि मनचाहा कराया जा सके। हाथ खाली जाना- (१) वार चूकना, प्रहार या लक्ष्य ठीक न होना। (२) चाल या युक्ति सफल न होना। खाली हाथ- बिना कुछ लिये। हाथ खाली होना- पास में रूपया-पैसा न होना। (किसी स्त्री के) हाथ खाली होना- (१) हाथ में चूड़ियाँ न होने से स्त्री का विधवा होना। (२) हाथ में कोई भी गहना न होना। (स्त्री के) हाथ खाली लगना- हाथ में बहुत ही हलका गहना या चूड़ी होना। (स्त्री के) खाली-खाली हाथ- हाथ में कोई भी गहना न होना। हाथ खाली न होना- फुरसत न होना, काम में फँसा होना। (स्त्री के) हाथ खाली न होना- हाथ में अच्छे खासे या काफी गहने पहने होना। हाथ खुजलाना- (१) मारने को जी करना। (२) (कुछ धन आदि) मिलने या प्राप्त होने के लक्षण दिखायी देना। हाथ खींचना- (१) कोई काम करते-करते उससे अलग हो जाना। (२) खर्च आदि देते-देने बंद कर देना। हाथ खुलना- (१) देने या दान में प्रवृत्त होना। (२) खूब खर्च करना। हाथ खोलना- (१) बहुत देना या दान करना। (२) खूब खर्च करना। (किसी का) हाथ गरम करना- (१) किसी प्रकार की आर्थिक प्राप्ति कराना। (२) किसी को घूस आदि देना। (किसी का) हाथ गरम होना- (१) किसी प्रकार की आर्थिक प्राप्ति होना। (२) खूब घूस मिलना। (किसी का) हाथ चढ़ना या चढ़ा होना- विशेष कार्य क्षमता या कौशल होना। (किसी के) हाथ चढ़ना- (१) मिलना, प्राप्त होना। (२) वश या अधिकार में होना। हाथ चलना-(१) गति या कौशल से काम होना। (२) मारने के लिए हाथ उठना। हाथ चलाए-हाथ से प्रहार किया। उ.-सौयौ हुतौ असुर तरु छाया। हलधर कौं देख्यौ तिन आए। हाथ दोऊ बल करि जु चलाए-४९९। हाथ चलाना- (१) गति या कौशल से काम करना। (२) मारने के लिए सैयार होना। (३) किसी वस्तु को छूने या लेने के लिए हाथ बढ़ाना। हाथ चूमना-किसी की करीगरी या कला-निपुणता पर इतना मुग्ध होना कि उसके हाथ को प्यार करने को ललक उठना। हाथ का चालाक-(१) फुर्ती से दूसरे की चीज उड़ा लेनेवाला। (२) किसी काम में हाथ की सफाई या कारीगरी दिखानेवाला। हाथ की चालाकी-(१) फुर्ती से दूसरे की चीज उड़ा लेने का कौशल। (२) किसी काम में हाथ की सफाई, कारीगरी या कौशल। हाथ चाटना- (१) सब कुछ खाकर भी तृप्त न होना। (२) बहुत स्वादिष्ट लगना। हाथ छोड़ना- (कोई काम किसी को) सौंपना। (किसी पर) हाथ छोड़ना-मारना, प्रहार करना। हाथ जड़ना-थप्पड़ मारना। (किसी को) हाथ जोड़ना-प्रणाम या नमस्कार करना। (२) (कृपा के लिए) अनुनय-विनय करना। (३) (ईश्वर या देवी-देवता) की बिनती या प्रार्थना करना। (४) दूर रहने का निश्चय करना। दूर से हाथ जोड़ना-बिलकुल दूर या अलग रहना किसी प्रकार का भी संबंध न रखना। हाथ जोड़े रहना-सेवक या दास-भाव से विनीत या नम्र रहना। रहत हाथ जोरैं-दास या सेवक की तरह नम्र या विनीत बना रहता है। उ.- प्रात जो न्हात, अघ जात ताके सकल, ताहि जमहूँ रहत हाथ जोरैं-१-२२२। हाथ जूठा होना- मुँह का स्पर्श होने से हाथ का अपवित्र हो जाना। (किसी काम में) हाथ जमना-ऎसा अभ्यास होना कि हाथ ठीक-ठीक चला करे। हाथ झाड़ना-खूब मारना, प्रहार करना। हाथ झुलाते आना-खाली हाथ आना। हाथ झाड़ देना- (१) मार बैठना। (२) कह देना कि कुछ भी पास नहीं है। हाथ झाड़ कर खड़े हो जाना-। (१) कह देना कि कुछ भी पास नहीं है। (२) बिलकुल अलग हो जाना। हाथ टेकना-लहारा देना। हाथ डालना- (१) कोई काम करना, काम में योग देना। (२) दखल देना, हस्तक्षेप करना। हाथ तंग होना- पास में कुछ न होना। हाथ तकना-दूसरे के देने के सहारे होना, दूसरे से सहारा चाहना। हाथ थिरकना-हाथ का हिलना या मटकना। हाथ थिरकाना-(बोलने में या नृत्य करते समय) हाथ मटकाना या हिलाना-डोलाना। हाथ दिखाना- (१) भावी शुभाशुभ जानने के लिए सामुद्रिक जाननेवाले से हस्तरेखाओं का विचार कराना (२) वैद्य को नाड़ी दिखाना। (३) धन आदि से रहित होने का संकेत करना। (४) हाथ से किसी बात का संकेत करना। हाथ दिलाना या दिवाना-(१) दूसरे से पिटवा देना। (२) भूत-प्रेत की बाधा शांत करने या वजर झड़वाने के लिए सयाने से हाथ फिरवाना। हाथ दिखावति डोलति-भूत-प्रेत की बाधा दूर करने या नजर झड़वाने के लिए सयानों या बूढ़ों से हाथ फिरवाती है। उ.-घर-घर हाथ दिवावति डोलति गोद लिए गोपाल बिनानी- १०-२५८। हाथ देखना- (१) सामुद्रिक का शुभाशुभ विचार करना। (२) वैद्य का नाड़ी देखना। (किसी के) हाथ देना-मारना-पीटना। (किसी को) हाथ देना-(१) सहारा देना, सहायक होना। (२) कार्य में सहयोग देने के लिए हाथ मिला कर समझौता करना या एक प्रकार से वचनबद्ध होना। (३) गुप्त रूप से सौदा तै करना। (४) हाथ के संकेत से रोकना या मना करना। (५) बाजी लगाना। हाथ देना-(१) हाथ के झोंके से दिया बुझाना। (२) भूत प्रेत की बाधा पर विचार करना। (किसी का) हाथ धरना- (१) कोई काम करने या अधिक देने से रोकना या मना करना। (२) किसी को सहारा देना। (३) सहारा या आश्रय देना। (४) किसी चलते हुए कार्य को रोकने पर विवश होना। हाथ पर गंगाजली धरना या रखना- गंगा की शपथ खिलाना। हाथ पर गंगाजली उठाना या लेना-गंगा की शपथ खाना। हाथ पर नाग खिलाना प्राण संकट में डालना। हाथ पर हाथ धरे या रखकर बैठे रहना-कुछ काम-धंधा ना करके खाली बैठे रहना। हाथ पर हाथ धरकर या रखकर बैठ जाना-निराश होकर काम छोड़ बैठना। हाथ पर हाथ मारना- (१) बाजी लगना, शर्त बदना। (२) किसी बात को पक्का करना। (किसी के आगे) हाथ पसारना या फैलाना-किसी से माँगने या कुछ लेने के लिए हाथ बढ़ाना। हाथ पसारे-माँगने या याचना करने के लिए हाथ फैलाये। उ.- तष्ना हाथ पसारे निसि दिन पेट भरे पर सोऊ-१-१८६। हाथ पसारे जाना-खाली हाथ जाना, परलोक में कुछ साथ न ले जाना। हाथ-पाँव (पैर) चलना-काम करने की सामर्थ्य, शक्ति या क्षमता होना। हाथ-पाँव (पैर) चलाना-काम-धंधा करना। (२) यत्न करना। हाथ-पाँव (पैर) जोड़ना-बहुत गिड़गिड़ाना, अनुनय-विनय करना। हाथ-पाँव (पैर) टूटना- (१) अंग-भंग होना। (२) शरीर में पीड़ा होना। हाथ-पाँव (पैर) ठंढे होना-(१) शरीर में गर्मी न रह जाना, मरणासन्न होना। (२) भय, आशंक आदि से ठक या स्तब्ध हो जाना। हाथ-पाँव (पैर) तोड़ना- (१) अंग-भंग कर लेना। (२) बहुत मारना पीटना। हाथ-पाँव (पैर) निकलना-सामान्य शरीर का मोटा-ताजा या लंबा हो जाना। हाथ-पाँव (पैर) निकालना- (१) नटखटी या शरारत करने लगना। (२) छेड़छाड़ करना (३) सीमा का अतिक्रमण करना। हाथ-पाँव (पैर) फूलना-डर या भय से इतना घबरा जाना कि कुछ कर न सके। हाथ-पाँव (पैर) बचाकर काम करना- इस प्रकार काम करना कि अपने को किसी तरह की हानि न पहुँचे। हाथ-पाँव (पैर) पटकना- (१) जी जान से कोशिश करना। (२) बहुत छटपटाना। (३) तैरने के लिए हाथ-पैर चलाना। हाथ-पाँव (पैर) मारना या हिलाना- (१) तैरने के लिए हाथ-पैर चलाना। (२) बहुत कोशिश या प्रयत्न करना। (३) दुख या पीड़ा से छटपटाना या तड़पना। (४) मेहनत या परिश्रम करना। हाथ-पाँव (पैर) से छटना-सहज में और सकुशल (स्त्रीका) प्रसव होना। हाथ-पाँव (पैर) हारना- (१) हिम्मत या साहस छोड़ना। (२) निराश होना। हाथ-पाँव (पैर) पीले पड़ना- इतना दुर्बल हो जाना कि शरीर में बहुत कम रक्त रह जाय। हाथ पीले करना- (विवाह के समय हलदी लगाने की रीति करके) कन्या का विवाह करना। (२) किसी प्रकार की तंगी या परेशानी से कन्या का विवाह कर पाना। हाथ-पाँव (पैर) फेंकना-बहुत कोशिश या मेहनत करना। हाथ फेंकना- (१) मारने क्रो हाथ चलाना। (२) वार या प्रहार करना। हाथ फेरना- प्यार से शरीर सहलाना। (किसी वस्तु पर) हाथ फेरना-सफाई या चालाकी से वह वस्तु उड़ा लेना या गयब कर देना। हाथ बँटाना-सहयोग देना। हाथ फैलना- (१) माँगने को हाथ बढ़ना। (२) लेने को हाथ बढ़ना। हाथ फैलाना-(२) माँगने को हाथ बढ़ाना। (किसी काम में) हाथ बँटाना-शामिल या सम्मिलित होना। हाथ बंद होना- (१) पास में रुपया-पैसा न होना। (२) रुपया-पैसा देने का क्रम रोकना। हाथ बढ़ाना- (१) कुछ लेने को हाथ फैलाना। (२) कुछ माँगने को हाथ फैलाना। (३) हद से बाहर जाना। हाथ बाँधकर खड़ा होना। (१) हाथ जोड़कर खड़ा होना। (२) सेवा में उपस्थित रहना। (३) कोई काम न करके खाली खड़े रहना। (किसी के आगे) हाथ बाँधे खड़े रहना-सेवा में पस्थित रहना। (किसी के) हाथ बिकना- (१) किसी को मोल ले कर दिया जाना। (२) उसके वश या अधिकार में होना। (किसी व्यक्ति का किसी के) हाथ बिकना- (१) किसी का खरीदा गुलाम या दास होना। (२) किसी के बिलकुल अधीन होना। उन हाथ बिकानी-उनके हाथ बिक गयी, उनके अधीन हो गयी, उनके वश या अधिकार में हो गयी। उ.- मैं उन तन उन मो तन चितयो, तब हीं तैं उन हाथ बिकानी- ना. २००३०। हाथ बिकानौ- किसी के वश या अधिकार में अथवा अधिन हो गया या है। उ.- (क) तदपि सूर मैं भक्तबछल हैं, भक्तनि हाथ बिकानौ-१-२४३। (ख) सूरदास भगवंत भजन बिनु जम कैं हाथ बिकानौ-१९-३२९। किसी के हाथ बेचना-मूल्य लेकर देना। (किसी काम में) हाथ बैठना-ऎसा अभ्यास होना कि हाथ बराबर ठीक तरह से काम करे। (किसी पर) हाथ बैठना- (१) जोर का थप्पड़ लगना। (२) वार खाली न जाना। हाथ भर आना-काम करते-करते हाथ का थक जाना। हाथ भरना-हाथ में रंग या महावर लगना। (किसी के) हाथ भरे होना- खाली या बेकार न होना, काम में व्यस्त होना। (स्त्री के) हाथ भरे होना- (१) स्त्री का हाथ में चूड़ी पहने रहने से सौभाग्यवती होना। (२) स्त्री के हाथ में कई या (हाथ के) सब गहने होना। किसी के हाथ भेजना-किसी के द्वारा भेजना। हाथ मँजना-अभ्यास होना। हाथ माँजना-निरंतर अभ्यास करना। हाथ मलना- (१) भूल-चूल होने पर पछताना। (२) निराश या दुखी होना। हाथ मारना- (१) बात पक्की करना। (२) बाजी लगाना। (३) (होड़ या स्पर्धा आदि में) आगे बढ़ जाना या जीत जाना। (किसी वस्तु पर) हाथ मारना- (१) बेईमानी से ले लेना। (२) सफाई से उड़ा देना गायब करना (भोजन पर) हाथ मारना-खुब डट कर खाना। हाथ मारे जात-(होड़ या स्पर्धा में) आगे बढ़ा या जीता जाता है। उ.- मेरी जोरी है श्रीदामा, हाथ मारे जात-१०-२१३। हाथ मिलाना-(१) भेंट होने पर सप्रेम या सहर्ष हाथ में हाथ लेना। (२) पंजा लड़ाना। (३) संपर्क या संबंध स्थापित करना। (४) सौदा पटाना। (५) एकमत होना। हाथ मींजना या मींड़ना- (१) भूल चूक होने पर पछताना। (२) निराश या दुखी होना। मींड़त हाथ-दुख या निराशा प्रगट करता है, या करते हैं। उ.- मींड़त हाथ, सीस धुनि ढोरत, रुदन करत नृप पारथ-१-२८७। हाथ में करना- (१) वश में या अधिन करना। (२) ले लेना, प्राप्त करना। (मन) हाथ में करना-प्रेम में फँसाना, लुभाना, मुग्ध या मोहित करना। हाथ में गंगाजली देना-गंगा की शपथ खाने को कहना या खिलाना। हाथ में गंगाजली लेना-गंगा की शपथ खाना या खाने को तैयार होना। हाथ में ठीकरा देना -भीख मँगवाना। हाथ में रा लेना-भीख माँगने लगना। हाथ में पड़ना- (१) मिलना, प्राप्त होना। (२) वश या आधिकार में होना। हाथ में लाना- (१) ले लेना, प्राप्त करना। (२) वश में या अधीन करना। हाथ में लेना-(१) ग्रहण या स्वीकार करना। (२) वश में या अधीन करना। (३) (काम) हाथ में लेना-काम का भार अपने ऊपर लेना, काम करने को सहमत होना। हाथ में हाथ देना- (१) कन्या का विवाह करना। (२) हेल-मेल कराना। हाथ में होना- (१) पास होना। (२) अपने वश में या अधीन होना। जीवन जाकैं हाथ (है)-जिसके हाथ में या जिसकी दया पर यह जीवन है। उ.- परम दयालु कृपालु है, (रे) जीवन जाकें हाथ-1-325। हाथ हाथ में गुन या हुनर होना- किसी बात में बहुत कुशल या निपुण होना। हाथ रँगना- (१) हाथ में मेंहदी रचाना। (२) किसी बुरे काम का कलंक अपने ऊपर लेना। (२) घूस या रिशवत लेना। (किसी के खून सै) हाथ रँगना-किसी का वध या हत्या करना। रँगे हाथ (हाथो) पाया जाना-कोई अपराध करते समय ही पूरे प्रमाण के साथ देख लिया जाना। हाथ रह जाना- (१) हाथ का सुन्न या गतिहीन हो जाना। (२) हाथ का थक जाना। (३) हाथ का रुक जाना। पचना या पचिबौ हाथ रहना-व्यर्थ परिश्रम करके हैरान होना ही मिलेगा, सारा परिश्रम नष्ट हो जायगा। हाथ रहैगी पचिबो-व्यर्थ परिश्रम करके हैरान होना पड़ेगा, सारा श्रम नष्ट हो जोयगा। उ.- अंतर गहत कनक-कामिनि कौं, हाथ रहैगो पचिबौ-१-५९। पछताना या पछतावा हाथ रहैगा -बहुत श्रम करने पर भी सफालना या यश न मिलकर पछताना ही होगा। हाथ रोकना- (१) किसी काम का करना बंद या स्थगित कर देना। (२) ठीक से या सामान्य गति से काम न करने देना। (३) स्वंयं किसी को मारने के लिए हाथ उठाकर ही रह जाना या रुक जाना। (४) खर्च करते समय आगापीछा सोचना, पूर्व गति से, अँधाधुंध खर्च न करके, सम्हालकर करना। (५) जो मारने की हाथ उठा रहा हो, उसे रोकना या मना करना। हाथ रोपना-माँगन के लिए हाथ बढ़ाना या फैलाना। हाथ लगना- (१) छू जाना। (२) शुरू होना। कोई वस्तु हाथ लगना- (१) कुछ मिलना या प्राप्त होना। (२) गणित करते समय वह संख्या जो पूर्व संख्या ले लेने पर बचतीं है, बाकी बचना। (किसी काम में) हाथ लगना-शुरु या आरंभ होना। (काम में किसी का) हाथ लगना- किसी के द्वारा किया जाना। (किसी वस्तु में) हाथ लगना- छू जाना। (किसी काम में) हाथ लगाना-(१) शुरु या आरंभ करना। (२) काम करने में योग या सहायता देना। (किसी वस्तु में) हाथ लगाना-छूना, स्पर्श करना। लगे हाथ (हाथों) -कोई काम करते समय या जैसे हीउसे पूरा कर लिया जाय वैसे ही;समाप्तप्राय कार्य के साथ-साथ। हाथ लगे टूटना-इतना कोमल या मुलायम होगा कि स्पर्श मात्र से टूट जाय। हाथ लगे मैला होना-इतना स्वच्छ होना कि केवल स्पर्श से मैला हो जाना हाथ सधंना-धीरे-धीरे अभ्यास हो जाना। हाथ साधना- (१) कोई काम करके यह देखना कि आगे भी वह या वसा ही कार्य हो सकता है या नही। (२) किसी कार्य में निपुण होने के लिए बार-बार अभ्यास करना। हाथ साफ करना-किसी कार्य में कुशल होने के लिए बार-बार अभ्यास करना। (किसी पर) हाथ साफ करना-किसी को मारना-पीटना। (किसी वस्तु पर) हाथ साफ करना- (१) बेइमानी से लेना। (२) हाथ की सफाई या फुर्ती दिखाकर गायब कर देना या उड़ा लेना। (भोजन पर) हाथ साफ करना-खूब डटकर खाना। (किसी के) सिर पर हाथ रखना- (१) किसी की रक्षा का भार लेना। किसी को आश्रय या शरण में लेना। (२) किसी को आशीवार्द देना।
(३) किसी की कसम खाना। (अपने) सिर पर हाथ रखना- अपनी कसम खाना। हाथ से-मारफत
द्वारा। हाथ से जाना या निकल जाना- (१) अपने पास न रहना। (२) वश में या अधीन न रह जाना। हाथ से हाथ मिलाना- अपने हाथ से किसी के हाथ में कुछ देना या रखना। हाथ हिलाते आना - (१) बिना कुछ लिये लौटना। (२) बिना कार्य सिद्ध किये हुए लौटना। हाथ (या हाथों)। में चाँद आना-मनचाही वस्तु मिलना। (स्त्री के) हाथ (या हाथों में) चाँद आना-पुत्र उत्पन्न होना। हाथ में रखना- बड़े लाड़-प्यार या आदर-सम्मान से रखना। हाथो-हाथ - (१) एक के हाथ से दूसरे के हाथ में
हर समय किसी न किसी के हाथ में। (२) एक के हाथ से दूसरे के
दूसरे से तीसरे के होते-होते। हाथों हाथ उड़ जाना- (१) एक के हाथ से दूसरे के और दूसरे से तीसरे के पहँचते-पहँचते गायब हो जाना। (२) बहुत जल्दी बिक जाना। हाथों-हाथ बिक जाना -बहुत जल्दी बिक जाना। हाथों-हाथ रहना-बहुत प्यार दुलार से रखा जाना। हाथों-हाथ लाना-बहुत आदर-सत्कार से लाना। हाथों हाथ लेना-बहुत आदर-सम्मान से स्वागत करना।"
मुहा.- हाथ भर का कलेजा होना- (१) बहुत खुशी या प्रसन्नता होना। (२) बहुत उत्साह होना। (३) बहुत साहस की आवश्यकता होना।
हाथ के खेलों में हर खिलाड़ी के खेलने की बारी या दाँव।
किसी कार्यालय आदि में काम करने बाले आदमी।
हथेली की पीठ पर पहनने का एक गहना।
मुहा.- हाथहिं आए-पकड़ में आये हैं। उ.- निसि बासर मोहिं बहुत सताए अब हरि हाथहिं आए-१०-२९७।
किसी औजार या हथियार का दस्ता या मूठ।
पंजें की छाप जो मंगल या पूजन के अवसरों पर हलदी, ऎंपन आदि से दीवाल पर बनायी जाती है।
उ.-घर घर देतिं जुवतिजन हाथा- ना. १५१३।
मुहा.- तुम्हरे हाथा-तुम्हारें ही हाथ में है तुम पर ही निर्भर है। उ.- हमरी पति सब तुम्हारे हाथा-७९९।
वह लड़ाइ-भिड़ाइ जिसमें नोचने, खसोटने, थप्पड़ और ठोकर देने के लिए हाथ-पैर का खूब काम लिया जाय।
एक हाथ से दूसरे हाथ में, हाथोंहाथ।
उ.-(तब) धाइ धायौ अहि जगायौ, मनौ छूटे हाथियाँ-५७७।
एक प्रसिद्ध चौपाया, गज, करि।
(सं. हस्तिन् ; हस्ती ; प्रा. हत्थी)
उ.- सुनत पुकार परग आतुर ह्वै, दौरि छुड़यौ हाथी-१-११२।
मुहा.- हाथी जैसा या सा-बहुत मोटा या स्थूल-काय। हाथी पर चढ़ना-बहुत धनी होना। हाथी बाँधना (१) बहुत अमीर होना। (२) ऎसे व्यक्ति को साथ लेना या ऎसा काम करना जिसके लिए बहुत अधिक व्यय करना पड़े। हाथी के संग गन्ने या गाँड़े खाना-किसी का अपने से इतने बड़े की बराबरी करने का दुस्साहस करना जिसके साथ किसी प्रकार की तुलना ही न हो।
भीम के हाथी-भीमसेन के द्वारा आकाश में फेंके गये वे सात हाथी जिनके संबंध में प्रसिद्ध है कि वे आज तक वहीं चक्कर लगा रहे हैं।
उ.- अब मन भयौ भीम के हाथी, सुनियत अगम अपार- ना ४८७१।
कहा; हाथी का खाया कैथ- ऐसी वस्तु जो उपर से तो बिलकुल ठीक या सारपूर्ण जान पड़े, परन्तु वस्तुत: सार या तत्वहीन हो।
(सं. हस्तिन् ; हस्ती ; प्रा. हत्थी)
भ्रम या संदेह में रहनेवाला।
हथियारों आदि पर सान धरने का काम।
हथियारों आदि पर सान धरनेवाला।
(सं. शक्ति या हिं. सैहथी)
मुहम्मद साहब के नाती बुसेन के बंशजों की उपाधि।
सिद्धांत का ज्ञाता या पंडित।
वह स्थान जहाँ हाथी पाले या बाँधे जाते हों।
हाथी के मुँह के दोनों छोरों पर निकले हुए वे सफेद अवयव जिनसे कई चीजें बनायी जाती हैं।
वह तोप जो हाथी की पीठ पर रखकर ले जायी या चलायी जाती थी।
उ.- ज्यौं जानौ त्यौं करौ, दीन की बात सकल तब हाथै-१-११२।
न रह जाने का भाव, क्षय, नाश।
उ.- मैं कीन्हीं बहु जिय की हानि-४-१२।
टूटने-फूटने से होनेवाला क्षय।
वह अनुचित बात या आघात जिससे मान-मर्यादा आदि में कमी हो।
घाटा, टोटा, 'लाभ' का विप.।
उ.- (क) लाभ-हानि कछु समुझत नाहीं-१-४६। (ख) और बनिज मैं नाहीं लाहा, होति मूल मैं हानि -१-३१०।
उ.-(क) अब लौं मैं करी कानि, सही दूध-दही हानि-१०-२७६। (ख) केतिक गोरस हानि, जा कौं करति है अपमान-३५०।
अपूर्ण रहना, निष्फल होना।
उ.-तातैं भई जज्ञ की हान-४-५।
न मिलना, न पाना, वंचित रहना।
उ.-अतिहिं अधीर नीर भरि आवत, सहत न दरसन हानि-ना. २९६७।
स्वास्थ्य को पहुँचनेवाली खराबी।
मुहा.- हानि उठाना-नुकसान सहना। हानि पहुँचना-नुकसान होना। हानि पहुँचाना-नुकसान करना।
हानिकर, हानिकरक, हानिकारी
हानिकर, हानिकरक, हानिकारी
हानिकर, हानिकरक, हानिकारी
वह (मुसलमान) जिसे कुरान कंठ हो।
हाँ' या स्वीकार करने का भाव, स्वीकृति।
मुहा.- हामी भरना- मंजूर या स्वीकार करना।
मुहा.- हाय करना या मारना-(१) शोक से हाय-हाय करना। (२) दुख से कराहना।
मुहा.- (किसी की) हाय पड़ना-किसी सताये गये की हाय या दुरसीस का बुरा फल भुगतना।
उ.- प्रबल माया ठग्यौ सब जग जनम जूआ हार-१-२९४।
मुहा.- हार कर- विवश या असमर्थ होकर।
उ.- छार सुगंध सेज पुहुपावलि हार छुवैं हिय हार जरैगौ-ना. ३९८६।
गले में पहनने की मोतियों, फूलों आदि की माला।
उ.- (क) मनि-गन-मुक्ता-हार-९-१२४। (ख) मानिक-मोती-हार रंग कौ- ना. २०९३। (ग) कंठ सुमाल हार मुकता के- ना. ४४३३।
(सं. हात, प्रा. हाय, या सं. हत)
(सं. हात, प्रा. हाय, या सं. हत)
(सं. हात, प्रा. हाय, या सं. हत)
(सं. हात, प्रा. हाय, या सं. हत)
(किसी चीज के) लिए आतुर या व्याकुल।
उ.- मेल्यौ जाल काल जब खैंच्यो, भयौ मिन जल-हायौ-१-६७।
मुहा.- हार खाना- हारना, पराजित होना। हार देना-पराजित करना। हार मानना-अपनी पराजय स्वीकार करना। हार मानि कै-अपनी पराजय स्वीकार करके। उ.- कै प्रभु हार मानिकै बैठो, कै अब हीं निस्तारौ-१-१३९। मानै हार-पराजय माने या स्वीकार करे। उ.- तन-मन-धन-जोबन खसै (रे) तऊ न माने हार-१-३२५।
एक प्रत्यय जो कर्तत्व, स्वामित्व आदि का सूचक होता है।
हृदय से निकला हुआ, सच्चा।
उ.- मैं हरिभक्त नाम मम नारद। मोसौं कहि तू अपनौ हारद-४-९।
प्रयत्न में निराश या विफल होना।
(विफल या पराजित होकर धन या बाजी की) चीज जाने देना।
एक प्रत्यय जो कर्तत्व, स्वामित्व, धारण या संयोग आदि सुचित करता है।
उ.-(क) पूरे चीर अंत नहिं पायौ, दुरमति हारि लही-१-२३८। (ख) जीतैं जीति भक्त अपने कैं, हारैं हारि बिचारौं-१-२७१। (ग) चरन-कमल मन सनमुख राखौ, कहूँ न आवै हारि-७-३। (घ) लरें भई असुरनि की हारि-७-७।
उ.-(क) संडामर्क रहे पचि हारि-७-२। (ख) तदपि सूर तरि सकीं न सोभा, रहीं प्रेम पचि हारि-६२८।
मुहा.- हारि मानि (कै)-पराजय या विफलता स्वीकार करके। उ.- (क) कै प्रभु हारि मानि कै बैठौ, कै करौ बिरद सही-१-१३७। (ख) सात दिवस जल बर्षि सिराने, हारि मानि मुख फेरो-९५९। (ग) हारि मानि हहरथो हरि चरननि, हरषि हिये अब हेतु करौ-९८९। (घ) हारि मानि कै रही मौन ह्वै-पृ. ३३२ (१६)। मानी हारि-पराजय स्वीकार कर ली। उ.-गिरी सुमार खेत बृंदाबन रन मानी नहिं हार- ना. ४२८०। हारि कै-लाचार या विवश होकर। उ.-हारि कै तब टेरि दीन्ही, पहुँचे गिरीधारी-१-१७६।
थके, शिथिल या क्लांत हुए।
उ.- कहति रोहिनी, सोवन देहु न खेलत-दौरत हारि गए री-१०-२४७।
पराजित होकर बाजी या दाँव की चीज जाने देकर।
उ.- (क) हारि सकल भंडार-भूमि आपुन बनवास लहथौ-१-२४७। (ख) ज्यौं कुजुवारि रस बींधि, हारि गथ सोचतु पटकि चिती-१० उ.-२०३।
एक पक्षी जो हर समय अपने चंगुल में कोई लकड़ी या तिनका लिये रहता है।
हारिल की लकरी-ऎसी वस्तु जिसे किसी भी स्थिति में छोड़ा न जाय।
उ.- हमरे हरि हारिल की लकरी-ना. ४६०६।
(सं. सत्व या फ़ा. शै = वस्तु)
(सं. सत्व या फ़ा. शै = वस्तु)
(सं. सत्व या फ़ा. शै = वस्तु)
(सं. सत्व या फ़ा. शै = वस्तु)
प्रयत्न करते-करते निराश या असमर्थ हो गये।
उ.- (क)मुसल मुगदर हनत त्रिबिध करमनि गनत मोहिं दंडत धरम-दूत हारे-१-१२०। (ख) तुव सुत कौ पढ़ाइ हम हारे-७-२। (ग) मधुबन बसत आस दरसन की जोइ नैन मग हारे-ना. ४८७०।
मुहा.- हारे-अटके-किसी वस्तु की अत्यंत आवश्यकता होने पर उसकी प्राप्ति के समस्त प्रयत्नों में निराश होकर, बहुत ही आवश्यकता के अवसर पर। हारे दर्जे- (१) सब प्रकार से निराश होकर, किसी तरह का कोई वश न चलने पर। (२) लाचार या, विवश होकर।
कर्तृत्व, स्वामित्व आदि सूचक एक प्रत्यय।
उ.- सूर सुगंध चुरावनहारे कैसैं दुरत दुराए-१२३३।
उ.- सुर-तरुवर की साख लेखिनी, लिखत सारदा हारैं-१-१८३।
हारन की स्थिति या अवस्था में )।
उ.-जीत जीति भक्त अपन के, हारैं हार बिचारौं-१-२७२।
(दाँव, बाजी आदि) हार जाय।
मुहा.- जनम या जन्म हारै-जीवन व्यर्थ या नष्ट करे। उ.- (क) माया-मद मों भयौ मत्त, कत जनम बादिहीं हारै-१-६३। (ख) कियैं नर की स्तुति कौन कारज सरै, कै सो आपनौ जन्म हारै-४-११।
उ.- हारै तोरथौ, चीरहिं फारथौ-१०३३।
उ.- मैं हारी त्यौंही तुम हारौ, चरन चापि स्रम मेटौंगी-ना. १७६५।
मुहा. अपुनपौ हारौ- अपना ज्ञान-विवेक, प्रतिष्ठा का ध्यान आदि सब कुछ भुला या मिटा दिया। उ.- धन-सुत-दारा काम न आवैं, जिनहिं लागि आपु-नपौ हारौ-१-८४।
कर्तृत्व, स्वामित्व आदि का सूचक एक प्रत्यय।
उ.- सूर सुगंध चुरावनहारौ कैसैं दुरत दुरायौ-ना. २३१३।
सेना में सबसे आगे चलनेवाला सैनिक दल।
हृदय से निकला हुआ, सच्चा।
उ.- (क) कियौ युद्ध, पै असुर न हारथौ-६-५। (ख) जीतै सबै असुर हम आगै, हरि कबहू नहिं हारथौ-४३३।
मुहा.- हारथौ हिय अपनैं-अपने हृदय में हार गया, हृदय से पराजय स्वीकार कर ली। उ.- भ्रमि भ्रमि अब हारथौ हिय अपनैं, देखि अनल जग छायौ-१-१५४।
दाँव, बाजी या उसमें लगायी गयी वस्तु) हार गया।
उ.- (क) तिन हारथौ सब भूमि भँडार-२-४६। (ख) चितवत नंद ठगे से ठाढ़े, मानौ हारथौ हेम जुआर-२६७१।
मुहा.- उवसर या औसर हारथौ-उचित अवसर पर चूक गया, उपयुक्त अवसर का लाभ नहीं उठाया। उ.- औसर हारथौ रे, तैं हारथौ-१-३३६।
खो दिया, गवाँ दिया, व्यर्थ कर दिया।
मुहा.- जनम या जन्म हारथौ-जीवन व्यर्थ नष्ट कर दिया। उ.- करी न प्रीति कमल लोचन सो, जन्म जुआ ज्यौं हारथौ-१-१०१।
उ.- कौन हाल हमरैं ब्रज बीतत जानत नहीं बिरह की रीति-ना. ४४१०।
मुहा.- हाल करना-(१) दुर्दशा बनाना, बहुत परेशान करना, दुर्गति करना। (२) दंड देना। हाल करिहौं या करौं-अच्छी तरह दंड दूँगी। उ.- (क) कैसे हाल करौं धरि हरि के, तुमकौं प्रगट दिखाऊँ-१०-३४१। (ख) सूर हाल कैसे करिहौं धरि, आवै तो हरि अबहीं- ना. २०४१। हाल किए (किये)-दुर्दशा की, दुर्गति बनायी। उ.- (क) जसुमति माइ कहा सुत सिखयौ, हमकौं जैसे हाल किए-७७१। (ख) जैसे हाल किए हरि हमकौं, भए कहूँ जग आहैं न-७७२। (ग) ¨¨¨¨¨¨ करै हाइ हाइ, देखौ जैसे हाल करथौ है- ना.2053। (घ) ऎसौ हाल हमारौ कीन्हौ, जाति हुतीं दहि लै हौं-ना. २०८४। हाल करत-दुर्दशा या दुर्गति करता है। उ.-ऎसे हाल करत री कोऊ, रहीं अकेली नारि-ना. २४५९।
उ.- परबस परी सुनौ करुनामय मम मति-तिय अब हारी-१-१६५।
उ.- मैं हारी, त्यौंही तुम हारौ, चरन चापि स्रम मेटौंगी-ना. १७६५।
मुहा.- कहि हारी-कहते कहते थक गयी। उ.-मैं बरजति सुत जाहु कहूँ जनि, कहि हारी दिनजाम-३७६। जतन करि हारी-बहुत प्रकार के उपाय करते-करते थक गयी। उ.- अधिक पिराति सिराति न कबहूँ बहुत जतन करि हारी-ना. ४१८८। सिखवति हारी-सिखाते-सिखाते थक गयी। उ.-सूर स्याम कौं सिखवति हारी, मारेहुँ लाज न आवति-ना, २०४५।
(दाँव, बाजी आदि) में जीत न सका।
उ.- सुर एक पौ नाम बिना नर फिरि फिरि बाजी हारी-१-६०।
मुहा.- रसना हारी- बात खाली जाय, माँग पूरी न हो। उ.- जाँचक पैं जाँचक कह जाँचै, जौ जाँचै तौ रसना हारी-१-३४।
बाजी या दाँव हारने पर उससे संबंधित-वस्तु जीतनेवाले को दी।
उ.- (क) हारी बहुरि द्रौपदी नार-१-२४६। (ख) रही न पैज प्रबल पारथ की जब तैं धरम-सुत धरनी हारी-१-१७६।
उ,- ग्राह जब गजराज घेरथौ, बल गयौ हारी-१-१८६।
मुहा. चलि सत हारी- अपना सत्य या वचन छोड़ या तोड़ दे। उ.- आध पैंड़ बसुधा दै राजा, नातरु चलि सत हारी-८-१४। पत जाहु हारी-अपनी मान-मर्यादा छोड;दो, अपनी अप्रतिष्ठा कराओ।उ;- बचन जो करथौ. प्रतिपाल ताकौ करौ, कै सभा माहिं पत जाहु हारी- ना. ४८३३।
उ.-छार सुगंध सेज पुहुपावलि, हार छुवैं हिय हार जरैगो-२८७०।
उ.- बन भीतर जुवतिनि कों रोकत हम खोटी तुम्हरे ये हाल-१११२।
भक्तों या साधकों की वह स्थिति जबवे अपने को भूलकर-ईश्वर-प्रेम में लीन या तन्मय हो जाते हैं।
मुहा.- (किसी पर) हाल आना-प्रेम में तन्मयता या लीनता होना।
मुहा.- हाल में-कुछ ही दिन पहले। हाल का-(१) बहुत थोड़े दिन का। (२) नया, ताजा।
हिलने की क्रिया या भाव, गति।
लोहे का बंद जो पहिये पर चढ़ाया जाता है।
उ.- बलै अछत छल-बल करि जीते, सूरदास प्रभु हाल- ना. ४७८४।
हिलने की क्रिया या भाव, गति।
बच्चों को हाथ में लेकर हिलाने-डुलाने की क्रिया।
बच्चों को सुलाने का गीत, लोरी।
हाली हाली -जल्दी-ज्लदी, शीघ्रता से।
उ.-नेंक नहीं हाल्यो नख पर तें मेरो सुत अहंकारी-१००१।
(साहित्य में) संयोग के समय नायक को मोहित करने, उससे मिलन की इच्छा प्रकट करने अथवा तत्संबंधी सहमति या स्वीकृति सूचित करने के लिए की जानेवाली स्वाभाविक चेष्टाएँ जो कायिक तथा मानसिक अनुभावों के अंतर्गत ग्यारह प्रकार की कही गयी हैं-लीला, विलास, विच्छित्ति (शोभावर्द्धक श्रृंगार), विभ्रम (उतावली में उलटे-पलटे या अस्तव्यस्त भूषण, वस्त्र धारण करना), मोट्टायित (मुग्ध होकर अनुराग व्यक्त करना), विव्वोक (मानपूर्वक प्रिय या उसकी प्रदत्त वस्तु के प्रति उपेक्षा दिखाना), विहृत (लज्जा के कारण प्रिया पर अपना भाव प्रकट न करना), कुट्टमित (संयोग के समय बनावटी दुख चेष्टा), लालत (सुकुमार भाव से और आकर्षक रूप से अंग-संचालन) और हेला (आँखें या भौहें नचाकर मिलन की अभिलाषा स्पष्ट करना) इन ग्यारह के अतिरिक्त कहीं-कहीं 'बोधक' (प्रेमी-प्रिया का संकेतों से अपनी कामना व्यक्त करना) बारहवाँ हाव माना गया है।
उ.- हाव अरु भाव करि चलत, चितवत जबै, कौन ऎसौ जो मोहित न होई-८-१०।
पुरुष का चित्त आकर्षित करने के लिए की गयी स्त्री की मनोहर चेष्टा, नाज-नखरा।
कागज पर किनारे छोड़ी हुई जगह।
हँसने की क्रिया या भाव, हँसी।
उ.- ईषद हास दंत-दुति बिगसति-१०-२१०।
उ.- लाल गोपाल बाल-छबि बरनत कबि कुल करिहै हास री-१०-१३९।
केवल कौतुक के लिए कही गयी बात या बनाया गया वेश जो साहित्य में सात्विक भावों के अंतर्गत है।
मुहा.- हासिल करना-पाना। हासिल होना-मिलना।
गणित में किसी संख्या का वह अंश जो शेष भाग के लिखे जाने पर बच रहे।
(चौथ, खिराज जैसा) धन जो किसी से अधिकारपूर्वक लिया जाय।
जिस पर लोग हँसें, हँसने के योग्य।
हँसने की क्रिया या भाव, हँसी।
सिद्धांत का, सिद्धांत संबंधी।
जो सिद्धांत के आधार पर हो।
(आँख या उँगली का) इशारा, संकेत या इंगित।
(सं. संज्ञपन, प्रा. सण्णवन)
उ.-(क) नैन की सैन अंगद बुलायौ-९-१२९। (ख) कमल नैन माखन माँगत हैं करि करि सैन बतावत-१०-१०२। (ग) सन देइ सब सखा बुलाए-१०-२८२। (घ) मोहि लई नैनंनि की सैन-७४२। (ङ) बात करत तुलसी मुख मेलै नैन सैन दै मुँह मटकी-1३-०१। (च) ताहू मैं अति चारु बिलोकनि गूढ़ भाव सूचतसखि सैन-१३१३। (छ) रीझत नारि कहत मथुरा की आपुस मैं दै सैन-सारा. ५०४।
(सं. संज्ञपन, प्रा. सण्णवन)
उ.- (क) नातरु कुटँब सैन संहरि सब कौन काज कौं जीजै-१-२७५। (ख) हरि प्रभाउ राजा नहिं जान्यौ, कहथौ सैन मोहिं देहु हरि-१-२६८। (ग) दामिनि कर करवार, बूँद सर, इहिं बिधि साजे सैन-२८१९। (घ) सखी री पावस सैन पलान्यौ-२८२०।
मुहा- हाहा हीही करना-(1) जोर से हसना।(2)(निम्न कोटि की) हँसी करना। हाहा हीही मचना या होना- बहुत जोर की हॅसी होना
दीनता की या बहुत बिनती की पुकार, दुहाई।
उ.-हाहाकंत मानि बिनती यह-ना. १४२१।
मुहा.- हाहा करना-बहुत गिड़गिड़ाना या बिनती करना। हाहाकरि-बहुत गिड़गिड़ाकर या बिनती करके। उ.- (क) हाहाकरि द्रौपदी पुकारी, बिलंब न करौ घरी-१-२५४। (ख) मैं आज तुम्हैं गहि बाँधौ। हा हा करि अनुराधौं-१०-१८३। (ग) सूर स्याम जसुमति भैया सौं, हाहा करि कहै केति-४२४। (घ) दोहनि नहिं देत कर तैं हरि, हाहा करि परै पाइ- 737। (ङ) हाहा करि, दसननि तृन धरि-धरि लोचन नीर बहाऊँ री-ना. २७२१। हाहा करति-बहुत गिड़गिड़ाकर बिनती करती है। उ.- हा हा करति पाइ तेरे लागति अब जनि दूरि जाइ मेरे बारे-६०८। हाहा करिहौ-बहुत गिड़गिड़ाकर बिनती करोगे। उ.- जो पाऊँ तौ तुमहिं दिखाऊँ हाहा करि हौ अबहीं-ना. २०४१। हाहा खाना-बहुत गिड़गिड़ाना या बिनती करना। हाहा खात-बहुत गिड़गिड़ाकर बिनती करता है। उ.- साँटी लै जसुमति अति तरजति हरि बसि हाहा खात।
शोक, दुख आदि का सूचक शब्द।
उ.- सूर उसाँस छाँड़ि हा हा ब्रज जल अँखियाँ भरि लीनी-ना. ४७७२।
जन-समूह की, भय, दुख आदि सूचक पुकार या चिल्लाहट, कुहराम।
उ.- हाहाकार भयौ सुरलोकनि-सारा. १०७।
साहित्य के नौ रसों में एक जो असंगत-विकृत घटनाओं, बातों आदि से उत्पन्न होता है ; इसका स्थायी भाव 'हास' है।
अत्यंत शोकसूचक शब्द-हे ईश्वर ! यह क्या हो गया ! !
हाहा हीही-(निम्न कोटि का) हँसी-ठट्ठा।
(घोड़ों का) हींसना, हिनहिनाना।
दुर्गा या देवी की एक मुर्ति।
दुर्गा या देवी की एक मुर्ति जो सिंध और बिलोचिस्तान के बीच की पहाड़ियों में है।।
एक कटीला पेड़ जिसके फलों से तेल निकलता है, इंगुदी।
(सं. हिंगुपत्र, प्रा. हिंगुवट)
हिंडोरना, हिंडोरनो, हिंडोरनौ, हिंडोरा
उ.- (क) सुरँग हिंडोरना माई झूलत स्यामा-स्याम-ना. ३४३७। (ख) जमुना पुलिनहिं रच्यौ रंग सुरंग हिंडोरनौ-ना. ३४५०।
उ.-हरषि हिंडोरनि गावहिं-ना. ४००५।
उ.-झूलत सुरँग बिंडोरें-सारा. ३१०।
उ.-डरत लाल हिंडोल झूलत, हरैं देत झुलाइ-३९८।
हिंडोलना, हिंडोलनो, हिंडोलनौ, हिंडोला
काठ का ऊपरनीचे जानेवाला चक्करदार झूला।
(सं. हिन्दोल, हिं. हिंडोला)
उत्तरी और मध्य भारत की सर्वप्रमुख भाषा जो अब भारतीय राष्ट्र की राष्ट्रभाषा है।
मुहा.- हिंदी की चिंदी निकालना- (१) बहुत सूक्ष्म पर व्यर्थ के दोष निकालना। (२) कुतर्क करना।
हिंदी भाषा का वह व्यावहारिक रूप जिसमें अरबी-फारसी और संस्कृत के क्लिष्ट शब्द न हों।
भारतीय आर्यों के वर्तमान भारतीय वंशज जो भारत में प्रवर्तित और पल्लवित धर्म-संस्कार और समाज-व्यवस्था को मानते और वेद, स्मृति, पुराण आदि के प्रति श्रद्धा-भाव रखते हैं।
हिंडोलना, हिंडोलनो, हिंडोलनौ, हिंडोला
(सं. हिन्दोल, हिं. हिंडोला)
उ.-तैसेइ मोर पिक करत कुलाहल हरषि हिंडोलना गावहिंगे-२८८९।
हिंडोलना, हिंडोलनो, हिंडोलनौ, हिंडोला
(सं. हिन्दोल, हिं. हिंडोला)
हिंडोलना, हिंडोलनो, हिंडोलनौ, हिंडोला
वह गीत जिसमें नायक-नायिका के हिंडोले पर झूलने का वर्णन हो।
(सं. हिन्दोल, हिं. हिंडोला)
मुहा.- हिंवार पड़ना-(१) बरफ गिरना (२) पाला पड़ना। (२) बहुत सर्दी होना।
(घोड़ों के) हींसने या हिनहिनाने का शब्द।
दूसरों का अहित या हानि करनेवाला।
(पशु) जो जीवों को मारकर उनका मांस खाता हो।
(जीवों का) वध या घात करना।
(जीवों को) पीड़ा या कष्ट देना।
बहुत पीड़ा या कष्ट पहुँचाना।
निंदा, बुराई या अनिष्ट करना।
प्राणियों को मारना या अस्यंत कष्ट देना।
उ.- हिंसा-मद ममता-रस भूल्यौ, आसा हीं लपटानौ-१-४७।
हानि पहुँचाना, अनिष्ट करना।
एक पुरानी विभक्ति जो पहले तो प्रायः मभी कारकों में प्रयुक्त होती थी, परंतु कालांतर में, 'को' के अर्थ में, केवल कर्म और संप्रदान में प्रयुक्त होने लगी थी।
एक अव्यय जिसका प्रयोग निश्चय, अल्पता या परिमिति, हीनता या उपेक्षा, किसी बात पर बल देने आदि के लिए होता है।
उ.- (क) उनके मुऎं हिऎं सुख होइ-१-२८९। (ख) पै संतोष न आयौ हिऎं-९-२।
नयी बात खोजने या निर्माण करने की बुद्धि या कौशल।
कार्य-सिद्धि की युक्ति या उपाय।
कार्य-साधन की युक्ति या उपाय निकालनेवाला।
एक रोग जिसमें बहुत हिचकियाँ आती हैं।
किसी काम को करने में आने वाली मानसिक रुकावट, आगा-पीछा।
किसी काम में भय, संकोच आदि के कारण तत्परता से प्रवृत्त न होना, आगा-पीछा करना।
उ.- राजिवनैन मैन की मूरति सैननि दियो बताई-९-४५।
रात्रि का नैवेद्य जो मंदिरों में चढ़ता ह।
उ.- बाँधै सिंधु सकल सैना मिलि-९-११०।
उ.- (क) मुहाँचुही सेनापति कीन्हीं सकटै गर्व बढ़ायौ-१०-६१। (ख) बरषत मुसलघार सैनापति महामेघ मघवा के पायक-९५४।
फौज में रहकर लड़नेवाला सिपाही।
उ.- कमलनैन हरि हिचिकिनि रोवै-३४६।
पेट की वायु का, झोंक के साथ, कंठ में धक्का देते हुए निकलने की क्रिया या भाव।
मुहा.- हिचकी (हिचकियाँ) लगना-मरने के निकट होना।
सिसक-सिसक कर रोने का शब्द।
एक स्थान छोड़कर दूसरे को जाना।
मुहम्मद साहब का मक्के से मदीने जाना।
मुसलमानी सन् जो मुहम्मद साहब के मक्के से मदीने जाने या हिजरत की तारीख (१५ जूलाई,६२२ ई.) से चला था।
एक राक्षस जिसे भीम ने मारा था।
हिड़िब राक्षस की बहन जिससे भीमसेन ने विवाह करके घटोत्कच नामक पुत्र उत्पन्न किया था।
(किसी की) भलाई या प्रसन्नता के लिए।
लिए, हेतु, कारण, निमित्त।
उ.- (क) पारबती सिव-हित तप करथौ-४-७। (ख) ज्यौ कपि सीत हतन-हित गुंजा सिमिटि होत लौलीन-१-१०२। (ग) ब्यास पुत्र-हित बहुतप कियौ-१-२२६।
भलाई, उपकार या कल्याण करनेवाला।
उ.- परम उदार स्याम-घन सुंदर, सुखदायक संतन हितकर हरि-१-३१२।
भलाई, उपकार या कल्याण करनेवाला।
उ.- सहज स्वभाव भक्त-हितकर-१०७०।
उ.- अति उदार पर-हित डोलत हैं, बोलत बचन सुसीले-ना. ४२१२।
उ.- (क) हित करि स्याम सौ कह पायौ। (ख) तहँ मृगछौना सौ हित भयौ-५-४।
मुहा.- हित लगाना- प्रेम या अनुराग करना। हित न लगावै- प्रेम या अनुराग नहीं किया। उ.- खान-पान सो सब पहुँचावै, पै नृप तासौं हित न लगावै-४-१२।
उ.- श्रीभागवत सुनै जो हित करि, तरै सो भव-जल पार-१-२३१।
उ.- जसुमति-भाव भक्ति हितकारन- ना. १५६९।
स्वास्थ्य के लिए उपयोगी, स्वास्थ्यकर।
उ.-दूध अकेली धौरी कौ यह, तन कौं अति हितकारि-४९६।
हितकारिणी, हितकारिनि, हितकारिनी
मंगल या कल्याण चाहनेवाली।
उ.-संग-संग जसुमति-रोहिनी हितकारिनि मैया-१०-११६।
हितकारिणी, हितकारिनि, हितकारिनी
भलाई, उपकार या कल्याण करनेवाला।
उ.-(क) जाकौ चरनोदक सिव सिर धरि तीन लोक हितकारी-१-१५। (ख) मुनि-मद मेटि दास-ब्रत राख्यौ अंबरीष हितकारी-१-१७। (ग) ऎसे कान्ह भक्त-हितकारी-१-२९। (घ) हते बंधु हितकारी-१-१७३। (ङ) संतनि के हितकारी-१-२८२। (च) जो कोऊ तेरौ हितकारी, सो कहै काढ़ि सबेरौ-१-३१९। (छ) सूर तुरत मधुबन पग धारे, धरनी के हितकारी-२५३३।
(किसी की) भलाई, उपकार या कल्याण की बात सोचना।
मंगल-कल्याण या लाभ की बात कहनेवाला।
प्रेम या स्नेहयुक्त होना।
स्नेह, प्रेम अथवा मंगल कामना के भाव से युक्त हो गयी।
उ.-बाँध्यो देखि स्याम को परबस गोपी परम हितानी।
भलाई करने या चाहनेवाला, हितैषी।
उ.-(क) कमल नयन हरि हितू हमारे-१-२४०। (ख) बाहर हेत हितू कहवावत, भीतर काज सयाने-ना. ४६२६।
(घोड़े का) हींसना या हिनहिनाना।
उ.-गैवर मोहि चढ़ावत रासभ, प्रभुता मेटि करत हिनती-ना. २३०७।
(किसी की) भलाई, उपकार या कल्याण की कामना।
भलाई या कल्याण चाहनेवाला, हितचिंतक।
उ.-ऎसे करम नाहिं प्रभु मेरे जातें तुम्हैं हितैहौं।
करण और अपादान कारकीय चिन्ह, तृतीया और पंचमी की विभक्ति।
[प्रा. सुंतो, पु. हिं. सेंति]
उ.- ताकौं सेइ परम गति पावत-५-२।
उ.- (क) तातै सेइयै श्री जदुराइ-१-२६५। (ख) पिय अपना ना होइ तऊ ज्यौं ईस सेइए कासी-२२७५।
सेवा, उपासना या आराधना करूँ।
उ.- श्री बृषभानु-सुता-पति सेऊँ -१८५८।
सेवा, उपासना या आराधना की।
उ.- (क) सेए नाहि चरन गिरिधर के-१-१४७। (ख) द्वादस वर्ष सेए निसि-बासर तब संकर भाषी है लैन-९-१२।
सेए तैं - सेवा आदि करने से।
उ.- सूरज दास स्याम सेए तें दुस्तर पार तरै-१-८२।
उ.- दरसन हूँ नासै जम सैनिक जिमि नह बालक सैनी।
उ.- जानि कठिन कलिकाल कुटिल नृप संग सजी अघसैनी-९-११।
उ.- एकै नाम लेत सब भाजै पीर सो भव-भय-सैनी-९-११।
उ.- ग्वाल- बाल कोउ कहूँ न देखौं, टेरत नाउँ लेत दै सेनु-५०१।
उ.- सब जीवनि लै उदर माँझ प्रभु महा प्रलय-जल करत हौ सैनु-४८९।
सेना में रहकर लड़ने के योग्य।
(सं. सेन्य + ईश = सैन्येश)
घोड़े की बोली, हींसने की ध्वनि।
मुहा.- हिब्बा भर-जरा सा, बहुत थोड़ा।
पाले या तुषार के छोटे-छोटे टुकड़े।
उ.-(क) सूर स्याम-लोचन-जल बरसत जनु मुकता हिमकर तैं-३५४। (ख) छूटे चिकुर बदन कुम्हिलाने, ज्यो नलिनी हिमकर की मारी-ना. ४६७१।
उ.-मानौ कमलहिं हिम तरसायौ- ३९१।
शीत की वह स्थिति जिसमें पानी जमने लगता है।
हिमालय पर्वत जो संसार का सबसे ऊँचा पर्वत है। पुराणों में यह मेना या मेनका का पति और पार्वती का पिता कहा गया है।
उ.-कह्यौ हमाचल, सिव प्रभु ईस-४-७।
मुगा.- हिम्मत पड़ना-साहस होना। हिम्मत हारना-साहस छोड़ना।
उ.-इन हिय हेरि मृगी सब गोपी सायक ज्ञान हए-३०५०।
मुहा.- हिय की फूटना-ज्ञान-नेत्र न होना; बुद्धि, विवेक या ज्ञान न होना। हिय की फूटी- ज्ञान-दृष्टि रहित; बुद्धि . विवेक या ज्ञान-हीन। उ.- एक आँधरौ, हिय ही फूटी, दौरत पहिरि खराऊँ-ना. ४७४४। हिय हारना-हिम्मत या साहस छोड़ना। हिय हारथौ-साहस छोड़ बैठा। उ.- भ्रमि भ्रमि अब हारथौ हिय अपनैं, देखि अनल जग छायौ-१-१५४।
मुहा.- हियरा (हियरो) सुलगावत - जी जलाता या जलाते हो। उ.- (क) फूँकि फूँकि हियरौ सुलगावत उठि न इहाँ तैं जात- ना. ४१६३। (ख) काहे को हियरा सुलगावत- ३२७९।
भारत के उत्तर का एक पर्वत जो संसार में सबसे ऊँचा है। पुराणों में यह मेना या मेनका का पति और पार्वती का पिता कहा गया है।
मुहा.- हिया जलना- (१) दुख होना। (२) क्रोध या ईर्ष्या होना। हिया जलाना- कुढ़ाना। हिया जुड़ाना या ठंढा होना- मन तृप्त और आनंदित होना। हिया ठंढा करना- मन को सुखी और संतुष्ट करना। हिया फटना- (कलेजा फटने जैसा) अत्यंत शोक या दुख होना। हिया फाड़ना- (कलेजा फाड़ डालने जैसा) घोर दुख या शोक देना।हिया भर आना- अत्यंत शोक या दुख होना। हिया भर लेना- दुख से लंबी साँसें लेना। हिया शीतल करना- किसी के हृदय को सुखी और संतुष्ट करना। हिया शीतल होना- मन का तृप्त ओर संतुष्ट होना।
उ.- कहि हियाव यह सौंज लादि कै हरि के पुर लै जाहि-१-३१०।
मुहा.- हियाव खुलना- (१) हिम्मत बँधना, साहस हो जाना। (२) धड़क खुलना; संकोच, हिचक या भय न रह जाना। हियाव पड़ना- हिम्मत या साहस होना।
उ.- (क) सब कोउ कहत गुलाम स्याम कौ, सुनत सिरात हिये-१-१७१। (ख) राजा हियैं सुरूचि सौं नेह-४-९। (ग) प्रेम पुलक न समात हिये-१०-८८। (घ) सूरदास प्रेम हरि हियैं न समावै री-६२९। हरषि हियें अब हेतु करै-९८९।
मुहा. हिये का अंधा- परम मूर्ख। हिये की फूटना- बुद्धि या विवेकहीन होना। हिये की फूटी - बुद्धि- विवेक रहित। उ. एक आँधरौ, हिय की फूटी, दौरत पहिरि खराऊँ-३४६६। हिये लगना- गले या छाती से लगना। हिये लगाना- हृदय या छाती से लगाना। हिये में लोन-सा लगना- बहुत बुरा लगना, अत्यंत अप्रिय होना। हिये पर पत्थर रखना- अत्यंत धैर्यपूर्वक सहन करना।
उ.- (क) सूर-स्याम सरबज्ञ कृपानिधि करूना-मृदुल हियौ-१-१२१। (ख) अति अनुराग संग कमला-तन प्रफुलित अंग न समात हियौ-१०-१४३। (ग) सराहौं तेरी नंद हियौ- ना. ३७८३।
मुहा. हियौ फूलना- अत्यंत प्रसन्नता होना। फूल्यौ हियौ- अत्यंत प्रसन्नता हुई। उ.- लै लै अधरं-परस करि जेंवत देखत फूल्यौ मात-हियौ- १०-१६८। हियौ सिराना या शीतल होना- कलेजा ठंढा होना, बहुत सुख-संतोष होना। सिरायौ हियौ या सीतल भयौ -सुखी और संतुष्ट हुआ। उ.- (क) अब कुबिजा पै हियौ सिरायौ- ना. ४७१२। (ख) सातौं द्वीप राज ध्रुव कियौ। सीतल भयौ मातु कौ हियौ-४-९।
उ.- आपु कहति मेरौ सुत बारौ, हियौ उघारि दिखाऊँ-७७२।
मुहा. हियौ फाटनो- (अत्यंत शोक या दुख से) कलेजा फटना।फाटयौ न हियौ- (अत्यंत शोक या दुख होने पर भी) कलेजा नहीं फटा। उ.- हऱि बिछुरत फाटयौ न हियौ- ना. ३६२६।
(किसी को) रूकने को प्रवृत्त करना।
जंबू द्वीप के नौ खंडों में एक।
एक प्रसिद्ध दैत्य जो प्रहलाद का पिता था और जिससे प्रहलाद की रक्षा के लिए नृसिंह अवतार हुआ था।
वह ज्योतिर्मय अंड जिससे ब्रह्मा और सारी सृष्टि की उत्पत्ति हुई मानी जाती है।
एक प्रसिद्ध दैत्य जो हिरण्यकशिपु का भाई था। उसने पृथ्वी को पाताल में रख छोड़ा था जिसके उद्धार के लिए बाराह अवतार हुआ था।
मुहा. हिरदय धरौ- ध्यान लगाओ। उ.- नर-हरि-पद नित हिरदय धरौ-७-२।
उ.- (क) मम सत्राई हिरदैं आन-४-२। (ख) हरि-जन हरि-चरचा जो करैं। दासी-सुत सो हिरदौं धरै-७-८।
उ.- हमारैं हृदयै कुलिसहु जीत्यौ-ना. ४००१।
मुहा. हिरदै महँ आन- हृदय में लाकर, ध्यान लगाकर। उ.- सो सुरूप हिरदै महँ आन-१-२८६। हिरदै महँ राखी- मन में बसा ली, स्मृति में रख ली, स्मरण कर ली। उ.- सची नृपति सौं यह कहि भाषी। नृप सुनिकै हिरदै महँ राखी-६-७। हिरदै राखि- ध्यान लगाकर। उ.- श्रीगोपाल हिरदै राखि-१-३०६। सुन्न हिरदै कौ-अत्यंत निष्ठुर या कठोर हृदयवाला। उ.-महा कठोर सुन्न हिरदै कौ, दोष दैन कौं नीकौ-१-१८६।
मुहा.- हिरदै माँझ रहे लपटाई-छाती से लिपट गये। उ.- अति आनंद सहित सुत पायौ, हिरदै माँझ रहे लपटाई-१०-५१।
मुहा.- हिरन हो जाना-(१) बहुत तेजी से भाग जाना। (२) चटपट दूर या नष्ट हो जाना।
हिरण्यकशिपु नामक प्रसिद्ध दैत्य।
उ.-हिरण्यकसिपु हिरनाच्छ आदि दै रावन-कुंभकरन कुल खोवन- १-५४।
जंबू द्विप के नौ खंडों या वर्षों में एक।
उ.-इलावर्त औ किम्पुरुषा कुरु औ हरिवर्ष केतुमाल। हिरनमय रमनक भद्रासन भरतखंड सुखपाल-सारा. ३३।
मन बहलाने के लिए घूमना फिरना।
उ.- (क) ब्योम धर नद सैल कानन इते चरि न अघाइ-१-५६। (ख) मही सराव, सप्त सागर घृत, बाती सैल घनी-२-२८। (ग) सैल-सिला द्रुम बरषि ब्योम चढ़ि सत्रु-समूह सँहारौ-९-१०८।
हक्का-बक्का होना, दंग या चकित होना।
अपने को भूल जाना, आपा खोना।
भूल जाना, ध्यान में न आना।
मिट गयी, दूर हो गयी, क्षीण हो गयी, जाती रही।
उ.- मिट गई चमक दमक अँग-अँग की, मति अरु दृष्टि हिरानी-१-३०५। (ख) भूख न दिन निसि नींद हिरानी-२९०७।
उ.-बालक द्वै दए पठै धेनु बन कहूँ हिरानी-४३७।
दंग या चकित रह गयी, अपने को भूल गयी।
उ.-सबै हिरानी हरि-मुख हेरैं-ना. २२७१।
भूल गयी, ध्यान में नहीं रही।
उ.-बिकल भईं तन दसा हिरानी।
हिरण्याक्ष नामक प्रसिद्ध दैत्य।
उ.-हिरनकसिपु हिरनाच्छ आदि दै रानम कुम्भकरन कुल खोवन- १-५४।
[हिं. हिरन + औटा (प्रा. उत्त से)]
हिरण्याक्ष नामक प्रसिद्ध दैत्य।
उ.-हरि जब हिरन्याच्छ कौं मारथौ-७-२।
हिरमंजी, हिरमिंजी, हिरमजी, हिरमिजी
एक तरह की लाल मिटटी जो दीवार, धन्नी आदि रँगने के काम आती है।
उ.-(क) जनु खद्योत चमक चलि सकत न, निसि-गत-तिमिर हिराने-ना. ३२१९। (ख) उत नंदहिं सपनौ भयौ, हरि कहूँ हिराने-ना. ३५५३।
उ,-स्याम अधर पर बैठि नाद कियौ, मारग चंद हिरान्यौ-ना. १६८७।
उ.-सपनैं माहिं नारि कौं भ्रम भयौ, बालक कहूँ हिरायौ-४-१३।
उ.- लखि गोपिन को प्रेम भुलायो। ऊधो को सब ज्ञान हिरायो।
सेना में सबसे आगे रहनेवाला सैनिक-दल।
किसी व्यक्ति की देखरेख के लिए रखा जानेवाला पहरा।
मुहा.- हिरासत में करना या रखना-कैद करना।
सेना में सबसे आगे रहनेवाला सैनिक-दल।
मुहा.- हिर्स दिलाना। (१) लालच दिलाना। (२) लालसा जगाना। (३) स्पर्द्धा करने को प्रवृत्त करना। हिर्स मिटना- (१) इच्छा में कमी आना। (२) लालच न रहना। (३) स्पर्द्धा का भाव दूर होना। हिर्स मिटाना- (१) इच्छा पूरी करना। (२) स्पर्द्धा का भाव शांत करना।
उ.- (क) देखौ माइ, कान्ह हिलकियनि रोवै-३४७। (ख) नैंकहूँ न दरद करति, हिलकिनि हरि रोवै-३४८।
सिसक-सिसक कर रोने का शब्द, सिसकन।
उ.-जौ जागौं तो कोऊ नाहीं, रोके रहति न हिलकीं-ना. ३८७९।
पानी की तरंग, हिलोर या लहर।
मुहा.- हिलकोरा (बहु. हिलकोरे) लेना-पानी का लहराना।
(पानी को हिलाकर) लहरें उठाना।
हिलने-मिलने या परचने का भाव, हेलमेल।
उ.-खान-पान तनु की न सम्हार। हिलग छँड़ायौ गृह-व्यवहार-ना. १७९८।
(सं. अधिलग्न, प्रा. अहिपग्न)
(सं. अधिलग्न, प्रा. अहिपग्न)
(सं. अधिलग्न, प्रा. अहिपग्न)
(सं. अधिलग्न, प्रा. अहिपग्न)
मुहा.- हिलन-मिलन-मिलना-जुलना, प्रेम या प्रीति का संबंध। उ.-हिलन-मिलन दिन चारि कौ-ना. ३७३२।
इधर-उधर डोलना, गति में आना।
(सं. हल्लन = इधर-उधर लुढ़कना)
मुहा.- हिलना-डोलना- (१) थोड़ा इधर-उधर होना, चलायमान होना। (२) थोड़ा धूमना-फिरना। (३) काम-धंधा करना। (४) प्रयत्न या उद्योग करना।
(अपने स्थान से) हटना, टलना या सरकना।
(सं. हल्लन = इधर-उधर लुढ़कना)
(सं. हल्लन = इधर-उधर लुढ़कना)
(अपने स्थान पर) जमा या दृढ़ न रहना।
(सं. हल्लन = इधर-उधर लुढ़कना)
(सं. हल्लन = इधर-उधर लुढ़कना)
(पानी में) पैठना या धँसना।
(सं. हल्लन = इधर-उधर लुढ़कना)
(मन का) चंचल होना या डिगना।
(सं. हल्लन = इधर-उधर लुढ़कना)
हिलना-मिलना-मेल-जोल रखना।
नीचे-ऊपर या इधर-उधर डुलाना।
(पानी में) धुसाना या पैठाना।
नीचे-ऊपर या इधर-उधर डुलायी।
उ.-निकसि कंदरा हूँ तें केहरि सिर पर पूँछ हिलायो-३४८०।
मुहा.- हिलिमिलि, हिलमिली-(१) मेल-जोल या प्रेमपूर्वक। उ.-(क) आनि खेलत रहौ प्यारि स्याम तुम हिलमिली-७०७। (ख) आपुन जाइ मधु पुरी छाए, उहाँ रहे हिलिमिलि-ना. ४४३९। (२) इकट्ठा एकत्र होकर।
हेल-मेल या प्रेम का व्यवहार करो।
उ.-वाही बिधि मोसौं हिलिमिलौ- ९-२।
मुहा.- हिलोर (बहु. हिलोरे) लेना-(पानी का) लहराना या तरंगित होना। (जी का) हिलोरा (बहु. हिलोरे) लेना-खूब मौज या मस्ती पर आना।
प्रेम या प्रीति का संबंध।
हिलनि-मिलनि-परस्पर मेल-जोल याप्रेम के साथ मिलना और रहना।
सूरदास प्रभु की सुनजरि उदित अंग, हिलनि-मिलनि तुव प्रीति प्रगटाई-ना. ३२७६।
हिला-मिला-मेल-जोलमें आया हुआ।
(स्थान से) उठाना या हटाना।
मुहम्मद साहब के नाती हुसेन के बंशजों की उपाधि।
द्रौपती का वह नाम जो उसने अज्ञातवास काल में राजा विराट के यहाँ रहने के लिए रखा था।
पानी को हिलाकर लहरें उठाना।
इधर-उधर हिलाना-डुलाना, लहराना।
उ.-अमृत-सिंधु हिलोरि पूरन, कृपा दरसन देइ-ना. २४४९।
उ.-ग्वाल-बाल सब संग मुदित मन जाइ जमुन-जल न्हाइ हिलोरी-ना. ३५२६।
तेरे बल भामिनी बदत नहिं उपजत काम हिलोरे-ना. ३४४४।
विचार, स्वभाव आदि का साम्य या मेल।
मुहा.- हिसाब बैठना- स्वभाव या प्रकृति में समानता होना, मेल मिलना।
आय-व्यय का ब्योरा या लेखा।
रुपये-पैसे का लेन-देन, उधार लेना-देना।
हिलोलना, हिल्लोलनो, हिल्लोलना, हिल्लोलनो
उ.-राम-नाम सरि तऊ न पूजै, जौ तनु गारौ जाइ हिवार-२-३।
हिसका-हिसकी-पारस्परिक स्पर्द्धा।
कम या क्षीण होना, ह्रास होना।
गिनकर या गणित करके लेखा तैयार करने का कार्य।
लेनदेन या आय-व्यय का लिखित विवरण।
मुहा.- हिसाब करना-जो जिसको देना हो, देकर साफ करना। कच्चा हिसाब- ऎसा ब्योरा जो मोटे तौर पर या अधूरे ढंग से तैयार किया गया हो। चलता हिसाब-लेन-देन या उधार बिक्री का जारी सिलसिला। हिसाब चलना- (१) लेन-देन का लेखा रखा जाना। (२) उधार का लिखा जाना। हिसाब चुकता करना या चुकाना- (१) जो कुछ बाकी हो, वह अदा करना। (२) किसी के पिछले अपराध का उचित दंड देना। हिसाब जाँचना- आय-व्यय के विवारण की जाँच करना। हिसाब जोड़ना-आय-व्यय या लेनदेन का लेखा करना। टेढ़ा हिसाब- (१) गड़बड़ ढंग से लिखा गया लेन-देन का ब्योरा। (२) गड़बड़ व्यवहार या रीति। हिसाब देना- (१) आय-व्यय या लेन-देन का ब्योरा बताना या समझाना। (२) किसी कार्य के संपादन का ठीक या उचित उपाय या युक्ति बताना। हिसाब पर चढ़ना-लेखेमें लिखा जाना। हुसाब बंद करना -(१) लेन-देन का सारा विवरण तैयार कर जोड़ लेना। (२) लेने-देने का कार्य आगे न चलाना। हिसाब बराबर करना- (१) जो देना हो, वह देना ; जो लेना हो, वह लेना। (२) अपना काम पूरा करना। बेड़ा हिसाब- (१) कोई कठिन या जटिल कार्य। (२) गड़बड़ व्यवहार या रीति। बे हिसाब-बहुत ही अधिक। हिसाब बेबाक करना-जो बाकी हो, वह दे-लेकर हिसाब चुकता करना। हिसाब बैठना- (१) सब बातों की उचित व्यवस्था या इच्छानुसार प्रबंध हो जाना। (२) सुख-सुविधा का प्रबंध होना। हिसाब में जमा होना- लेन-देन के ब्योरे में किसी से पायी हुई रकम का लिखा जाना। हिसाब में लगना- लेन देन में लगना। (किसी) हिसाब मे लगना- किसी कार्य, युक्ति या उपाय में जुटना। हिसाब में लगाना-लेन-देन के ब्योरे में लिखना या सम्मिलित करना। (किसी) हिसाब में लगाना-किसी कार्य, युक्ति या उपाय के साधन में जुटाना। हिसाब रखना-आय-व्यय या लेन-देन का ब्योरा रखना। हिसाब लगना या लड़ना- (१) कोई तदबीर या युक्ति ठीक होना जिससे अभीष्ट सिद्ध हो सके (२) तबियत या मेल मिलना। हिसाब लेना या समझना- आय-व्यय या लेन-देन का ब्योरा या विवरण पूछना और समझना। हिसाब समझाना-आय-व्यय या लेन-देन का ब्योरा या विवरण समझाना। हिसाब से-(१) अनुमान से। (२) लिखे हुए ब्योरे या विवरण के अनुसार।
मुहा.- टेढ़ा हिसाब-गणित का कठिन, पेचीदा या जटिल प्रश्न। (२) मुश्किल या जटिल कार्य।
मुहा.- हिसाब से- (१) दर या भाव से। (२) क्रम, गति या परिणाम के अनुसार।
बॅधी हुई रीति या व्यवस्था।
मुहा.- हिसाब से-विचार या ध्यान से, औचित्य की दृष्टि से।
बल लगा कर अपनी तरफ लाना या खींचना।
किसी चीज का गुण निकाल लेना।
लकीरों से कोई आकृति या आकार बनाना।
व्यर्थ या निरुद्देश्य धूमना-फिरना।
घोड़े के बोलने का शब्द, हिनहिनाहट।
उ.- गर्जनि पणव निसान शंख रव हय गज हींस चिकार-पृ. ५७० (२)।
घोड़े का बोलना, हिनहिनाना।
एक अव्यय जिसका प्रयोग किसी बातपर जोर या बल देने, निश्चय सूचित करने, अल्पता या परिमिति बताने, हीनता या उपेक्षा जताने, स्वीकृति देने आदि के लिए होता है।
[सं. हिं. ( निश्चयार्थक)]
उ.-पहिलैं हौं ही हो तब एक-२-३८।
उ.- जो बीतति मोको री सजनी कहौं काहि यह ही की -पृ ३३१ (९)।
उ.- एक दिवस मेरे गृह आए, मैं ही मथति दही। (ख) जो मन मैं अभिलाष करति ही, सो देखति नँद-घरनी-१०-१२३।
मुहा.- हीक आना या मारना-हलकी-हलकी दुगंध आने लगना।
(हिं. हिचकना या अनु. हिच्)
बँटने या विभक्त होने पर प्राप्त भाग।
व्यापार में पूँजी, लाभ-हानि आदि का साझा या भाग।
वह जिसे किसी वस्तु का हिस्सा मिला हो या मिलने को हो।
किसी कार्य आदि में भाग लेनेवाला, सहभागी।
हिस्सेदार होने का भाव या स्थिति, सहभागिता।
(घोड़ों का)बोलना, हींसना या हिनहिनाना।
एक प्रसिद्ध मसाला जो अफगानिस्तान और फारस में अधिकता से होनेवाले एक पौधे का जमाया हुआ दूध का गोंद होता है।
उ.- (क) हींग हरद म्रिच छौंके तेले-३९६। (ख) हींग मिरच पीपरि अजवाइनि ये सब बनिज कहावैं-पृ. २४३ (८)। मूँग ढरहरी हींग लगाई-पृ. ४२१ (२१)।
चाहना, इच्छा या कामना करना।
व्यर्थ या निरुद्देश्य धूमना-फिरना।
खोजना, ढूँढ़ना, पता लगाना।।
(सं. अधिष्ठा, प्रा. अहिट्ठा)
(सं. अधिष्ठा, प्रा. अहिट्ठा)
बिना, वंचित, रहित, शून्य।
घटिया, निम्नकोटि का, निकृष्ट।
उ.-मोसों कोउ पतित नहिं अनाथ हीन दीन-१-१८२।
उ.- अधर मधुर मुसुक्यानि मनोहर, करति मदन मन हीन-४७८।
अपने को व्यक्ति-विशेष अथवा व्यक्तियों से हीन समझने की क्षुद्र भावना।
निर्दिष्ट कर्म न करनेवाला।
एक काव्य-दोष जो क्रम-व्यवस्था भंग करने पर होता है।
वह तर्क या बात जो प्रमाण से सिद्ध या पुष्ट न हो।
जिसमें बल न हो या जिसका बल घट गया हो।
सैर करने या मन-माना घूमनेवाला।
बौद्ध धर्म की वह प्राचीन शाखा जिसका प्रचार सिंहल, बरमा, स्याम आदि देशों में हुआ था और जिसके ग्रंथ मुख्यतः पाली भाषा में हैं।
एक काव्य-दोष जो किसी रस के उत्कर्ष में बाधक प्रसंगों के समावेश से होता है।
जो निम्न या शूद्र वर्ण का हो।
ऎसा कथन जिसमें पूर्वापर विरोध हो।
जो सर्वांग या पूर्ण न हो, अधूरा।
उ.-ताको करत हीना-पृ २८८ (९१)।
जिसका उद्देश्य या कार्य पूर्ण न हुआ हो, विफल।
किसी तत्व, गुण आदि से खाली, रहित।
उ.-सूरदास प्रभू क्हौं कहाँ लगि, हे अपान मति हीनी-पृ. ५६४ (४९)।
उ.-कामधेनु तैं नैंकु न हीनी-१०-३२।
उ.-बरु ए प्रान जाहिं ऎसे ही बयन होहिं क्यों हीनो- पृ. ५१६ (३४)।
वह उपमा जिसमें बड़े या महत के लिए छोटा या क्षुद्र उपमान प्रस्तुत किया जाय।
किसी तत्व, गुण आदि से खाली, रहित।
उ.-महा मत्त बुधि-बल कौ ही नौ देखि करै अंधेरा-१-१८६।
उ.-अहिपति-सुता-सुवन सन्मुख ह्वै बचन कहथौ इक हीनौ-१-२९।
हीय, हीयरा, हीया, हीयो, हीयौ
(सं.हृदय, प्रा़ हिअ, हि् हिय या हिया)
मुहा.- कँप्यौ हीयौ-हृदय काँपने लगा, अत्यंत भयभीत हो गया। उ.- तुव सतम जज्ञ अरंभ लखि इंद्र कौ राज-हित कँप्यौ हीयौ-४-११।
लकड़ी के भीतर का बढ़िया भाग।
शरीर के भीतर का सार, धातु, वीर्य।
किसी व्यक्ति, संस्था आदि की साठवें वर्ष मनायी जाने वाली जयंती।
एक बहुमूल्य रत्न जो बहुत कड़ा और चमकदार होता है।
उ.-कंठ सुमाल हार मुकता के हीरा रतन अपार-ना. ४४३३।
मुहा.- हीरा खाना या हीरे की कनी चांटना-हीरे का कण या चूर खाकर आत्महत्या करना।
हीरे जैसा अत्यंत श्रेष्ठ व्यक्ति, नररत्न।
उ.-कत अपनी परतीति नसावत, मैं पायौ हरि-हीरा- १-१३४।
हीरे जैसी बहुमूल्य वस्तु।
हीरे के समान स्वच्छ, कांतियुक्त और मूल्यवान।
उ.-अमला अबला कंजा मुकुता हीरा नीला प्यारि-१५८०।
प्रचीन कहानियों में वर्णित तोते की एक जाति जिसका रंग सुनहरा माना गया है।
अपने स्थान से इधर-उधर होना।
चलायमान या गतियुक्त होना।
जमा हुआ या दृढ़ न रह जाना।
(मन का) डिगना या चंचल होना।
कीसी कार्य की सिद्धि के लिए निकला हुआ मार्ग, उपाय या साधन।
मुहा.- हीला निकलना-कार्य-साधन का ढंग निकलना।
एक शब्द जिसे कहकर सुननेवाला यह सूचित करता है कि मैं सुन रहा हूँ।
स्वीकृत्ति सूचक शब्द, हाँ।
वह धन जो कुछ जातियों में वरपक्ष की ओर से कन्या पक्ष वालों को विवाह-खर्च के लिए दिया जाता है।
हुंडी लिखने या भेजने की दस्तूरी।
वह निधि-पत्र जिस पर रुपया लिखकर महाजनों में लेन-देन होता है।
मुहा.- हुंडी पटना-हुंडी का रुपया चुकाया जाना। हुंडी सकारना-हुंडी का रुपया देना या देना स्वीकार करना।
दर्शनी हुंडी-वह हुंडी जिसको दिखाते ही उसका रुपया देने का नियम हो। मियादी हुंडी-वह हुंडी जिसका रुपया नियत तिथि तक या उसके बाद देने का नियम हो।
पुरानी हिंदी की पंचमी और तृतीया की विभक्ति, से।
(प्रा. विभक्तिं 'हिंतो' )
(प्रा. विभक्तिं 'हिंतो' )
(प्रा. विभक्तिं 'हिंतो' )
उ.-आगे सिंह हुँकारत आवत निर्भय बाट जनावें-सारा. ३७५।
सुननेवाले की 'हूँ' करने की क्रिया जो सूचित करती है कि वह वक्ता की बात सुन रहा है।
उ.-(क) कहत बात हरि कछू न समुझत, झँठहिं भरत हुँकारी-१०-१६७। (ख) यह सुनि सूर स्याम मन हरषे, पौढ़ि गए हँसि देत हुँकारी-१०-१९७।
स्वीकृति या सहमति-सूचक क्रिया।
रुपया या रकम सूचित करने की रेखा, बिकारी।
(सं. उप, प्रा. उअ, हिं. ऊ)
होना' क्रिया का भूतकालीन एकवचन रुप।
गीदड़ों का 'हुआ-हुआ' बोलना।
मुहा.- कलेजा (या जी) हुकर-पुकर करना- (१) डर या घबराहट से जी का धकधक करना। (२) बहुत घबराहट या अधीरता होना।
उ.- फिरि कहि कहि हरि मल्ल हुकारथौ- पृ. ४६९ (६)।
शिव के उपासकों का वर्ग या संप्रदाय।
उ.- सैसवता में हे सखी, जोबन कियौ प्रवेस-२०६५।
मुहा.- हुकूमत चलना-अधिकार या प्रभुत्व माना जाना। हुकूमत चलाना- (१) अधिकार या प्रभुत्व से काम लेना, दूसरों को केवल आज्ञा देते रहना। (२) रोब, अधिकार या बड़प्पन दिखाना। (२) राजनीतिक शामन या अधिकार।
तम्बाकू पीने का एक नल-यंत्र।
एक जात-बिरादरी के लोगों का एक दूसरे के हाथ का हुक्का और पानी पीकर, सामाजिक दृष्टि से समान मानने या समाज में सम्मिलित करने का व्यवहार।
मुहा.- हुक्का-पानी बंद करना-किसी सामाजिक अपराध का दंड देने के लेए किसी का छूआ हुक्का-पानी न पीकर जैसे उसे बिरादरी से निकाल देना। हुक्का-पानी बंद होना- किसी सामाजिक अपराध के दंडस्वरूप बिरादरी से निकाल दिया जाना।
डराने के लिए जोर का शब्द करना।
मुहा.- हुक्म उठाना-(१) आज्ञा या आदेश लौटा लेना। (२) आज्ञा पालन के लिए सेवा में रहना। हुक्म उलटाना-एक आज्ञा का निराकरण करनेवाली दूसरी आज्ञा प्राप्त करना। हुक्म की तामील- आज्ञा का पालन। (किसी का) हुक्म चलना-किसी की आज्ञा का पालन करने के लिए सबका बाध्य होना, किसी की आज्ञा सर्वमान्य होना। हुक्म चलाना-(१) अपना बड़प्पन या अधिकार सूचित करते हुए कोई आज्ञा देना। (२) आज्ञा या आदेश को प्रचलित करना। हुक्म जारी करना- (सर्व साधारण के लिए) आज्ञा या आदेश को प्रचलित करना। हुक्म तोड़ना-आज्ञा या आदेश के विरुद्ध काम कराना। हुक्म देना-आदेश देना। हुक्म बजाना या बजा लाना-(१) आज्ञा का पालन करना, आदेश के अनुसार कार्य करना। (२) किसी की सेवा या अधीनता में रहकर उसकी इच्छानुसार कार्य करना। हुक्म मानना-किसी के आदेश के अनुसार काम करना। हुक्म मिलना-आज्ञा या आदेश दिया जाना। जो हुक्म-(आपके) आदेश से अनुसार ही सारा काम होगा।
मुहा.- हुक्म लेना-इजाजत या अनुमति लेना।
सर्व-साधारण के लिए प्रचारित, राज्य या शासन की आज्ञा।
मुहा.- हुक्म उठाना-राज्य या शासन की पूर्व प्रचारित आज्ञा को रद्द हर देना।हुक्म उलटाना- राज्य या शासन की पूर्व प्रचारित आज्ञा का निराकरण करनेवाली दूसरी प्राप्त कर लेना। हुक्म चलाना या जारी करना-सर्वसाधारण के लिए किसी आज्ञा को प्रचलित करना।
मुहा.- हुक्म में होना-शासन या अधिकार में होना।
विधि या धर्मशास्त्र की आज्ञा।
आज्ञानुसार कार्य करनेवाला।
अधिकारी या शासक के लिए अधीनस्थ कर्मचारियों या सामान्य व्यक्तियों का संबोधन।
(किसी के) सामने या समक्ष।
उ.-किनि देख्यो, किनि कही बात यह जो मो हुजूर कहै आनी-पृ ३८० (१३)।
किसी प्रतिष्ठित या अधिकारी की समक्षता।
(अ. हुजूर +हिं. प्रत्य. ई)
किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति, अधिकारी या शासक की सेवा में हर समय रहनेवाला सेवक।
किसी की चापलूसी में हर समय लगा रहनेवाला मुसाहब।
मुहा.- जी हुजूरी करना-चापलूसी या खुशामद करना।
अधिकारी या शासक का, सरकारी।
व्यर्थ का तर्क-वितर्क करनेवाला।
कहासुनी या तकरार करने का आदी।
अचूक, अवश्य गुणकारी (औषध)।
हिचकियाँ ले लेकर रोना, सिसकना।
पेट की वायु का कुछ रुरक-रुक कर झोंके के साथ गले से निकलना।
बहुत देर तक रोने पर इसी प्रकार सिसकी के साथ साँस का निकलना।
किसी प्रतिष्ठित या अधिकारी व्यक्ति की समक्षता।
मुहा.- (किसी के) हुजूर में- (किसी प्रतिष्ठित या अधिकारी के) आगे या सामने।
बादशाह या अधिकारी का दरबार या उसकी कचहरी।
हुड़कने की क्रिया या भाव।
बच्चे का, जिससे वह बहुत हिला हो, उसके वियोग में बहुत रोना और दुखी होना।
बच्चे का किसी कारण से डर जाना।
हुड़कने की क्रिया या भाव।
धमा-चौकड़ी, उछल-कूद और उपद्रव।
एक प्रकार का छोटा ढोल या बाजा।
उ.-बाजत हुड़ुक मँजीरा नूपुर नाना भाँति नचायो-सारा. ४०७।
हुड़ुक' नामक छोटा ढोल या बाजा।
होना' का प्राचीन भूतकालिक रूप, था।
हुतागि, हुतागिनि, हुताग्नि
हुतागि, हुतागिनि, हुताग्नि
उ.- (क) लछिमन रचौ हुतासन भाई-९-१६१। (ख) मलयज गरल हुतासन मारुत साखामृग रिपुवीर- पृ. ३६९ (३)।
उ.-क्षमा भयो जल परे हुतासा-पृ २३१ (६९ )।
करण और अपादान करकों का चिह्र, से, द्वारा।
हवन करते समय अग्नि में डाला हुआ, आहुति रूप में दिया हुआ।
('होना' क्रिया का प्राचीन भूत.)
होना' का प्राचीन भूतकालिक, बहुवचन, स्त्रीलिंग रूप; थीं।
उ.-(क) ऎसो हाल हमारो कीन्हौ जात हुतीं दहि लै हौ-ना. २०८४। (ख) गोपी हुतीं प्रेमरस माती-पृ ४२० (१६)।
होना' का प्राचीन भूतकालिक, एकवचन, स्त्रीलिंग रूप; थीं।
उ.- (क) साबिक जमा हुती जो जोरी-१-१४३। (ख) ठानी हुती और कछु मन मैं-१-२९९। (ग) तहँ उरबसी सखिनि समेत आई हुती स्नान कैं हेत-९-२। (घ) बैठी हुती जसोदा मंदिर-१०-५०। (ङ) वह जो हुती प्रतिमा समीप की-पृ. ४९० (४)। (च) हुती बड़ी नगरी-पृ ५२४ (४)।
होना' क्रिया का प्राचीन भूतकालिक, बहुवचन, या एकवचन आदरार्थक पुल्लिंग रूप।
उ.- (क) जब हुते नंद-दुलारे-१-२५। (ख) अरजुन के हरि हुते सारथी-१-२६४। (ग) असुर द्वै हुते बलवंत भारी-८-११। (घ) इक हरि चतुर हुते पहिले हीं-पृ ५४६ (४)
होना' क्रिया का प्राचीन भूतकालिक एकवचन, पुल्लिंग रूप।
उ.- (क) गर्भ परीच्छित रच्छा कीनी, हुतौ नहीं वस माँ कौ-१- ११३। (ख) एकै चीर हुतौ मेरे पर-१-२४७। (ग) राजा रहत हुतौ तहँ एक-५-२। (घ) दसरथ नृपति हुतौ रघुबंसी-१०-१९८।
जोर से या बलपूर्वक आगे बढ़ना या आघात करना।
जोर से या बलपूर्वक आगे बढ़ना या आघात करना।
किसी चीज पर चढ़कर उसे बार-बार जोर से नीचे दबाना।
हुमड़ना, हुमड़नो, हुमरना, हुमरनो
(द्रव पदार्थ का) उतराकर बह चलना।
हुमड़ना, हुमड़नो, हुमरना, हुमरनो
(किसी हलके पदार्थ का) ऊपर उठकर फैलना या छा जाना।
किसी चीज पर चढ़कर उसे बार-बार नीचे दबाना।
पैरों को तानकर जोर से आघात करना।
उ.- एक गाँव एक ठाँव को बास एक तुम कैहौ, क्यौं मैं सैहौं-८४३।
करण और आपादान कारकीय चिह्न, से, द्वारा।
उ.- बात सुने तें बहुत हँसोंगे चरन-कमल की सों।
उ.- मन हरि सों, तनु धरहिं चलावति।
(सं. शुण्ड या हिं. सटना, सोंटा)
मुहा.- सोंटा चलना- मार-पीट होना। सोंटा चलाना या जमाना- सोंटे से प्रहार करना।
मुहा.- हुन बरसना बहुत आय या लाभ होना।
(सं. हवन +हिं. प्रत्य. ना)
(सं. हवन +हिं. प्रत्य. ना)
(सं. हवन +हिं. प्रत्य. ना)
कारीगरी जाननेवाला, कलाविद्।
हुमड़ना, हुमड़नो, हुमरना, हुमरनो
तल या सतह से कुछ ऊँचा होना, उकसना।
हुमड़ना, हुमड़नो, हुमरना, हुमरनो
हुमड़ना, हुमड़नो, हुमरना, हुमरनो
हुमड़ना, हुमड़नो, हुमरना, हुमरनो
(हवा न चलने पर) गर्मी होना।
जोर से ऊपर उठाना, उछालना।
एक कल्पित पक्षी जिसके संबंध में प्रसिद्ध है कि उसकी छाया जिस पर पड़ जाती है, वह राजा हो जाता है।
वह माला या हार जिसमें रजत या स्वर्ण मुद्राएँ गुँथी हों।
हुड़ुक' नामक ढोल या बाजा।
उ.- ढाढ़ी और ढाढ़िनि गावैं, ठाढ़े हुरकें बजावैं-१०-३१।
उ.-हुलसत, हँसत, करत किलकारी, मन अभिलाष बढ़ावैं-१०-४५।
बहुत प्रसन्न होना, अत्यंत उल्लास में होना।
प्रसन्न या प्रफुल्लित करना।
जो सदा प्रसन्न रहे, हँसमुख।
प्रसन्न या प्रफुल्लित करना।
उ.- महरिनिरखि मुख हिय हुलसानी-१०-४६।
उ,- ब्रजजन निरखत हिय हुलसाने-१०-११७।
प्रसन्न या आनंदित होती है।
उ.-आजु गयौ मेरौ गाइ चरावन, कहि-कहि मन हुलसावति-४२२।
प्रसन्न या आनंदित करनेवाले।
उ.-सूरदास प्रभु जनमे भक्त-हुलसावन रे-१०-२८।
प्रसन्न या प्रफुल्लित करनेवाली।
उ.- जैसी ही हरी हरी भूमि हुल-सावनी मोर मराल मुख होत न थोरनो-पृ. ४१४ (८०)।
प्रसन्न होकर, उमंग में भरकर।
उ.- मुख प्रतिबिंब पकरिबे कारन हुलसि घुटुरुवनि धावत-१०-१०२।
बहुत प्रसन्न, बहुत उमंग में भरा हुआ।
कुछ लोगों के अनुसार, गो. तुलसीदास की माता का नाम।
उ.- त्यौं ब्रज-जन हुलसे सबै आवत हैं नँद-नंद-५८९।
उमंग या उल्लास से भर गया।
उ.- रति-जल-जलज हियौ हुलस्यौ मन पलक पाँखुरी फूली-पृ ३९९ (७९)।
एक पौधा जिसकी पत्तियों का साग खाया जाता है।
लाठी, भाले आदि को जोर से पेलना।
हर्ष की उमंग, उल्लास, आह्लाद।
उ.- (क)मारथौ ताहि प्रचारि हरि सुर-मन भयौ हुलास-३-१२। (ख) आए बाहरि निकसि कै, मन सब कियौ हुलास-४३१। (ग) सूर स्याम जसुमति घर लै गई, ब्रज जन मनहिं हुलास-६०४। (घ) सूर अरुन आगमन देखि कै प्रफुलित भए हुलास-पृ. २७५ (४४)।
किसी व्यक्ति के रूप-रंग या उसकी आकृति का ऎसा विवरण जिससे उसको सहज ही पहचाना जा सके।
उ.- सब दल होहि हुसियार चलहु मठ घेरहिं जाई- पृ. ५७२ (८)।
जो समझने योग्य अवस्था का हो, सयाना।
मुहम्मद साहब के नाती जो करबला के मैदान में मारे गये थे। मुहर्रम इन्हीं के शोक में मनाया जाता है।
(सं. उप = आगे, प्रा. उव, हिं. ऊ.)
कलेजे की पीड़ा या हृदय की वेदना जो रहरह कर उठे।
उ.-हृदय जरत है दावानल ज्यों, कठिन बिरह की हूक - पृ. ४८६ (४९)।
ध्यानपूर्वक सूनना सूचित करने का शब्द।
उ.-स्याम-बलराम बिनु दूसरे देव कौं स्वप्न हूँ माहिं नहिं हृदय ल्याऊँ-१-१७७।
होना' क्रिया का वर्तमानकालिक, उत्तम पुरुष, एकवचन रूप। सर्व. हौ, मैं।
विशेष दुःख सूचित करने के लिए गैयाँ धीरे-धीरे या हुँड़ककर बोलती हैं।
उ.-(गाय) जल-समूह बरसति दोउ आँखें, हूँकति लीने नाउँ-पृ. ५५८ (२१)।
गाय का, विशेष दुख सूचित करने के लिए हुड़क-हुड़ककर बोलना।
(सं. अर्द्धचतुर्थ, प्रा. अद्धुट्ठ)
(सं. शुण्ड या हिं. सटना, सोंटा)
उ.- (क) अति प्यौसर सरस बनाई। तिहिसोट-मिरिच रुचि नाई-१०-१८३। (ख) कूट काइफर सोंठि चिरैतौ कटजीरा कहुँ देखत-११०८।
(प्रसूता स्त्री के लिए) सोंठ तथा कुछ मेवा-मसालों का बना हुआ लडडू।
तपी हुई भूमि पर वर्षा का पहला पानी पड़ने या भुने हुए चने या बेसन की सुगंध के समान।
एक तरह का सुगंधित मसाला जिससे स्त्रियाँ केश धोती हैं।
एक मसाला जो तेल को सुगंधित करने के लिए उसमें मिलाया जाता है।
उ.- बासौंधी सिखरनि अति सोंधी-२३२१।
कसक, पीड़ा या वेदना होना।
पीड़ा से चौंक-चौंक पड़ना।
उ.- बासर स्याम बिरह अहि ग्रासित हूजत मृतक समान-पृ. ४२३ (३१)।
उ.-बृंदाबन द्रुम लता हूजिए-पृ. ३४४ (३२)।
होना चाहिए, होना उचित है।
उ.- पर-मद पिये. मत्त न हूजियत काहे कौं इतरात-ना. ४३०५।
उ.-परसन हमहिं सदा प्रभु हूज्यो-१०३८।
अपने स्थान से हटना या टलना।
(लड़ाई या संघर्ष से) पीछे हटना या पीठ फेरना।
(चिढ़ाने के लिए) किसी की भावभंगी, मुद्रा आदि की नकल करना या होंठ बिचकाना।
(किसी को चिढ़ाने य बनाने के लिए) अँगूठा दिखाने, होंठ बिचकाने और हाथ मटकाने की चेष्टा या क्रिया।
मुहा.- हूठा देना-उक्त क्रिया या चेष्टा करना।
एक प्राचीन मंगोल जाति जिसने चौथी पाँचवीं शताब्दी में अनेक बार भारत पर आक्रमण किये थे।
स्वर्ग की अप्सरा (मुसलमान)।
लाठी, भाले आदि की नोक जोर से घुसाना या धँसाना।
लपटों के साथ अग्नि के जलने पर होनेवाला शब्द।
छीनकर लिया या हरण किया हुआ।
छीनने या हरण करने की क्रिया या भाव, लूट, हरण।
वह मांस-पिंड जो 'हृदय' कहलाता है, हृदय-कोश।
उ.- जे पद-कमल संभु-चतुरानन हृद अंतर लै राखे-५७१।
मन को मुग्ध करने या रुचिकर लगनेवाला।
मन को क्षुब्ध या चंचल करनेवाला।
जिसके हृदय में कोमल भावों का सहज ही उदय हो जाय, सहृदय, भावुक।
(शोक, करुणा आदि की वह घटना) जिससे हृदय को बहुत शोक हो या जिससे हृदय में करुणा का उदय हो।
मन को अत्यंत मुग्ध करनेवाला।
अत्यंत शोक या करुणा उत्पन्न करनेवाला।
उ.-नाभि हृद, रोमावली-अलि चले सहज सुभाव-१-३०७।
जो अच्छी तरह समझ में आ गया हो, जिसका ठीक ठीक बोध बोध हो गया हो।
छाती की बायीं ओर का वह भीतरी मांसकोश-जैसा अवयव जिसमें धड़कल होती है और जिसमें से होकर शुद्ध लाल रक्त शरीर की नाड़ियों में पहुँचता है।
मुहा.- हृदय धड़कना-(१) जीवित होने की स्थिति सूचित होना। (२) भय, आशंका आदि से हृदय की धड़कन बढ़ जाना।
मुहा.- हृदय से लगाना- छाती से लगाना, भेंटना, आलिंगन करना।
छाती के मध्य भाग में स्थित माना हुआ वह रागात्मक अंग जो प्रेम, हर्ष, शोक, करुणा, क्रोध आदि मनोविकारों का उत्पत्ति-स्थान माना जाता है।
उ.-ता छिन हृदय-कमल प्रफूलित ह्वै जनम सफल करि लेखौं-।
मुहा.- हृदय उमड़ना-मन में प्रेम, करुणा आदि का वेग उत्पन्न होना। हृदय जलना- (१) मन में दुख, शोक आदि का उत्पन्न होना। (२) किसी की उन्नति, समृद्धि आदि देखकर ईर्ष्या होना। हृदय जरत है-मन को बहुत बिकल कर देनेवाले दुख, शोक आदि का अनुभव होता है। उ.-हृदय जरत है दावानल ज्यौं कठिन विरह की हूक- पृ. ४८६ (४९)। (हरष, सुख आदि) हृदय में न अमाना या समाना-बहुत ही हर्ष या प्रसन्नता होना। हरष हृदय न माइ, सुख न हृदय समाइ-बहुत ही आनद या सुख का अनुभव होता है। उ.- (क) सूरदास प्रभु सिसुता कौ सुख सकै न हृदय समाइ-१०-१७८। (ख) हरष अक्रूर हृदय न माइ-पृ. ४६२ (५६)। हृदय भर आना-मन में प्रेम, शोक, करुणा आदि का उत्पन्न होना। हृदय विदीर्ण होना-दुख, शोक करुणा आदि के कारण मन को बहुत कष्ट होना।
मुहा.- हृदय धरना या धारना-हृदयंगम करना। हृदय धरि-हृदयंगम करके या करो। उ.-सदगूरु कौ उपदेस हृदय धरि जिन भ्रम सकल निवारथौ-१-३३६। बचन हृदय नाहिं धारथौ-उपदेश को हृदयंगम नहीं किया या स्मरण नहीं रखा। उ.-उन यह बचन हृदय नहिं धारौ-३-६। हृदय की गाँठ- (१) मन का दुर्भाव। (२) छल कपट। हृदय लाना-ध्यान या स्मरण करना। हृदय ल्याऊ-ध्यान या स्मरण करूँ। उ.-स्याम बलराम बिनु दूसरे देव कौं स्वप्न हूँ माहिं नाहिं हृदय ल्याऊँ-१-१७७।
किसी वस्तु का सार या तत्व भाग।
हृदय पर विशेष प्रभाव डालनेवाला।
हृदय में दया या करुणा उत्पन्न करनेवाला
मन को लुभाने या मोहनेवाला।
हृदयेश, हृदयेश्वर, हृदयेस्वर
हृदयेश, हृदयेश्वर, हृदयेस्वर
हृदय को उत्मत्त कर देनेवाली।
मन को अत्यंत मुग्ध करनेवाली।
(सं. 'हृद' का अधिकरण रूप)
उ.- ऎसौ ज्ञान हृदै मैं आनौ-३-१३।
उ.- तेरे हृदै न संसय राखौं-२-३७।
समझ या ध्यान में आया हुआ।
उ.- दिति दुर्बल अति, अदिति हृष्ट चित देखि सूर संधान-९-२०।
उ.- सूरदास प्रभु की बानक देखे गोपी-ग्वाल टारे न टरत निपट आवै सोंधे की लपट-८३९। (ख) पवन गवन आवें सोंधे की झकोरे-२२८७।
उ.- नासिका अति सुंदर राजत सोंवनिया।
उ.- सूरदास ऎसे स्वामी कौं देहिं पीठि सो अभागे-१-८।
मिटटी चूर करने का पाटा (खेती)।
दीनतापूर्वक या गिड़गिड़ाकर हँसने का शब्द।
मुहा.- हें हें करना- (१) खीसें निपोरना। (२) दीनतापूर्वक या निर्लज्जता से हँसना।
उ.- (क) मानी हार बिमुख दुरजोधन जाके जोधा हे सौ भाई-१-२४। (ख) मनसा करि सुमिरत हे जब-जब मिलते तब तबहीं-१-२८३। (ग) माता सौं कछु करते कलह हे, रिस डारी बिसराई हो-७००।
अधिकार, बल या ऎंठ दिखाने की क्रिया या भाव, अक्खड़पन, उद्धतता।
मुहा.- हेकड़ी दिखाना- ऎंठ, अकड़ या अक्खड़पन दिखाना। (किसी की) हेकड़ी भुला देना या भुलाना- किसी को नीचा दिखाकर गर्व या अभिमान चूर करना। हेकड़ी भूल जाना या भूलना- (१) (दूसरे के सामने) नीचा देखकर मन ही मन हार मानना या लज्जित होना।
(सं. अधस्थः , प्रा. अहट्ठ)
जो किसी बात में घटकर या कम हो।
(सं. अधस्थः , प्रा. अहट्ठ)
जो (किसी से) घटकर या कम हो।
उ.- (क) देखौ करनी कमल की (रे) कीन्हौं रवि सौं हेत-१-३२५। (ख) सूरदास-प्रभु खात परस्पर माता अंतर-हेत बिचारथौ-४०७। (ग) इहिं बिधि रहसत-बिलसत दंपति, हेत हियैं नहिं थोरे-७३२। (घ) बाहर हेत हितू कहावत, भीतर काज सयाने-ना. ४६२६।
उ.- जज्ञ-भाग नहिं लियौ हेत सौ, रिषिपति पतित बिचारे- १-२५।
उ.-मुक्ति-हेत जोगी स्रम साधैं-१-१०४।
उ.-सखी री, हरि आवें केहि हेत-२८००।
उ.-कपट हेतु कियौ हरि हमसे खोटो होहिं खरी-पृ. ४८५ (४१)।
उ.-हारि मानि हहरथौ हरि चरननि हरषि हियैं अब हेतु करैं-पृ. २२० (८९)।
वह बात या कार्य जिसका कोई कारण हो।
उ.- जानि पिय अतिहिं आतुर नारि आतुरी गई बन-तीर तनु सुद्ध हेती-ना. ३२२२।
कारण-रूप वस्तु या व्यक्ति।
वह तर्कसंगत बात या युक्ति जिससे कोई सिद्धांत या निष्कर्ष निकाला जाय या दूसरी बात सिद्ध हो।
एक अर्थालंकार जिसमें कारण के साथ ही कार्य का अथवा कारण का ही कार्य-रूप में उल्लेख होता है।
सुमेरु पर्वत (जो पुराणों में सोने का बताया गया है)।
क्रिया के भूतकाल का एक भेद।
किसी बात को सिद्ध करने के लिए बताया जानेवाला ऎसा कारण जो ठीक जान तो पड़े, पर वास्तव में ठीक न हो।
शीत की वह ऋतु जो अगहन-पूस में होती है।
उ.-(क) कमलन यों हम हरी हेम अति कासौं कहै दुख टेरि-पृ. ४९९ (७५)। (ख) निरमोही नहिं नेह, कुमुदिनी अंतहु हेम हई-पृ. ५४६ (८)।
उ.-(क) गीध्यौ दुष्ट हेम तस्कर ज्यौं-१-१०२। (ख) सुंदर कुंडल हेम जराल-४७३।
उत्तरी हिमालय का एक पर्वत।
उ.-यह सुनि कान्ह भए अति आतुर द्वारैं तन फिरि हेरत-१०-२४३।
उ.-चित चुभि रही मनोहर मूरति चपल दृगन की हेरन-पृ. ५४३ (७७)।
ढूँढ़ना, खोजना, पता लगाना।
(सं. आखेट, पु. हिं. अहेर)
(सं. आखेट, पु. हिं. अहेर)
(सं. आखेट, पु. हिं. अहेर)
(हिं. हेरना + अनु. फेरना)
एक अप्सरा जो मंदोदरी की माता थी।
छोड़ने या त्यागने योग्य, त्याज्य।
वह (अर्थात् ब्रह्म) मैं ही हूँ।
वही (अर्थात् ब्रह्म) मैं ही हूँ।
उ.- छोरे निगड़, सोआए पहरू, द्वारे कौ कपाट उघरथो-१०-८।
सुलाना, सोने को प्रवृत्त करना।
उ.- (क) सोइ सगुन ह्वै नंद की दाँवरी बँधावै-१-४। (ख) सोइ प्रसाद सूरहिं अबं दीजै-१-२०४। (ग) ज्ञान बिराग तुरत तिहिं होइ। सूर बिष्नु पद पावै सोइ-६-४। (घ) पाप उजीर कह्यौ सोइ मान्यौ-१-६४।
उ.- जैसै सुपने सोइ देखियत तैसे यह संसार-१-३१।
उ.- सूर स्याम तुम सोइ रहौ अब प्रात जान मैं दैहौं-४२०।
(चीजों की) अदला बदली करना।
(हिं. हेरना + अनु. फेरना)
उ.-तासों भिरहु तुमहिं मो लायक इह हेरनि मुसकानि-पृ. ४३८ (२०)।
उ.-जब आवत बलराम, देख्यो, मधुमंगल तन हेरनो-पृ. ४१४ (८०)।
धुमाव-फिराव या दाँव-पेंच की बात।
कहीं न मिलना, अभाव हो जाना।
लुप्त, नष्ट या तिरोहित हो जाना।
किसी के सामने फीका, मंद या कांतिहीन पड़ जाना।
सुध-बुध भूलना, आत्मविस्मृत होना।
तलाश करवाना, ढूँढ़ने या खोजने को प्रवृत्त करना।
उ.-सूरदास प्रभु मोहन देखत जनु बारिधि जल बूँद हेरानी पृ. २०३ (५०)।
(किसी चीज का) इधर का उधर किया जाना या होना।
बार-बार (और जल्दी-जल्दी) कहीं आना-जाना।
उ.-चहुँ दिसि सूर सोर करि धावैं, ज्यौ करि हेरि सृगाल-९-१०४।
रही हेरि-(चकपका कर या अचरज से) देखती रह गयी।
उ.-भीति बिनु कह चित्र रेखै, रही दूती हेरि-२०४३।
उ.-इन हिय हेरि मृगी सब गोपी, सायक ज्ञान हए-पृ. ५१८ (५०)।
उ.-कृपानिधान सुदृष्टि हेरियै, जिहिं पतितनि अपनायौ-१-२०५।
उ.-हेरी-टेर सुनत लरिकनि की, दौरि गए नँदलाल-४१३।
मुहा.- हेरी देत-पुकार मचाता (है), टेर लगाता (है)। उ.- (क) कोऊ हेरी देत परस्पर-४३१। (ख) हेरी देत चले सब बन तैं, गोधन दियौ चलाइ-५०५। (ग) हेरी देत चले सब बालक -६११। हेरी देना-पुकारना, टेरना। हेरी देहिं-पुकारते या टेरते हैं। उ.-एक हेरी दैहिं, गावहिं, एक भेंटहिं धाइ-१०-२६।
उ.-(क) अंबर हरत सबन तन हेरी-१-२५२। (ख) देखति भई चकित ग्वालि इत-उत कौं हेरी-१०-२७५।
उ.-सबै हिरानी हरि-मुख हेरें-पृ. २५९ (९४)। (पाठा. हेरैं-ना. २२७१)।
उ.-दूतिका हँसति हरि-चरित हेरै-पृ. ३६७ (९४)।
उ.-गई लिवाइ ग्वालनि बुलाइ कै, जहँ-तहँ बन-बन हेरै हो-४५२।
विचारता, ध्यान देता, समझता या मानता है।
उ.-पिता एक अवगुन नहिं हेरै-५-४।
लेन-देन या खरीदने-बेचने का काम।
तलाश या खोज करवाना, पता लगवाना, ढुँढ़वाना।
पुकारने या बुलाने का शब्द।
ढूँढ़ने-खोजने की क्रिया या भाव।
कहीं चली (गयी), खो (गयी)।
उ.-सूरस्याम या दरस-परस बिनु निसिगई नींद हेराइ-पृ. ३९३ (२७)।
उ.-आसन देइ बहुत करि बिनती, सुत धोखें तव बुद्धि हेराई-पृ. ५९२ (१३)।
रह न जाना, कहिं चला जाना, खो जाना।
उ.-(क) नैंकु इतै हँसि हेरौ- १०-२१६। (ख) मोहन, नेक बदन तन हेरौ- पृ. ४६० (३२)।
उ.-ऎसे भए मनो नहिं मेरे जबहीं स्याम मुख हेरो- पृ. ३३२ (१६)।
उ.-जौ मेरी करनी तुम हेरौ-१-१९४।
उ.-(क) बार-बार झकझोरि, नैंकु हलधर तन हेरथौ-५८९। (ख) गावहिं सब सहचरी, कुँवरि तामस करि हेरथौ-पृ. ५७१ (८)।
हेरथौ चाहत-देखना-परखना चाहते हैं।
उ.-कर करि कै हरि हेरथौ चाहतं, भाजि पताल गयौ अपहारी- १०-१९६।
किलोल या केलि-क्रिड़ा करना।
किलोल या केलि-क्रिड़ा करना।
ठिठोली या विनोद करके मन बहलाना।
परवाह न करना ध्यान न देना।
साथ-साथ उठने-बैठने, मिलने-जुलने आदि का संबंध, घनिष्ठता।
खेल ही खेल या खिलवाड़ में।
उपेक्षा और तिरस्कार योग्य या तुच्छ समझना।
परवाह न करना ध्यान न देना।
साहित्य में संभोग श्रृंगार के अंतर्गत एक 'हाव' जिसमें नायिका आँखें या भौंहें मटकाकर या नचाकर मिलन अथवा संभोगेच्छा सूचित करती है।
ठेलने की क्रिया या भाव, रेला, धक्का।
उ.-बसे री हेली, नयननि में षट इंदु-पृ. ३१४ (४१)।
जिसमें मेल-जोल यां घनिष्ठता हो।
एक गहना जो घोड़े के गले में पहनाया जाता है।
जिसका कोई हेतु या उद्देश्य हो।
पानी में घुसकर या खड़े होकर संगी साथियों या सखी-सहेलियों पर पानी का हिलोरा या छींटा मारने का खेल।
उ.-जमुना, तोहिं, बहुथौ क्यौं भावै। तोमैं कृष्ण हेलुआ (हेलुवा) खेलै, सो सुरत्यौ नहिं आवै-५६१।
अगहन-पूस की ऋतु, हेमंत ऋतु।
उ.- जब बृंदाबन रास रच्यौ हरि तबहिं कहाँ तुम हेव-पृ. ५१० (८३)।
उ.-खग-मृग कहँ हैं हम लीन्हें-पृ. २४५ (३१)।
एक अव्यय जो निषेध, असम्मति आदि का सूचक है।
होना' का वर्तमानकालिक एक वचन रूप।
उ.-कतहिं बकत है काम-काज बिनु-ना. ४३२४।
उ.-हैबर गैबर सिंह हंसबर खग-मृग कहँ हैं हम लीन्हे-पृ. २४५ (३१)।
उ.- नाहिंन इतौ सोइयत सुनि सुत प्रात परम सुचि काल-१०-२०७।
उ.- (क) सहि सन्मुख तउ सीत-उष्न कौं सोई सुफल करै-१-११७। (ख) जो मैं कहत रह्यौ भयौ सोई सपनंतर की प्रगट बताई-९३२।
उ.- टहल करत मैं याके घर की, यह पति संग मिलि सोई-१०-३२२।
उ.- सुख सोऊँ, सुनि बचन तुम्हारे, देहु कृपा करि बाँह-१-५१।
उ.- महादेव-हित जो तप करिहैं। सोऊ भव-जल तैं नहिं तरिहैं-४-५।
उ.- तृष्ना हाथ पसारे निसि दिन, पेट भरे पर सोऊ-१-१८६।
निद्रा लेते रहे, सो गये, शयन किया।
उ.- (क) सूर अधम की कहौ कौन गति, उदर भरे परि सोए-१-५२। (ख) सूर स्याम बिरुझाने सोए-१०-१९६। (ग) अब लौं कहा सेए मनमोहन, और बार तुम उठत सबार-४०३।
प्रिय व्यक्ति की मृत्यु से होने वाला परम कष्ट।
उ.- दरसन सुखी, दुखी अति सोचति षट-सुत सोक-सुरति उर आवति-१०-७।
मुहा.- सोक मनाना-प्रियजन की मृत्यु पर शोकचिह्न धारण करना और सामाजिक उत्सव आदि में सम्मिलित न होना।
प्रियजन के विरह से होनेवाला कष्ट।
उ.- (क) करिहैं सोक-संताप धार पितु-मातहिं देखौ-४९२। (ख) मदन गोपाल देखत ही सजनी सब दुख-सोक बिसारे-१५६९।
उ.- (क) सीत-उष्न सुख-दुख नहिं मानै हर्ष-सोक नहिं खाँचै-१-८१। (ख) अंबर हरत सभा मैं कृष्ना सोक-सिंधु तैं तारी-१-२८२। (ग) गदगद कंठ सोक सौं सोवत बारि बिलोचन छाए-९-६७।
अत्यंत खेद या शोक-सूचक शब्द।
उ.-हैबर गैबर सिंह हंसबर खग-मृग कहँ हैं हम लीन्हे-पृ. २४५ (३१)।
पृथ्वी के एक वर्ष या खंड का नाम (पुराण)।
दंग, भौचक्का, चकित, स्तब्ध।
इंसान' का उलटा, जानवर, पशु।
इंसानियत' का उलटा, जानवरपन।
(कार्य) जो जानवर या पशु के करने योग्य हो।
होना' का संभाव्यकालीन बहु-वचन रूप।
मुहा.- होंठ काटना या चबाना-आंतरिक क्षोभ या क्रोध प्रकट करना। होंठ चाटना-कोई स्वादिष्ट वस्तु खाकर और खाने की इच्छा प्रकट करना। होंठ चिपकना- किसी स्वादिष्ट वस्तु का नाम सुनकर खाने को लालायित होना। होंठ हिलाना-बोलने का प्रयत्न करना, बोलना।
[हिं. होंठ + (प्रत्य.) ल]
होना' के अन्य पुरुष संभाव्य काल और मध्यम पुरुष, बहुवचन का वर्तमान कालीन रूप।
वर्तमानकालिक क्रिया 'है' का सामान्य भूतकालिक रूप, था।
उ.-(क) नरहरि ह्वै हिरनाकुस मारथौ काम परथौ हों बाँकौ-१-११३। (ख) लै लै फिरे नगर मैं घर-घर जहाँ मृतक हो हौं-१-१५१। (ग) पहिलै हौं ही हो तब एक -२-३८। (घ) जहाँ न कोऊ हो रखवैया-१०-३३५।
उ.-नागिन के काटैं बिष होइ-९-२।
मुहा.- होइ सो होइ (होई)- जो होना होगा, वह होगा। उ.-(क) पाछैं होनी होइ सो होइ-६-५। (ख) की मारि डारियो दुहुँनि को, होइ सो होइ यह कहत रान्यो- पृ. ४६९ (२)। (ग) दूध पिवाइ हृदय सों लावौं पाछे होइ सो होई-पृ. ५९५ (२८)।
उ.-गोड़ पसारि परथौ दोउ नीकैं अब कैसी कह होइसि-१-३३३।
उ.-बेनु कें राज मैं औषधी गिलि गईं होइहैं सकल किरपा तुम्हारी-४-११।
समाई, बिसात, आर्थिक स्थिति।
एक प्राचीन क्षत्रिय वंश जिसके सबसे प्रसिद्ध राजा कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन को परशुराम ने मारा था।
हैहय राजा कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन।
कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन।
उ.-सुन सुग्रीव प्रतिज्ञा मेरी, एकहिं बान असुर सब हैहौ-९-१५७।
उ.-हाव अरु भाव करि चलत चितवत जबै कौनै ऎसै जो मोहित न होई-८-११।
एक देवी की पूजा जोदीपावली के आठ दिन पहले संतान की प्राप्ति और उसकी रक्षा के लिए की जाती है।
उ.-(क) होनो होउ होउ सो अबहीं, यहि ब्रज अन्न न खाउँ-पृ. ४८९ (८०)। (ख) अब मेरे मन ऎसी षट-पद होवे होहु सु होऊ-पृ. ५५० (४९)।
उ.-सूर स्याम कह्यौ काल्हि दुहैंगे, हमहूँ तुम मिलि होड़ लगाई-६६८।
एक दूसरे से बढ़ जाने का प्रयत्न, चढ़ा-ऊपरी, प्रतियोगिता, स्पर्द्धा।
उ.-(क) दंपति होड़ करत आपुस मैं, स्याम खिलौना कीन्हौ री-१०-९८। (ख) हाथ तारी देत भाजत सबै करि-करि होड़-१०-२१३।
समान करने, बनने या होने का प्रयास, बराबरी।
उ.-(क) मोहिं प्रभु, तुमसौं होड़ परी-१-१३०। (ख) अरुन अधर नासिका निकाई, बदत परस्पर होड़-पृ. २७७ (५७)। (ग) वीद्याधर कौ रूप धारि, कह्यौ नाथ करै को तुमरी होड़-पृ. ४१७ (९२)। (घ) नैननि होड़ बदी बरसा सों-पृ. ५६५ (५७)।
वह जिसका होना निश्चित हो, होनेवाला, होनहर।
वह बात जिसका होना निश्चित हो, होनहार।
मंत्र पढ़कर हवन करने या यज्ञ में आहुति देनेवाला।
उ.-देती अबहिं जगाइ कै, जरि-बरि होत्यौ छार-५८९।
बढ़ने, विकसित होने या उन्नति करने आदि की क्रिया या भाव।
उ.-अबहिं तैं तू करत ये ढँग, तोहिं अबही होन-७१९।
उ.-हाँसी होन लगी है ब्रज में, जोगहिं राखौ गोई-ना. ४१६०।
उ.-तनक तनक भुज पकरि कै, ठाढ़ौ होन सिखावै-१०-११२।
सत्ता, अस्तित्व, उपस्थितिसूचक क्रिया, उपस्थित या विद्यमान रहना, अस्तित्व में आना।
मुहा.- किसी का होना-(१) किसी के अधीन या वश में होना, किसी का दास या सेवक होना। (२) किसी का प्रियजन या प्रेमपात्र होना। (३) किसी का कुटुंबी या संबंधी होना। कहीं का होना (हो जाना या रहना)-कहीं जाकर बहुत देर में लौटना या वहीं रुक या ठहर जाना। (कहीं से) होकर या होते हुए- (१) जाकर, मिलकर। (२) रुककर और आवश्यक कार्य करके। हो आना-मिलने के लिए जाना। होता सवाता या सोता-जो अपना निकट संबंधी (विशेषतः पुत्र) हो। कौन होता है-क्या संबंध है ?
सूरत या हालत बदलना, पहला रूप छोड़कर नये रूप में आना।
मुहा.- हो बैठना- (अपने को) कुछ समझ बैठना या समझने-जताने लगना।
कार्य का संपन्न या संपादित किया जाना।
मुहा.- (कार्य) होना-कार्य संपादित हो जाना। (कार्य) हो चुकना या जाना- (कार्य का) लगभग समाप्ति पर होना। बस हो चुका-कुछ भी न हो सकेगा।
बनने या तैयार होने की स्थिति में रहना।
कोई बात या संयोग आ पड़ना, घटित किया जाना।
मुहा.- भई, न होना- न आज तक घटित हुआ है और न आगे होने की संभावना ही है। उ.-(क) जोबन-दान कहा धौं माँगत भई कहूँ नहिं होना-पृ. २३६ (३७)। (ख) ऎसी छवि कहूँ भई न होना -पृ. ४३८ (२१)। होकर रहना-अवश्य घटित होना, कभी न टलना। हो न हो-निश्चय ही, निस्संदह। हो पड़ना-जान या अनजान में (भूल-चूक) हो जाना।
किसी रोग, व्याधि आदि का आना।
प्रभाव या गुण दिखायी देना।
काम निकलना, प्रयोजन सधना।
किसी के बराबर होने या उससे बढ़ जाने का प्रयत्न, लाग-डाँट, चढ़ा-ऊपरी, स्पर्द्धा, प्रतियोगिता।
उ.-होड़ाहोड़ी मनहिं भावते किए पाप भरि पेट-१-१४६।
होने की क्रिया या भाव, अस्तित्व।
पास में कुछ होने का भाव या दशा, संपन्नता, आढथता।
बिसात, समाई, वित्त, सामर्थ्य य़
उ.-(क) ब्याकुल होत हरे ज्यौं सरबस-१-५०। (ख) भोर भयौ दधिमथन होत-४०४।
जन्मता, उपजता या अस्तित्व में आता है।
उ.-ज्यौं पानी में होत बुद-बुदा पुनि ता माहिं समाहीं- पृ.५९५ (३१)।
कार्य आदि संपादित होता या किया जाता है।
उ.-रंग कापै होत न्यारो हरद चनो सानि-पृ. २०८ (९५)।
उ.-तो देखत तनु होमि मदन मुख मिलौं माधवहिं जाहिं-पृ. ४९३ (१२)।
उ.-मेरो अंस अवतार होयगो-सारा. ५२।
पत्थर का चकला या चौका जिस पर चंदन घिसा जाता है।
आग में भुने हुए हरे चने (बूट) की फलियाँ।
मुसलमानों कें चार वर्गो में से एक प्रसिद्ध वर्ग।
दुख या शोक करना, कष्ट पाना।
लिये सोख-सुखा डाले, प्राण खींच या चूस लिये।
उ.- कुंभकरनपुनि इंद्रजीत यह महाबली बलसार। छिन में लिये सोख मुनिवर ज्यों छत्री बली अपार-सारा.२९२।
सुखा डालने या शोषण करनेवाला।
आहुति देने का कर्म, हवन, यज्ञ।
उ.-होम हवन द्विज पूजा गनपति सूरज सक्र महेस-सारा. २३४।
मुहा.- होम कर देना (करना)-(१) जलाकर भस्म कर डालना। (२) बरबाद या नष्ट करना। (३) त्याग, अर्पण या उत्सर्ग करना।
वह गढ़ा जिसमें होम की अग्नि रखी जाय।
उ.-(क) तर्फत नैन हृदय होमत हवि मन-बच-क्रम औरै नहिं काम-पृ. ४०५ (३०)। (ख) सूर सकल उपमा जो रही यों ज्यों होइ आवै कहत होमत हवि-पृ. ४२० (१४)।
होम या हवन करना, आहुति देना।
त्याग, अर्पण या उत्सर्ग करना।
[हिं.) होम + ना(प्रत्य.)]
(स्त्री का) मासिक धर्म से बैठना।
उ.-मुरली अधर बिकट भौहैं करि ठाढ़ौ होनि त्रिभंग - पृ. ५१६ (३१)।
उ.-पाछैं होनी होइ सो होई-६-५।
वह बात जिसका होना ध्रव या निश्चित हो, भावी, भवितव्यता।
वह बात जिसका होना संभव हो।
उ.-होनो होउ होउ सो अबहीं, यहि ब्रज अंन्न न खाउँ -पृ. ४८९ (८०)।
उ.-या बिन होत कहा अब सूनो-पृ. ४९८ (५९)।
एक अहोरात्र का चौबीसवाँ भाग, घंटा।
होरिहा, होरिहार, होरिहारा
हिंदुओं का एक प्रसिद्ध त्योहार जो फागुन की पूर्णिमा को होता है। इसमें आग जलायी जाती है और लोग परस्पर रंग छिड़कते तथा अबीर-गुलाल लगाते हैं।
उ.-(क) तनु जोबन ऎसे चलि जैहै जनु फागुन की होरी-पृ. ३८३ (४०)। (ख) मिटि गए कलह कलेस कुलाहल जनु करि बीती होरी-पृ. ५८४ (५२)।
मुहा.- खेलत होरी-परस्पर रंग छिड़कते, गुलाल लगाते और कोलाहल करते हैं। उ.-खेलत हो हो होरी अति सुख प्रीति प्रगट भई-पृ. ४३५ (६९)। खेलि होरी-परस्पर रंग छिड़ककर, गुलाल लगाकर, गीत गाकर और कोलाहल करके। उ.-सूरदास भगवत भजन बिनु चले खेलि फागुन की होरी-१-३०३।
लकड़ियों और खर-पतवार का वह ढेर जो होली के दिन जलाया जाता है।
एक प्रकार के गीत जो फागुन में गाये जाते हैं।
उ.-औरौ सखी जाल बिनु सोभित सकल ललित तनु गावति होरी-पृ. ४३१ (९३)।
लकड़ी, खर-पतवार घास-फूस आदि का वह ढेर जो होली के दिन जलाया जाता है।
एक प्रकार के होली-संबंधी श्रृंगारिक गीत जो फागुन में गाये जाते हैं।
जो अवश्य होने को हो, होनहार, भावी।
वह बात जो अवश्य होनेवाली हो, होनी।
उ.-दीखति है कछु होवनहारी-४-५।
जो (बात) अवश्य होने वाली हो।
उ.-अब मेरे मन ऎसी षटपद होवै होहु सु होऊ-पृ. ५५० (४९)।
मुहा.- होश उड़ना या जाते रहना- कष्ट, भय या आशंका से चित्त का इतना व्याकुल होना कि सुधृबुध भूल जाना। होश करना- बुद्धि ठीक-ठिकाने रखना। होश की दवा करना-बुद्धि ठीक-ठीकाने करना, समझ-बूझ कर काम करना। होश ठिकाने होना-(१) मोह, भ्रम या भ्रांति दूर होना। (२) थकावट, घबराहट या अधीरता का कारण न रहने पर चित्त स्वस्थ होना। (३) हानि सहकर या दंड पाकर गर्व मिटना और भूल पर पछतावा होना। होश दंग हो जाना या होना-बहुत चकित होना। होश पकड़ना-चेतना प्राप्त करना, सचेत होना। होश में आना-बेहोशी या मूर्च्छा दूर होने पर पुनः चेतना प्राप्त करना। होश सँभालना-अनजान न रहना; समझदार, सयाना या वयस्क होना।
मुहा.- होश दिलाना-याद दिलाना, स्मरण कराना।
सिखों की होली जो होली जलने के दूसरे दिन होती है।
हरे चने या मटर आदि की आग में भुनी फलियाँ।
होली के पहले आठ दिन जिनमें विवाह आदि शुभ कृत्य नहीं किये जाते।
लकड़ी, खर-पतवार आदि का वह ढेर जो होली के दिन जलाया जाता है।
होलिहा, होलिहार, होलिहारा
धूम-धाम से होली खेलनेवाला।
फागुन की पूर्णिमा को मनाया जानेवाला, हिंदुओं का एक प्रसिद्ध त्योहार जिसमें आग जलाकर लोग परस्पर रंग छिड़कते, अबीर-गुलाल लगाते और गले मिलते हैं।
मुहा.- होली खेलना-एक दूसरे पर रंग छिड़कना, अदीर-गुलाल लगाना और खूब कोलाहल कर के आनंद मनाना।
मुहा.- होश-हवास गुम होना-चेतना और बुद्धि का ठीक-ठीक काम न करना, कर्तव्य-अकर्तव्य न सूझना। होश-हवास ठीक या दुरूस्त करना-(१) ऎसा दंड देना कि बुद्धि ठीक-ठीक काम करने लगे। (२) ऎसा प्रतीकारात्मक कार्य करना जिससे व्यक्ति अकड़, घमंड आदि भूलकर सामान्य स्थिति में आ जाय। होश-हवास ठीक या दुरुस्त होना-ऎसा दंड मिलना कि बुद्धि ठीक-ठिकाने हो जाय। (२) प्रतीकारात्मक कार्य कियैं जाने पर अकड़, घमंड आदि भूलकर व्यक्ति का सामान्य व्यवहार करने लगना।
मुहा.- होशियार करना- (कष्ट, अनिष्ट आदि से बचने या सतर्क रहने को) सावधान या सचेत करना।
जिसने होश सँभाला हो, जो समझदार, सयाना और वयस्क हो गया हो।
लाग-डाँट, होड़, स्पर्द्धा।
उ.-कतहिं बकत है काम-काज बिनु होहि न ह्याँ तैं हातौ-ना. ४३२४।
उ.-(क) सूरदास प्रभु कंस मारि कै, होहु यहाँ के भूप- पृ. ४६३ (६१)। (ख) सब दल होहु हुसियार- पृ. ५७२ (८)।
उ.-हो-हो हो-हो होरी अति सुख प्रीति प्रगट भई-पृ. ४३५ (६९)।
ब्रजभाषा में उत्तमपुरुष सर्वनाम का एकवचन रूप, मैं।
उ.-हौं इक नई बात सुनि आई-१०-२०।
होना' का वर्तमानकालिक उत्तमपुरुष एकवचन रूप, हूँ।
उ.-(क) हौंस होइ तौ ल्याऊँ पूआ-३९ ६। (ख) होति हौंस न ताहि बिष की, कियो जिन मधु पान-पृ. ५५९ (२९)।
मुहा.- हौंस रखना-इच्छा बाकी न रखना, कामना पूरी करना। उ.-कछू हौंस राखै जनि मेरी, जोइ-जोइ मोहिं रुचै री-१०-१७६।
होना' के मध्यमपुरुष, एकवचन का वर्तमानकालिक रूप, हो।
'है' का सामान्य भूतकालिक रूप, था।
बच्चों को डराने के लिए कल्पित, एक भयंकर जीव या वस्तु, हाऊ।
किसी चीज को पाने की बहुत प्रबल इच्छा, लोभ या तृष्णा।
अभाव, विवशता आदि से ली गयी लंबी साँस।
हाथी की पाठ पर सवारी के लिए कसा जानेवाला चौखटे जैसा आसन।
होना है, बढ़ना है, उन्नति करना है।
उ.-पाँच बरस कै सात कौ, आगैं तोकौं हौन-५८९।
मुहा.- हौल पैठना या बैठना-जी में दहशत या डर समा जाना।
एक रोग जिसमें दिल बहुत धड़कता है।
जिसका दिल डर से धड़कता हो।
जो बहुत डरा या घबराया हुआ हो।
एक तरह के पत्थर का टुकड़ा जो दिल धड़कने-जैसे रोगी को दूर करने के लिए रोगी को पहनाया जाता है।
(स्याही) सोखनेवाला, मोटा कागज।
नमी या रस चूस लेना या सुखा डालना, शोषण करना।
बहुत अधिक पानी जैसा पेय पदार्थ पी लेना (व्यंग्य)।
प्राण खींच लेना, मार डालना।
उ.- (क) सोखि समुद्र, उतारौं कपि दल-९-१०९। (ख) जनु जल सोखि लयो से सविता जोबन गज मतवार-२०६२।
उ.- पूतना के प्रान सोखे-४९८।
देशी शराब बनने-बिकने की जगह।
संसार की वह पहली स्त्री जो आदम की पत्नी थी और जिसने मनुष्य जाति को जन्म दिया था।
उ.-पुनि गए तहाँ जहाँ धनुष, बोले सुभट, हौस मन जिनि करौ बन-बिहारी- पृ. ४६६ (८४)।
उ.-मरियत देखिबे की हौसनि -पृ. ४८६ (४७)।
उ.-चली जाति धारा ह्वै अध कौं, नाभी ह्रद अवगाह-६३७।
कोई काम करने की उमंग या उत्कंठा।
मुहा.- (जी या मन का) हौसला निकलना-इच्छा पूरी होना, अरमान निकलना। (ज़ी या मन का) हौसला निकालना-सारा प्रयत्न कर डालना।
मुहा.- हौसला पस्त होना-जोश ठंढा पड़ जाना, हिम्मत न रह जाना, उत्साह न बचना।
बढ़ी हुई तबियत, प्रफुल्लता।
मुहा.- (जी या मन का) हौसला निकालना-किसी उत्सव या हर्षावसर पऱ इच्छानुसार धूमधाम कर लेने का अरमान पूरा हो जाना। (जी या मन का) हौसला निकालना-खूब धूम-धाम और आनंद से काम करके जी का अरमान पूरा करना।
जिसमें लालसा या कामना हो।
उ.-(क) काके हित श्रीपति ह्याँ ऎहैं-१-२९। (ख) याकौ ह्याँ तैं देहु निकारि-१-२८४। (ग) ह्याँ के बासी-९-१६५।
वर्णमाला में वे स्वर जो दीर्घ की अपेक्षा कम खींचकर बोले जाते हैं जैसे अ, इ, उ आदि; ऎसे स्वरों की मात्रा (छंद में) एक समझी जाती है।
वैभव, गुण, तत्व आदि में कम हो जाने की क्रिया या भाव।
घिसने, छीजने आदि की क्रिया या भाव।
दक्ष प्रजापति की एक कन्या जो धर्म को ब्याही थी।
उ.-(क) यह सुनि ह्वाँ तैं भरत सिधायौ-५-३। (ख) जाइ करौ ह्वाँ बोध सबनि कौं-पृ. ३६६ (८३)।
उ.-जाति चली धारा ह्वै अध कौं-६३७।
उ.-बिछुरन भेंट देहु ठाढ़े ह्वै-पृ. ४६० (३२)।
भिन्न या परिवर्तित रूप धारण करके।
उ.-छोरी बंदि बिदा किए राजा, राजा ह्वै गए राँकौ-१-११३।
उ.-अंग सुभग सजि ह्वै मधु मूरति, नैननि माँह समाऊँ-१०-४९।
जन्म लेकर, शरीर धारण करके, अवतार लेकर।
उ.-(क) सोई सगुन ह्वै नंद की दाँवरी बँधावै-१-४। (ख) नरहरि ह्वै हिरनाकुस मारथौ-१-११३। (ग) दंतबक्र सिसुपाल जो भए, बासुदेव ह्वै सो पुनी हए-१०-२।
(कार्य आदि) आरंभ या संपादित होंगे।
उ.-ह्वैहैं जज्ञ अब देव मुरारी- ७-२।
मुहा.- कौन के ह्वैहैं-किसके सगे या आत्मीय होंगे। उ.-काके भए कौन के ह्वैहैं, बँधे कौन की डोरी-पृ. ४९८ (६३)।
उ.-(क) ता रानी सेंती सुत ह्वैहैं-६-५। (ख) पाछैं भयौ, न आगैं ह्वैहैं, सब पतितनि सिरताज-१-९६।
उ.-सूरदास प्रभु रची सु ह्वैहैं-१-२६४।
उ.-नंद राइ, सुनि बिनती मेरी तबहिं बिदा भल ह्वैहौं-१०-३५।
उ.-ह्वैहौं पूत नंद बाबा कौं, तेरौ सुत न कहैहौं-१०-१९३।
एक प्रकार का खुरदरा कागज जो स्याही सोख लेता है।
प्रिय जन की मृत्यु का परम कष्ट।
मुहा.- सोग मनाना- प्रियजन की मृत्यु पर शोकचिह्न धारण करना और किसी उत्सव आदि में सम्मि लित न होना।
उ.- (क) देवकी-बसुदेव-सुत सुनि जननि कैहै सोग-२९३३। (ख) सूर उसाँस छाँड़ि भरि लोचन बढ़थो बिरह-ज्वर सोग-३४९२।
उ.- (क) जोग, भोग रस रोग-सोग-दुख जाने जगत सुनावत-३२७६। (ख) अपने-अपने भाव सु पेखत, मिट़यौ सकल मनसोग-सारा. ५१४।
वह स्थान जहाँ प्रियजन की मृत्यु का शोक मनाया आ रहा हो।
प्रियजन की मृत्यु का शोक करनेवाला।
सोचने, समझने और विचार करने की क्रिया या भाव, गौर।
उ.- जिनि सोचहु सुख मान सयानी, भली रितु सरद भई-२८५३।
सोचने-विचारने की क्रिया या भाव।
सोचने विचारने को प्रवृत्त करना।
सोचने विचारने के लिए (किसी संबंध में) ध्यान आकृष्ट करना।
उ.- (क) सोचि विचारि सकल स्रुति सम्मति, हरि तैं और न आगर-१-९१। (ख) रे मन, समुझि सोचि-बिचारि-१-३०९।
उ.- (क) सूरदास प्रभु रची सु ह्वैहै, को करि सोच मरै-१-२६४। (ख) कंसराय जिय सोच परी-१०-४८। (ग) सूरज सोच हरौं मन अबहीं, तौ पूतना कहाऊँ-१०-४९। (घ) सुन्यौ कंस पूतना सँहारी। सोच भयौ ताकैं जिय भारी-१०-५८। (ङ) तब तैं यो जिय सोच, जबहिं तैं बात परी सुनि-५८९।
उ.- (क) औगुन की क्रछु सोच न संका-१-१८६। (ख) कियौ न कबहुँ बिलम्ब कृपानिधि सादर सोच निवारौ-१-१५७।
उ.- देखि कै उमा कोरुद्र लज्जित भए, कहथौ मैं कौन यह काम कीनौ।¨¨¨¨¨¨। चतुर्भुज रूप हरि आइ दरसन दियौ, कहथौ, सिव सोच दीजै बिहाई-८-१०।
(किसी विषय में) विचार करता है।
उ.- (क) विदुखि सिंधु सकुचत, सिव सोचत, गरलादिक किमि जात पियौ-१०-१४३। (ख) कैसे कैं वाकौ मारैंगे, सोचत हैं पुर-नारी-सारा. ५०५।
चिंतित होती है, चिंता करती है।
उ.- (क) दरसन सुखी, दुखी अति सोचति षट सुत-सोक सुरति उर आवति-१०-७। (ख) कैसेहुँ ये बालक दोउ उबरैं, पुनि पुनि सोचति परी खभारे-५९५।
उ.- भवन मोहिं भाटी सों लागत मरति सोच ही सोचन-१४१७।
लगे या लागे सोचन-सोचने, विचारने या चिंता करने लगे।
उ.- (क) भूमि परे तैं सोचन लागे महा कठिन दुख भारे-१-३३४। (ख) अबकी बेर बहुरि फिरि आवहु कहा लगे जिय सोचन-२७०८।
किसी बात, विषय या प्रसंग पर विचार करना।
उ.- अब हरि आइ हैं, जिनि सोचै ¨¨¨¨¨¨।
(सं. सम्मुझ, म. प्रा. समुज्झ)
वह जो वेद-शास्त्रों का अच्छा ज्ञाता हो।
उ.- (क) हरि के दूत जहाँ-तहाँ रहैं। हम तुम उनकी सोंध न लहैं-६-४। (ख) आए तीर समुद्र के कछु सोध न पायौ-९-१२। (ग) सब सोधि रह्यौ, न सोध पायौ, बिन सुने का कीजिए-१० उ.-२४।
कुँआ या जलाशय जिसमें सोते का पानी आता है।
उ.- आनँद मगन भए सब डोलत कछु न सोध सरीर-९-१८।
साफ, शुद्ध या शोधन करना, शुद्धता की जाँच करना।
गलती, त्रुटि या दोष दूर करना।
खोजना, ढूँढ़ना, पता लगाना।
दुरुस्त या ठीक करना सुधारना।
शोधन या शुद्धता की जाँच कराना।
बढ़बढ़कर बातें करना, डींग।
उ.- पारथ-सीस सोधि अष्टाकुल तब जदुनंदन ल्याए-१-२९।
विचार या गणना द्वारा निश्चित करके।
उ.- (क) ग्रह-लगन-नषत-पल सोधि कीन्ही बेद-धुनी-१०-२४। (ख) लगन सोधि सब जोतिष गनिकै चाहत तुमहिं सुनायौ-१०-८६। (ग) बिप्र बुलाइ नाम लै बूझयौ रासि सोधि एक सुदिन धरथौ-१०-८८।
उ.- खग-मृग-मीन पतंग लौं मैं सोधे सब ठौर-१३२५।
एक प्रसिद्ध नद जो बिहार में दानापृर से दस मील उत्तर गंगा में मिला है।
जलाशय के निकट रहनेवाला एक पक्षी।
एक लता जो बारहों महीन हरी रहती है; इसके फूल पीले होते हैं।
चमकीले परोंवाला एक कीड़ा।
(हिं. सोना + किरवा = कीड़ा)
(हिं. सोना + किरवा = कीड़ा)
नट जाति की स्त्री, नटिनी, नटी।
(हिं. सोना + चिरी = चिड़िया)
पीली जूही, स्वर्ण यूथिका।
(हिं. सोना + फ़ा. जर्द = पीला)
पीले फूलवाली जूही जिसके फूल सफेद जूही से अधिक सुगंधवाले होते हैं।
शरीर के किसी अंग का सन्न हो जाना।
किसी विषय या कार्य की ओर से उदासीन होकर चुप या निष्क्रिय होना।
एक खनिज पदार्थ जिसमें सोने का कुछ अंश और गुण रहता है।
उ.- सोनित (पाठा. स्रोनित)-छिंछ उछरि आकासहिं गज-बाजिनि सिर लागि-९-१५८।
शोण नद जो विहार में दानापुर से उत्तर में गंगा से मिलता है।
कोगी' नामक हिंसक जतु जो शेर तक को मार डालता है।
एक प्रसिद्ध पीली धातु जिसके गहने आदि बनते हैं, कंचन, कनक।
एक प्रकार का हंस, राजहंस।
उ.- सूरदास सोने कैं पानी मढ़ै चोंच अरु पाँखि-९-१६४।
ताँबे रुपे सोने सजि राखीं वै बनाइ कै-२६२८।
मुहा.- सोने का घर मिटटी करना- बहुत अधिक धन-सम्पत्ति नष्ट कर देना। सोने का घर मिटटी होना- अत्यन्त धन-धान्य पूर्ण घर या परिवार का वैभव नष्ट हो जाना।सोने में घुन लगना-अनहोनी या असंभव बात होना। सोने में सुगंध (होना)-किसी बहुत अच्छी चीज में (कारण-विशेष से ) और भी गुण या विशेषता आ जाना।
वह चीज जो देखने में तो बहुत सुन्दर और आकर्षक हो, परन्तु वस्तुतः हानिकारिणी और घातक हो।
उ.- खुर ताँबैं, रूपैं पीठि, सोनैं सींग मढ़ी-१०-२४।
उ.-बरि कुबजा के रंगहिं राचे तदपि तजी सोपी-३४८७।
रोग में कमी की दशा या स्थिति।
मुसलमानों का एक धार्मिक संप्रदाय।
स्थान जहाँ स्त्रियाँ प्रसव करती है।
(सं. शोभा या शुभ + गृह ?)
सहिंजन' वृक्ष जिसमें लंबी फलियाँ लगती हैं।
उ.- (क) मृग मूसी नैननि की सोभा जाति न गुप्त करी-९-६३। (ख) स्याम उलटे परे देखे, बढ़ी सोभा-लहरि-१०-६७। (ग) सोभा मेरे स्यामहिं पर सोहै-१०-१५८। (घ) तदपि सूर तरि सकीं न सोभा, रहीं प्रेम पचि हारि-६२८।
उ.- बरनौं कहा सदन की सोभा बैकुंठहूँ तैं राजै री-१०-१३९।
किसी की सुंदरता बढ़ानेवाली कोई वस्तु, बात या विशेषता।
उ.- कुबिजा भई स्याम-रँग राती तातैं सोभा पाई-१-६३।
उ.- (क) गनिकासुत सोभा नहिं पावत जाके कुल कोऊ न पिता री-१-३४। (ख) पति कौं ब्रत जो धरै तिय, सो सोभा पावै-२-९।
शोभा बढ़ाने या देनेवाला, सुंदर।
उ.- (क) तिलक ललित ललाट केसरि-बिंदु सोभाकारि-१०-१६९। (ख) केहरी-नख उर पर रुरै सुठि सोभाकारि-१०-१३४।
उ.- (क) गत पतंग राका ससि बिष संग घटा सघन सोभात -२१८५। (ख) नैन दोऊ ब्रह्म से परम सोभात से-२६१७।
शोभा बढ़ाने या देनेवाला, सुंदर।
जिसमें उभार हो, उभरा हुआ, उभारदार।
सोहती, फबती या शोभित होती है।
उ.- कर सिर-तर करि स्याम मनोहर अलक अधिक सोभावै-१०-६५।
उ.- (क) छाता लों छाँह किए सोभित हरि छाती-१-२३। (ख) उर सोभित भृगु रेख-१०-४। (ग) सोभित सीस लाल चौतनियाँ -१०-१०६। (घ) मानौ गज-मुक्ता मरकत पर सोभित सुभंग साँवरे गात -१०-१५९। (ङ) सोभित अति कुंडल की डोलनि-६३९।
एक लता जिसका रस पीले रंग का और मादक होता था। यह रस वदिक ऋषिपान किया करते थे।
उ.- मानौ सोम संग करि लीने, जानि आपने गोती री-१०-१३९।
उ.-(क) सेज छाँड़ि भू सोयौ-१-४३। (ख) बैठत उठत सेज-सोवत मैं कंस डरनि अकुलात-१०-१२। (ग) स्वच्छ सेज मैं तैं मुख निकसत गयौ तिमिरि मिटि मंद-१०-२०३। (घ) दामिनि की दमकनि बूँदनि की झमकनि सेज की तलफ कैसे जीजियत माई है-२८२७।
राजा की शैया या शयनगृह पर पहरा देनेवाला।
उ.-सोइ रहौ सुथरी सेजरिया-१०-२४६।
उ.-(क) कमलनैन पौढ़े सुख-सेज्या-१-१६८। (ख) किंज-भवन कुसुमनि की सेज्या अपने हाथ निवारत पात -१८९३। (ग) कोमल कमल दलनि सेज्या रची-२२९८।
जो चंद्रमा से उत्पन्न हो।
द्वादश ज्योतिलिंगों में एक।
उक्त ज्योतिलिंग का मंदिर जो कठियावाड़ में है।
सोम रस पीने या उसका पान करनेवाला।
उ.- सोमवंश पुरुरवा सौं भयौ-९-२१।
सोमवंशी, सोमवंशीय, सोमवंसी, सोमवंसीय
सोमवंशी, सोमवंशीय, सोमवंसी, सोमवंसीय
सोमवार को पड़नेवाली अमावस्या जो पुण्य तिथियों या पर्वो में गिनी जाती है और हिंदू उस दिन नदी-स्नान करते हैं।
सात वारों में एक जो रविवार और मंगलवार के बीच में पड़ता है और सोम या चंद्रमा का वार माना जाता है।
जिसने सोमयज्ञ किया हो, जो सोमयज्ञ करता हो।
उ.- (क) संकर कौ मन हरथौ कामिनी, सेज छाँड़ि भू सोयौ-१-४३। (ख) सूरदास जो चरन सरन रहथौ, सो जन निपट नींद भरि सोयौ-१-५४।
उ.- (क) होत जय-जय सोर-१-२५३। (ख) चहुँ दिसि सूर सोर करि घावै-९-१०४। (ग) कटक सोर अति घोर-९-११५। (घ) लंक मैं सोर परथौ-९-१३९।
मुहा.- सोर पारना-ललकारना। सोर पारि-ललकारकर, चुनौती देकर। उ.-सोर पारि हरि सुबलहिं धाए, गहथौ श्रीदामा जाइ-१०-२४०।
उ.- रोर कैं जोर सैं सोर घरनी कियौ, चल्यौ द्विज द्वारिका द्वार ठाढ़ौ-१-५।
उ.-झहरात गहरात दवानल आयौ। घेरि चहुं ओर करि सोर अंदोर बन धरनि आकास चहुं पास छायी-५९६।
गुजरात और दक्षिण काठियावाड़ का प्राचीन नाम।
एक राग जिसमें जब शुद्ध स्वर लगते हैं।
मृत्यु के तीसरे दिन होनेवाला संस्कार जिसमें मृतक की राख बटोरकर नदी में बहा दी जाती है।
उ.- सोरह सहस घोष कुमारि-७४५।
सोलह चित्ती कौड़ियाँ जिनसे जुआ खेला जाता है।
वह जुआ जो सोलह कौड़ियों से खेला जाता है।
उ.- (क) सोवत सपने मैं ज्यौं संपति, त्यौं दिखाइ बौरावै-१-४२। (ख) सोवत मुदित भयौ सपने मैं पाई निधि जो पराई-१-१४७।
उ.- सोवत नींद आइ गइ स्यामहिं-५१५।
मुहा.- सोवत जागत-सोते-जागते, किसी भी समय। उ.- सूरदास मोहिं पलक न बिसरत मोहन मूरति सोवत-जागत-३४०७।
उ.- सूरदास रावन कुल खोवन सोवत सिंह जगायौ-९-८८।
सोने की क्रिया या भाव, शयन, निद्रा।
शरीर के किसी अंग का सुन्न होना।
किसी बात या कार्य की ओर से उदासीन होकर मौन या निष्क्रिय हो जाना।
वह स्थान जहाँ स्त्री प्रसव करती है।
मिटटी से निकलनेवाला एक प्रसिद्ध क्षार।
उ.- देखत गोकुल लोग जहाँ नंद उठे सुनि सोरी-२४९२।
बरतन में हो जानेवाला महीन छेद जिसमें से पानी आदि द्रव टपक-टपक कर बह जाते हैं।
क्षत्रियों का एक प्राचीन राजवंश जिसने बहुत समय तक गुजरात में राज्य किया था।
(सं. षोडश, प्रा. सोलस, सोरह)
स्त्रियों के श्रृंगार के सौलह अंग जिनसे श्रृंगार पूरा समझा जाता है- उबटन लगाना, स्नान करना, स्वच्छ बस्त्र धारण करना, केश-सज्जा, नेत्र आँजना, माँग भरना, महावर लगाना, भाल पर तिलक या बिंदी लगाना,चिबुक पर तिल बनाना, मेंहदी लगाना, सुगंध लगाना, आभूषण पहनना, फूलमाला पहनना, मिस्सी लगाना, पान खाना और होंठ रँगना।
मुहा.- सोलहों आने- पूरा-पूरा, सब।
वह पशु जिसका शिकार किया जाता है।
उ.- (क) सरसौं मेथी सोवा पालक-३९७। (ख) सोवा अरु सरसौं सरसाई-२३२१।
उ.- रुचिर सेज लै गइ मोहन कौं भुजा उछंग सोवावति-१०-७३।
उ.- जसुदा मदन गुपाल सोवावै-१०-६५।
उ.- भरि सोवै सुख-नींद मैं तहँ सुजाइ जगावै।¨¨¨¨¨¨। एकनि कौं दरसन ठगै, एकनि के सँग सोवै-१-४४।
उ.- आजु न सोवौं नंद-दुहाई, रनि रहौंगौ जागत-४२०।
उ.-तुम सोवौ, मैं तुम्हैं सुवाऊँ-१०-२३०।
वह पुल जो लंका पर चढ़ाई के समय श्रीराम ने समुद्र पर बाँधा था।
उ.-वै कहा करैगी, सेति राखै री-१५४८।
करण और अपादान कारक की विभक्ति, से।
(प्र. सुंतो, पुं. हिं. सेंति, सेंती)
उ.-(क) कहन लग्यौ, मम सुत ससि गोद। ता सेती ससि करत बिनोद-५-३। (ख) तप कीन्हैं सो दैहैं आग। ता सेती तुम कीनौ जाग-९-३।
मिटटी का ऊँचा पटाव धुस्स।
नदी, जलाशय आदि के पार जाने के लिए बनाया गया पुल।
वह अर्थात ब्रह्म मैं ही हूँ।
वह अर्थात् ब्रह्म मैं ही हूँ।
उ.- मोरमुकुट सिर सोहई-४३७।
ब्याह की एक रीति जिसमें लड्के का तिलक चढ. जाने के बाद उसके यहॉं लड़की के लिए फल, मिठाई, गहने, कपड़े आदि चीजें भेजी जाती हैं।
सिंदूर, मेंहदी आदि सुहाग-सूचक वस्तुएँ।
(सुहाग-सूचक) सिंदूर रखने की डिबिया, सिंदूरा।
उ.- सीस मुकुट सिर सोहत-५६५।
उ.- वृदाबन बिहरत नँदनंदन ग्वाल सखा सँग सोहत-६४५।
उ.- कान्ह गरैं सोहति मनि-माला-१०-९४।
एक पौधा जिसके फूलों के दलों से जीभ की उपमा दी जाती है।
सौसन पौधे के फल-जैसे लाली लिये नीले रंग का।
उ.- बजावत मृदंग ताल, अरस-परस करै बिहार सोभा को बरनी न पार एक-एक दै सोहन-२४२८।
उ.- (क) बार-बार कह बीर दोहाई, तुम मानत नहिं सोहन-८८६। (ख) त्रिय तनु को दुख दूरि कियौ पिय दै-दैं अपनी सोहन-पृ ३१५-४४।
भला या रुचिकर लगना, फबना।
उ.- पहिरि पवित्रा सोहनो।¨¨¨¨¨¨। गिरिधरन लाल छबि सोहनो-२२८०।
वह अर्थात् ब्रह्म मैं ही हूँ।
बच्चे का जन्म होने पर गाए जानेवाले मंगलगीत।
(सं. सूतिगृह, प्रा. सूइहर)
(सं. सूतिगृह, प्रा. सूइहर)
स्थान जहाँ बच्चे का जन्म हो।
नाव का पाल खींचने की रस्सी।
किसी बस्तु या अंग पर धीरे-धीरे हाथ फेरना।
बच्चे के जन्म पर गाए जानेवाले गीत।
किसी देवी-देवता की पूजा के गीत।
उ.- कमल मुख कर कमल लोचन कमल मृदु पद सोहहीं-१० उ.-२४।
उ.- बिछुरे बारि मीनहिं अनत कहा सोहाइ-३४२४।
उ. बाँधत बंदन-माल, साथियै द्वारै धुजा सुहाई-सारा. ३९५।
उ.- सूरदास प्रभु बिनु ब्रज ऎसो, एको पल न सोहाई-२५३८।
उ.- कहा करहि, कहाँ जाइ सखी री हरि बिनु कछु न सोहाए-२९९६।
उ.- राज-सोहाग बढ़ो सबै कहा निहोरो मोहिं-१० उ.-८।
सोहागिन, सोहागिनि, सोहागिनी, सौहागिल
सधवा या सौभाग्यवती स्त्री।
उ.- ता तीरथ-तप के फल लैके, स्याम सोहागिनि कीन्ही-६५६।
उ.- अबलन जोग सिखावन आए चेरिहिं चपरि सोहागु-३०९५।
अच्छा या भला लगता है, रुचता है।
उ.- (क) सबन इहै सुहात-२६८१। (ख) कछु न सुहात दिवस अरु राती-२८८२। (ग)नहिंन सोहात कछु हरि, तुम बिनु-३४२३। (घ) स्रवन कछू न सोहात-३४२६।
उ.- बात बिचारि सोहाती कहियै-३२३१।
उ.- तब हरि कहथौ, मोहिं राधा बिन पल-छिन कछु न सेहाय-सारा. ७२२।
उ.- मिल्यौ सोहायो साथ श्याम कौ कहाँ कंस, कहाँ काग-३०९५।
बहुत छोटी-छोटी सादी या मीठी पूरियाँ जो देवी-देवताओं के पुचापे के लिए की जाती हैं।
उ.- कान्ह कुँवर कौ कनछेदन है हाथ सोहारी भेली गुर की-१०-१८०।
एक तरह का सादा या नमकीन पकवाल जो मैदे का बनता है।
प्रिय या रुचिकर लगना, रुचना।
बच्चे के जन्म पर गाए जानेवाले गीत।
उ.- गावौं हरि कौ सोहिलौ मन-आखर दै मोहिं- १०-४०।
सोहिं, सोहीं, सोहें, सोहैं
उ.- संग-संग बल मोहन सोहैं- १०-११७।
शोभित होता है, सुंदर लगता है।
उ.- (क) सेत उपरना सोहै-१-४४। (ख) मोर मुकुट पीताम्बर सोहै-३-१३। (ग) भृकुटि पर मसि-बिंदु सोहे-१०-२२५।
उ.- सुंदर स्याम हँसत सजनी सों नंद बबा की सौं री।
उ.- (क) तिनुका सौं अपने जन कौ गुन मानत मेरु समान- १-८। (ख) हरि सौं ठाकुर और न जन कौं-१-९।
उ.- (क) जज्ञ-भाग नहिं लियौ हेत सौं- १-२५। (ख) गजराज ग्राह सौं अटक्थौ-१-३२। (ग) प्रेम पतंग दीप सौं- १-५५। (घ) बिमुखनि सौं रति जोरत दिन-प्रति- १-४९। (ङ) भावी काहूँ सौ न टरै-१-२६४। (च) कुँवरि सौं कहति वृषभानु-धरनी-६९८।
खत्रियों की एक प्रसिद्ध जाति।
उ.-(क) सिला तरी जल माहिं सेत बैधि-१-३४। (ख) सकल विषय-बिकार तजि तू उतरि सायर-सेत-१-३११। (ग) करि कपि कटक चले लंका कौं छिन मैं बाँध्यौ सेत-सारा. २८।
उ.-(क) सेत उपरना सोहै-१-४४। (ख) सेत सींग सुहाइ-१-५६। (ग) नीलांबर पाटंबर सारी सेत पीत चुनरी अरुनाए-७८४।
मुहा.- स्याम चिकुर भए सेत-काले बाल सफेद हो गये, युवावस्था से बुढ़ापा आ गया। उ.-इतनौ जन्म अकारथ खौयौ, स्याम चिकुर भए सेत-१-३२२।
सफेद जाति का नाग जो सर्पों के अष्टकुल में एक है।
उ.-मोकों तुम अब जज्ञ करावहु। तच्छक कुटुँब समेत जरावहु। बिप्रन सेतकुली जब जारी। तव राजा तिनसौं उच्चारी-१० उ.-२०५।
इकट्ठा, संगृहीत या संचित करना।
उ.- (क) याहू सौंज संचि नहिं राखी-१-१३०। (ख) यह सौंज लादि कै हरि कै पुर लै जाहि-१-३१०। (ग) षटरस सौंज बनाइ जसोदा-३९७। (घ) दै सब सौज अनत लोकपति निपट रंक की नाई-१० उ.-१३३।
गुप्त रूप से किया गया मंतव्य।
शोभा, पद और मान बढ़ानेवाली वस्तुएँ।
उ.- बल बिद्या धन धाम रूप गुन और सकल मिथ्या सौंजाई-१-१४।
उ.- देखि बदन चकित भई सौंतुष की सपनैं- ४३९।
मिट्टी आदि लगाकर गंदा करना।
खूबसूरती, सुंदरता, रमणीयता।
तपी हुई भूमि पर वर्षा का पहला छींटा पड़ने या भुने हुए चने या बेसन की सुगंध के समान सुगंधवाला।
उ.- दधि-माखन द्वै माट अछुते तोहिं सौंपति हौं सहियौ-१०-३१३।
(देख-रेख आदि के लिए किसी के) सुपुर्द या हवाले करना।
(सं. समर्पण, प्रा. सउप्पण)
सँभालने केलिए कहना, सहेजना।
(सं. समर्पण, प्रा. सउप्पण)
उ.- अजहूँ सिय सौंपि नतरु बीस भुजा भानै-९-९७।
सौंपि दई-सुपुर्द या समर्पण कर दिया।
उ.-स्याम बिना ये चरित करै को, यह कहिकै तनु सौंपि दई।
सौंपि गए-सँभालने-सहेजने को सुपुर्द कर गये।
उ.- भली भई तुम्हैं सोपि गए मोहिं, जान न दैहौं तुमकौं-६८१।
सँभालने-सहेजने को सुपुर्द किया।
उ.- कीजै कहा बाँधि करि सौंपी सूर स्याम के पानि-पृ. ३२२ (१३)।
सँभालने-सहेजने के लिए दो।
उ.- यह तौ सूर ताहि लै सौंपो जिनके मन चकरी-३३६०।
उ.- (क) सूर सबै इनको क्यौं सौंप्यो, यह कहि पछितावै- पृ . ३३० (९०)। (ख) सिंधु तें काढ़ि संभु कर सौंप्यौ गुनहगार की नाई-३०७७।
एक पौधा जिसके बीज दवा और मसाले के काम आते हैं।
वह स्थान जहाँ स्त्री प्रसव करती है, सूतिकागार।
उ.- (क) उनहूँ जाइ सौंह दै पूछौ मैं करि पठयौ सटिया-१-१९२। (ख) कहा कहौं बलि जाउँ, छोरि तू, तेरी सौंह दिवाई-३६३। (ग) कंस नृपति की सौंह है, पुनि-पुनि कही तुमको-२५७७। (घ) चरन कमल की सौह कहत हौं, इह सँदेस मोहिं बिष सों लागत-३४०७।
उ.- (क) दै दै सौंहैं नंद बबा की जननी पै लै आइ-१०-२४०। (ख) मोहिं अपने बबा की सोहै कान्हहिं अब न पत्याउँ-३४५।
नब्बे से दस अधिक की संख्या या अंक।
जो गिनती में पचास का दूना हो।
उ.- (क) जाके जोधा हे सौ भाई-१-२४। (ख) सौ भैया दुरजोधन राजा-१-४३।
मुहा.- सौ बातन की एक बात- सारांश, तात्पर्य। उ.- सौ बातन की एकै बात-१० उ.-१२६। सौ की सीधी एक-सबका निचोड़ या सार। सौ बार कहना- बार-बार या अनेक बार कहना। उ.-जो पे जिय लज्जा नहीं, कहा कहौं सौ बार-१-३२५।
किसी वस्तु की प्राप्ति या सुख के उपभोग की प्रबल इच्छा।
मुहा,- सौक से- प्रसन्नता से, सहर्ष।
जिसे किसी बात का शौक या व्यसन हो।
ठाट-बाट से या बना-ठना रहनेवाला।
तरह-तरह के शौक या व्यसन करने का भाव।
बना-ठना या ठाट-बाट से रहने का भाव।
काव्य का एक गुण जो ग्राम्य और परुष शब्दों के त्याग एवं कोमल शब्दों के प्रयोग से आता है।
किसी वस्तु की प्राप्ति या उसके सुखोपभोग की प्रबल कामना।
किसी बात का शौक या व्यसन करनेवाला।
सुगंधित तेल आदि का व्यापार करनेवाला, गंधी।
सुगत (बौद्ध) का अनुयायी, बौद्ध भिक्षु।